भक्ति कथा

श्रीमद्देवीभागवत (आठवां स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 6 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ भूमण्डल के विस्तार का और आम्र, जाम्बू, कदम्ब एवं वटवृक्ष के फलों के रस से प्रकट हुई नदियों का वर्णन तथा गंगाजी के अवतरण का वृत्तान्त... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान् नारायण कहते हैं- नारद! मैंने जिस नदी का वर्णन किया है, वह अरुणोदा मन्दर पर्वत से निकलकर इलावृतवर्ष के पूर्वभाग में बहती है। भगवती जगदम्बा की अनुचरी स्त्रियाँ तथा यक्षों एवं गन्धर्वों की पलियाँ अरुणोदा के जल में स्नान करती हैं। स्नान करते समय उनके शरीर की दिव्य गन्ध से जल सुवासित हो जाता है। इसी प्रकार जम्बूफल मेरु-मन्दर के वक्षः स्थल पर उगे ऊँचे वृक्ष से गिरे ये फल हाथी के शरीर के समान विशाल हैं। गिरते ही बिखर गये और इनसे रस बह चला। उसी रस से जम्बू नाम की नदी बनकर भूमण्डल पर उतर आयी। यह नदी इलावृतवर्ष से दक्षिण की ओर बहती है। जम्बू-फल के स्वाद से संतुष्ट होने वाली वहाँ की देवी को 'जम्ब्वादिनी' कहते हैं। वहाँ रहने वाले देवता, नाग, ऋषि और राक्षस - सभी प्राणी इन देवी की उपासना करते हैं। समस्त प्राणियों पर दया करना इन आदरणीया भगवती का स्वभाव ही है। इन्हें स्मरण करने वाले पापी भी शुद्ध हो जाते हैं और रोगियों के रोग नष्ट हो जाते हैं। इनका कीर्तन करने पर विघ्न नहीं रह सकते। कोकिलाक्षी, कामकला, करुणा, कामपूजिता, कठोरविग्रहा, धन्या, नाकिमान्या और गभस्तिनी देवी के इन नामों का उच्चारण करके मानव निरन्तर जप करे। जम्बू नदी के दोनों तटकी जो मिट्टी है, वह जम्बू के रस से सन जाती है। फिर सूर्य और पवन उसे सुखा देते हैं। उसीसे विद्याधरियों और देवांगनाओं के विविध विशाल भूषण बनते हैं। इसी को जाम्बूनद सुवर्ण कहा जाता है। इसी सुवर्ण को स्त्रियों की अभिलाषा पूर्ण करने वाले विबुधगण मुकुट, करधनी और केयूर आदि के रूप में परिणत करते हैं। कदम्ब का महान् वृक्ष सुपार्श्व पर्वत पर बताया गया है। उस वृक्ष में पाँच खोढ़र अर्थात् पोली जगह थी। उनसे पाँच धाराएँ निकलीं। ये धाराएँ सुपार्श्वगिरि के शिखर से गिरकर इस भूमण्डल पर आयी हैं। इन पाँचों का नाम मधुधारा है। इलावृतवर्ष से पश्चिम ये प्रवाहित होती हैं। भक्तों का कार्य सिद्ध करने के लिये धारेश्वरी नाम की महादेवी वहाँ विराजती हैं। उस स्थान पर शोभा पाने वाली देवी के नाम हैं- देवपूज्या, महोत्साहा, कालरूपा, महानना, कर्मफलदा, कान्तारग्रहणेश्वरी, करालदेहा, कालांगी और कामकोटिप्रवर्तिनी । इन नामों से इन सर्वदेवेश्वरी भगवती जगदम्बा की पूजा करनी चाहिये। माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (तीन सौ तेरासी वाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनम: श्रीरामजी के विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजी के द्वारा उनके उत्तर...