विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏 आप और आपके पूरे परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं शुभ रात्रि विश्राम🌹🙏🌹🙏 त्रेतायुग से आरम्भ रावणवध के स्मारकी-- विजया दशमी दशहरा : अच्छाई से बुराई को खत्म करने की दिव्य सन्देश युक्त सांस्कृतिक त्यौहार है विजया दशमी-- दशहरा, जिसका आरम्भ त्रेतायुग से है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम है-- अच्छाई की प्रतीक, जंहा बुराई की प्रतीक है-- असुरराज लंकपति रावण। इसीलिए त्रेतायुग से आरम्भ विजय- उत्सव स्वरूप विजया- दशमी में अच्छाई के द्वारा बुराई को जलाने की परंपरा है, जो इन्सानियत की आधार पर आर्य- संस्कृति की एक प्रतीकात्मक रूपकल्प सम्बलित विजय- सन्देश।। यंहा प्रश्न है कि त्रेता युग में जिस मास की तिथि में रावण वध हुआ था, इस से अलग एक समय में विजया दशमी मनाने की रहस्य क्या हो सकता है। रावण था विश्रवा ऋषि के पुत्र। इस कारण से ब्राह्मण सन्तान रावण को वध करना यदि ब्रह्महत्या दोषयुक्त, तो ऐसी धर्मसंकट में हर साल रावण को जलाना दोषप्रद है की नहीं?? दोनों प्रश्नों के उत्तर में कहा जा सकता है कि-- संहिता के अनुसार, जन्म से कोई भी इंसान ब्राह्मण होकर जन्म नहीं लेता; सिर्फ कर्मगुण से ही कोई ब्राह्मण बन सकता है। अतः एक ऋषि- पुत्र तथा ब्रह्मज्ञानी होने के साथ परम् शिवभक्त होते हुए भी अपवाद में प्रचंड अहंकारी तथा त्रिलोक में आसुरिक- संत्रास फैलाने वाला दुष्ट लंकपति रावण के लिए विजया- दशमी में दहनोत्सव पालन को ब्रह्महत्या- दोषप्रद कहकर टाल नहीं सकते। रही बात दूसरे माह में विज्योत्सव मनाने की तो, सिर्फ इतनी कहा जा सकता है कि-- अयोध्यावासी सब रावण वध होने की सम्बाद जानने के बाद ही प्रतीकात्मक रूप से रावण- दहन कर विजयोत्सव मनाये थे और इसी के पीछे कोई भ्रम या दूसरा कारण नहीं है।। प्रश्न-- ''रावण एक प्रकांड पंडित था ! उसने माता सीता को कभी छुआ नहीं ! अपनी बहन के अपमान के लिये पूरा कुल को दाँव पर लगा दिया ! तो रावण कंहा कैसे अन्याय किया !!" उत्तर-- "माता सीता को नहीं छूने का कारण उसकी अच्छाई प्रवृत्ति नहीं, बल्कि कुबेर के पुत्र “नलकुबेर” द्वारा दिया गया श्राप था कि, यदि काम- प्रवणता के साथ किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुआ, तो उसके सिर के टुकड़े- टुकड़े हो जायेंगे।।" प्रश्न-- ''रावण अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिये सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था, तो भाई की कर्त्तव्य निभाना कैसे अन्याय कहा जाए !!" उत्तर-- "रावण की बहन सूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह था राजा कालकेय का सेनापति। जब रावण तीनो लोकों पर विजय प्राप्त करने निकला, तो उसका युद्ध कालकेय से भी हुआ, जिसमें उसने बहनोई विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब सूर्पणखा ने अपने ही भाई को श्राप दिया था कि, बहन के द्वारा ही भाई का सर्वनाश होगा। बहन को विधवा बनाते समय तो भाई का बहन के प्रति कर्त्तव्य ज्ञान नहीं रही, बाद में बहन को लगे अपमान की बदला लेने के लिए अपनी ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मज्ञान को भी भूल गया और पराई औरत को छल कर हरण किया। इसी से बढ़कर घोर अन्याय का प्रमाण और क्या हो सकता है !!" कहते है की रावण 'अजेय' होने के साथ 'महाज्ञानी' था। किन्तु प्रभु श्रीराम के अलावा उसे राजा बलि, वानरराज बाली, महिष्मति के राजा कार्तवीर्य अर्जुन और स्वयं भगवान शिव ने भी हराया था, तो पराजित को 'अजेय' कहना युक्ति सम्मत नहीं है। दूसरी बात ये है कि रावण महाज्ञानी था; लेकिन जो व्यक्ति अपने ज्ञान को यथार्थ जीवन में लागू ना करे, वही तो ज्ञान- विनाशकारी होता है।। रावण ने अनेक ऋषि- मुनियों का वध किया, अनेक यज्ञ ध्वंस किया, ना जाने कितनी स्त्रियों का अपहरण भी किया। यहाँ तक कि स्वर्गलोक की अप्सरा 'रंभा' को भी नहीं छोड़ा था। उल्लेखनीय है कि एक गरीब ब्राह्मणी 'वेदवती' के रूप से प्रलोभित होकर जब कामुक रावण उसे बालों से घसीट कर ले जाने की कोसिस किया, वेदवती ने आत्मदाह कर लिया और वो उसे श्राप दे गई कि उनका विनाश एक स्त्री के कारण ही होगा, जो बाद में हुआ था। इसीलिए रावण- वध के पीछे नारियों का श्राप था, जो अकाट्य प्रमाण है।। रावण कहता था-- "एकः ही अस्मिन द्वितीयो ना अस्ति न भूतो न भविष्यति।" अर्थात "मेरे जैसा मैं एक ही हूं, ना कोई भूतकाल में था, ना भविष्य में होगा।" इसीलिए अध्यात्म- दर्शन के दृष्टि में उसे श्रीराम ने नहीं मारा, उसे उसके इसी अहंकार ने ही मारा था, तो अहंकार पर आत्मसम्मान की विजय का पर्व ही शुभ और खुशहाल व्यंजक विजयदशमी है।। "विद्या विवादाए धनं मदाय, शक्ति परेशां परपीडनाय। खलस्य साधु विपरित्मेदय, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।" अर्थात-- "दुष्ट व्यक्ति को विद्या, धन और शक्ति मिलने पर वह सिर्फ विवाद, अहंकार और दुसरों की उत्पीडन के लिये ओ सब को प्रयोग करता है, जबकी साधु या सज्जन ज्ञान बांटने, दान करने एवं दुसरों की रक्षा के लिये करता है।" महाज्ञानी होकर भी रावण सिर्फ आसुरिक दुष्ट स्वभाव से अहंकारी बन गया था और विजया दशमी त्यौहार ऐसी आसुरिक दुष्टतापूर्ण अहंकार की विनाश- यज्ञ है। किन्तु ऐसे सिर्फ पुतले जलाने से बुराई की प्रतीक रावण नहीं मर सकता; सचमुच बुराई को जलाना है तो-- अच्छाई की प्रतीक राम को मन में जिंदा रखना चाहिए।। अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय, पाप पर पुण्य की विजय, अत्याचार पर सदाचार की विजय, क्रोध पर दया- क्षमा की विजय, अज्ञान पर ज्ञान की विजय-- ये सब है, रावण पर भगवान श्रीराम की विजय के प्रतीक विजयादशमी।।

