शक्तिपीठ

श्रीमद्देवीभागवत (पाँचवा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 33 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ राजा सुरथ और समाधि वैश्य का सुमेधा मुनि के आश्रम पर गमन और सुमेधा के द्वारा देवीमहिमा का वर्णन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ वैश्य बोला- मेरा परिवार अब असहाय हो गया है। मेरे बिना वे अत्यन्त कष्ट पा रहे होंगे। दुःख और शोक से संतप्त होकर वे महान् चिन्तित हो जायँगे । राजन्! मेरी पत्नी और पुत्र शारीरिक सुख पा रहे हैं अथवा नहीं- इस प्रकार की चिन्ता से आतुर मेरा चित्त सदा अशान्त बना रहता है। राजन्! अपने पुत्र, स्त्री, घर और बन्धु-बान्धवों को मैं फिर कब देखूँगा। गृहकी चिन्ता में अत्यन्त आकुल मेरा मन किसी प्रकार भी स्वस्थ नहीं हो पाता। राजा सुरथ ने कहा- महामते! जिन दुराचारी एवं प्रचण्ड मूर्ख पुत्रों ने तुम्हें निकालकर घर से बाहर कर दिया है, उन्हें देखकर अब तुमको कौन-सा सुख प्राप्त होगा ? दुःख देनेवाले सुहृद् की अपेक्षा शत्रु को उत्तम माना जाता है। अतः मन को स्थिर करके तुम मेरे साथ आनन्द करो। वैश्य ने कहा - राजन्! असीम दुःख से संतप्त मेरा मन किसी प्रकार भी स्थिर नहीं हो रहा है; क्योंकि दुराचारी भी बड़ी कठिनता से जिसका त्याग करते हैं, उस कुटुम्ब की चिन्ता मुझे सता रही है। राजा ने कहा- राज्यसम्बन्धी मानसिक दुःख के कारण मैं भी दुःखी हूँ। ये मुनिजी बड़े शान्तस्वरूप हैं। अब हम दोनों व्यक्ति इन्हीं से इस शोक-नाश की औषध पूछें। व्यासजी कहते हैं- इस प्रकार विचार करके राजा सुरथ और समाधि वैश्य- दोनों अत्यन्त नम्र होकर शोक का कारण पूछने के लिये सुमेधा मुनि के पास गये। उस समय वे परमादरणीय ऋषि आसन लगाकर शान्त बैठे थे। राजा ने सामने जाकर मस्तक झुकाया और शान्तिपूर्वक बैठकर कहना आरम्भ किया राजा सुरथ ने कहा- मुनिवर ! अभी इन वैश्य से वन में मेरी मित्रता हो गयी है। स्त्री और पुत्रों के द्वारा ये घर से निकाल दिये गये हैं। संयोगवश मुझसे इनकी भेंट हो गयी। कुटुम्ब से अलग होने के कारण इनके मन में अपार दुःख हो रहा है। इन्हें किसी प्रकार भी शान्ति नहीं मिल रही है। इस समय यही स्थिति मेरी भी है। महामते! राज्य मेरे हाथ में नहीं है। मैं दुःख से शोकातुर रहता हूँ। व्यर्थ की चिन्ता मेरे हृदय से बाहर नहीं निकल पाती। सोचता रहता हूँ 'अब मेरे घोड़े दुर्बल हो गये होंगे। हाथियों पर शत्रुओं का अधिकार हो गया होगा। मेरी अनुपस्थिति में सेवकगण कष्ट से समय व्यतीत करते होंगे। क्षणमात्र में शत्रुओं द्वारा मेरा सारा कोष-भण्डार नष्ट-भ्रष्ट हो जायगा।' इस प्रकार की चिन्ता से चिन्तित रहने के कारण मुझे रात में सुख की नींद नहीं आ रही है। मैं जानता हूँ, यह सम्पूर्ण संसार स्वप्न की भाँति मिथ्या है। प्रभो! इस विषय की पूर्ण जानकारी होने पर भी निरन्तर संसार में चक्कर काटने वाला मेरा मन स्थिर नहीं हो पाता। मैं कौन, घोड़े कौन, हाथी कौन और ये बन्धु-बान्धव कौन ? पुत्र कौन और मित्र कौन– जिनका दुःख मेरे हृदय को संतप्त कर रहा है? जानता हूँ- यह बिलकुल भ्रम है, फिर भी मेरे मन से सम्बन्ध रखने वाला मोह दूर नहीं हो पाता। इसमें कौन सा ऐसा कारण है? स्वामिन्! आपको सभी बातें विदित हैं। सम्पूर्ण संदेहों का निवारण करने की आपमें योग्यता है। दयानिधे! अब मेरे तथा इन वैश्य के मोह का कारण बताने की आप कृपा करें क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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