sachin jain
sachin jain Nov 25, 2021

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हीरा Jan 23, 2022

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सुपरहीरो 〰️🌸〰️ "सर कुछ काम नहीं है तो आज मैं थोड़ा जल्दी निकल जाऊं ।" एक घंटे से कुर्सी पर बैठे घड़ी की सुइयां देख रहे रघु ने प्रकाश के कैबिन में घुसते हुए कहा । "यार रघु, बस ये फाइल गुप्ता जी के ऑफिस में दे देना फिर तुम उधर से ही निकल जाना ।" प्रकाश ने भी एक नज़र घड़ी पर मारी और जवाब दिया । "ठीक है सर ।" "और सुनो, जाने से पहले एक कप चाय पिला दो यार, सिर फटा जा रहा है ।" रघु निकल ही रहा था कि प्रकाश ने एक और काम बता दिया उसे । "ठीक सर, अभी लाया ।" थोड़ी देर में रघु चाय बना कर ले आया । उसने चाय प्रकाश को दी और फाइल लेकर निकल पड़ा । हालांकि फाइल गुप्ता जी के ऑफिस तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं था । रघु को वहां जाने में आधा घंटा लगता और फिर वापस आ कर घर जाने में आधा घंटा और । वो लगातार अपनी घड़ी देखे जा रहा था । जैसे तैसे वो अपनी साइकिल खींचता हुआ गुप्ता जी के ऑफिस पहुंचा, फाइल रखी और वहां से चलने लगा । "अरे रघु, यार रहीम आज छुट्टी पर है और कुछ क्लाइंट्स आने वाले हैं । ज़रा यार ये समान ला दो मार्किट से ।" गुप्ता जी ने एक और काम फ़र्मा दिया था रघु को । उसने घड़ी की तरफ देखा 5.45 हो चुके थे । देर हो रही थी मगर वो गुप्ता जी को ना भी नहीं कह सकता था । मजबूरी में उसे जाना पड़ा । आधा घंटा लग गया उसे समान लेकर लौटने में । उसने जल्दी से समान रखा और वहां से निकलने लगा तभी गुप्ता जी बोले "रघु यार थोड़ी देर रुक जाओ । क्लाइंट्स के रहते कुछ ज़रूरत पड़ सकती है । यकीन रखो तुम्हें निराशा नहीं होगी दोस्त ।" रघु ने एक बार फिर से घड़ी की तरफ देखा । हालांकि वो जानता था गुप्ता जी दिलेर आदमी हैं । काम के बदले में वो कुछ ना कुछ तो ज़रूर देंगे । लेकिन अभी उसके लिए पैसे से भी ज़रूरी कुछ था । "वो बात नहीं है सर । आज ज़रा जल्दी घर जाना था ।" "समझ सकता हूं भाई लेकिन अभी मैं किसी और को बुला भी नहीं सकता और ये क्लाइंट बहुत ज़रूरी हैं । इनके स्वागत में कमी नहीं करना चाहता मैं । देख लो अगर रुक सको तो अहसान होगा तुम्हारा । मैं सच में निराश नहीं करूंगा तुम्हें ।" गुप्ता जी को काम करवाना अच्छे से आता है और रघु तो वैसे भी दो मीठे शब्दों का भूखा रहा है हमेशा से । उसने कुछ सोचा और फिर उसे बात माननी ही पड़ी गुप्ता जी की । कुछ ही देर में उनके क्लाइंट्स आ गये और उनकी पार्टी शुरू हो गई । देखते देखते 2 घंटे बीत गए । इस बीच रघु को कई बार बाज़ार दौड़ना पड़ा था । 