K. Rajan
K. Rajan Jan 15, 2022

Jay Shree Radhe krishna Radhey Radhey

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' " बचपन का जीद " "माया छाया एक सी, बिरला जाने कोय। भगता के पीछे फिरे, सन्मुख भाजे सोय।।" "एक सन्यासी एक घर के सामने से निकल रहे थे। एक छोटा सा बच्चा घुटने टेक कर चलता था। सुबह थी और धूप निकली थी और उस बच्चे की छाया आगे पड़ रही थी।वह बच्चा छाया में अपने सिर को पकड़ने के लिए हाथ ले जाता है, लेकिन जब तक उसका हाथ पहुँचता है छाया आगे बढ़ जाती है। " "बच्चा थक गया और रोने लगा। उसकी माँ उसे समझाने लगी कि पागल यह छाया है, छाया पकड़ी नहीं जाती। लेकिन बच्चे कब समझ सकते हैं कि क्या छाया है और क्या सत्य है? जो समझ लेता है कि क्या छाया है और क्या सत्य,वह बच्चा नहीं रह जाता। वह प्रौढ़ होता है। बच्चे कभी नहीं समझते कि छाया क्या है, सपने क्या हैं झूठ क्या है।वह बच्चा रोने लगा।" "कहा कि मुझे तो पकड़ना है इस छाया को।वह सन्यासी भीख माँगने आया था।उसने उसकी माँ को कहा,मैं पकड़ा देता हूँ। वह बच्चे के पास गया, उस रोते हुए बच्चे की आँखों में आँसू टपक रहे थे। सभी बच्चों की आँखों से आँसू टपकते है!" "ज़िन्दगी भर दौड़ते हैं और पकड़ नहीं पाते। पकड़ने की योजना ही झूठी है। बूढ़े भी रोते हैं और बच्चे भी रोते हैं। वह बच्चा भी रो रहा था तो कोई नासमझी तो नहीं कर रहा था। उस सन्यासी ने उसके पास जाकर कहा,बेटे रो मत।" "क्या करना है तुझे? छाया पकड़नी है न?उस सन्यासी ने कहा, जीवन भर भी कोशिश करके थक जायेगा, परेशान हो जायेगा। छाया को पकड़ने का यह रास्ता नहीं है। उस सन्यासी ने उस बच्चे का हाथ पकड़ा और उसके सिर पर हाथ रख दिया।" "इधर हाथ सिर पर गया, उधर छाया के ऊपर भी सिर पर हाथ गया। सन्यासी ने कहा,देख, पकड़ ली तूने छाया। छाया कोई सीधा पकड़ेगा तो नहीं पकड़ सकेगा। लेकिन अपने को पकड़ लेगा तो छाया पकड़ में आ जाती है।" "जो अहंकार को पकड़ने को लिए दौड़ता है वह अहंकार को कभी नहीं पकड़ पाता। अहंकार मात्र छाया है। लेकिन जो आत्मा को पकड़ लेता है, अहंकार उसकी पकड़ में आ जाता है।वह तो छाया है। " "उसका कोई मुल्य नहीं। केवल वे ही लोग तृप्ति को, केवल वे ही लोग आप्त कामना को उपलब्ध होते हैं जो आत्मा को उपलब्ध होते हैं।" ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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' " ज्ञान की पहचान " "किसी जंगल में एक संत महात्मा रहते थे। सन्यासियों वाली वेशभूषा थी और बातों में सदाचार का भाव, चेहरे पर इतना तेज था कि कोई भी इंसान उनसे प्रभावित हुए नहीं रह सकता था।" "एक बार जंगल में शहर का एक व्यक्ति आया और वो जब महात्मा जी की झोपड़ी से होकर गुजरा तो देखा बहुत से लोग महात्मा जी के दर्शन करने आये हुए थे। वो महात्मा जी के पास गया और बोला कि आप अमीर भी नहीं हैं, आपने महंगे कपडे भी नहीं पहने हैं, आपको देखकर मैं बिल्कुल प्रभावित नहीं हुआ फिर ये इतने सारे लोग आपके दर्शन करने क्यों आते हैं ?" "महात्मा जी ने उस व्यक्ति को अपनी एक अंगूठी उतार के दी और कहा कि आप इसे बाजार में बेच कर आएं और इसके बदले एक सोने की माला लेकर आना।" "अब वो व्यक्ति बाजार