पौराणिक कथा

Sumit Agarwal Sep 24, 2022

🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 *वृन्दावन का वह स्थान जहाँ 5 वर्ष के ध्रुव ने किये भगवान के दर्शन* *✍️ध्रुव टीला -मधुवन* *भगवान विष्णु की कथाएं अपार हैं। उनके भक्तों की कहानियां भी रोचक हैं। कही उन्होंने जल्दी से दर्शन दिया तो कही वर्षों से इंतजार करा दिया। मथुरा के मधुबन में भी कुछ ऐसी ही कहानी है प्रभु विष्णु की।* *जहां पर मात्र 6 महीने में ही भगवान विष्णु ने भक्त ध्रुव को दर्शन दिए थे। उस जगह पर अभी भी भारी भीड़ होती है। ध्रुव टीला के नाम से स्थान प्रसिदृध है।* 🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷 *मथुरा से करीब 10 किलोमीटर दूर नेशनल हाइवे दो से होते हुए महोली गांव पहुंचते ही ध्रुव टीला दिखेगा । आपको बता दें कि यह टीला बहुत ही प्राचीन समय का बना है। यहां बड़े—बड़े पत्थर और मिट्टी का ढ़ेर काफी जमा हुआ था। जिसकी लंबाई करीब 200 फीट और ऊंचाई करीब डेढ़ सौ फीट है। भगवान ध्रुव ने इस किले पर 5 वर्ष की अवस्था में यहां आए थे।* 🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥 *इसी टीले पर आकर उन्होंने तपस्या की।श्रीमद्भागवत के अनुसार नारद मुनि के कहने पर ध्रुव जी महाराज यहां आए थे।* *उन्होंने ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप किया। ध्रुव जी 5 साल की अवस्था में ही यहां बैठकर तपस्या करने लग गए थे। छह माह तक भगवान विष्णु की घोर तपस्या की उसके बाद उन्हें भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर उनको दर्शन दे दिए। इस टीले के चारों तरफ घना जंगल है।* 🎷🎷🎷🎷🎷🎷🎷🎷 🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁🍁

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VANITABEN YUVRAJ Sep 21, 2022

