ajay singh ashu
ajay singh ashu Nov 21, 2021

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Ritu Sabarwal Jan 22, 2022

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Dharampal Singh35678 Jan 21, 2022

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Dharampal Singh35678 Jan 20, 2022

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Dharampal Singh35678 Jan 20, 2022

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Uma Mishra Jan 22, 2022

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.88 : मछली की देह अधिक पवित्र है या तुम्हारी देह?* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 88)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* धर्मानुरागिनी प्यारी जनता! *जितने लोग हैं, सब डर से काम करते हैं।* किसान को होता है कि खेती का काम जिस-जिस समय में जो-जो होता है, उस-उस समय में काम नहीं करने से खेत नहीं उपजेगा। अन्न के लिए वस्त्र के लिए दुःख होगा, किसान को डर है। *लोग कहते हैं कि वह स्वतंत्र है, किंतु नहीं, पेट का नौकर है।* ठीक समय पर खेती का काम नहीं करने से उसको दुःख होगा, इसी डर से धूप में खेती करता है, पानी में सड़-सड़कर काम करता है। नौकरीवाले को अपने से ऊपर के हाकिम का डर रहता है कि ठीक से काम नहीं करने से नौकरी से अलग न कर देवे, ऊँचे से नीचे पद पर न दे देवे। लड़के को पिता का डर रहता है, शिक्षक या मौलवी साहब का डर रहता है कि नहीं पढ़ेंगे, तो ये लोग मारेंगे। बड़े होने पर जानते हैं कि ठीक से नहीं पढ़ने पर परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं होंगे, लज्जा होगी। किन्तु इसके साथ-साथ यह भी जानना चाहिए कि *यह शरीर अवश्य छूटेगा, चाहे कब्र में गड़े या चिता में जले।* इसी के लिए संत कबीर साहब कहते हैं - ‘यह शरीर जल के बुदबुदे (बुलबुले) के समान है। बच्चे मर गए, जवान मर गए, बूढ़े मर गए। बूढ़े देह से मरते हैं, किंतु उनका मन नहीं मरता। *निधड़क बैठा नाम बिनु, चेति न करै पुकार। यह तन जल का बुदबुदा, बिनसत नाहीं बार।। आज कहै मैं काल्ह भजूँगा, काल्ह कहै फिर काल। आज काल्ह के करत ही, औसर जासी चाल।। काल करै सो आज कर, आज करै से अब्ब। पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब्ब।।* इससे शरीर भी बिगड़ जाता है और धर्म भी बिगड़ जाता है, *धर्म के बिगड़ने से दुनिया में भी हँसी होती है और दुनिया छोड़ने पर नरक जाना पड़ता है।* साधु-संत जो भोजन करने के लिए बतायें, वह भोजन करो। जितना भोजन ठीक-ठीक पच जाय, उतना भोजन करो। *जीभ-स्वाद के लिए धर्म का नाश मत करो। जीभ का स्वाद क्या है?* वह तो आदत है, उसको अच्छा लगता है, किन्तु जो नहीं खाता, उसे पसन्द नहीं होता। हमारे यहाँ दो धर्म हैं - एक धर्म में मांस-मछली नहीं खाने की बात है और दूसरे धर्म में मांस-मछली खाने की बात है। मांस-मछली खाने में कोई दोष भी लगा सकता है, किंतु नहीं खाने में कोई दोष नहीं लगा सकता। इसलिए जिसमें दोष नहीं लगावे, वही अच्छा है। जो लोग मांस-मछली नहीं खाते हैं, उनको दूसरे लोग जो मांस-मछली खाते हैं, नहीं कहते कि तुम नहीं खाते हो, इसलिए तुमको दोष लगेगा; बल्कि जो नहीं खाता है, वह उसे जो मांस-मछली खाता है, कहता है कि तुमको दोष लगेगा। उसको अधर्मी कहता है। खानेवाले को एक अच्छा कहता है, दूसरा अच्छा नहीं कहता। इसके लिए जिसको अच्छा नहीं लगता, क्यों खाया जाय? *मुसलमानों के धर्म में है कि जबतक शगल (साधनाभ्यास) करते रहो, कोई चिकनी चीज नहीं खाओ। मांस-मछली नहीं खाओ। शगल करना एक दो दिन की बात नहीं है।