8.30 हो चुके थे । गुप्ता जी ने रघु की तरफ देखा और फिर उसे बाहर ले गए । "मुझे लगता है अब कुछ चाहिए नहीं होगा । तो तुम जा सकते हो । वैसे भी बहुत समय ले लिया तुम्हारा यार । शुक्रिया तुम्हारा ।" इतना कहते हुए गुप्ता जी ने रघु के हाथ में 500 का नोट थमा दिया । रघु ने मुस्कुराते हुए उनका धन्यवाद किया और एक बार घड़ी की तरफ फिर से देखते हुए वहां निकल गया । वो मार्किट में कुछ देर रुका और फिर 10 बजे तक घर पहुंचा । दरवाजा खटखटाया तो रोशनी ने दरवाजा खोला । उसके चेहरे पर नाराजगी झलक रही थी । "अरे ऐसे मत देखो, बुरा फंस गया था । गुप्ता जी के यहां रुकना पड़ गया ।" रघु ने घर में घुसते हुए हाथ में पकड़े लिफाफे एक तरफ रखे और जूते उतारते हुए अपनी सफाई देने लगा । "जल्दी आ जाते तो सब साथ में खाना खा लेते ?" "क्या हुआ ? सो गया क्या ?" "हां काफ़ी देर पूछता रहा पापा कब आएंगे, फिर टीवी देखते देखते सो गया । ये सब क्या है ?" रोशनी ने लिफाफों को देखते हुए पूछा । "सब तुम्हें ही बता दें ?" रोशनी ने तब तक लिफाफे में देख लिया था । "अरे वाह, मगर आप तो कह रहे थे फिज़ूलखर्ची है ?" "है तो लेकिन अब साल में उसकी एक मांग भी पूरी ना कर सकें तो कमाने पर लानत है ।" "अच्छा अब डयलॉग ना मारिए । चल के उसे उठाने की कोशिश करते हैं । वैसे उम्मीद कम ही है क्योंकि वो ढीठ है आपकी तरह ही । एक बार सो गया तो फिर उठता नहीं ।" "चलो तो देखते हैं ज़्यादा ढीठ कौन है उसे जगाने वाला बाप या वो खुद ।" दोनों मुस्कुराए और कमरे की तरफ बढ़ गए । "सोमू, ए सोमू । उठ तो, पापा आ गए ।" "मां, सोने दो ना ।" "ए बेटा देख तो सही पापा क्या लाए हैं ।" "नहीं देखना ना अभी । सुबह देख लूंगा ।" "ठीक है तो मत देख । जा रहा हूं मैं ये लेकर ।" रघु कमरे से जाने लगा । "क्या है पापा ?" रघु के जाने ए पहले सोमू आंख मलता हुआ उठकर बैठ गया था । रघु ने एक बड़ा सा लिफ़ाफ़ा खोला और उसमें से एक केक निकालते हुए बोला "हैप्पी बड्डे बेटा ।" इसके बाद रोशनी और रघु दोनों उसे बड्डे विश करने लगे । सोमू केक देख कर ऐसे खुश हुआ कि ना जाने क्या मिल गया हो उसे । काफ़ी महीने पहले से ही वो अपनी क्लास के दोस्तों के किस्से सुनाता रहता था कि किसने अपने जन्म दिन पर कैसे केक काटा । रोशनी भी महीने भर पहले से रघु को कह रही थी कि इस बार सोमू के जन्मदिन पर केक काटेंगे लेकिन रघु ये कह कर मना कर देता कि 300-400 का केक आता है, बेकार में इतने पैसे क्यों बर्बाद करने । वो भले ही ऐसा कहता था लेकिन उसने मन ही मन सोच लिया था कि इस बार वो बेटे की ये इच्छा ज़रूर पूरी करेगा । हालांकि बेटे को हैसीयत से ज़्यादा महंगे स्कूल में पढ़ाने और घर का खर्च निकालने के बाद उसके हाथ में कुछ बचता नहीं था लेकिन इस बार उसने इतने पैसे अलग से निकाल लिए थे । इसके बाद आज गुप्ता जी के दिए पैसों से और आसानी हो गई थी । रघु ने दूसरे लिफाफे भी खोले । उनमें खाने पीने का सामान और एक सोमू के पसंद की ड्रेस थी । सोमू की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं था । वो बार बार अपने पिता को गौर से देख रहा था । ज़माने के लिए एक नौकर जो दूसरों का आदेश मानता है, चाय बनाता है जूठे बर्तन धोता है वो रघु अपने बेटे की नज़रों में हीरो है । शायद यही हीरो बनने के लिए वो ये काम करता है । बच्चे सुपरहीरोज़ के बारे में बाद में जानते हैं लेकिन उनका पहला हीरो उनके पिता ही होते हैं फिर भले वे किसी दफ्तर के चपरासी हों या फिर अधिकारी । और इधर एक पिता की ज़िंदगी खुद को अपने बच्चों की नज़र में हीरो बनाए रखने में ही निकल जाती है । 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Anju Mishra Jan 24, 2022