गया और सब की दुकान पर जा कर उस अंगूठी के बदले सोने की माला मांगने लगा। लेकिन सोने की माला तो क्या उस अंगूठी के बदले कोई पीतल का एक टुकड़ा भी देने को तैयार नहीं था।" "थक हार के व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास पहुंचा और बोला कि इस अंगूठी की तो कोई कीमत ही नहीं है।" "महात्मा जी मुस्कुराये और बोले कि अब इस अंगूठी को सुनार गली में जौहरी की दुकान पर ले जाओ। वह व्यक्ति जब सुनार की दुकान पर गया तो सुनार ने एक माला नहीं बल्कि अंगूठी के बदले पांच माला देने को कहा।" "वह व्यक्ति बड़ा हैरान हुआ कि इस मामूली सी अंगूठी के बदले कोई पीतल की माला देने को तैयार नहीं हुआ, लेकिन ये सुनार कैसे 5 सोने की माला दे रहा है!" "व्यक्ति वापस महात्मा जी के पास गया और उनको सारी बातें बतायीं।" "अब महात्मा जी बोले कि चीजें जैसी ऊपर से दिखती हैं, अंदर से वैसी नहीं होती। ये कोई मामूली अंगूठी नहीं है बल्कि ये एक हीरे की अंगूठी है जिसकी पहचान केवल सुनार ही कर सकता था। इसलिए वह 5 माला देने को तैयार हो गया। ठीक वैसे ही मेरी वेशभूषा को देखकर तुम मुझसे प्रभावित नहीं हुए, लेकिन ज्ञान का प्रकाश लोगों को मेरी ओर खींच लाता है। व्यक्ति महात्मा जी की बातें सुनकर बड़ा शर्मिंदा हुआ। " ("शिक्षा:-कपड़ों से व्यक्ति की पहचान नहीं होती बल्कि आचरण और ज्ञान से व्यक्ति की पहचान होती है..!") ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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. " भोग द्वारा अहंकार का हरण " "एक बार सन् 1989 में मैंने सुबह टीवी खोला तो जगत गुरु शंकराचार्य कांची कामकोटि जी से प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम चल रहा था।" "एक व्यक्ति ने प्रश्न किया.. कि हम भगवान को भोग क्यों लगाते हैं? हम जो कुछ भी भगवान को चढ़ाते हैं," "1) उसमें से भगवान क्या खाते हैं?" "2) क्या पीते हैं?" "3) क्या हमारे चढ़ाए हुए पदार्थ के रुप, रंग स्वाद या मात्रा में कोई परिवर्तन होता है?" "4) यदि नहीं तो हम यह कर्म क्यों करते हैं, क्या यह पाखंड नहीं है?" "5) यदि यह पाखंड है तो हम भोग लगाने का पाखंड क्यों करें?" "मेरी भी जिज्ञासा बढ़ गई थी कि शायद प्रश्नकर्ता ने आज जगद्गुरु शंकराचार्य जी को बुरी तरह घेर लिया है देखूं क्या उत्तर देते हैं। " "किंतु जगद्गुरु शंकराचार्य जी तनिक भी विचलित नहीं हुए। बड़े ही शांत चित्त से उन्होंने उत्तर देना शुरू किया।" "उन्होंने कहा यह समझने की बात है कि जब हम प्रभु को भोग लगाते हैं तो वह उसमें से क्या ग्रहण करते हैं।" "मान लीजिए कि आप लड्डू लेकर भगवान को भोग चढ़ाने मंदिर जा रहे हैं और रास्ते में आपका जानने वाला कोई मिलता है और पूछता है यह क्या है.. ?" "तब आप उसे बताते हैं कि यह लड्डू है। फिर वह पूछता है कि किसका है? तब आप कहते हैं कि यह मेरा है।" "फिर जब आप वही मिष्ठान्न प्रभु के श्री चरणों में रख कर उन्हें समर्पित कर देते हैं और उसे लेकर घर को चलते हैं.. " "तब फिर आपको जानने वाला कोई दूसरा मिलता है और वह पूछता है कि यह क्या है ?" "तब आप कहते हैं कि यह प्रसाद है .. फिर वह पूछता है कि किसका है तब आप कहते हैं कि यह हनुमान जी