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं
     🙏🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🙏
       आप और आपके पूरे परिवार को विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएं शुभ रात्रि विश्राम🌹🙏🌹🙏
    
त्रेतायुग से आरम्भ रावणवध के स्मारकी-- विजया दशमी दशहरा :

       अच्छाई से बुराई को खत्म करने की दिव्य सन्देश युक्त सांस्कृतिक त्यौहार है विजया दशमी-- दशहरा, जिसका आरम्भ त्रेतायुग से है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम है-- अच्छाई की प्रतीक, जंहा बुराई की प्रतीक है-- असुरराज लंकपति रावण। इसीलिए त्रेतायुग से आरम्भ विजय- उत्सव स्वरूप विजया- दशमी में अच्छाई के द्वारा बुराई को जलाने की परंपरा है, जो इन्सानियत की आधार पर आर्य- संस्कृति की एक प्रतीकात्मक रूपकल्प सम्बलित विजय- सन्देश।।

       यंहा प्रश्न है कि त्रेता युग में जिस मास की तिथि में रावण वध हुआ था, इस से अलग एक समय में विजया दशमी मनाने की रहस्य क्या हो सकता है। रावण था विश्रवा ऋषि के पुत्र। इस कारण से ब्राह्मण सन्तान रावण को वध करना यदि ब्रह्महत्या दोषयुक्त, तो ऐसी धर्मसंकट में हर साल रावण को जलाना दोषप्रद है की नहीं??

       दोनों प्रश्नों के उत्तर में कहा जा सकता है कि-- संहिता के अनुसार, जन्म से कोई भी इंसान ब्राह्मण होकर जन्म नहीं लेता; सिर्फ कर्मगुण से ही कोई ब्राह्मण बन सकता है। अतः एक ऋषि- पुत्र तथा ब्रह्मज्ञानी होने के साथ परम्  शिवभक्त होते हुए भी अपवाद में प्रचंड अहंकारी तथा त्रिलोक में आसुरिक- संत्रास फैलाने वाला दुष्ट लंकपति रावण के लिए विजया- दशमी में दहनोत्सव पालन को ब्रह्महत्या- दोषप्रद कहकर टाल नहीं सकते। रही बात दूसरे माह में विज्योत्सव मनाने की तो, सिर्फ इतनी कहा जा सकता है कि-- अयोध्यावासी सब रावण वध होने की सम्बाद जानने के बाद ही प्रतीकात्मक रूप से रावण- दहन कर विजयोत्सव मनाये थे और इसी के पीछे कोई भ्रम या दूसरा कारण नहीं है।।

       प्रश्न--  ''रावण एक प्रकांड पंडित था ! उसने माता सीता को कभी छुआ नहीं ! अपनी बहन के अपमान के लिये पूरा कुल को दाँव पर लगा दिया ! तो रावण कंहा कैसे अन्याय किया !!"

      उत्तर-- "माता सीता को नहीं छूने का कारण उसकी अच्छाई प्रवृत्ति नहीं, बल्कि कुबेर के पुत्र “नलकुबेर” द्वारा दिया गया श्राप था कि, यदि काम- प्रवणता के साथ किसी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुआ, तो उसके सिर के टुकड़े- टुकड़े हो जायेंगे।।"


      प्रश्न-- ''रावण अपनी बहन के अपमान का बदला लेने के लिये सर्वस्व न्यौछावर कर दिया था, तो भाई की कर्त्तव्य निभाना कैसे अन्याय कहा जाए !!"

      उत्तर-- "रावण की बहन सूर्पणखा के पति विद्युतजिव्ह था राजा कालकेय का सेनापति। जब रावण तीनो लोकों पर विजय प्राप्त करने निकला, तो उसका युद्ध कालकेय से भी हुआ, जिसमें उसने बहनोई विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब सूर्पणखा ने अपने ही भाई को श्राप दिया था कि, बहन के द्वारा ही भाई का सर्वनाश होगा। बहन को विधवा बनाते समय तो भाई का बहन के प्रति कर्त्तव्य ज्ञान नहीं रही, बाद में बहन को लगे अपमान की बदला लेने के लिए अपनी ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मज्ञान को भी भूल गया और पराई औरत को छल कर हरण किया। इसी से बढ़कर घोर अन्याय का प्रमाण और क्या हो सकता है !!"

