Mangilal
Mangilal Nov 27, 2021

🛑 *"श्रीकृष्ण की परीक्षा"* एक बार श्रीकृष्ण के गुरु दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में किसी जंगल में रूककर उन्होंने आराम किया। समीप ही द्वारिका नगरी थी। दुर्वासा ऋषि ने अपने शिष्यों को भेजा कि श्रीकृष्ण को बुला कर लाओ। उनके शिष्य द्वारिका गये और द्वारकाधीश को उनके गुरुदेव का सन्देश दिया। सन्देश सुनते ही श्रीकृष्ण दौड़े-दौड़े अपने गुरु के पास आए, और उन्हें दण्डवत प्रणाम किया। आवभगत पश्चात श्रीकृष्ण ने उनसे द्वारिका चलने के लिए विनती की लेकिन ऋषि दुर्वासा ने चलने के से मना कर दिया, और कहा कि हम फिर कभी आपके पास आयेंगे। श्रीकृष्ण ने पुन: पुनः अपने गुरुदेव दुर्वासा ऋषि से विनती की तब दुर्वासा ऋषि ने कहा कि ठीक है कृष्ण, हम तुम्हारे साथ चलेंगे। पर हम जिस रथ पर जायेंगे, उसे घोड़े नहीं खीचेंगें एक ओर से तुम और दूसरी ओर से तुम्हारी पटरानी रुक्मणि ही रथ खीचेंगी। श्रीकृष्ण उसी समय दौड़ते हुए रुक्मणि जी के पास गए और उन्हें बताया कि गुरुदेव को तुम्हारी सेवा की जरुरत है। रुक्मणि जी को उन्होंने सारी बात बताई और वह दोनों अपने गुरुदेव के पास आये, और उनसे रथ पर बैठने के लिए विनती की। जब गुरुदेव दुर्वासा ऋषि रथ पर बैठे तो उन्होंने अपने शिष्यों को भी उसी रथ पर बैठने के लिए कहा। श्री कृष्ण ने इसकी भी परवाह नही की.. क्योंकि वे तो जानते ही थे कि गुरुदेव आज उनकी परीक्षा ले रहे हैं। रुक्मणि और श्रीकृष्ण ने रथ को खींचना आरम्भ किया और उस रथ को खींचते- खींचते द्वारिका पहुँच गए। जब गुरुदेव ऋषि दुर्वासा द्वारिका पहुँचे तो श्रीकृष्ण ने उन्हें राजसिंहासन पर बिठाया। उनका पूजन और सत्कार किया, तदुपरांत 56 प्रकार के व्यंजन बनवाये अपने गुरुदेव के सम्मुख रखा। पर जैसे ही वह व्यंजन लेकर गुरुदेव के पास पहुँचे उन्होंने सारे व्यंजनों का तिरस्कार कर दिया। श्रीकृष्ण ने पुन: अपने गुरुदेव से हाथ जोड़कर पूछा कि गुरुदेव! आप क्या स्वीकार करेंगे? दुर्वासा ऋषि ने खीर बनवाने के लिए कहा। श्रीकृष्ण ने आज्ञा मानकर खीर बनवाई। खीर बनकर आई.. खीर से भरा पतीला दुर्वासा ऋषि जी के पास पहुँचा.. उन्होंने खीर का भोग लगाया.. थोड़ी-सी खीर का भोग लगा कर उन्होंने श्री कृष्ण को खाने के लिए कहा‌। उस पतीले में से भगवान श्रीकृष्ण ने थोड़ी सी खीर खाया। तब उनके गुरुदेव ऋषि दुर्वासा ने श्रीकृष्ण को बाकी खीर अपने शरीर पर लगाने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण जी ने आज्ञा पाकर खीर को अपने शरीर पर लगाना शुरू कर दिया। उन्होंने पूरे शरीर पर खीर लगा ली, पर जब पैरों पर लगाने की बारी आई तो श्रीकृष्ण ने अपने पैरों पर खीर लगाने से मना कर दिया। श्री कृष्ण जी ने कहा ‘हे गुरुदेव; यह खीर आपका भोग-प्रसाद है, मैं इस भोग को अपने पैरों पर नहीं लगाऊंगा। उनके गुरुदेव श्रीकृष्ण से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा ‘हे वत्स; मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ, तुम हर परीक्षा में सफल रहे, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि पूरे शरीर में तुमने जहाँ -2 खीर लगाई है वह अंग वज्र के समान हो जायेगा। इतिहास साक्षी है कि महाभारत के युद्ध में कोई भी अस्त्र-शस्त्र श्रीकृष्ण का बाल भी बाँका नहीं कर पाया था। इसीलिए ठाकुरजी के चरण कमल अति कोमल हैं। और उनसे प्रेम करने वाले साधक इन युगल चरण कमलों को अपने ह्रदयरुपी सिंहासन पर धारण करने के लिए जीवन भर प्रयास करतें हैं..!! 🇮🇳 जय माँ भारती,वन्दे मातरम्