का है।" ("अब समझने वाली बात यह है कि लड्डू वही है। ") "उसके रंग रूप स्वाद परिमाण में कोई अंतर नहीं पड़ता है तो प्रभु ने उसमें से क्या ग्रहण किया कि उसका नाम बदल गया। " "वास्तव में प्रभु ने मनुष्य के अहंकार को हर लिया। यह मेरा है का जो भाव था, अहंकार था, प्रभु के चरणों में समर्पित करते ही उसका हरण हो गया।" "प्रभु को भोग लगाने से मनुष्य विनीत स्वभाव का बनता है, शीलवान होता है। अहंकार रहित स्वच्छ और निर्मल चित्त मन का बनता है। " "इसलिए इसे पाखंड नहीं कहा जा सकता है।यह मनोविज्ञान है, इतना सुन्दर उत्तर सुन कर मैं भाव विह्वल हो गया। " ("🙏कोटि-कोटि नमन है देश के संतों को जो हमें अज्ञानता से दूर ले जाते हैं और हमें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करते हैं।🙏") ~~~०~~~ "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *************************************************

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. "भगवदर्थ कर्म और भगवान की दया का रहस्य" समस्त प्राणी, पदार्थ, क्रिया ओर भाव का सम्बन्ध भगवान के साथ जोड़कर साधन करने से साधक के हृदय मे उत्साह, समता, प्रसन्नता, शन्ति और भगवान की स्मॄति हर समय रह सकती है। इससे भगवान् मे परम श्रद्धा-प्रेम होकर भगवान कि प्रप्ति सहज ही हो सकती है। जो कुछ भी है - सब भगवान का है और मैं भी भगवान का हूँ , भगवान सबमे व्यापक हैं (गीता 18/46), इसलिये सबकी सेवा ही भगवान की सेवा है, मैं जो कुछ कर रहा हूँ, भगवान की प्रेरणा के अनुसार भगवान के लिये ही कर रहा हूँ, भगवान ही मेरे परम प्यारे और परम हितैषी हैं - इस प्रकार के भाव से अपने घर या दुकान के काम को अथवा किसी भी धार्मिक संस्था के काम को अपने प्यारे भगवान का ही काम समझकर और स्वयं भगवान का ही होकर काम करने से साधक को कभी उकताहट नही होती, प्रत्युत्‌ चित मे उत्साह प्रसन्नता और शन्ति उतरोतर बढ़ती रहती है। यदि नहीं बढ़ती है तो गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि इसमे क्या कारण है। खोज करने पर पता लगेगा कि श्रद्धा-विश्वास की कमी ही इसमें कारण है। इस कमी की निवृत्ति के लिये साधक को भगवान के शरण होकर उसमें करुणापूर्वक स्तुति-प्रार्थना करनी चाहिये और भगवान के गुण, प्रभाव, तत्व, रह्सय को समझना चाहिये। गीता प्रचार का काम तो प्रत्यक्ष भगवान का ही काम है; इसमें कोई शंका की बात नहीं है। जो मनुष्य श्रीमद्भगवदगीता के अर्थ और भाव को समझकर गीता का प्रचार करता है तो उससे उसका उध्दार हो जाता है और भगवान उस पर बहुत ही प्रसन्न होते हैं। इसके लिये गीता अ. 18 श्लो. 68-69 को देखना चाहिये - य इमं परमं गुहयं मदभक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परा कृत्वा मामेवैषयत्यसंशय:॥ न च तस्मान्मनुश्येशु कशिचन्मे प्रियकृतम:। भविता न च मे तस्मादन्य: प्रियतरो भुवि॥ ‘जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रह्सययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों मे कहेगा, वह मुझको प्राप्त होगा - इसमें कोई संदेह नहीं है। उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों मे कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर मे उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नही।