🙏🌹हर हर महादेव 🙏🌹 स्वयं को पहचानें - 👉 एक बार अकबर एक ब्राह्मण को दयनीय हालत में जब भिक्षाटन करते देखा तो बीरबल की ओर व्यंग्य कसकर बोला - 'बीरबल! ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण! जिन्हें ब्रह्म देवता के रुप में जाना जाता है। ये तो भिखारी है'। बीरबल ने उस समय तो कुछ नहीं कहा। लेकिन जब अकबर महल में चला गया तो बीरबल वापिस आये और ब्राह्मण से पूछा कि वह भिक्षाटन क्यों करता है' ? ब्राह्मण ने कहा - 'मेरे पास धन, आभूषण, भूमि कुछ नहीं है और मैं ज्यादा शिक्षित भी नहीं हूँ। इसलिए परिवार के पोषण हेतू भिक्षाटन मेरी मजबूरी है'। बीरबल ने पूछा - 'भिक्षाटन से दिन में कितना प्राप्त हो जाता है'? ब्राह्मण ने जवाब दिया - 'छह से आठ अशर्फियाँ।' बीरबल ने कहा - 'आपको यदि कुछ काम मिले तो क्या आप भिक्षा मांगना छोड़ देंगे ?' ब्राह्मण ने पूछा - 'मुझे क्या करना होगा ?' बीरबल ने कहा - 'आपको ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके प्रतिदिन 101 माला गायत्री मन्त्र का जाप करना होगा और इसके लिए आपको प्रतिदिन भेंटस्वरुप 10 अशर्फियाँ प्राप्त होंगी।' बीरबल का प्रस्ताव ब्राह्मण ने स्वीकार कर लिया। अगले दिन से ब्राह्मण ने भिक्षाटन करना बन्द कर दिया और बड़ी श्रद्धा भाव से गायत्री मन्त्र जाप करना प्रारम्भ कर दिया और शाम को 10 अशर्फियाँ भेंटस्वरुप लेकर अपने घर लौट आता। ब्राह्मण की सच्ची श्रद्धा व लग्न देखकर कुछ दिनों बाद बीरबल ने गायत्री मन्त्र जाप की संख्या और अशर्फियों की संख्या दोनों ही बढ़ा दी। गायत्री मन्त्र की शक्ति के प्रभाव से ब्राह्मण को भूख, प्यास व शारीरिक व्याधि की तनिक भी चिन्ता नहीं रही। गायत्री मन्त्र जाप के कारण उसके चेहरे पर तेज झलकने लगा। लोगों का ध्यान ब्राह्मण की ओर आकर्षित होने लगा। दर्शनाभिलाषी उनके दर्शन कर मिठाई, फल, पैसे, कपड़े चढाने लगे। अब उसे बीरबल से प्राप्त होने वाली अशर्फियों की भी आवश्यकता नहीं रही। यहाँ तक कि अब तो ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक चढ़ाई गई वस्तुओं का भी कोई आकर्षण नहीं रहा। बस वह सदैव मन से गायत्री जाप में लीन रहने लगा। ब्राह्मण सन्त के नित्य गायत्री जप की खबर चारों ओर फैलने लगी। दूरदराज से श्रद्धालु दर्शन करने आने लगे। भक्तों ने ब्राह्मण की तपस्थली में मन्दिर व आश्रम का निर्माण करा दिया। ब्राह्मण के तप की प्रसिद्धि की खबर अकबर को भी मिली। बादशाह ने भी दर्शन हेतू जाने का फैंसला लिया और वह शाही तोहफे लेकर राजसी ठाठबाट में बीरबल के साथ सन्त से मिलने चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर शाही भेंटे अर्पण कर ब्राह्मण को प्रणाम किया। ऐसे तेजोमय सन्त के दर्शनों से हर्षित हृदय सहित बादशाह बीरबल के साथ बाहर आ गए। तब बीरबल ने पूछा - 'क्या आप इस सन्त को जानतें हैं ?' अकबर ने कहा - 'नहीं, बीरबल मैं तो इससे आज पहली बार मिला हूँ।' फिर बीरबल ने कहा - 'महाराज ! आप इसे अच्छी तरह से जानते हो। यह वही भिखारी ब्राह्मण है,जिस पर आपने व्यंग्य कसकर एक दिन कहा था - 'ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण ! जिन्हें ब्रह्म देवता कहा जाता है ?' आज आप स्वयं उसी ब्राह्मण के पैरों में शीश नवा कर आए हैं। अकबर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। बीरबल से पूछा - 'लेकिन यह इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ ?' बीरबल ने कहा - 'महाराज ! वह मूल रुप में ब्राह्मण ही है। परिस्थितिवश वह अपने धर्म की सच्चाई व शक्तियों से दूर था। धर्म के एक गायत्री मन्त्र ने ब्राह्मण को साक्षात् 'ब्रह्म' बना दिया और वह कैसे बादशाह को चरणों में गिरने के लिए विवश कर दिया। यही ब्राह्मण आधीन मन्त्रों का प्रभाव है। यह नियम सभी ब्राह्मणों पर सामान रुप से लागू होता है।

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श्रीमद्देवीभागवत (छठा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 30 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ भगवान् विष्णु के द्वारा महामाया का महत्त्व वर्णन, व्यासजी के द्वारा जनमेजय के प्रति भगवती की महिमा का कथन... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ नारदजी कहते हैं-मुझ ब्राह्मण नारद को देखकर राजा तालध्वज अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गये। सोचा, मेरी पत्नी कहाँ चली गयी और वे मुनिवर नारद कहाँ से आ गये। उन्होंने बारम्बार विलाप करना आरम्भ किया। कहा 'हा प्रिये! मैं तेरे वियोग में पड़कर विलाप कर रहा हूँ। मुझे छोड़कर तू कहाँ चली गयी। शुचिस्मिते! तेरे नेत्र कमलपत्र के समान विशाल हैं। विपुलश्रोणी! मैं अब क्या करूँ तेरे बिना मेरा जीवन, गृह और राज्य-सब-के-सब व्यर्थ हैं। तेरे विरह से अब मेरे प्राण क्यों नहीं निकल रहे हैं? तू न रही तो जीवन-धारण करने से भी मुझे कोई प्रयोजन नहीं रहा। विशालाक्षी! मैं रो रहा हूँ। तू प्रिय उत्तर देने की कृपा कर तूने प्रथम मिलन में मेरे प्रति जो प्रेम दिखलाया था, वह अब कहाँ चला गया ? सुभु! क्या तू जल में डूब गयी अथवा तुझे मछली एवं कछुए खा गये? या मेरे दुर्भाग्यवश तू वरुण के हाथ लग गयी। अमृत के समान मधुर भाषण करने वाली प्रिये! तेरे सभी अंग बड़े मनोहर थे। तुझे धन्यवाद है, जो पुत्रों के प्रति तूने सच्चा प्रेम दिखलाया। मैं तेरा पति होकर दीनभाव से विलाप कर रहा हूँ। पुत्रस्नेह के पाश से तू बँधी भी है। ऐसी स्थिति में मुझे छोड़कर तेरा स्वर्ग सिधारना शोभा नहीं देता। कान्ते! मेरे दोनों ही सर्वस्व छिन गये। पुत्र मर ही चुके थे और तू प्राणप्यारी भी मेरे साथ न रह सकी। प्रिये! मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। फिर भी मेरे प्राण शरीर से अलग नहीं हो रहे हैं। मैं क्या करूँ और कहाँ जाऊँ ? जगत् में प्रतिकूल घटना उपस्थित करने वाले ब्रह्मा अवश्य ही बड़े निष्ठुर हैं, जो समान चित्तवाले स्त्री-पुरुष का मरण सर्वथा विभिन्न समय में क्यों किया करते हैं। मुनियों ने स्त्रियों के लिये अवश्य ही बड़ा उपकार किया है कि जो उन्होंने स्पष्ट कह दिया है, 'पति के मर जाने पर स्त्री उसके साथ चिता में जल जाय।' इस प्रकार राजा तालध्वज विलाप कर रहे थे। तब भगवान् श्रीहरि ने अनेक प्रकार के युक्तिपूर्ण वचन कहकर उन्हें चुप कराया। जय माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ अष्टमः स्कन्धः, अथ सप्तमोऽध्यायः समुद्रमन्थन का आरम्भ और भगवान् शङ्कर का विषपान...