🌸आज के मंगला आरती दर्शन श्री हनुमान जी महाराज श्री हनुमान गढ़ी अयोध्या धाम से🌸

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Rani Sep 21, 2021
jai shree ram ji🚩🙏 jai shree hanuman ji🙏🌹suprbhat vandan bhai ji🙏🌿🌺 shree bajrangbli hanuman ji ki kripa sadaiv aap ke sampurn pariwar pr bni rhe aap ka har pal subh magalmay ho aap hmesha kush rhe swasth rhe 🌿🙏🌺

k.n.pandey Sep 21, 2021
🍁🙏Jai shree Seeta Ram Jai shree Hanuman ji mahraj 🙏🍁🙏🌺🙏🌷

शिव आंजना Sep 21, 2021
जय श्री राम जय जय राम जय हनुमान जी महाराज

Anju Mishra Oct 26, 2021

🙏राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की🙏 🙏🌹जय श्री राम 🌹🙏 प्रभु भोग का फल हैं। 👉एक सेठजी बड़े कंजूस थे। एक दिन दुकान पर बेटे को बैठा दिया और बोले कि बिना पैसा लिए किसी को कुछ मत देना, मैं अभी आया। अकस्मात एक संत आये जो अलग-अलग जगह से एक समय की भोजन सामग्री लेते थे। लड़के से कहा: बेटा जरा नमक दे दो। लड़के ने सन्त को डिब्बा खोल कर एक चम्मच नमक दिया। सेठजी आये तो देखा कि एक डिब्बा खुला पड़ा था। सेठजी ने कहा: क्या बेचा बेटा? बेटा बोला: एक सन्त, जो तालाब के किनारे रहते हैं, उनको एक चम्मच नमक दिया था। सेठ का माथा ठनका और बोला: अरे मूर्ख! इसमें तो जहरीला पदार्थ है। अब सेठजी भाग कर संतजी के पास गए, सन्तजी भगवान् के भोग लगाकर थाली लिए भोजन करने बैठे ही थे कि.. सेठजी दूर से ही बोले: महाराज जी रुकिए, आप जो नमक लाये थे, वो जहरीला पदार्थ था, आप भोजन नहीं करें। संतजी बोले: भाई हम तो प्रसाद लेंगे ही, क्योंकि भोग लगा दिया है और भोग लगा भोजन छोड़ नहीं सकते। हाँ, अगर भोग नहीं लगता तो भोजन नही करते और कहते-कहते भोजन शुरू कर दिया। सेठजी के होश उड़ गए, वो तो बैठ गए वहीं पर। रात हो गई, सेठजी वहीं सो गए कि कहीं संतजी की तबियत बिगड़ गई तो कम से कम बैद्यजी को दिखा देंगे तो बदनामी से बचेंगे। सोचते सोचते उन्हें नींद आ गई। सुबह जल्दी ही सन्त उठ गए और नदी में स्नान करके स्वस्थ दशा में आ रहे हैं। सेठजी ने कहा: महाराज तबियत तो ठीक है। सन्त बोले: भगवान की कृपा है! इतना कह कर मन्दिर खोला तो देखते हैं कि भगवान् के श्री विग्रह के दो भाग हो गए हैं और शरीर काला पड़ गया है। अब तो सेठजी सारा मामला समझ गए कि अटल विश्वास से भगवान ने भोजन का ज़हर भोग के रूप में स्वयं ने ग्रहण कर लिया और भक्त को प्रसाद का ग्रहण कराया। सेठजी ने घर आकर बेटे को घर दुकान सम्भला दी और स्वयं भक्ति करने सन्त शरण में चले गए! इसलिए रोज ही भगवान् को निवेदन करके भोजन का भोग लगा करके ही भोजन करें, भोजन अमृत बन जाता है। अत: आज से ही यह नियम लें कि भोजन बिना भोग लगाएं नहीं करेंगे।