‘ जो मनुष्य इन दोनों श्लोकों के अर्थ और भाव को भलीभाँति समझ जाता है, उसका तो सारा जीवन गीताप्रचार मे ही व्यतीत होना चाहिये। वर्तमान मे जो कुछ भी गीता का प्रचार हमारे देखने सुनने मे आता है, उसका भी प्रधान कारण इन दो श्लोकों के अर्थ और भाव को जानने का प्रभाव ही है। अत: गीताप्रचार का कार्य भगवान का ही कार्य है और यह भगवान की विशेष कृपा से ही प्राप्त होता है। रुपये खर्च करने से यह नहीं मिलता। भगवान का काम करना - उनकी आज्ञा का पालन करना भगवान की ही सेवा है। वास्तव मे इस काम को भगवान की सेवा समझकर करने से अवशय ही प्रसन्नता तथा शान्ति प्राप्त हो सकती है। यदि नहीं मिलती है तो उस्ने इस काम को भगवान की सेवा समझा ही नहीं। यदि कोई मनुशय महात्मा को महात्मा जानकार उनके कार्य को, उनकी आज्ञा के पालन को उनकी सेवा समझकर करता है तो उस्के हृदय मे भी इतना आनन्द होता है कि वह उसमें स्माता ही नही, फिर भगवान की सेवा से परम प्रसन्नता और शन्ति प्राप्त हो, इसमे तो कहना ही क्या है। गीताप्रचार का कार्य करने वालों के चित मे यदि भगवान की स्मॄति, प्रसन्नता, उत्साह, प्रेम और शान्ति नहीं रहती है तो उन्हें इसके कारण की खोज करनी चाहिये एवं जो दोष समझ मे आये उसको भगवान की दया का आश्रय लेकर हटाना चाहिये। भगवान की दया सब पर अपार है, उसको पूर्न्तया न समझने के कारण ही हम लोग प्रसन्नता और शन्ति की प्राप्ति से वंचित रह्ते हैं। हम लोगों पर भगवान की जो अपार पूर्न दया है, उसके शतांशको भी हम नहीं समझते हैं। किंतु न समझ मे आने पर भी हम लोगों को अपने उपर भगवान कि अपार दया मानते रहना चाहिये। ऐसा करने से वह आगे जाकर समझ मे आ सकती है। दया के इस तत्व को भलीभाँति समझने के लिये यहाँ एक दृष्टान्त बतलाया जाता है। वह इस प्रकार है - एक क्षत्रिय बालक राज्य की सहायता ओर व्यवस्था से एक महाविद्यालय मे अध्ययन करता था। उसके माता-पिता उसे सदा यही उपदेश दिया करते थे कि ‘इस देश के राजा उच्चकोटि के ज्ञानी योगी महापुरुश हैं, वे हेतुरहित प्रेमी और द्यालु हैं, उनकी हम लोगों पर बड़ी भारी दया है। हम लोगों का देहान्त हो जाय तो तुम चिन्ता न करना; क्योंकि महाराज साहब की दया तुम पर हम लोगों की अपेक्षा अतिशय अधिक है।‘ माता-पिता के इस उपदेश के अनुसार वह ऐसा ही मानता था। समय आने पर उस्के माता-पिता चल बसे, परन्तु वह बालक दु:खित नहि हुआ। विद्यालय के सहपाठी बालकों ने उससे पूछा - ‘तुम्हारे माता-पिता मर गये, फिर भी तुम्हारे चेहरे पर खेद नहीं, क्या बात है ? अब तुम्हारा पालन-पोशन कौन करेगा ? क्षत्रिय बालक ने कहा - ‘मुझे शोक क्यों होता ? क्योंकि मेरे माता-पिता से भी बढ़कर मुझ पर दया और प्रेम करने वाले हमारे परम हितैषी महाराजसाहब हैं। महाराजसाहब उच्चकोटि के भक्त एवं ज्ञानी महापुरुष हैं। मैं तो उन्हीं पर निर्भर हूँ। बालक की यह बात सुनकर वहाँ के प्रधानाध्यापक को बड़ा आश्चर्य हुआ कि देखो, इस बालक के हृदय में महाराजसाहब के प्रति कितनी श्रद्धा-भक्ति है। वे प्रधानाध्यापक राज्य की कौंसिल के सदस्य थे। एक दिन जब कौंसिल की बैठक हुई, तब वे भी इसमें उपस्थित थे। उस दिन महाराजसाहब ने कहा - ‘अपने देश मे कोइ अनाथ बालक हो तो बतलायें, उसका प्रबन्ध राज्य की ओर से सुचारु रूप से हो जाना उचित है।