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*"श्रीकृष्ण की परीक्षा"*

एक बार श्रीकृष्ण के गुरु दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे। रास्ते में किसी जंगल में रूककर उन्होंने आराम किया। समीप ही द्वारिका नगरी थी।

दुर्वासा ऋषि ने अपने शिष्यों को भेजा कि श्रीकृष्ण को बुला कर लाओ। उनके शिष्य द्वारिका गये और द्वारकाधीश को उनके गुरुदेव का सन्देश दिया।

सन्देश सुनते ही श्रीकृष्ण दौड़े-दौड़े अपने गुरु के पास आए, और उन्हें दण्डवत प्रणाम किया।

आवभगत पश्चात श्रीकृष्ण ने उनसे द्वारिका चलने के लिए विनती की लेकिन ऋषि दुर्वासा ने चलने के से मना कर दिया, और कहा कि हम फिर कभी आपके पास आयेंगे।

श्रीकृष्ण ने पुन: पुनः अपने गुरुदेव दुर्वासा ऋषि से विनती की तब दुर्वासा ऋषि ने कहा कि ठीक है कृष्ण, हम तुम्हारे साथ चलेंगे।

पर हम जिस रथ पर जायेंगे, उसे घोड़े नहीं खीचेंगें एक ओर से तुम और दूसरी ओर से तुम्हारी पटरानी रुक्मणि ही रथ खीचेंगी।

श्रीकृष्ण उसी समय दौड़ते हुए रुक्मणि जी के पास गए और उन्हें बताया कि गुरुदेव को तुम्हारी सेवा की जरुरत है।

रुक्मणि जी को उन्होंने सारी बात बताई और वह दोनों अपने गुरुदेव के पास आये, और उनसे रथ पर बैठने के लिए विनती की।

जब गुरुदेव दुर्वासा ऋषि रथ पर बैठे तो उन्होंने अपने शिष्यों को भी उसी रथ पर बैठने के लिए कहा।

श्री कृष्ण ने इसकी भी परवाह नही की.. क्योंकि वे तो जानते ही थे कि गुरुदेव आज उनकी परीक्षा ले रहे हैं।

रुक्मणि और श्रीकृष्ण ने रथ को खींचना आरम्भ किया और उस रथ को खींचते- खींचते द्वारिका पहुँच गए।

जब गुरुदेव ऋषि दुर्वासा द्वारिका पहुँचे तो श्रीकृष्ण ने उन्हें राजसिंहासन पर बिठाया। उनका पूजन और सत्कार किया, तदुपरांत 56 प्रकार के व्यंजन बनवाये अपने गुरुदेव के सम्मुख रखा।

पर जैसे ही वह व्यंजन लेकर गुरुदेव के पास पहुँचे उन्होंने सारे व्यंजनों का तिरस्कार कर दिया।

श्रीकृष्ण ने पुन: अपने गुरुदेव से हाथ जोड़कर पूछा कि गुरुदेव! आप क्या स्वीकार करेंगे? 