(भाग 6) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीरामजी ने पूछा- ब्रह्मन्! इस तरह आपके उपदेश से यह बात तो समझ में आ गयी कि जाप्रत्-जगत् भी स्वप्न के समान ही है। किंतु यह स्वप्न तुल्य प्रतीत होने वाला जगत् रूपी यक्ष भी क्रूर ग्रह की भाँति कष्ट देता है। अतः किस प्रकार इस रोग की चिकित्सा की जाय ? श्रीवसिष्ठजी ने कहा – रघुनन्दन ! यह जो संसार रूपी स्वप्न है, इसका क्या कारण हो सकता है? कार्य से कारण भिन्न नहीं है, यह बात सर्वत्र देखी गयी है। इस प्रकार इस विषय में विचार करो । श्रीरामजी बोले- स्वप्न की उपलब्धि का कारण है चित्त । इसलिये स्वप्न-जगत् चित्तरूप ही है। इसी प्रकार आप के विचार से यह जाग्रत् जगत् भी जो आादि-अन्त से रहित और असार है, चित्तरूप ही है। इस निश्वय से जगत् रूपी रोग की चिकित्सा स्वतः सिद्ध है। श्रीवसिष्ठजी ने कहा – महामते ! मैं कह चुका हूँ कि चेतन का चेत्य की ओर उन्मुख होना ही चित्त है। इस दृष्टि से चित्त महान् चैतन्यधन ही है। वही जगत् के आकार में स्थित है। अतः सिद्ध हुआ कि स्वप्न, जाग्रत् आदि कुछ भी चिन्मय ब्रह्म से भिन्न नहीं है; क्योंकि आदिकाल से ही यह जगत् कभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है । इसलिये यह सारा दृश्यमान प्रपञ्च अजर-अमर, शान्त, अजन्मा एवं अखण्ड सच्चिदानन्दधन ब्रह्म ही है। श्रीरामचन्द्र जी बोले – भगवन् ! आपके सदुपदेश से में यह मानता हूँ कि जीवात्मा को भ्रान्ति के कारण द्रष्टापन और भोक्तापन के साथ सृष्टि के जन्म नाश आदि सारे भ्रम परमपद स्वरूप परब्रह्म में प्रतीत हो रहे हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा – राघवेन्द्र ! जो रससे भी रस तत्त्व के ज्ञाता है— सार से भी सार वस्तु को मथकर निकालने और जानने में समर्थ हैं, ऐसे विद्वान की विचार व्यापार से युक्त जो कोई नवीन दृष्टि है, वह पहली है तथा समस्त विचारों और शास्त्र के श्रवण, मनन, निदिध्यासन के परिपाक से परिनिष्ठित जो परम तत्त्वरूप अर्थ है, उसका अपरोक्ष अनुभव कराने वाली जो तत्त्वज्ञानी जीवन्मुक्त महात्माओं की दृष्टि है, वह दूसरी है। उन्हीं दो दृष्टियों का अवलम्बन करके मैंने सम्पूर्ण विश्व के स्वरूप पर तबतक के लिये इस प्रकार विचार किया और विचार करना आवश्यक समझा है, जबतक कि यह बोध न हो जाय कि जितनी भी दृष्टियाँ और उनके द्रष्टा के द्रष्टापन हैं, वे सब त्रिकाल में भी नहीं हैं। सारा जगत्-असत् है शून्य है। उसकी प्रतीति भ्रममात्र है। वस्तुतः तो न कोई शून्यता है और न भ्रम ही है। नित्य-निरन्तर, सर्वत्र एकमात्र अपरोक्ष परमानन्दस्वरूप परब्रह्म ही विराजमान है। क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नवम स्कन्ध, अथाष्टमोऽध्यायः सगर-चरित्र...(भाग 4) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ प्रशान्तमायागुणकर्मलिंग मनामरूपं सदसद्विमुक्तम् । ज्ञानोपदेशाय गृहीतदेह नमामहे त्वां पुरुष पुराणम् ||२५ त्वन्मायारचिते' लोके वस्तुबुद्ध्या गृहादिषु। भ्रमन्ति कामलोभेर्ष्यामोहविभ्रान्तचेतसः || २६ अद्य नः सर्वभूतात्मन् कामकर्मेन्द्रियाशयः। मोहपाशो दृढश्छिन्नो भगवंस्तव दर्शनात् ||२७ श्रीशुक उवाच इत्थं गीतानुभावस्तं भगवान् कपिलो मुनिः। अंशुमन्तमुवाचेदमनुगृह्य धिया नृप ॥