‘ कौंसिल के कईं सदस्यों ने उसी क्षत्रिय बालक का नाम बतलाया। इस पर राजा ने सबकी सम्पति से उस बालक के लिये खाने-पीने का सब प्रबन्ध कर दिया और उस्के कच्चे घर को पक्का बनाने का आदेश दे दिया। पढ़ाई का प्रबन्ध तो पहले से ही राज्य की ओर से था ही। कुछ ही दिनों बाद जब राजा की आज्ञा से राजकर्मचारी उसके कच्चे घर को पक्का बनाने के लिये तोड़ रहे थे, तब उस क्षत्रिय बालक के एक सहपाठी ने दौड़कर उसे सूचना दी कि तुम्हारे घर को राजकर्मचारी तोड़कर बर्बाद कर रहे हैं। यह सुनकार बालक बहुत प्रसन्न हुआ और कह्ने लगा - ‘अहा ! महाराजसाहब की मुझ पर बडी़ ही दया है। सम्भव है, वे पुराना तुड़वाकर नया घर बनवायेंगे !’ उसकी यह बात सुनकर प्रधानाध्यापक आशचर्यचकित हो गये ओर सोचने लगे - ‘देखो, इस बालक को कितना प्रबल विश्वास है। महाराज पर कितनी अतूत (atoot) श्रद्धा है।‘ पुन: जब दूसरी बार कौंसिल की बैठक मे प्रधानाध्यापक सम्मिलित हुए, तब राजा ने यह प्रस्ताव रखा - ‘मैन वृद्ध हो गया हुन। मेरे संतान नहीं है। अत: युवराज पद किसको दूँ ? इसके योग्य कौन है ?’ इस पर प्र्धानाध्यापक ने बतलाया - ‘यह क्षत्रिय बालक गुन, आचरण, विद्या ओर स्वभाव मे सब्से बढ़कर है। वह राजभक्त है और आप पर तो उसकी अपार श्रद्धा है।‘ इस बात लका दूसरे सदस्यों ने भी प्रस्न्नतापूर्वक समर्थन किया। राजा ने सर्वसम्मति से उस क्षत्रिय बालक को ही युवराज पद दे दीया। दूसरे दिन राजा के मन्त्री और कुछ उच्च अधिकारी उस क्षत्रिय बालक के घर पर गये। तब सबको आते देख उस क्षत्रिय बालक ने उंका अत्यन्त आदर-सत्कार किया और कहा - ‘मै आप्कि क्या सेवा करूँ ?’ पदाधिकारियों ने कहा - ‘महाराजसाहब की आप पर बडी़ भारी दया हें।‘ बालक बोला - ‘यह मैं पह्ले से ही जानता हूँ कि महाराज की मुझ पर अपार दया है। इसी कारण आप लोगों कि भी मुझ पर बड़ी दया है।‘ पदाधिकारियों ने कहा - ‘हम तो आपके सेवक हैं, आप की दया चाहते हैं।‘ बालक बोला - ‘आप ऐसा कहकर मुझे लज्जित न कीजिये। मैं तो आपका सेवक हूँ। महाराजसाहब की मुझ पर दया है - इस्को मैं अच्छी तरह जानता हूँ।‘ पदाधिकारियों ने कहा - ‘आप जो जानते हैं उससे कहीं बहुत अधिक उनकी दया है।‘ क्षत्रिय बालक ने पूछा - ‘क्या महाराजसाहब ने मेरे विवाह का प्रबन्ध कर दिया है ?’ तब उन्होंने कहा - ‘विवाह का प्रबन्ध ही नहीं, महाराजसाहब की तो आप पर अतिशय दया है।‘ बालक ने पुन: पूछा - ‘क्या महाराजसाहब ने मुझको दो-चार गावो कि जागिरदारी दे दी है ?’ पदाधिकारियों ने कहा - यह तो कुछ नही, उनकी आप पर जो दया है, उसकी आप कल्पना भी नही कर सक्ते। इस पर बालक ने निवेदन किया - ‘उनकी मुझ पर केसी दया है, इसे आप ही कृपा करके बतलाइये। उन्होने कहा - ‘आपको महाराजसाहब ने युवराज पद दे दिया है। इसलिये हम आपकी दया चाहते हैं। लड़के ने कहा - क्या यह सच्ची बात है ? वे बोले सच्ची बात है। उसे बड़ा भारी आश्च्रर्य हुआ। क्योंकि वह अनुमान ही नहीं कर सकता था कि महाराज कि इतनी बड़ी भारी दया मेरे उपर हो सकती है। उसे थोड़ा भी अनुमान नहीं था कि इस प्रकार की दया वे कर सकते