राधेश्याम

gopal gajjar May 27, 2022

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. संक्षिप्त महाभारत-कथा पोस्ट–021 (आदि पर्व) आज की कथा में:– माण्डव्य ऋषि की कथा, धृतराष्ट्र आदि का विवाह और पाण्डु का दिग्विजय तथा धृतराष्ट्र के पुत्रों का जन्म और नाम जनमेजय ने पूछा–'भगवन् ! धर्मराज ने ऐसा कौन-सा कर्म किया था, जिसके कारण उन्हें ब्रह्मर्षि ने शाप दिया और वे शूद्र-योनि में पैदा हुए ?' वैशम्पायनजी ने कहा–'जनमेजय ! बहुत दिनों की बात है, माण्डव्य नाम के एक यशस्वी ब्राह्मण थे। वे बड़े धैर्यवान्, धर्मज्ञ, तपस्वी एवं सत्यनिष्ठ थे। वे अपने आश्रम के दरवाजे पर वृक्ष के नीचे हाथ ऊपर उठाकर तपस्या करते थे। उन्होंने मौन का नियम ले रखा था। बहुत दिनों के बाद एक दिन कुछ लुटेरे लूट का माल लेकर वहाँ आये। बहुत से सिपाही उनका पीछा कर रहे थे, इसलिये उन्होंने माण्डव्य के आश्रम में लूट का सारा धन रख दिया और वहीं छिप गये। सिपाहियों ने आकर माण्डव्य से पूछा कि 'लुटेरे किधर से भगे ? शीघ्र बतलाइये, हम उनका पीछा करें।' माण्डव्य ने उनका कुछ भी उत्तर नहीं दिया। राजकर्मचारियों ने उनके आश्रम की तलाशी ली, उसमें धन और चोर दोनों मिल गये। सिपाहियों ने माण्डव्य मुनि और लुटेरों को पकड़कर राजा के सामने उपस्थित किया। राजा ने विचार करके सबको शूली पर चढ़ाने का दण्ड दिया। माण्डव्य मुनि शूली पर चढ़ा दिये गये। बहुत दिन बीत जाने पर भी बिना कुछ खाये पिये वे शूली पर बैठे रहे, उनकी मृत्यु नहीं हुई। उन्होंने अपने प्राण छोड़े नहीं, वहीं बहुत से ऋषियों को निमन्त्रित किया। ऋषियों ने रात्रि के समय पक्षियों के रूप में आकर दुःख प्रकट किया और पूछा कि आपने क्या अपराध किया था ? माण्डव्य ने कहा–'मैं किसे दोषी बनाऊँ ? यह मेरे ही अपराध का फल है।' पहरेदारों ने देखा कि ऋषि को शूली पर चढ़ाये बहुत दिन हो गये, परन्तु ये मरे नहीं। उन्होंने जाकर अपने राजा से निवेदन किया। राजा ने माण्डव्य मुनि के पास आकर प्रार्थना की कि 'मैंने अज्ञानवश आपका बड़ा अपराध किया। आप मुझे क्षमा कीजिये, मुझ पर प्रसन्न होइये।' माण्डव्य ने राजा पर कृपा की, उन्हें क्षमा कर दिया। वे शूली पर से उतारे गये। जब बहुत उपाय करने पर भी शूल उनके शरीर से नहीं निकल सका, तब वह काट दिया गया। गड़े हुए शूल के साथ ही उन्होंने तपस्या की और दुर्लभ लोक प्राप्त किये। तब से उनका नाम अणीमाण्डव्य पड़ गया। महर्षि माण्डव्य ने धर्मराज की सभा में जाकर पूछा कि 'मैंने अनजान में ऐसा कौन-सा पाप किया था, जिसका यह फल मिला ? जल्दी बतलाओ, नहीं तो मेरी तपस्या का बल देखो।' धर्मराज ने कहा–'आपने एक छोटे से फतिंगे की पूँछ में सींक गड़ा दी थी। उसी का यह फल है। जैसे थोड़े से दान का अनेक गुना फल मिलता है, वैसे ही थोड़े से अधर्म का भी कई गुना फल मिलता है।' अणीमाण्डव्य ने पूछा–'ऐसा मैंने कब किया था ?' धर्मराज ने कहा–'बचपन में!' इस पर अणीमाण्डव्य बोले–'बालक