२८ अश्वोऽयं नीयतां वत्स पितामहपशुस्तव । इमे च पितरो दग्धा गंगाम्भोऽर्हन्ति नेतरत् ॥ २९ तं परिक्रम्य शिरसा प्रसाद्य हयमानयत् । सगरस्तेन पशुना क्रतुशेषं समापयत् ।। ३० राज्यमंशुमति न्यस्य निःस्पृहो मुक्तबन्धनः। और्वोपदिष्टमार्गेण लेभे गतिमनुत्तमाम् ॥३१ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ माया, उसके गुण और गुणों के कारण होने वाले कर्म एवं कर्मों के संस्कार से बना हुआ लिंगशरीर आपमें है ही नहीं। न तो आपका नाम है और न तो रूप। आपमें न कार्य है और न तो कारण। आप सनातन आत्मा हैं। ज्ञान का उपदेश करने के लिये ही आपने यह शरीर धारण कर रखा है। हम आपको नमस्कार करते हैं ||२५|| प्रभो! यह संसार आपकी माया की करामात है। इसको सत्य समझकर काम, लोभ, ईर्ष्या और मोह से लोगों का चित्त शरीर तथा घर आदि में भटकने लगता है। लोग इसीके चक्करमें फँस जाते हैं ||२६|| समस्त प्राणियों के आत्मा प्रभो! आज आपके दर्शन से मेरे मोह की वह दृढ़ फाँसी कट गयी जो कामना, कर्म और इन्द्रियों को जीवन दान देती है ||२७|| श्रीशुकदेवजी कहते हैं- परीक्षित् ! जब अंशुमान ने भगवान् कपिलमुनि के प्रभाव का इस प्रकार गान किया, तब उन्होंने मन-ही-मन अंशुमान् पर बड़ा अनुग्रह किया और कहा ॥२८॥ श्रीभगवान ने कहा–'बेटा! यह घोड़ा तुम्हारे पितामह का यज्ञपशु है। इसे तुम ले जाओ। तुम्हारे जले हुए चाचाओं का उद्धार केवल गंगाजल से होगा, और कोई उपाय नहीं है' ।। २९ ।। अंशुमान् ने बड़ी नम्रता से उन्हें प्रसन्न करके उनकी परिक्रमा की और वे घोड़े को ले आये। सगर ने उस यज्ञपशु के द्वारा यज्ञ की शेष क्रिया समाप्त की ।।३०।। तब राजा सगर ने अंशुमान् को राज्य का भार सौंप दिया और वे स्वयं विषयों से निःस्पृह एवं बन्धनमुक्त हो गये। उन्होंने महर्षि और्व के बतलाये हुए मार्ग से परमपद की प्राप्ति की ॥ ३१ ॥ इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां नवमस्कन्धे सगरोपाख्यानेऽष्टमोऽध्यायः ।।८।। क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Gulshan Kumar May 26, 2022

*प्रेम और शरण* *दोनों ही गुरु के प्रसाद हैं,!!* *प्रेम और सद्गुरु शरण उनकी दया मेहर और कृपा से ही मिलते हैं । गुरु की मौज में रहना परमात्मा की मौज में रहना है, गुरु की शरण परमात्मा की शरण हैं ।* *कबीर साहिब शरण की अवस्था को एक मुर्दे का दृष्टांत देकर समझाते हैं । मुर्दे को उत्तम वस्त्र पहनाया जाएँ तो वह खुशी नहीं मनाता, उसे चिथड़ों में लपेटा जाए तो नाराज नहीं होता ।* *न वह चाहता है कि उसे पालकी में रखा जाए और न ही कठोर जमीन पर लिटाए जाने पर कोई शिकायत करता है ।* *इसी प्रकार एक सच्चा प्रेमी हर सांसारिक अवस्था को प्रियतम की इच्छा मानकर खुशी-खुशी स्वीकार करता है ।* *वह सतगुरु के प्रेम में इतना डूबा रहता है कि आराम और तकलीफ, सुख और दुख में वह कोई फर्क ही नहीं कर पाता !* *सच्चा प्रेमी प्रियतम से किसी वस्तु की याचना नहीं करता, अपनी मुक्ति की भी नहीं!!* *।। जय सियाराम जी।।* *।। ॐ नमह शिवाय।।*

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