दुर्वासा ऋषि ने खीर बनवाने के लिए कहा। श्रीकृष्ण ने आज्ञा मानकर खीर बनवाई।

खीर बनकर आई.. खीर से भरा पतीला दुर्वासा ऋषि जी के पास पहुँचा.. उन्होंने खीर का भोग लगाया.. थोड़ी-सी खीर का भोग लगा कर उन्होंने श्री कृष्ण को खाने के लिए कहा‌।

उस पतीले में से भगवान श्रीकृष्ण ने थोड़ी सी खीर खाया।

तब उनके गुरुदेव ऋषि दुर्वासा ने श्रीकृष्ण को बाकी खीर अपने शरीर पर लगाने की आज्ञा दी। श्रीकृष्ण जी ने आज्ञा पाकर खीर को अपने शरीर पर लगाना शुरू कर दिया।

उन्होंने पूरे शरीर पर खीर लगा ली, पर जब पैरों पर लगाने की बारी आई तो श्रीकृष्ण ने अपने पैरों पर खीर लगाने से मना कर दिया।

श्री कृष्ण जी ने कहा ‘हे गुरुदेव; यह खीर आपका भोग-प्रसाद है, मैं इस भोग को अपने पैरों पर नहीं लगाऊंगा।

उनके गुरुदेव श्रीकृष्ण से अत्यंत प्रसन्न हुए।

उन्होंने कहा ‘हे वत्स; मैं तुमसे अति प्रसन्न हूँ, तुम हर परीक्षा में सफल रहे, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि पूरे शरीर में तुमने जहाँ -2 खीर लगाई है वह अंग वज्र के समान हो जायेगा।

इतिहास साक्षी है कि महाभारत के युद्ध में कोई भी अस्त्र-शस्त्र श्रीकृष्ण का बाल भी बाँका नहीं कर पाया था।

इसीलिए ठाकुरजी के चरण कमल अति कोमल हैं। और उनसे प्रेम करने वाले साधक इन युगल चरण कमलों को अपने ह्रदयरुपी सिंहासन पर धारण करने के लिए जीवन भर प्रयास करतें हैं..!!
🇮🇳 जय माँ भारती,वन्दे मातरम्

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Rajindar Sharma Nov 27, 2021
श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारी हे नाथ नारायण वासुदेवा हे नाथ नारायण वासुदेवा हे नाथ नारायण वासुदेवा हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे जय श्री कृष्ण भगवान