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ तदुग्र्वेगं दिशि दिश्युपर्यधो विसर्पदुत्सर्पदसह्यमप्रति भीताः प्रजा दुद्रुवुरङ्ग सेश्वरा अरक्ष्यमाणाः शरणं सदाशिवम् ॥ १९ विलोक्य तं देववरं त्रिलोक्या भवाय देव्याभिमतं मुनीनाम् । आसीनमद्रावपवर्गहेतो स्तपो जुषाणं स्तुतिभिः प्रणेमुः ॥ २० प्रजापतय ऊचुः देवदेव महादेव भूतात्मन् भूतभावन । त्राहि नः शरणापन्नांस्त्रैलोक्यदहनाद् विषात् ॥ २१ त्वमेकः सर्वजगत ईश्वरो बन्धमोक्षयोः । तं त्वामर्चन्ति कुशलाः प्रपन्नार्तिहरं गुरुम् ॥ २२ गुणमय्या स्वशक्त्यास्य सर्गस्थित्यप्ययान्विभो । धत्से यदा स्वदृग् भूमन्ब्रह्मविष्णुशिवाभिधाम् ॥ २३ त्वं ब्रह्म परमं गुह्यं सदसद्भावभावनः । नानाशक्तिभिराभातस्त्वमात्मा' जगदीश्वरः ॥ २४ त्वं शब्दयोनिर्जगदादिरात्मा प्राणेन्द्रियद्रव्यगुणस्वभावः कालः क्रतुः सत्यमृतं च धर्म स्त्वय्यक्षरं यत् त्रिवृदामनन्ति ।। २५ अग्निर्मुखं तेऽखिलदेवतात्मा क्षितिं विदुर्लोकभवाङ्घ्रिपङ्कजम् । कालं गतिं तेऽखिलदेवतात्मनो दिशश्च कर्णो रसनं जलेशम् ॥ २६ नाभिर्नभस्ते श्वसनं नभस्वान् सूर्यश्च चक्षूंषि जलं स्म रेतः । परावरात्माश्रयणं तवात्मा सोमो मनो द्यौर्भगवञ्छिरस्ते ॥ २७ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ वह अत्यन्त उग्र विष दिशा-विदिशा में, ऊपर-नीचे सर्वत्र उड़ने और फैलने लगा। इस असह्य विष से बचने का कोई उपाय भी तो न था। भयभीत होकर सम्पूर्ण प्रजा और प्रजापति किसी के द्वारा त्राण न मिलने पर भगवान् सदाशिव की शरण में गये ॥ १९ ॥ भगवान् शङ्कर सतीजी के साथ कैलास पर्वत पर विराजमान थे। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि उनकी सेवा कर रहे थे। वे वहाँ तीनों लोकों के अभ्युदय और मोक्ष के लिये तपस्या कर रहे थे। प्रजापतियों ने उनका दर्शन करके उनकी स्तुति करते हुए उन्हें प्रणाम किया ॥ २० ॥ प्रजापतियों ने भगवान् शङ्कर की स्तुति की देवताओं के आराध्यदेव महादेव ! आप समस्त प्राणियों के आत्मा और उनके जीवनदाता हैं। हमलोग आपकी शरण में आये हैं। त्रिलोकी को भस्म करने वाले इस उम्र विष से आप हमारी रक्षा कीजिये ॥ २१ ॥ सारे जगत्‌ को बाँधने और मुक्त करने में एकमात्र आप ही समर्थ हैं। इसलिये विवेकी पुरुष आपकी ही आराधना करते हैं। क्योंकि आप शरणागत की पीड़ा नष्ट करने वाले एवं जगद्गुरु हैं ॥ २२ ॥ प्रभो ! अपनी गुणमयी शक्ति से इस जगत्‌ की सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने के लिये आप अनन्त, एकरस होने पर भी ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि नाम धारण कर लेते हैं ॥ २३ ॥ आप स्वयंप्रकाश हैं। इसका कारण यह है कि आप परम रहस्यमय ब्रह्मतत्त्व हैं। जितने भी देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सत् अथवा असत् चराचर प्राणी हैं— उनको जीवनदान देनेवाले आप ही हैं। आपके अतिरिक्त सृष्टि भी और कुछ नहीं है। क्योंकि आप आत्मा हैं। अनेक शक्तियों के द्वारा आप ही जगत्रूप में भी प्रतीत हो रहे हैं। क्योंकि आप ईश्वर हैं, सर्वसमर्थ हैं ॥ २४ ॥ समस्त वेद आपसे ही प्रकट हुए हैं। इसलिये आप समस्त ज्ञानों के मूल स्रोत स्वतःसिद्ध ज्ञान हैं। आप ही जगत् के आदिकारण महत्तत्त्व और त्रिविध अहङ्कार हैं एवं आप ही प्राण, इन्द्रिय, पञ्चमहाभूत तथा शब्दादि विषयों के भिन्न-भिन्न स्वभाव और उनके मूल कारण हैं। आप स्वयं ही प्राणियों की वृद्धि और ह्रास करने वाले काल हैं, उनका कल्याण कर नेवाले यज्ञ हैं एवं सत्य और मधुर वाणी हैं। धर्म भी आपका ही स्वरूप है। आप ही 'अ, उ, म्' इन तीनों अक्षरों से युक्त प्रणव हैं अथवा त्रिगुणात्मिका प्रकृति हैं— ऐसा वेदवादी महात्मा कहते हैं ॥ २५ ॥ सर्वदेवस्वरूप अग्नि आपका मुख है। तीनों लोकों के अभ्युदय करने वाले शङ्कर! यह पृथ्वी आपका चरणकमल है। आप अखिल देवस्वरूप हैं। यह काल आपकी गति है, दिशाएँ कान हैं और वरुण रसनेन्द्रिय है ॥ २६ ॥ आकाश नाभि है, वायु श्वास है, सूर्य नेत्र हैं और जल वीर्य है। आपका अहङ्कार नीचे-ऊँचे सभी जीवों का आश्रय है। चन्द्रमा मन है और प्रभो ! स्वर्ग आपका सिर है ॥ २७ ॥ क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (दो सौ तेहत्तर वाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः श्रीवसिष्ठजी का विद्याधरी के साथ लोकालोक पर्वत पर पापाणशिला के पास पहुँचना, उस शिला में उन्हें विद्याधरी की बतायी हुई सृष्टि का दर्शन न होना, विद्याधरी का इसमें उनके अभ्यासाभाव को कारण बताकर अभ्यास की महिमा का वर्णन करना...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं—श्रीराम ! ब्रह्माण्ड के पूर्ववर्णित ऊर्ध्व आकाश में संकल्प द्वारा कल्पित आसन पर बैठे हुए मैंने, उसी आकाश में कल्पित आसन पर स्थित हुई वह नारी जब मेरे पूछने पर उपर्युक्त बातें कह चुकी, तब पुनः उससे प्रश्न किया— 'बाले ! शिला के पेट में तुम जैसे देहधारियों की स्थिति कैसे हो सकती है ? उसमें हिलना-डुलना कैसे होता होगा? तथा तुमने वहाँ किस ? लिये घर बनाया ?” विद्याधरी बोली मुने ! जैसे आप लोगों का यह संसार बहुत ही विस्तृत रूप से प्रकाशित हो रहा है, उसी प्रकार उस शिला के उदर में सृष्टि और संसार से युक्त हम लोगों का जगत् भी स्थित है। वहाँ भी यहाँ की भाँति ही देवता, असुर, गन्धर्व, पृथ्वी, पर्वत, पाताल, समुद्र, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य और चन्द्रमा आदि सब वस्तुएँ हैं। मुने ! यदि आप मेरी बात को असम्भव समझते हों तो आइये, उस सृष्टि को अच्छी तरह देख लीजिये, मेरे साथ चलने के लिये कृपा कीजिये; क्योंकि बड़े लोगों को आश्चर्ययुक्त वस्तुएँ देखने के लिये बड़ा कौतूहल होता है। रघुनन्दन ! तब मैंने 'बहुत अच्छा' कहकर उसकी बात मान ली और शून्य (आकाश )-रूप हो, शून्यरूपधारिणी उस नारी के साथ शून्य आकाश में उसी तरह उड़ना