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S A Dec 6, 2021

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' " *[११८ - शत्रुनाशन सूक्त (११३)]* "[ *ऋषि* - भार्गव। *देवता* - तृष्टिका। *छन्द* - विराट् अनुष्टुप्, २ शंकुमती चतुष्पदा भुरिक् उष्णिक्।] " "*२०१९. तृष्टिके तृष्टवन्दन उदमूं छिन्धि तृष्टिके। यथा कृतद्विष्टासोऽमुष्मैशेप्यावते॥१॥*" "हे काम तृष्णा! हे धन तृष्णा! तुम अपने कुप्रभाव से स्त्री-पुरुष में द्वेष पैदा कर देती हो, उनके स्नेह सम्बन्धों को काट देती हो॥१॥" "*२०२०. तृष्टासि तृष्टिका विषा विषातक्यसि। परिवृक्ता यथासस्यृषभस्य वशेव॥२॥*" "हे तृष्णा ! तुम लोभमय हो। तुम विष लता जैसे विषैले प्रभाव वाली हो। जिस प्रकार वृषभ द्वारा त्याग देने से गाय बिना बछड़े वाली रहती है, उसी प्रकार तुम त्यागने योग्य हो॥२॥" "*[तृष्णा आदि मनोविकार मन में आएँ, तो उन्हें अपने चिन्तन से पोषण नहीं देना चाहिए। ऐसा करने से वृषभहीन गाय की तरह उनका तेज विकसित नहीं हो पाता।]*" (क्रमशः) "अथर्ववेद संहिता [सरल हिन्दी भावार्थ सहित]" - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य" ----------:::×:::---------- " जय माता दी " " कुमार रौनक कश्यप " **********************************************

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. "भक्तों की दरिद्रता" जगत-जननी पार्वतीजी ने एक भूखे भक्त को श्मशान में चिता के अंगारों पर रोटी सेंकते देखा तो वे दौड़ी-दौड़ी ओघड़दानी शंकरजी के पास गयीं और कहने लगीं, "भगवन् ! मुझे ऐसा लगता है कि आपका कठोर हृदय अपने अनन्य भक्तों की दुर्दशा देखकर भी नहीं पिघलता। कम-से-कम उनके लिए भोजन की उचित व्यवस्था तो कर ही देनी चाहिए। देखते नहीं वह बेचारा भर्तृहरि अपनी कई दिन की भूख मृतक को पिण्ड के दिये गये आटे की रोटियाँ बनाकर शान्त कर रहा है।" महादेव ने हँसते हुए कहा, "शुभे ! ऐसे भक्तों के लिए मेरा द्वार सदैव खुला रहता है। पर वह आना ही कहाँ चाहते हैं यदि कोई वस्तु दी भी जाये तो उसे स्वीकार नहीं करते। कष्ट उठाते रहते हैं फिर ऐसी स्थिति में तुम्हीं बताओ मैं क्या करूँ ?" माँ भवानी आश्चर्य से बोलीं, "तो क्या आपके भक्तों को उदर पूर्ति के लिए भोजन की आवश्यकता भी अनुभव नहीं होती ?" श्रीशिवजी ने कहा, "परीक्षा लेने की तो तुम्हारी पुरानी आदत है यदि विश्वास न हो तो तुम स्वयं ही जाकर क्यों न पूछ लो। परन्तु परीक्षा में सावधानी रखने की आवश्यकता है।" भगवान शंकर के आदेश की देर थी कि माँ पार्वती भिखारिन का छद्मवेश बनाकर भर्तृहरि के पास पहुँचीं और बोली, "बेटा ! मैं पिछले कई दिन से भूखी हूँ। क्या मुझे भी कुछ खाने को देगा ?" अवश्य भर्तृहरि ने केवल चार रोटियाँ सेंकी थीं उनमें से दो बुढ़िया माता के हाथ पर रख दीं। शेष दो रोटियों को खाने के लिए आसन लगाकर उपक्रम करने लगे। भिखारिन ने दीन भाव से निवेदन किया, "बेटा ! इन दो रोटियों से कैसे काम चलेगा ? मैं अपने परिवार में अकेली नहीं हूँ एक बुड्ढा पति भी है उसे भी कई दिन से खाने को नहीं मिला है।" भर्तृहरि ने वे दोनों रोटियाँ भी भिखारिन के हाथ पर रख दीं। उन्हें बड़ा सन्तोष था कि इस भोजन से मुझसे से भी अधिक भूखे प्राणियों का निर्वाह हो सकेगा। उन्होंने कमण्डल उठाकर पानी पिया। सन्तोष की साँस ली और वहाँ से उठकर जाने लगे। तभी आवाज सुनाई दी, "वत्स ! तुम कहाँ जा रहे हो ?" भर्तृहरि ने पीछे मुड़ कर देखा। माता पार्वती दर्शन देने के लिए पधारी हैं। माता बोलीं, "मैं तुम्हारी साधना से बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हें जो वरदान माँगना हो माँगो।" प्रणाम करते हुए भर्तृहरि ने कहा, "अभी तो अपनी और अपने पति की क्षुधा शान्त करने हेतु मुझसे रोटियाँ माँगकर ले गई थीं। जो स्वयं दूसरों के सम्मुख हाथ फैलाकर अपना पेट भरता है वह क्या दे सकेगा। ऐसे भिखारी से मैं क्या माँगू।" पार्वती जी ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा, "मैं सर्वशक्तिमती हूँ। तुम्हारी परदुःख कातरता से बहुत प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो।" भर्तृहरि ने श्रद्धा पूर्वक जगदम्बा के चरणों में सिर झुकाया और कहा, "यदि आप प्रसन्न हैं तो यह वर दें कि जो कुछ मुझे मिले उसे दीन-दुःखियों के लिए लगाता रहूँ और अभावग्रस्त स्थिति में बिना मन को विचलित किये शान्त पूर्वक रह सकूँ।" पार्वती जी 'एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव के पास लौट गई। त्रिकालदर्शी शम्भु यह सब देख रहे थे उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "भद्रे ! मेरे भक्त इसलिए दरिद्र नहीं रहते कि उन्हें कुछ मिलता नहीं है। परन्तु भक्ति के साथ जुड़ी उदारता उनसे अधिकाधिक दान कराती रहती हैं और वे खाली हाथ रहकर भी विपुल सम्पत्तिवानों से अधिक सन्तुष्ट बने रहते है।" ----------:::×:::--------- " जय माता दी " " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

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' " *[११९ - शत्रुनाशन सूक्त (११४)]* " [ *ऋषि* - भार्गव। *देवता* -अग्नीषोमा। *छन्द* - अनुष्टुप्।] *२०२१. आ ते ददे वक्षणाभ्य आ तेऽहं हृदयाद् ददे।* *आ ते मुखस्य संकाशात् सर्वं ते वर्च आ ददे॥१॥* "(हे द्वेषकारिणी अधम स्त्री !) हम तेरे मुख, वक्षस्थल आदि आकर्षक अंगों के तेज को नष्ट करते हैं। हृदय की कुत्सित भावनाओं को नष्ट करते हैं॥१॥" "[अपने सौन्दर्य से दूसरों को हीनता की ओर प्रेरित करने वाली नारी की तेजस्विता का हरण कर लेना लोकहित की दृष्टि से लाभप्रद माना गया है।]" *२०२२. प्रेतो यन्तु व्याध्यः प्रानुध्याः प्रो अशस्तयः।* *अग्नी रक्षस्विनीर्हन्तु सोमो हन्तु दुरस्यतीः॥२॥* "हे विकारों से बचने वाले स्त्री या पुरुष ! तुम्हारी शारीरिक व्याधियाँ एवं मानसिक दुःख दूर हों। तुम लोक-निन्दा से मुक्त हो। अग्निदेव राक्षसियों का नाश करें तथा सोमदेव अनिष्ट चिन्तन की प्रेरणा देने वाली पिशाचिनियों का संहार करें॥२॥" (क्रमशः) "अथर्ववेद संहिता [सरल हिन्दी भावार्थ सहित]" - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " **********************************************

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