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@mahaveer1698 Sep 19, 2022

*🚩एक बार लोकपितामह ब्रह्माजी अपनी दिव्य सभा में बैठे थे । तभी उनके मानस पुत्र सनकादि चारों कुमार दिगम्बर वेष में वहां आए और पिता को प्रणाम कर उनकी आज्ञा लेकर आसनों पर बैठ गए । उन अत्यंत तेजस्वी चारों कुमारों को देखकर सभा में उपस्थित जन मौन हो गए।* *सनकादि कुमारों ने अपने पिता ब्रह्माजी से प्रश्न किया—* *‘पिताजी ! शब्द, स्पर्श आदि विषय (सांसारिक भोग) मन में प्रवेश करते हैं या मन विषयों में प्रवेश करता है; इनका परस्पर आकर्षण है । इस मन को विषयों से अलग कैसे करें ?’ मोक्ष चाहने वाला अपना मन विषयों (सांसारिक भोग-विलास) से कैसे हटा सकता है; क्योंकि मनुष्य जीवन प्राप्त कर यदि मोक्ष की सिद्धि नहीं की गयी तो सम्पूर्ण जीवन ही व्यर्थ हो जाएगा।’* *सभी प्राणियों के जन्मदाता सृष्टिकर्ता होने पर भी विधाता ब्रह्माजी प्रश्न का मूल कारण नहीं समझ सके क्योंकि वे कर्म-परायण हैं, उनकी बुद्धि कर्म करने में लगी हुई है । जैसे कोई संन्यासी अपने आश्रम का निर्माण करवा रहा हो और उसकी बुद्धि ईंटों की गाड़ी गिनने में लगी ह** *ब्रह्माजी के ध्यानमग्न होते ही सभा में सबके सामने अत्यंत उज्जवल, तेजस्वी व परम सुन्दर महाहंस के रूप में भगवान प्रकट हो गए । उस अलौकिक हंस को देखकर सभा में उपस्थित सभी लोग खड़े होकर उन्हें प्रणाम करने लगे । ब्रह्माजी ने महाहंस की पाद्य-अर्घ्य आदि से पूजा कर सुन्दर आसन पर बिठाया।* *सनकादि कुमारों ने उस परम तेजस्वी महाहंस से पूछा—‘आप कौन हैं?* *भगवान हंस ने विचित्र उत्तर देते हुए कहा—‘मैं इसका क्या उत्तर दूँ ? इसका निर्णय तो आप लोग ही कर सकते हैं । यदि इस पांचभौतिक शरीर को आप लोग ‘आप’ कहते हैं; तो सबके शरीर पंचभूतों से ही बने हुए हैं । जैसे सारे आभूषण एक सोने से बने होते हैं और सारे बर्तन एक ही मिट्टी से बने होते हैं।* *पंचभूत—पृथ्वी, वायु, जल, तेज और आकाश से रस, रक्त, मेदा, मज्जा, अस्थि और शुक्र बनता है जिससे शरीर का निर्माण होता है; तो देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी के शरीर पांचभौतिक होने के कारण एकरूप हैं । जीव तो मेरा स्वरूप है । यह मन विषयों का चिन्तन करते-करते विषयाकार (सांसारिक भोगों में लिप्त) हो जाता है और विषय मन में प्रवेश कर जाते हैं, यह बात सत्य है किन्तु आत्मा का मन और विषय के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है।’* *भगवान हंसनारायण ने उपदेश किया कि ‘पहले मन विषयों में जाकर विषयाकार बनता है। उसके बाद विषयाकार मन में विषय स्थिर हो जाते हैं। अब आप लोग ही सोचें और निर्णय करें कि मन विषयों में जाता है या विषय मन में आते हैं ? मन से, वाणी से, दृष्टि से तथा इन्द्रियों से जो कुछ भी ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ, मुझसे भिन्न और कुछ भी नहीं है । यह सिद्धान्त आप लोग तत्त्वविचार के द्वारा सरलता से समझ लीजिए।’* *अब समस्या यह है कि विषय से मन को अलग कैसे करें?* *भगवान हंस कहते हैं—‘इसका समाधान है कि मन और विषय पर डालो मिट्टी और मेरे साथ मिल जाओ । मन में निवास करने वाला संसार बहुत रुलाता है । तुम अपने मन से संसार को निकाल डालना और मन को सम्हाल कर रखना । सारे गुण मुझ निर्गुण का ही भजन करते हैं।’* *जैसे कोई बच्चा हाथ में खिलौना लिए मां की गोदी में बैठ कर रो रहा हो तो मां उससे कहती है बेटा, यह खिलौना फेंक दे और मेरी गोदी में बैठा रह; वैसे ही परमात्मा कहते हैं कि अरे आत्मा ! तू मन और विषय के खिलौनों को फेंक दे तथा मुझसे एक हो जा; क्योंकि आत्मा के सिवाय दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं । बाकी सब स्वप्न की तरह झूठ है । सब कुछ मन का ही खेल है और वह बहुत चंचल है । शरीर प्रारब्ध के अनुसार रहता है और उसमें प्राण चलते हैं परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुष कभी इस शरीर को ‘मै’ नहीं कहते हैं ।* *श्रीमद्भभागवत (११।१४।२७) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—‘जो पुरुष निरन्तर विषय चिन्तन करता है, उसका चित्त विषयों में फंस जाता है और जो मेरा स्मरण करता है, उसका चित्त मुझमें तल्लीन हो जाता है।’* *हंस रूप भगवान के उत्तर से सनकादि कुमारों का संदेह दूर हो गया । सभी ने भगवान की स्तुति की और देखते-ही-देखते भगवान अंतर्ध्यान होकर अपने धाम को चले गए।* *🙏*

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