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (दोसौ तीसवाँ दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय अपाक दान के प्रसंग में राजा हव्यवाहन की कथा...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ महाराज युधिष्ठिर ने पूछा- भगवन्! कृपाकर आप ऐसा कोई दान बतायें, जिससे मनुष्य धन, पुत्र और सौभाग्य से सम्पन्न हो सके। भगवान् श्रीकृष्ण बोले – महाराज! मैं इस - सम्बन्ध में एक इतिहास कह रहा हूँ, आप श्रद्धापूर्वक सुनिये। किसी समय चन्द्रवंश में हव्यवाहन नामक एक राजा हुआ था। उसके राज्य में न कोई उपद्रव होता था और न कोई उसका शत्रु ही था। सभी नीरोग रहते थे। वह बड़ा प्रतापी, बली और शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाला था। परंतु पूर्वजन्म के अशुभ कर्म के प्रभाव से उसके पास कोई ऐसा मन्त्री नहीं था जो राज्य को सुचारुरूप से चला सके तथा उसे कोई पुत्र, मित्र या सहायक बन्धु-बान्धव भी न था। उसे कभी समय से भोजन आदि भी नहीं मिल पाता था। इस कारण वह राजा सदा चिन्तित रहता था । एक बार उसके यहाँ पिप्पलादमुनि पधारे। राजा की पटरानी शुभावती ने मुनि की श्रद्धापूर्वक पाद्य, अर्घ्य आदि से पूजा की और आसन पर उन्हें बैठाकर निवेदन किया- 'मुनीश्वर! यह निष्कण्टक राज्य तो हमें मिला है, परंतु मन्त्री, मित्र, पुत्र आदि हमें क्यों नहीं प्राप्त हुए। इसका कारण बताने की कृपा करें।' रानी का वचन सुनकर पिप्पलाद मुनि ने कहा – 'देवि! पूर्वजन्म में किये गये कर्मों के फल ही अगले जन्म में प्राप्त होते हैं, यह कर्मभूमि है, अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जिस पदार्थ का पूर्वजन्म में मनुष्य ने सम्पादन नहीं किया है, उसे शत्रु, मित्र, बान्धव, राजा आदि कोई भी नहीं दे सकते। पूर्वजन्म में तुमने राज्य का दान किया था, वह तुम्हें प्राप्त हो गया, परंतु तुमलोगों ने मित्र, भृत्य आदि से कोई सम्बन्ध नहीं रखा, अतः इस जन्म में ये सब कैसे प्राप्त होंगे ?' इसपर रानी शुभावती बोली – महाराज! पूर्वजन्म में जो हुआ वह तो बीत गया, अब इस समय आप ऐसा कोई व्रत, दान, उपवास, मन्त्र अथवा सिद्धयोग बताने की कृपा करें, जिससे मुझे पुत्र, धन, मित्र, भृत्य इत्यादि प्राप्त हो सकें। रानी का वचन सुनकर पिप्पलादमुनि बोले-'भद्रे! एक आपाक नाम का महादान है, जो सभी सम्पत्तियों का प्रदायक है। श्रद्धापूर्वक कोई भी आपाक का दान करता है तो उसे महान् लाभ होता है। इसलिये तुम श्रद्धा से आपाकदान करो।' मुनि के कथनानुसार रानी शुभावती ने आपाकदान किया। फलतः उसे पुत्र, मित्र, धन और भृत्य प्राप्त हो गये। भगवान् श्रीकृष्ण ने पुनः कहा – महाराज ! अब मैं उस आपाकदान की विधि बता रहा हूँ, आप श्रद्धापूर्वक सुनें। बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि ग्रह और ताराबल का विचार कर शुभ मुहूर्त में अगर, चन्दन, धूप, पुष्प, वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्य आदि से भार्गव (कुम्हार) का ऐसा सम्मान करे, जिससे वह संतुष्ट हो और उससे निवेदन करे कि महाभाग ! आप विश्वकर्मास्वरूप हैं। आप मेरे लिये सुन्दर छोटे-बड़े मिट्टी के घड़े, स्थाली, कसोरे, कलश आदि पात्रों का निर्माण करें। भार्गव भी उन पात्रों को बनाये। तदनन्तर विधिपूर्वक एक आँवाँ-भट्ठी लगाये। अनन्तर उन एक हजार मिट्टी के पात्रों को आँवें में स्थापित कर सायंकाल के समय उसमें अग्नि प्रज्वलित करेऔर रात्रि को जागरणकर वाद्य, गीत, नृत्य आदि की व्यवस्था कर उत्सव मनाये। सुप्रभात होते ही यजमान आँवें की अग्नि को शान्तकर पात्रों को बाहर निकाल ले। अनन्तर स्नानकर श्वेत वस्त्र पहनकर उनमें से सोलह पात्रों को सामने स्थापित करे। रक्त वस्त्र से उन्हें आच्छादितकर पुष्पमालाओं से उनका अर्चन करे और ब्राह्मणों द्वारा स्वस्तिवाचन आदि कराकर भार्गव का भी पूजन करे। ये पात्र माणिक्य, सोने, चाँदी अथवा मिट्टीतक के हो सकते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियों की पूजा कर भाण्डों की प्रदक्षिणा करनी चाहिये और इन मन्त्रों को पढ़ते हुए उन पात्रों का दान करना चाहिये आपाक ब्रह्मरूपोऽसि भाण्डानीमानि जन्तवः । प्रदानात् ते प्रजापुष्टिः स्वर्गश्चास्तु ममाक्षयः ॥ भाण्डरूपाणि यान्यत्र कल्पितानि मया किल। भूत्वा सत्पात्ररूपाणि उपतिष्ठन्तु तानि मे ॥ (उत्तरपर्व १६७।३२-३३) 'आपाक (आँवाँ) ! आप ब्रह्मरूप हैं और ये सभी भाण्ड प्राणीरूप हैं। आपके दान करने से मुझे प्रजाओं से पुष्टि प्राप्त हो, अक्षय स्वर्ग प्राप्त हो। मैंने जितने पात्र निर्माण कराये हैं, ये सभी सत्पात्र के रूप में मेरे समक्ष प्रस्तुत रहें।' जिसकी इच्छा जिस पात्र को लेने की हो उसे वह स्वयं ही ले ले, रोके नहीं। इस विधि से जो पुरुष अथवा स्त्री इस आपाकदान को करते हैं, उससे तीन जन्मतक विश्वकर्मा संतुष्ट रहते हैं और पुत्र, मित्र, भृत्य, घर आदि सभी पदार्थ मिल जाते हैं। जो स्त्री इस दान को भक्तिपूर्वक करती है, वह सौभाग्यशाली पति के साथ पुत्र-पौत्रादि सभी पदार्थों को प्राप्त कर लेती है और अन्त में अपने पतिसहित स्वर्ग को जाती है। नरेश्वर ! यह आपाकदान भूमिदान के समान ही है। जय श्रीराम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्री हनुमान जी और बाली युद्ध की कथा 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ कथा का आरंभ तब का है ,, जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा। सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस (वरदान द्वारा प्राप्त) पुत्र हैं। और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है। बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी, रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा। अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई, अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था। हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे। इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे। बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर, हे ब्रम्ह अंश, हे राजकुमार बाली, (तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो, हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो, फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो, अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो, इससे तुम्हे क्या मिलेगा, तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी। इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर और राम नाम का जाप कर इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे। इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम की और जिस राम की तू बात कर रहा है वो है कौन और केवल तू ही जानता है राम के बारे में मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है। हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है उनकी महिमा अपरंपार है, ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए। बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे। हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा। बाली- तब ठीक है कल के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा। हनुमान जी ने बाली की बात मान ली बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा। अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए। हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा। ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो और युद्ध के लिए न जाओ। हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा अन्यथा सारे विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है। तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें। हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था। हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,, बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा। ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा। उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे, उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लग उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा बाली को कुछ समझ नही आ रहा था। तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ, बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया। सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ मुझे कुछ समझ नही आया। ब्रम्हा जी बोले- पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तुममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा। बाली- मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है। ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता। पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा। ब्रम्हा जो बोले- हे बाली मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,, पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके। सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती। ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था मुझे क्षमा करें। और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और आगे चलकर अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया। आध्यात्म रामायण के प्रसंग से टीका.. 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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