बारह वर्ष की अवस्था तक जो कुछ करता है, उससे उसे अधर्म नहीं होता; क्योंकि उसे धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं रहता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। तुम्हें मालूम होना चाहिये कि समस्त प्राणियों के वध की अपेक्षा ब्राह्मण का वध बड़ा है। इसलिये तुम्हें शूद्रयोनि में जन्म लेकर मनुष्य बनना पड़ेगा। आज मैं संसार में कर्मफल की मर्यादा स्थापित करता हूँ। चौदह वर्ष की अवस्था तक किये कर्मों का पाप नहीं लगेगा, उसके बाद किये कर्मों का फल अवश्य मिलेगा।' इसी अपराध के कारण माण्डव्य ने शाप दिया और धर्मराज शूद्रयोनि में विदुर के रूप में उत्पन्न हुए। वे धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में बड़े निपुण थे। क्रोध और लोभ तो उन्हें छू तक नहीं गया था। वे बड़े दूरदर्शी, शान्ति के पक्षपाती और समस्त कुरुवंश के हितैषी थे। वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के जन्म से कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र तीनों की ही बड़ी उन्नति हुई। अन्न की उपज बढ़ गयी। समय पर अपने-आप वर्षा होने लगी। वृक्षों में बहुत से फल-फूल लगने लगे। पशु-पक्षी आदि भी सुखी हो गये। नगरों में व्यापारी, कारीगर और विद्वानों की संख्या बढ़ गयी। संत सुखी हो गये, कोई डाकू नहीं रहा, पापियों का अभाव हो गया। न केवल राजधानी में, सारे देश में ही सत्ययुग का सा समय हो गया। न कोई कंजूस था और न विधवा स्त्रियाँ। ब्राह्मणों के घर में सदा उत्सव होते रहते। भीष्म बड़ी लगन से धर्म की रक्षा करते थे। उन दिनों सर्वत्र धर्मशासन का बोलबाला था धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर के कार्य देखकर पुरवासियों को बड़ी प्रसन्नता होती थी। भीष्म बड़ी सावधानी से राजकुमारों की रक्षा करते थे। सबके यथोचित संस्कार हुए। सबने अपने अपने अधिकारानुसार अस्त्रविद्या तथा शास्त्रज्ञान सम्पादन किया। सबने गजशिक्षा और नीतिशास्त्र का अध्ययन किया इतिहास, पुराण तथा अन्य अनेक विद्याओं में उनकी अच्छी पैठ थी। सभी विषयों पर वे अपना निश्चित मत रखते थे। मनुष्य में सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर थे पाण्डु; और सबसे अधिक बलवान् थे धृतराष्ट्र। विदुर के समान धर्मज्ञ और धर्मपरायण तीनों लोकों में कोई नहीं था। उन दिनों सब लोग यही कहते थे कि वीरप्रसविनी माताओं में काशीनरेश की कन्या, देशों में कुरुजांगल, धर्मज्ञों में भीष्म और नगरों में हस्तिनापुर सबसे श्रेष्ठ हैं। धृतराष्ट्र जन्मान्ध थे और विदुर दासी के पुत्र, इसलिये वे दोनों राज्य के अधिकारी नहीं माने गये। पाण्डु को ही राज्य मिला। भीष्म ने सुना कि गान्धारराज सुबल की पुत्री गान्धारी सब लक्षणों से सम्पन्न है और उसने भगवान् शंकर की आराधना करके सौ पुत्रों का वरदान भी प्राप्त कर लिया है। तब भीष्म ने गान्धारराज के पास दूत भेजा। पहले तो सुबलने अंधे के साथ अपनी