हैं। राजा ने उस लड़के को युवराज पद दे दिया। परंतु अपने राजा के पास तो सबके लिये युवराज पद है। वे सबको अपने समान बना लेते हैं। ऐसा राजा अपना ईश्वर है। जिसने आपको मनुष्य शरीर दिया उसने आपके लिये युवराज पद पह्ले से ही कायम कर रखा है। आप उन्हे ठुकरा दें तो अपनी मूर्खता है। राजा की इतनी भारी दया है कि अपने उपर आन्नद कि, प्रेम की बरसा बरस रही है। अब आप छाता लगा लें तो उस विभूति से वंचित रह जायंगे। नहीं मानना अथवा अविश्वास ही अश्रद्धा है। यही छाता लगाना है। अपने को विश्वास रहना चाहिये कि भगवान की अपने उपर बड़ी दया है। भगवान अपने से बहुत प्रेम करना चाहते हैं। आप उनसे हाथ बढ़ाकर मिलना चाहें तो वे निकट खड़े दीखेंगे, मिलने के लिये उत्सुक हो रहे हैं, ऐसे दीखेंगे। किंतु आपका भगवान मे विश्वास होना चाहिये। आपकी श्रद्धा होनी चाहिये | इस दृष्टांत को अध्यातम विषय मे यों घटाना चाहिये कि भगवान ही ज्ञानी महापुरुष राजा हैं। श्रद्धालु साधक ही क्षत्रिय बालक है। उपदेश देने वाले गुरुजन ही माता-पिता हैं। सत्संगी साधकगण ही सहपाठी बालक हैं। राज्य की ओर से बालक के खान-पान का प्रबन्ध कराये जाने को लोकदॄष्टि से अनुकूल परिस्थिति की प्रप्ति और घर तुड़वाये जाने को लोकदॄष्टि से प्रतिकूल परिस्थिति की प्राप्ति समझना चाहिये तथा इन दोनों मे बालक के द्वारा राजा का मंगलविधान मानकर प्रसन्न होने को प्रत्येक घटना मे भगवान का मंगलमय विधान मानकर प्रसन्न होना समझना चाहिये। बालक का राजा को सुह्रद मानकर उन पर निर्भरता, श्रद्धा और विश्वास करना ही भगवत-शरणागति का साधन समझना चाहिये। इस दृष्टांत से हम लोगों को यह शिक्षा लेनी चाहिये की हम लोग अपने उपर भगवान की जितनी दया मानते हैं, भगवान की दया उससे कहीं बहुत अधिक है। भगवान की हम पर इतनी दया है की उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। यदि हम उस दया को जान जायँ तो क्षत्रिय बालक की भाँति हमें इतना आनन्द और प्रसन्न्ता हो कि उसकी सीमा ही न रहे; फिर हमें अपने-आप का भी ज्ञान न रहे। अत: हमें स्वेच्छा. अनिच्छा या परेच्छा से जो कुछ भी प्राप्त हो, उसे भगवान का दयापूर्ण मंगलमय विधान समझकर और अपने द्वारा होने वाली क्रियाओं को भगवान का काम तथा भगवान की परम सेवा समझकर हर समय भगवान को याद रखते हुए आनन्द मे मग्न रहना चाहिये। इस प्रकार भगवदभक्ति के साधन से साधक के चित मे प्रसन्न्ता, रोमाँच और अश्रुपात होने लगता है, हृदय प्रफुल्लित हो जाता है, वाणी गद्गद् हो जाती है तथा कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है, वाणी गद्गद् हो जाती है तथा कण्ठ अवरुद्ध हो जाता है। किंतु मनुष्य जब साधन करते-करते सिद्धावस्था मे पहुँच जाता है - भगवान को पा लेता, तब वह आमोद, प्रमोद, हर्ष आदि से उपर उठकर परम शान्ति और परम आनन्द को प्राप्त कर लेता है। जैसे कड़ाही मे घी डालकर उसमे कचौड़ी सेंकी जाती है, वह तब तक कच्ची रहती है तब तक तो उछलती है - उसमें विशेष क्रिया होती रहती; किंतु जब वह पकने लगती है, तब उसका उछलना कम हो जाता है ओर सर्वथा पक जाने पर तो वह शांन्त और स्थिर हो जाती है। इसी प्रकार साधन करते समय साधक मे जब तक कच्चाई रहती है, तब तक वह साधन-विषयक