snehalata Mishra Jan 27, 2022

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*🌹षटतिला एकादशी महिमा व कथा* ➡ *28 जनवरी 2021 रात्रि 02:17 AM से 28 जनवरी रात्रि 11:35 PM तक (यानी 28 जनवरी, शुक्रवार को पुरा दिन) एकादशी है ।* 💥 *विशेष - 28 जनवरी, शुक्रवार को एकादशी का व्रत (उपवास) रखें ।* ➖➖➖➖➖➖➖➖ *🌹इस दिन तिल से स्नान-होम करे, तिल का उबटन लगाये, तिल मिलाया हुआ जल पीये, तिल का दान करे और तिल को भोजन के काम में ले ।’* *🌹इस प्रकार छ: कामों में तिल का उपयोग करने के कारण यह एकादशी ‘षटतिला’ कहलाती है, जो सब पापों का नाश करनेवाली है ।* *🌹युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछा: भगवन् ! माघ मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है? उसके लिए कैसी विधि है तथा उसका फल क्या है ? कृपा करके ये सब बातें हमें बताइये ।* *🌹श्रीभगवान बोले: नृपश्रेष्ठ ! माघ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार पौष) मास के कृष्णपक्ष की एकादशी ‘षटतिला’ के नाम से विख्यात है, जो सब पापों का नाश करनेवाली है । मुनिश्रेष्ठ पुलस्त्य ने इसकी जो पापहारिणी कथा दाल्भ्य से कही थी, उसे सुनो ।* *🌹दाल्भ्य ने पूछा: ब्रह्मन्! मृत्युलोक में आये हुए प्राणी प्राय: पापकर्म करते रहते हैं । उन्हें नरक में न जाना पड़े इसके लिए कौन सा उपाय है? बताने की कृपा करें ।* *🌹पुलस्त्यजी बोले: महाभाग ! माघ मास आने पर मनुष्य को चाहिए कि वह नहा धोकर पवित्र हो इन्द्रियसंयम रखते हुए काम, क्रोध, अहंकार ,लोभ और चुगली आदि बुराइयों को त्याग दे । देवाधिदेव भगवान का स्मरण करके जल से पैर धोकर भूमि पर पड़े हुए गोबर का संग्रह करे । उसमें तिल और कपास मिलाकर एक सौ आठ पिंडिकाएँ बनाये । फिर माघ में जब आर्द्रा या मूल नक्षत्र आये, तब कृष्णपक्ष की एकादशी करने के लिए नियम ग्रहण करें । भली भाँति स्नान करके पवित्र हो शुद्ध भाव से देवाधिदेव श्रीविष्णु की पूजा करें । कोई भूल हो जाने पर श्रीकृष्ण का नामोच्चारण करें । रात को जागरण और होम करें । चन्दन, अरगजा, कपूर, नैवेघ आदि सामग्री से शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले देवदेवेश्वर श्रीहरि की पूजा करें । तत्पश्चात् भगवान का स्मरण करके बारंबार श्रीकृष्ण नाम का उच्चारण करते हुए कुम्हड़े, नारियल अथवा बिजौरे के फल से भगवान को विधिपूर्वक पूजकर अर्ध्य दें । अन्य सब सामग्रियों के अभाव में सौ सुपारियों के द्वारा भी पूजन और अर्ध्यदान किया जा सकता है । अर्ध्य का मंत्र इस प्रकार है:* *कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव ।* *संसारार्णवमग्नानां प्रसीद पुरुषोत्तम ॥* *नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन ।* *सुब्रह्मण्य नमस्तेSस्तु महापुरुष पूर्वज ॥* *गृहाणार्ध्यं मया दत्तं लक्ष्म्या सह जगत्पते ।* *🌹‘सच्चिदानन्दस्वरुप श्रीकृष्ण ! आप बड़े दयालु हैं । हम आश्रयहीन जीवों के आप आश्रयदाता होइये । हम संसार समुद्र में डूब रहे हैं, आप हम पर प्रसन्न होइये । कमलनयन ! विश्वभावन ! सुब्रह्मण्य ! महापुरुष ! सबके पूर्वज ! आपको नमस्कार है ! जगत्पते ! मेरा दिया हुआ अर्ध्य आप लक्ष्मीजी के साथ स्वीकार करें ।’* *🌹तत्पश्चात् ब्राह्मण की पूजा करें । उसे जल का घड़ा, छाता, जूता और वस्त्र दान करें । दान करते समय ऐसा कहें : ‘इस दान के द्वारा भगवान श्रीकृष्ण मुझ पर प्रसन्न हों ।’ अपनी शक्ति के अनुसार श्रेष्ठ ब्राह्मण को काली गौ का दान करें । द्विजश्रेष्ठ ! विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह तिल से भरा हुआ पात्र भी दान करे । उन तिलों के बोने पर उनसे जितनी शाखाएँ पैदा हो सकती हैं, उतने हजार वर्षों तक वह स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है । तिल से स्नान होम करे, तिल का उबटन लगाये, तिल मिलाया हुआ जल पीये, तिल का दान करे और तिल को भोजन के काम में ले ।’* *🌹इस प्रकार हे नृपश्रेष्ठ ! छ: कामों में तिल का उपयोग करने के कारण यह एकादशी ‘षटतिला’ कहलाती है, जो सब पापों का नाश करनेवाली है ।* *🌹व्रत खोलने की विधि : द्वादशी को सेवापूजा की जगह पर बैठकर भुने हुए सात चनों के चौदह टुकड़े करके अपने सिर के पीछे फेंकना चाहिए । ‘मेरे सात जन्मों के शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप नष्ट हुए’ - यह भावना करके सात अंजलि जल पीना और चने के सात दाने खाकर व्रत खोलना चाहिए ।* 🌹🌹🌹🌹🌹🌹

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Thakur Sharma Billu Jan 27, 2022

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Anup Kumar Sinha Jan 27, 2022

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