आरम्भ किया, जैसे आँधी या बवंडर के साथ फूलों की सुगन्ध उड़ती है। तदनन्तर दूर तक का रास्ता तै करने के बाद आकाश की शून्यता को लाँधकर मैं उस नारी के साथ आकाशवर्ती भूतसमुदाय के पास जा पहुँचा। चिरकाल के बाद आकाश में प्राणियों के संचारमार्ग को पारकर मैं लोका लोक पर्वत के शिखर के ऊपर आकाश भाग में पहुँच गया, उस शिखर के पूर्वोत्तर भाग में स्थित चन्द्रतुल्य उज्ज्वल बादल के पीठ भाग से नीचे उतरकर वह नारी मुझे उस ऊँची शिला के पास ले गयी, जो तपाये हुए सुवर्ण की बनी जान पड़ती थी। मैंने उस शुभ्र शिला को जब अच्छी तरह देखना आरम्भ किया, तब उसमें वह जगत् मुझे नहीं दिखायी दिया । केवल वह सुवर्गमयी शिला ही अग्निलोक ( सुमेरु ) के उच्चतम तट की भाँति दृष्टिगोचर हुई। तब मैंने उस कान्तिमती नारी से पूछा – 'तुम्हारी वह सृष्टिभूमि कहाँ है ? उस लोक के रुद्र, सूर्य, अग्नि और तारे आदि कहाँ हैं तथा भूर्भुव: आदि सातों भिन्न-भिन्न लोक कहाँ हैं ? समुद्र, आकाश और दिशाएँ कहाँ हैं ? प्राणियों के जन्म और नाश कहाँ हो रहे हैं? बड़े-बड़े मेघों की घटाएँ कहाँ घिरी हुई हैं ? ताराओं की तड़क-भड़क से युक्त आकाश यहाँ कहाँ दिखायी देता है ? कहाँ हैं शैलशिखरों की वे श्रेणियाँ ? कहाँ हैं महासागरों की पड्डियाँ कहाँ हैं मण्डलाकार सातों द्वीप और कहाँ हैं तपाये हुए सुवर्ण के सदृश वह भूमि ? कार्य और कारण की कल्पनाएँ कहाँ हैं : भूतों और उनके भवनों का भ्रम कहाँ हो रहा है ? कहाँ हैं विद्याधर और गन्धर्व ? कहाँ हैं मनुष्य, देवता और दानव तथा कहाँ हैं ऋषि, राजा और मुनि ! नीति-अनीति की रीतियाँ कहाँ चलती हैं ! हेमन्त ऋतु की पाँच पहर वाली रातें यहाँ कहाँ हो रही हैं ? स्वर्ग और नरक के भ्रम कहाँ हैं ? पुण्य और पाप की गणना कहाँ हो रही है ? कला और काल की क्रीडाएँ कहाँ होती हैं ? देवताओं और असुरों में कहाँ वैर देखे जाते हैं तथा द्वेष और स्नेह की रीतियाँ कहाँ उपलब्ध होती हैं ?? मेरे इस प्रकार पूछने पर निर्मल नेत्रवाली उस सुन्दरी ने आश्चर्यचकित दृष्टि से मेरी ओर देखकर इस प्रकार कहा । ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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माघमास महात्म्य सातवां अध्याय 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ चित्रगुप्त ने उन दोनों के कर्मों की आलोचना करके दूतों से कहा कि बड़े भाई कुंडल को घोर नरक में डालो और दूसरे भाई विकुंडल को स्वर्ग में ले जाओ जहां उत्तम भोग हैं तब एक दूत तो कुंडल को नरक में फेंकने के लिए ले गया और दूसरा दूत बड़ी नम्रता से कहने लगा कि हे विकुंडल! चलो तुम अच्छे कर्मों से स्वर्ग को प्राप्त होकर अनेक प्रकार के भोगों को भोगों तब विकुंडल बड़े विस्मय के साथ मन में संशय धारकर दूत से कहने लगा कि हे यमदूत! मेरे मन में बड़ी भारी शंका उत्पन्न हो गई है अतएव मैं तुमसे कुछ पूछता हूँ कृपा कर के मेरे प्रश्नों का उत्तर दो. हम दोनों भाई एक ही कुल में उत्पन्न हुए, एक जैसे ही कर्म करते रहे, दोनों भाइयों ने कभी कोई शुभ कार्य नहीं किया फिर एक को नरक क्यों और दूसरे को स्वर्ग