आमोद-प्रमोद मे उछलता रहता है एवं उसके रोमांच, अश्रुपात और कंठावरोध होता रह्ता है: किंतु जब साधन पकने लगता है, तब हर्षादि विकारों का उफान कम हो जाता है और सर्वथा पक जाने पर वह आमोद, प्रमोद, हर्ष आदि विकारों से रहित परम शांत हो जाता है। फिर वह परमात्मा मे अचल और स्थिर होकर परम शान्ति और परमानन्दस्वरूप परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। ----------:::×:::---------- रचना:- श्रद्धेय श्रीजयदयाल गोयन्दकाजी पुस्तक:- उपदेशप्रद कहानियाँ (६८०) प्रकाशक:- गीताप्रेस, (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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' " माँ और बेटा " "सर्दियों के मौसम में एक बूढी औरत अपने घर के कोने में ठंड से तड़फ रही थी । जवानी में उसके पति का देहांत हो गया था घर में एक छोटा बेटा था!" "उस बेटे के उज्जवल भविष्य के लिए उस माँ ने घर-घर जाकर काम किया काम करते वो बहुत थक जाती थी, लेकिन फिर भी आराम नही करती थी वो सोचती थी जिस दिन बेटा लायक हो जाएगा उस दिन आराम करूंगी।।" "देखते समय बीत गया!माँ बूढी हो गयी और बेटे को अच्छी नौकरी मिल गयी। कुछ समय बाद बेटे की शादी कर दी और एक बच्चा हो गया।" "अब बूढी माँ खुश थी कि बेटा लायक हो गया, लेकिन ये क्या बेटे व बहू के पास माँ से बात करने तक का वक़्त नही होता था बस ये फर्क पड़ा था माँ के जीवन में पहले वह बाहर के लोगो के बर्तन व कपड़े धोती थी। अब अपने घर में बहू-बेटे के." "फिर भी माँ खुश थी क्योंकि औलाद उसकी थी सर्दियों के मौसम में एक टूटी चारपाई पर, बिल्कुल बाहर वाले कमरें में एक फटे से कम्बल में सिमटकर माँ लेटी थी ,और सोच रही थी !" "आज बेटे को कहूँगी तेरी माँ को बहुत ठंड लगती है एक नया कम्बल ला दे। शाम को बेटा घर आया तो माँ ने बोला. बेटा मै बहूत बूढी हो गयी हूँ, शरीर में जान नही है, ठंड सहन नही होती मुझे नया कम्बल ला दे।" "तो बेटा गुस्से में बोला,इस महीने घर के राशन में और बच्चे के एडमिशन में बहुत खर्चा हो गया! कुछ पैसे है पर तुम्हारी बहू के लिए शॉल लाना है । वो बाहर जाती है। तुम तो घर में रहती हो सहन कर सकती हो। ये सर्दी निकाल लो, अगले साल ला दुंगा।" "बेटे की बात सुनकर माँ चुपचाप सिमटकर कम्बल में सो गयी अगले सुबह देखा तो माँ इस दुनियाँ में नही रही. सब रिश्तेदार, पड़ोसी एकत्रित हुए, बेटे ने माँ की अंतिम यात्रा में कोई कमी नही छोड़ी थी।" "माँ की बहुत अच्छी अर्थी सजाई थी!बहुत महंगा शॉल माँ को उढाया था।। सारी दुनियां अंतिम संस्कार देखकर कह रही थी हमको भी हर जन्म में भगवान ऐसा ही बेटा मिले!मगर उन लोगो को क्या पता था कि मरने के बाद भी एक माँ तडफ रही थी,सिर्फ एक कम्बल के लिए ..... ("प्यारे मेरा उद्देस्य इन्सानो के अंदर मर चुकी इंसानियत को जिंदा करना है, अगर मेरी कहानी आपके दिल को छु गयी हो तो अपने सभी दोस्तो को भेजो!हो सकता है ऐसे बहू बेटा हमारे दोस्तो मे भी हो। जिन्हे इस बात का एहसास हो ..!!") ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " **********************************************

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. "विश्वास और भरोसा" एक बार दो बहुमंजिली इमारतों के बीच बंधी हुई एक तार पर लंबा सा बाँस पकड़े एक नट चल रहा था, उसने अपने कन्धे पर अपना बेटा बैठा रखा था। सैंकड़ों, हज़ारों लोग दम साधे देख रहे थे। सधे कदमों से, तेज हवा से जूझते हुए अपनी और अपने बेटे की ज़िंदगी दाँव पर लगा उस कलाकार ने दूरी पूरी कर ली। भीड़ आह्लाद से उछल पड़ी, तालियाँ, सीटियाँ बजने लगी। लोग उस कलाकार की फोटो खींच रहे थे, उसके साथ सेल्फी ले रहे थे। उससे हाथ मिला रहे थे। वो कलाकार माइक पर आया, भीड़ को बोला, "क्या आपको विश्वास है कि मैं यह दोबारा भी कर सकता हूँ।" भीड़ चिल्लाई हाँ हाँ, तुम कर सकते हो। उसने पूछा, क्या आपको पक्का विश्वास (भरोसा) है। भीड़ चिल्लाई हाँ पूरा विश्वास है, हम तो शर्त भी लगा सकते हैं कि तुम सफलतापूर्वक इसे दोहरा भी सकते हो। कलाकार बोला, पूरा पूरा विश्वास है ना। भीड़ बोली, हाँ। कलाकार बोला, ठीक है, कोई मुझे अपना बच्चा दे दे, मैं उसे अपने कंधे पर बैठा कर रस्सी पर चलूँगा। लोगों में खामोशी, शांति, चुप्पी फैल गयी। कलाकार बोला, डर गए, अभी तो आपको तो पक्का विश्वास था कि मैं कर सकता हूँ। असल मे आपको केवल विश्वास है पर भरोसा नहीं है कि मैं कर ही लूँगा। यही कारण है जो हम चिंता, क्रोध, तनावग्रस्त रहते हैं।क्योंकि हम ईश्वरपर विश्वास तो रखते हैं पर पूर्ण विश्वास (भरोसा) नहीं रखते। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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. " श्री राधा नाम की महिमा " "एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा कि गुरु जी कृपया श्री राधा नाम की महिमा बताये तो गुरु जी ने अपने शिष्य को उत्तर दिया कि मुझे महिमा का मालूम तो नही किन्तु जब तुम्हारी मृत्यु हो और जब तुम यमराज के समक्ष पहुँचो तो यही प्रश्न तुम उनसे करना वही बताएंगे जब शिष्य का देह पूरा हुआ तो वह यमराज के समक्ष पहुंचा और उनसे यही प्रश्न किया कि मुझे श्री राधा नाम की महिमा बताऐ! "यमराज आश्चर्य में पड़ गया और उसने कहा हमे नही पता तो शिष्य ने कहा जिसको पता है हमे उसके पास ले चलो तब यमराज उन्हें इंद्रदेव के पास ले गए यही प्रश्न उन्होंने उनसे किया उन्होंने भी मना कर दिया और रथ पर विराजमान हो और यमराज और इंद्र को एक साथ रथ चलाने को बिठा दिया सारथी रूप में।" "फिर पहुंचे ब्रह्मा जी के पास वो तो सृष्टि के रचयिता हैं किन्तु उन्हें भी इस प्रश्न का उत्तर नही पता था उन्हें भी सारथी बनाकर आगे बिठा दिया!" "अब पहुंचे क्षीर सागर में जहां शेषशैया पर श्री नारायण विराजमान थे और यह दृश्य देखकर चकित हुए कि यह कौन मनुष्य है जिसने यमराज इंद्र और ब्रह्मा जी को सारथी बना दिया ,जब वह उनके पास पहुंचे तो श्री गोविन्द से उन्होंने यही प्रश्न किया तो उनका उत्तर था "आप जैसे देवों को जिसने सारथी बना दिया और खुद रथ में बैठकर आया है यह मनुष्य यही श्री राधा नाम की महिमा है।" ("श्री जी के चरणों का ध्यान मात्र भी देवताओं के लिए दुर्लभ है किन्तु जो श्री जी भक्ति कर लेता है उसके आगे सभी देवता भी झुक जाते हैं..!!") ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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