* शगल करते-करते सालों लग जाते हैं। जो साल-साल, कई सालों तक नहीं खाएगा, उससे फिर आप ही वह खाना छूट जाएगा। इस तरह उसमें भी मांस-मछली आदि का खाना मना है। मछली की देह अधिक पवित्र है या तुम्हारी देह? चिड़िया की देह मनुष्य देह से उत्तम नहीं है। इसलिए *अपने से नीच शरीर के मांस को अपनी ऊँची और पवित्र देह में डालना ठीक नहीं।* हमा आस्त = सब वही है। हमा अज आस्त = सब उससे है। सब वही है - यह अद्वैतवाद है। सब उससे है - इसमें द्वैतवाद है। हमलोगों के यहाँ अद्वैतवाद है, उसमें है - एक वही है। *मंसूर ने ‘अनलहक' कहा था।* *जब दिल मिला दयाल से, तब कछु अंतर नाहिं। पाला गलि पानी मिला, यों हरिजन हरि माहिं।। - कबीर साहब* जैसे पाला गलकर पानी हो जाता है, उसी प्रकार ईश्वर से मिल जाने पर एक ही हो जाता है। संत कबीर साहब ने कहा - *बुन्द समानी समुँद में , यह जानै सब कोय। समुँद समाना बुन्द में, बूझै बिरला कोय।। निरबन्धन बन्धा रहै, बन्धा निरबन्ध होय। करम करै करता नहीं, दास कहावै सोय।।* *झूठ, चोरी, नशा, हिंसा और व्यभिचार; इन पाँचों पापों को नहीं करने का बंधन रखो।* एक ईश्वर पर विश्वास, उसकी प्राप्ति अपने अंदर होगी - इसका दृढ़ निश्चय रखना, गुरु-सेवा, सत्संग और ध्यान; इन पाँचों को करने का बंधन रखो। *कोटि कोटि तीरथ करै, कोटि कोटि करि धाम। जब लग संत न सेवई, तब लग सरै न काम।। जहँ आपा तहँ आपदा, जहँ संसय तहँ सोग। कह कबीर कैसे मिटे, चारो दीरघ रोगा।। अहं अग्नि हिरदे जरै, गुरु से चाहै मान। तिनको जम न्योता दिया, हो हमरे मेहमान।। - संत कबीर साहब* यह प्रवचन श्रीसंतमत सत्संग मंदिर पलासी, अररिया में दिनांक 28.5.1954 ई० को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.87 : ईश्वर को मानिए, उसमें विश्वास कीजिए* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 87)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! *आपलोगों को बहुत उत्तम शरीर मिला है।* इसे पाकर आप साँप, बिच्छू भी बन सकते हैं और देवता भी बन सकते हैं। पाप-कर्म करेंगे, अधर्म कर्म करेंगे तो फिर साँप, बिच्छू बनेंगे और सदाचार का पालन करेंगे; भगवद्भजन करेंगे, पाप नहीं करेंगे, तो देवता-तुल्य हो जाएँगे। झूठ नहीं बोलें, *एक शब्द को छिपा लेने से भी झूठ है। बात मत चुराइए।* एक बात से किसी को लाख रुपये मिल जाते हैं और किसी को लाख रुपये की घटी हो जाती है। हिंसा नहीं करें। मन से, वचन से और कर्म से - तीनों प्रकार की हिंसा से बचें। किसी भी नशीली चीज का सेवन न करें। व्यभिचार न करें। यह तो हुआ संसार में कैसे रहेंगे। अब ईश्वर भजन कैसे हो, इसके लिए सुनिए - आप कहेंगे हम कमाते हैं, खाते हैं, ईश्वर-भजन का क्या काम है? दूसरे कहते हैं - ईश्वर नहीं माने तो नहीं सही, किंतु दुनिया में प्रतिष्ठा से रहो। तो वे कहते हैं - दुनिया में धन से प्रतिष्ठा होती है, तो धन जैसे-तैसे जमा कर लो। तो कोई कहता है - अभी जैसे-तैसे धन जमा कर लो; लेकिन मरने पर नरक जाओगे तब? तब वे कहते हैं - नरक-स्वर्ग कहाँ है? खाओ पियो, धन जमा करो। पाप-पुण्य किसको लगता है? जबतक जियो, सुख से रहो, नहीं तो ऋण लेकर भी घी पियो। मरने पर शरीर जलकर भस्म हो जाता है। यमराज कहाँ है? सब कल्पना है। किंतु ऐसा मत समझो। ईश्वर और जीवात्मा दोनों हैं। मरोगे तो जीवात्मा अवश्य रहेगा। *पाप करोगे तो शरीर छूटने पर नरक देखना पड़ेगा।* युधिष्ठिर जरा-सा झूठ बोले थे तो नरक देखना पड़ा था। यहाँ आप देखते हैं कि कोई बच्चा जन्म लेता है तो हृष्ट-पुष्ट और कोई बच्चा दुबला-पतला रोग लिए हुए। कोई धनी के यहाँ जन्म लेता है, तो कोई निर्धन के यहाँ। ऐसा क्यों होता है? *इसके लिए पूर्व जन्म का संस्कार मानना पड़ेगा।* पूर्व जन्म के कोई दानी पुण्यात्मा होंगे, इसलिए श्रीमान् के यहाँ जन्म लेकर वे बचपन से ही सुखी रहते हैं। *पाप-कर्म का भी फल मिलता है। किसी को तो इसी जन्म में उसका फल मिल जाता है।* सिकलीगढ़ धरहरा में एक अंग्रेज रहता था। वह मनुष्य को मनुष्य नहीं समझता था, पशु समझता था। बड़ा बदमाश था, लोगों को बहुत सताता था। कुछ दिनों के बाद वह पागल हो गया। भीख माँगकर खाया। राजदण्ड हुआ। पुलिस उसको खूब पीटती थी। उसी से चाबी लेकर उसी का धन खोल-खोलकर लेता था। *ईश्वर को मानिए, उसमें विश्वास कीजिए।* स्वर्ग-नरक है, इसको भी मानिए। कर्म-फल के अनुसार नरक-स्वर्ग और दुःख-सुख भोगना पड़ेगा ही। *संसार में तो सुख है ही नहीं।* ईश्वर- भजन कीजिए, मोक्ष मिलेगा, तभी सुख है। पहले ईश्वर को जानिए कि स्वरूपतः कैसा है? लोग समझते हैं कि ईश्वर बड़ी सुन्दर देहवाला और सिंहासन पर विराजमान होगा। किंतु असली बात तो यह है कि *ईश्वर की पहचान आँख से होने योग्य नहीं है। वह कान से सुनने और नाक से सूँघने योग्य भी नहीं है। त्वचा से स्पर्श होने योग्य नहीं है। वह इन्द्रियों से ऊपर है।* शरीर और इन्द्रियों को छोड़कर आप स्वयं रहते हैं, तब अपने से जो पकड़ेंगे, वही ईश्वर है। लेकिन जबतक वह चेतन आत्मा मन, बुद्धि और शरीर इन्द्रियों में रहती है, तबतक पहचान नहीं सकती। जो चेतन आत्मा से जाना-पहचाना जाय, उसके लिए कोशिश कीजिए। *उसकी युक्ति गुरु से जानिए।* अपने गाँव से आप यहाँ आए हैं। जब आप घर जाने लगेंगे, तो जैसे-जैसे जिस रास्ते से यहाँ आए हैं, यहाँ से उधर जाने में वैसे-वैसे इन सब गाँवों को छोड़ते-छोड़ते अपने गाँव पहुँचेंगे। उसी तरह आप शरीर, इन्द्रिय और मन-बुद्धि में आ गए हैं। इन सबको पार कर वहाँ पहुँचिए, जहाँ से आए हैं। *किसी चीज को समेटिए, तो उसके विपरीत की ओर उसकी गति हो जाती है।* इसी तरह जब यह मन इन्द्रियों की ओर से रोका जाएगा, तो जिधर मन-इन्द्रिय आदि नहीं है, उधर को बढ़ेगा। इसी तरह से जाते-जाते ईश्वर के स्थान पर पहुँचेगा, वहाँ जाकर ईश्वर को पहचानेगा। वह ईश्वर को पहचान कर मुक्ति प्राप्त करेगा। इसके लिए जो जप और ध्यान करने के लिए बतलाया गया है, उसको करते रहिए। *जो आदमी पाप में फँसा रहेगा, वह उस ओर नहीं जा सकता है। जिसका मन सत्संग में जाने से कतराता है तो समझिए कि उसका मन पापी है।* जिसके मन में लगा रहे कि सत्संग में कब जायँ, कब जायँ तो उससे पाप नहीं होगा। यदि उससे पाप हो भी जाय और वह कह दे कि भाई! मुझसे यह पाप हो गया तो उससे फिर पाप नहीं होगा। *जो गलती से झूठ बात आप में आ गयी है, उसको छोड़ दीजिए। अपने को पाप में मत डुबाइए।* यह प्रवचन अररिया जिलान्तर्गत संतमत सत्संग मंदिर, सैदाबाद में दिनांक 25.5.1954 ईo को अपराह्नकालीन सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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, ॐ सनातन हमारा अस्तित्व और मैं सनातन हिन्दू सभ्यता संस्कृति में मनुष्य जीवन को तीन भागों में विभक्त किया गया है । ये तीन भाग ( सभ्यता , संस्कृति और जीवन ) सनातन हिन्दू के लोग अपने यश गौरव पराक्रम ईश्वर को याद करने के लिए जय श्री परशुराम जय श्री राम जय श्री कृष्ण हर हर महादेव जयघोष करते है । यह सिर्फ जयघोष नही जीवन जीने की पद्धति है। ईश्वर का दर्शन और संभाषण- प्रतिमाओं में देखे जाने वाले भगवान बोलते नहीं, पर अंत:करण वाले भगवान जब दर्शन देते हैं , तो बात करने के लिए भी व्याकुल दीखते हैं । यदि हमारे कान हों तो सुनें- वे एक ही बात कहते चले जाएँगे - "मेरे इस अनुपम उपहार - मनुष्य जीवन को इस तरह न बिताया जाना चाहिए - जैसे कि बिताया जा रहा है । ऐसे न गँवाना चाहिए जैसे कि गँवाया जा रहा है । यह बड़े प्रयोजन के लिए है । ओछी रीति नीति अपनाकर मेरे प्रयास अनुदान का उपहास न बनाया जाना चाहिए । जब और भी बारीकी से उनकी भाव-भंगिमा और मुखाकृति को देखें तो प्रतीत होगा कि वे विचार-विनिमय करना चाहते हैं , और कहना चाहते हैं , कि बताओ तो इस जीवन संपदा का इससे अच्छा उपयोग क्या और कुछ नहीं हो सकता जैसा कि किया जा रहा है ? वे उत्तर चाहते हैं और संभाषण को जारी रखना चाहते हैं । अंतःकरण में अवस्थित भगवान की झाँकी, दर्शन, परामर्श और पथ प्रदर्शन तक ही पर्याप्त नहीं है । उसमें गाय बछड़े जैसा वात्सल्य भी विह्वल दीखता है । परमात्मा हमें अपना अमृत रस "दुग्ध" अजस्र अनुदान के रूप में पिलाना चाहते हैं । पति और पत्नी की तरह भिन्नता को अभिन्नता में बदलना चाहते हैं । आत्मसात कर लेने की उनकी उत्कंठा कितनी प्रबल दृष्टिगोचर होती है । हम "ईश्वर"के बनें, ईश्वर के लिए जिएँ । अपने को इच्छाओं और कामनाओं से खाली कर दें । उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए आत्मसमर्पण कर दें, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ, आनंद की वर्षा करता हुआ पाएँगे । ऐसा दर्शन कर सकें तो हम धन्य हो जाएँ । भय - क्रोध , ईष्या , घमंड और अभिमान के मद में चूर मनुष्य का हृदय एक कारावास (जेल) की भाँति है । जिसमे-: प्रेम-सौहार्द , दया, भक्ति और धर्म का निवास निषेध है ।। ( कुछ लोग प्रेम का मतलब ही बदल दिये हैं । आजकल एक भ्रांतिपूर्ण वक्तव्य का चलन प्रचलित हो रहा है । की एक थाली में भोजन नहीं करना भेदभावपूर्ण है । जिसे जाती से जोड़ दिया जाता है । प्रेम एक थाली में खाने से नहीं जुड़ा हो सकता या किसी के द्वारा परोसने से नहीं हो सकता प्रेम एक प्रवाह है जो हृदय से प्रकट होकर मनको तरंगित करता है । खिचाव उत्पन्न करता है । एक दूसरे केलिए समर्पण का भाव पैदा करता है । एक थाली में या किसी के द्वारा परोसा जाने वाला भोजन, स्वार्थी मतलबी प्रेम का दिखावा हो सकता है ) जिस हृदय मे प्रेम का प्रकाश नही है आपितू मतलब के लिए संबंध स्थापित करते हैं! जिनमे निस्वार्थ भाव का प्रेम नहीं है ! आपसी तालमेल को सही दिशानिर्देश देने वाला सौहार्द नहीं है । परजीवियों ( यानी अपने तनसे हटकर दूसरे शरीर धारी ) के प्रति दया ज्ञान नहीं है । जिनमें अपने कूल के पितृपक्ष और इष्ट देवी-देवताओ के प्रति भक्ति नही है ! जिस भी जीव-मनुष्य मे अपने धर्म मे आस्था-विश्वास नहीं है ऐसे व्यक्तित्व के धनी सदैव ही समाज के लिए अभिशाप हैं । यदि ईश्वर के आलौकिक दिव्य रूप के दर्शन करना चाहते हैं तो स्वयं के हृदय को अपने ही पल्लवित बाल-बालिकाओ के हृदय जैसा कोमल और पवित्र भावपूर्ण हृदय का निर्माण करें । अभी अपनेे ही बच्चों को आपने ही चरित्र और व्यक्तित्व से ओत-प्रोत करके उनको भी समाज के खिलाफ भ्रमित - अभद्र व्यवहार के द्वारा हथियार बना दिया है। नशा सेवी समाज कभी सभ्य नहीं हो सकता । नशा तीन प्रकार का होता है । (1) व्यसन जैसे :- शराब तंबाकु गुटका नशीले पदार्थ (2) अहम जैसे :- मैं शक्तिशाली हूं मैं धनवान हूं मैं पहलवान हूं मैं विद्वान हूं (3)धर्म जैसे :- किसी के किये जा रहे कृत्य को परिभाषित करना सही गलत का निर्णय लेना यानी अपने लिए स्वयं वकिल बनना और दूसरों के लिए जजमेंट करना ही नशा है । आप दोनो , माता - पिता अपने परिवार के लिए सूपर हीरो के समान हैं । अपने बच्चों और कुटुम्बियो के लिए आप आदर्श बनकर एक मजबूत समाज की नींव बन सकते हैं। हमारे शब्द और जिव्हा यदी नियंत्रण मे न रहे तो मनुष्य को स्वयं के पतन का कारण बनना पड़ता है। इसलिए मनुष्य को हर संभव प्रयास के द्वारा अपने संबंधो मे शब्दो का चयन उचित रूप से करके जिव्हा को उचित शब्दो के द्वारा स्वयं का मार्ग दर्शक बनाए । पतंग तभी तक आकाश में उड़ती हुई!!इठलाकर इतराती रहती है!!जब तक वह डोर से जुड़ी हुई है!! वह उसे बन्धन भले समझती है किन्तु वही उसका आलम्ब है!! आधार है!!उसी तरह हम आप जब तक अपने समाज से संस्कार से जुड़े हैं!! तभी तक हमारी, आपकी, समाज की , संस्थान की गरिमा है , मर्यादा है!! नहीं तो कटी पतंग को तो कोई भी लूट लेता है!! या किसी गर्त में, अस्तित्व विहीन होकर, फटेहाल पड़ी रहती है!! वैसे ही समाज से कटकर या उसकी उपेक्षा करके!!दूसरो की छाव में खड़े होकर हम!! अपनी परछाई खो देते हैं !! अपनी परछाई बनाने के लिए हमे स्वयं धूप में खड़ा होना पड़ेगा!! व्यक्ति को अपने जीवन में परछाई और आईने के जैसे दोस्त बनाने चाहिए!! क्योंकि परछाई कभी साथ नहीं छोड़ती और आईना कभी झूठ नहीं बोलता.!!समाज और संगठन हमारी मर्यादा है!!और हमसे आपसे समाज, संगठन मर्यादित होता है!!समाज के गौरव बनकर समाज और संगठन को गौरवान्वित कीजिए! परिवार ही व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है!! माता पिता ही प्रथम गुरु होते हैं!!व्यक्ति का व्यक्तित्व उस व्यक्ति का ही नहीं अपितु उसके परिवार का दर्पण होता है!!जिसमें उसका और उसके परिवार का संस्कार झलकता है!!अतः व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने संस्कार से अपने व्यक्तित्व को और अपने परिवार के संस्कार को हमेशा गौरवान्वित करने का प्रयास करें । 🌹🙏🙏🙏🙏🙏🌹 आपका दीपक कुमार ओझा उर्फ बोका बाबा

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Mukesh Janyani Jan 20, 2022

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