       कहते है की रावण 'अजेय' होने के साथ 'महाज्ञानी' था। किन्तु प्रभु श्रीराम के अलावा उसे राजा बलि, वानरराज बाली, महिष्मति के राजा कार्तवीर्य अर्जुन और स्वयं भगवान शिव ने भी हराया था, तो पराजित को 'अजेय' कहना युक्ति सम्मत नहीं है। दूसरी बात ये है कि रावण महाज्ञानी था; लेकिन जो व्यक्ति अपने ज्ञान को यथार्थ जीवन में लागू ना करे, वही तो ज्ञान- विनाशकारी होता है।।

       रावण ने अनेक ऋषि- मुनियों का वध किया, अनेक यज्ञ ध्वंस किया, ना जाने कितनी स्त्रियों का अपहरण भी किया। यहाँ तक कि स्वर्गलोक की अप्सरा 'रंभा' को भी नहीं छोड़ा था। उल्लेखनीय है कि एक गरीब ब्राह्मणी 'वेदवती' के रूप से प्रलोभित होकर जब कामुक रावण उसे बालों से घसीट कर ले जाने की कोसिस किया, वेदवती ने आत्मदाह कर लिया और वो उसे श्राप दे गई कि उनका विनाश एक स्त्री के कारण ही होगा, जो बाद में हुआ था। इसीलिए रावण- वध के पीछे नारियों का श्राप था, जो अकाट्य प्रमाण है।।
          
       रावण कहता था-- "एकः ही अस्मिन द्वितीयो ना अस्ति न भूतो न भविष्यति।" अर्थात "मेरे जैसा मैं एक ही हूं, ना कोई भूतकाल में था, ना भविष्य में होगा।" इसीलिए अध्यात्म- दर्शन के दृष्टि में उसे श्रीराम ने नहीं मारा, उसे उसके इसी अहंकार ने ही मारा था, तो अहंकार पर आत्मसम्मान की विजय का पर्व ही शुभ और खुशहाल व्यंजक विजयदशमी है।।

      "विद्या विवादाए धनं मदाय, शक्ति परेशां परपीडनाय। खलस्य साधु विपरित्मेदय, ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।" अर्थात-- "दुष्ट व्यक्ति को विद्या, धन और शक्ति मिलने पर वह सिर्फ विवाद, अहंकार और दुसरों की उत्पीडन के लिये ओ सब को प्रयोग करता है, जबकी साधु या सज्जन ज्ञान बांटने, दान करने एवं दुसरों की रक्षा के लिये करता है।" महाज्ञानी होकर भी रावण सिर्फ आसुरिक दुष्ट स्वभाव से अहंकारी बन गया था और विजया दशमी त्यौहार ऐसी आसुरिक दुष्टतापूर्ण अहंकार की विनाश- यज्ञ है। किन्तु ऐसे सिर्फ पुतले जलाने से बुराई की प्रतीक रावण नहीं मर सकता; सचमुच बुराई को जलाना है तो-- अच्छाई की प्रतीक राम को मन में जिंदा रखना चाहिए।।

      अधर्म पर धर्म की विजय, असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय, पाप पर पुण्य की विजय, अत्याचार पर सदाचार की विजय, क्रोध पर दया- क्षमा की विजय, अज्ञान पर ज्ञान की विजय-- ये सब है, रावण पर भगवान श्रीराम की विजय के प्रतीक विजयादशमी।।

+21 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 13 शेयर

कामेंट्स

R.K.SONI (Ganesh Mandir) Oct 15, 2021
जय श्री राम जी💐💐🙏 🚩🚩शुभ रात्री वंदन जी🚩🚩🚩🚩🚩🚩दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामनाए जी👌💐

+96 प्रतिक्रिया 41 कॉमेंट्स • 184 शेयर
Pooja Rajpoot Dec 6, 2021

+3 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Sudha Mishra Dec 6, 2021

+4 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Babbu Bhai Dec 6, 2021

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

+3 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 0 शेयर

+4 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 2 शेयर
pradeep rajpurohit Dec 6, 2021

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
Pooja Rajpoot Dec 6, 2021

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर
sachin jain Dec 6, 2021

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB