
Rama Devi Sahu
6 hours ago
राजा दशरथ की पुत्री शांता और शृंगी ऋषि के विवाह का दिव्य रहस्य “जिस पुत्री को राजा दशरथ ने स्वयं अपनी गोद से दूर कर दिया था, वही शांता आगे चलकर उस यज्ञ की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बनी, जिसके फलस्वरूप स्वयं भगवान श्रीराम ने अयोध्या में जन्म लिया… आखिर शांता का विवाह शृंगी ऋषि से क्यों हुआ?” अयोध्या के महाराज दशरथ के जीवन में एक ऐसा अध्याय भी था, जिसके बारे में रामकथा सुनने वाले बहुत कम लोग जानते हैं। हम सभी जानते हैं कि राजा दशरथ के चार पुत्र थे—राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि महाराज दशरथ की एक पुत्री भी थीं—राजकुमारी शांता। शांता केवल अयोध्या की राजकुमारी नहीं थीं। उनके जीवन में ऐसी घटनाएं जुड़ी थीं, जिनका संबंध आगे चलकर श्रीराम के अवतरण से भी जोड़ा जाता है। शांता कौन थीं? परंपरागत रामकथा के कुछ उत्तरवर्ती आख्यानों में शांता को राजा दशरथ और कौशल्या की पुत्री बताया गया है। कहा जाता है कि शांता अत्यंत बुद्धिमती, संस्कारी और तेजस्विनी थीं। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें अंगदेश के राजा रोमपाद को दत्तक पुत्री के रूप में सौंप दिया गया। कथा के अनुसार, राजा रोमपाद और दशरथ के बीच गहरा स्नेह था। शांता का पालन-पोषण अंगदेश में हुआ और वह वहां की राजकुमारी बनकर बड़ी हुईं। समय बीतता गया। फिर अंगदेश में एक भयंकर संकट आया। जब अंगदेश पर पड़ा अकाल कहा जाता है कि एक समय अंगदेश में वर्षा नहीं हुई। धरती सूखने लगी। नदियां सिकुड़ने लगीं। खेतों में अन्न उगना बंद हो गया। प्रजा व्याकुल होकर राजा रोमपाद की ओर देखने लगी। राजा ने अनेक उपाय किए, लेकिन वर्षा नहीं हुई। तब ऋषियों ने बताया कि एक ऐसे महान तपस्वी हैं, जिनकी उपस्थिति से देवताओं की कृपा प्राप्त हो सकती है। वह थे—महातपस्वी शृंगी ऋषि। शृंगी ऋषि महान ऋषि विभाण्डक के पुत्र थे। उनका तप, ब्रह्मचर्य और आध्यात्मिक तेज अद्भुत माना जाता था। राजा रोमपाद ने उन्हें अंगदेश बुलाया। कथा के अनुसार, जैसे ही शृंगी ऋषि का आगमन हुआ, प्रकृति पर जैसे कृपा बरस पड़ी और वर्षा होने लगी। अंगदेश की धरती फिर हरी हो गई। प्रजा के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। राजा रोमपाद समझ गए कि यह ऋषि साधारण नहीं हैं। फिर शांता का विवाह शृंगी ऋषि से क्यों हुआ? यहीं से कथा का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय प्रारंभ होता है। राजा रोमपाद ने अपनी पुत्री शांता का विवाह शृंगी ऋषि से करने का निर्णय लिया। लेकिन यह केवल एक राजसी विवाह नहीं था। इसके पीछे धर्म, तप, राजधर्म और भविष्य की एक बड़ी भूमिका जुड़ी हुई मानी जाती है। शांता स्वयं भी अत्यंत विदुषी और संस्कारी थीं। उन्होंने राजमहल के सुखों की अपेक्षा ऋषि-पत्नी का जीवन स्वीकार किया। वह शृंगी ऋषि के आश्रम में रहने लगीं और तप, सेवा तथा धर्म के मार्ग पर चलने लगीं। लेकिन इस विवाह की सबसे अद्भुत कड़ी अभी बाकी थी। जब राजा दशरथ को याद आई अपनी पुत्री समय बीता। अयोध्या के महाराज दशरथ वृद्ध हो रहे थे, लेकिन उनके कोई पुत्र नहीं था। राजवंश के भविष्य को लेकर दशरथ चिंतित थे। उन्होंने अनेक धार्मिक अनुष्ठान किए, लेकिन उनकी पुत्र-प्राप्ति की इच्छा पूरी नहीं हुई। तभी उन्हें शृंगी ऋषि की याद आई। कथा के अनुसार, शृंगी ऋषि को अयोध्या बुलाया गया और उन्होंने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। यज्ञ की अग्नि से दिव्य पुरुष प्रकट हुए और उन्होंने राजा दशरथ को दिव्य पायस प्रदान किया। यही पायस आगे चलकर कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को दिया गया। और फिर… अयोध्या में जन्म हुआ— मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का। साथ ही भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। इसलिए शांता और शृंगी ऋषि की कथा को श्रीराम के अवतरण की घटनाओं से जोड़कर देखा जाता है। क्या शांता का विवाह केवल राम के जन्म के लिए हुआ था? यहां एक गहरी बात समझनी आवश्यक है। शांता के विवाह को केवल “राम के जन्म का साधन” मानना उनके चरित्र को बहुत छोटा कर देना होगा। शांता स्वयं एक महत्वपूर्ण पात्र हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि ईश्वर की बड़ी योजना में हर व्यक्ति की भूमिका अलग होती है। किसी का जीवन राजमहल में रहकर सार्थक होता है, तो किसी का तप और त्याग के माध्यम से। शांता ने राजकुमारी होकर भी ऋषि-पत्नी का जीवन स्वीकार किया। उन्होंने सुख-सुविधाओं से अधिक धर्म और कर्तव्य को महत्व दिया। और यही उनके चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता

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