पुत्री का विवाह करने में बहुत सोच-विचार किया परन्तु फिर कुल, प्रसिद्धि और सदाचारपर विचार करके विवाह करने का निश्चय कर लिया। जब गान्धारी को यह बात मालूम हुई कि मेरे भावी पति नेत्रहीन हैं, तब उसने एक वस्त्र को कई तह करके उससे अपनी आँखें बाँध लीं। पतिव्रता गान्धारी का यह निश्चय था कि मैं अपने पतिदेव के अनुकूल रहूँगी। उसके भाई शकुनि ने अपनी बहिन को धृतराष्ट्र के पास पहुँचा दिया। भीष्म की अनुमति से विवाहकार्य सम्पन्न हुआ। वह अपने चरित्र और सद्गुणों से अपने पति और परिवार को प्रसन्न रखने लगी। यदुवंशी शूरसेन के पृथा नाम की बड़ी सुन्दरी कन्या थी। वसुदेवजी इसी के भाई थे। इस कन्या को शूरसेन ने अपनी बुआ के सन्तानहीन लड़के कुन्तिभोज को गोद दे दिया था। यह कुन्तिभोज की धर्मपुत्री पृथा अथवा कुन्ती बड़ी सात्त्विक, सुन्दरी और गुणवती थी। कई राजाओं ने उसे माँगा था, इसलिये कुन्तिभोज ने स्वयंवर किया। स्वयंवर में कुन्ती ने वीरवर पाण्डु को जयमाला पहना दी। अतः उनके साथ उसका विधिपूर्वक विवाह हुआ। राजा पाण्डु वहाँ से बहुत सी दहेज की सामग्री प्राप्त करके अपनी राजधानी हस्तिनापुर लौट आये। महात्मा भीष्म ने पाण्डु का एक और विवाह करने का निश्चय किया; अतः वे मन्त्री, ब्राह्मण, ऋषि, मुनि और चतुरंगिणी सेना के साथ मद्रराज की राजधानी में गये। उनके कहने पर शल्य ने प्रसन्न चित्त से अपनी यशस्विनी एवं साध्वी बहिन माद्री उन्हें दे दी। उसके साथ विधिपूर्वक विवाह करके धर्मात्मा पाण्डु अपनी दोनों स्त्रियों के साथ आनन्द से रहने लगे। फिर राजा पाण्डु ने पृथ्वी के दिग्विजय की ठानी। उन्होंने भीष्म आदि गुरुजनों, बड़े भाई धृतराष्ट्र और श्रेष्ठ कुरुवंशियों को प्रणाम करके आज्ञा प्राप्त की और चतुरंगिणी सेना लेकर यात्रा आरम्भ की। ब्राह्मणों ने मंगलपाठ किये और आशीर्वाद दिये। यशस्वी पाण्डु ने सबसे पहले अपने अपराधी शत्रु दशार्ण नरेश पर चढ़ाई की और उसे युद्ध में जीत लिया। इसके बाद प्रसिद्ध विजयी वीर मगधराज को राजगृह में जाकर मार डाला। वहाँ से बहुत सा खजाना और वाहन आदि लेकर उन्होंने विदेह पर चढ़ाई की और वहाँ के राजा को परास्त किया। इसके बाद काशी, शुम्भ, पुण्ड्र आदि पर विजय का झंडा फहराया। अनेकों राजा पाण्डु से भिड़े और नष्ट हो गये। सबने पराजित होकर उन्हें पृथ्वी का सम्राट् स्वीकार किया। साथ ही मणि-माणिक्य, मुक्ता, प्रवाल, सोना, चाँदी, गाय, घोड़े, रथ आदि भी भेंट में दिये। महाराज पाण्डु ने उनकी भेंट स्वीकार की और हस्तिनापुर लौट आये। पाण्डु को सकुशल लौटा देखकर भीष्म ने उन्हें हृदय से लगा लिया, उनकी आँखों में आनन्द के आँसू छलक आये। पाण्डु ने सारा धन भीष्म और दादी सत्यवती को भेंट किया। माता के आनन्द की सीमा न रही। भीष्मजी ने सुना कि राजा देवक के यहाँ एक सुन्दरी एवं युवती दासीपुत्री है। उन्होंने उसे माँगकर परम ज्ञानी विदुरजी के साथ उसका विवाह कर दिया। उसके गर्भ से विदुर के समान ही गुणवान् कई पुत्र उत्पन्न हुए।' वैशम्पायनजी ने कहा–'एक बार महर्षि व्यास हस्तिनापुर में गान्धारी के पास आये। गान्धारी ने सेवा-शुश्रूषा करके उन्हें बहुत ही सन्तुष्ट किया। तब उन्होंने उससे वर माँगने को कहा। गान्धारी ने अपने पति के समान ही बलवान् सौ पुत्र होने का वर माँगा। इससे समय पर उसके गर्भ रहा और वह दो वर्ष तक पेट में ही रुका रहा। इस बीच में कुन्ती के गर्भ से युधिष्ठिर का जन्म हो चुका था। स्त्री स्वभाववश गान्धारी घबरा गयी और अपने पति धृतराष्ट्र से छिपाकर इसने गर्भ गिरा दिया। इसके पेट से लोहे के गोले के समान एक मांस-पिण्ड निकला। दो वर्ष पेट में रहने के बाद भी उसका यह कड़ापन देखकर गान्धारी ने उसे फेंक देने का विचार किया। भगवान् व्यास अपनी योगदृष्टि से यह सब जानकर झटपट उसके पास पहुँचे और बोले–'अरी सुबल की बेटी! तू यह क्या करने जा रही है ?' गान्धारी ने महर्षि व्यास से सारी बात सच-सच कह दी। गान्धारी ने कहा–'भगवन् ! आपके आशीर्वाद से गर्भ तो मुझे पहले रहा, परन्तु सन्तान कुन्ती को ही पहले हुई। दो वर्ष पेट में रहने के बाद भी सौ पुत्रों के बदले यह मांस-पिण्ड पैदा हुआ है। यह क्या बात है?' व्यासजी ने कहा–'गान्धारी ! मेरा वर सत्य होगा। मेरी बात कभी झूठी नहीं हो सकती, क्योंकि मैंने कभी हँसी में भी झूठ नहीं कहा है। अब तुम चटपट सौ कुण्ड बनवाकर उन्हें घी से भर दो और सुरक्षित स्थान में उनकी रक्षा का विशेष प्रबन्ध कर दो तथा इस मांस-पिण्ड पर ठंडा जल छिड़को।' जल छिड़कने पर उस पिण्ड के सौ टुकड़े हो गये। प्रत्येक टुकड़ा अँगूठे के पोरुए के बराबर था। उनमें एक टुकड़ा सौ से अधिक भी था। व्यासजी के आज्ञानुसार जब सब टुकड़े कुण्डों में रख दिये गये, तब उन्होंने कहा–'इन्हें दो वर्ष के बाद खोलना।' इतना कहकर वे तपस्या करने के लिये हिमालय पर चले गये। समय आने पर उन्हीं मांस-पिण्डों में से पहले दुर्योधन और पीछे गान्धारी के अन्य पुत्र उत्पन्न हुए। यह बात कही जा चुकी है कि दुर्योधन का जन्म होने के पहले ही युधिष्ठिर का जन्म हो चुका था। जिस दिन दुर्योधन का जन्म हुआ, उसी दिन परम पराक्रमी भीमसेन का भी जन्म हुआ था। दुर्योधन जन्मते ही गधे की भाँति रेंकने लगा। उसका शब्द सुनकर गधे, गीदड़, गिद्ध और कौए भी चिल्लाने लगे, आँधी चलने लगी, कई स्थानों में आग लग गयी। इन उपद्रवों से भयभीत होकर धृतराष्ट्र ने ब्राह्मण, भीष्म, विदुर आदि सगे-सम्बन्धियों तथा कुरुकुल के श्रेष्ठ पुरुषों को बुलवाया और कहा–'हमारे वंश में पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ज्येष्ठ राजकुमार हैं। उन्हें तो उनके गुणों के कारण ही राज्य मिलेगा, इस सम्बन्ध में मुझे कुछ नहीं कहना है। युधिष्ठिर के बाद मेरे इस पुत्र को राज्य मिलेगा या नहीं, यह बात आप लोग बताइये।' अभी उनकी बात पूरी भी नहीं हो पायी थी कि मांसभोजी जन्तु गीदड़ आदि चिल्लाने लगे। इन अमंगलसूचक अपशकुनों को देखकर ब्राह्मणों के साथ विदुरजी ने कहा–'राजन् ! आपके इस ज्येष्ठ पुत्र के जन्म के समय जैसे अशुभ लक्षण प्रकट हो रहे हैं, उनसे तो मालूम होता है कि आपका यह पुत्र कुल का नाश करने वाला होगा। इसलिये इसे त्याग देने में ही शान्ति है। इसका पालन करने पर दुःख उठाना पड़ेगा। यदि आप अपने कुल का कल्याण चाहते हैं तो सौ में एक कम ही सही, ऐसा समझकर इसे त्याग दीजिये और अपने कुल तथा सारे जगत् का मंगल कीजिये। शास्त्र स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि कुल के लिये एक मनुष्य का, ग्राम के लिये एक कुल का, देश के लिये एक ग्राम का और आत्मकल्याण के लिये सारी पृथ्वी का भी परित्याग कर दे।' सबके समझाने-बुझाने पर भी पुत्र स्नेहवश राजा धृतराष्ट्र दुर्योधन को नहीं त्याग सके। उन एक-सौ-एक टुकड़ों से सौ पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई। जिन दिनों गान्धारी गर्भवती थी और धृतराष्ट्र की सेवा करने में असमर्थ थी, उन दिनों एक वैश्य-कन्या उनकी सेवा में रहती थी और उसके गर्भ से उसी साल धृतराष्ट्र के युयुत्सु नाम का पुत्र हुआ था। वह बड़ा यशस्वी और विचारशील था। जनमेजय! धृतराष्ट्र के पुत्रों के नाम क्रमशः ये हैं–दुर्योधन सबसे बड़ा था और उससे छोटा था युयुत्सु तदनन्तर दुःशासन, दुस्सह, दुश्शल, जलसन्ध, सम, सह, विन्द, अनुविन्द, दुर्द्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षण, दुर्मर्षण, दुर्मुख, दुष्कर्ण, कर्ण, विविंशति, विकर्ण, शल, सत्व, सुलोचन, चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, शरासन, दुर्मद, दुर्विगाह, विवित्सु, विकटानन, ऊर्णनाभ, सुनाभ, नन्द, उपनन्द, चित्रबाण, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विमोचन, आयोबाहु, महाबाहु, चित्रांग, चित्रकुण्डल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, बलवर्द्धन, उग्रायुध, सुषेण, कुण्डधार, महोदर, चित्रायुध, निषंगी, पाशी, वृन्दारक, दृढ़वर्मा, दृढ़क्षत्र, सोमकीर्ति, अनूदर, दृढ़सन्ध, जरासन्ध, सत्यसन्ध, सद:सुवाक, उग्रश्रवा, उग्रसेन, सेनानी, दुष्पराजय, अपराजित, कुण्डशायी, विशालाक्ष, दुराधर, दृढ़हस्त, सुहस्त, बातवेग, सुवर्चा, आदित्यकेतु, बह्वाशी, नागदत्त, अग्रयायी, कवची, क्रथन, कुण्डी, उग्र, भीमरथ, वीरबाहु अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृढ़रथाश्रय, अनाधृष्य, कुण्डभेदी, विरावी, प्रमथ, प्रमाथी, दीर्घरोमा, दीर्घबाहु, महाबाहु, व्यूढोरस्क, कनकध्वज, कुण्डाशी और विरजा। कन्या का नाम दुश्शला था। ये सभी बड़े शूरवीर, युद्धकुशल तथा शास्त्रों के विद्वान् थे। धृतराष्ट्र ने समय पर योग्य कन्याओं के साथ सबका विवाह किया। दुश्शला का विवाह समय आने पर राजा जयद्रथ के साथ हुआ। ~~~०~~~ – साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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Meena Dubey May 27, 2022

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