किस कारण प्राप्त हुआ? मैं अपने स्वर्ग में आने का कोई कारण नहीं देखता तब यमदूत कहने लगा कि हे विकुंडल! माता-पिता, पुत्र, पत्नी, भाई, बहन से सब संबंध जन्म के कारण होते हैं और जन्म, कर्म को भोगने के लिए ही प्राप्त होता है. जिस प्रकार एक वृक्ष पर अनेक पक्षियों का आगमन होता है उसी तरह इस संसार में पुत्र, भाई, माता, पिता का भी संगम होता है. इनमें से जो जैसे-जैसे कर्म करता है वैसे ही फल भोगता है. तुम्हारा भाई अपने पाप कर्मों से नरक में गया तुम अपने पुण्य कर्म के कारण स्वर्ग में जा रहे हो तब विकुंडल ने आश्चर्य से पूछा कि मैंने तो आजन्म कोई धर्म का कार्य नहीं किया सदैव पापों में ही लगा रहा. मैं अपने पुण्य के कर्म को नहीं जानता, यदि तुम मेरे पुण्य के कर्म को जानते हो तो कृपा कर के बताइए तब देवदूत कहने लगा कि मैं सब प्राणियों को भली-भाँति जानता हूँ, तुम नहीं जानते. सुनो, हरिमित्र का पुत्र सुमित्र नाम का ब्राह्मण था जिसका आश्रम यमुना नदी के दक्षिणोत्तर दिशा में था. उसके साथ जंगल में ही तुम्हारी मित्रता हो गई और उसके साथ तुमने दो बार माघ मास में श्री यमुना जी में स्नान किया था. पहली बार स्नान करने से तुम्हारे सब पाप नष्ट हो गए और दूसरी बार स्नान करने से तुमको स्वर्ग प्राप्त हुआ. सो हे वैश्यवर! तुमने दो बार माघ मास में स्नान किया इसी के पुण्य के फल से तुमको स्वर्ग प्राप्त हुआ और तुम्हारा भाई नरक को प्राप्त हुआ. दत्तात्रेय जी कहने लगे कि इस प्रकार वह भाई के दुखों से अति दुखित होकर नम्रतापूर्वक मीठे वचनों से दूतों से कहने लगा कि हे दूतों! सज्जन पुरुषों के साथ सात पग चलने से मित्रता हो जाती है और यह कल्याणकारी होती है. मित्र प्रेम की चिंता न करते हुए तुम मुझको इतना बताने की कृपा करो कि कौन-से कर्म से मनुष्य यमलोक को प्राप्त नहीं होता क्योंकि तुम सर्वज्ञ हो। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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🌳🦚आज की कहानी🦚🌳 💐💐शैतान की चाल💐💐 गधा पेड़ से बंधा था। शैतान आया और उसे खोल गया। गधा मस्त होकर खेतों की ओर भाग निकला और खड़ी फसल को खराब करने लगा। किसान की पत्नी ने यह देखा तो गुस्से में गधे को मार डाला। गधे की लाश देखकर मालिक को बहुत गुस्सा आया और उसने किसान की पत्नी को गोली मार दी। किसान पत्नी की मौत से इतना गुस्से में आ गया कि उसने गधे के मालिक को गोली मार दी। गधे के मालिक की पत्नी ने जब पति की मौत की खबर सुनी तो गुस्से में बेटों को किसान का घर जलाने का आदेश दिया। बेटे शाम में गए और मां का आदेश खुशी-खुशी पूरी कर आए। उन्होंने मान लिया कि किसान भी घर के साथ जल गया होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किसान वापस आया और उसने गधे के मालिक की पत्नी और बेटों, तीनों की हत्या कर दी। इसके बाद उसे पछतावा हुआ और उसने शैतान से पूछा कि यह सब नहीं होना चाहिए था। ऐसा क्यों हुआ? शैतान ने कहा, 'मैंने कुछ नहीं किया। मैंने सिर्फ गधा खोला लेकिन तुम सबने रिऐक्ट किया, ओवर रिऐक्ट किया और अपने अंदर के शैतान को बाहर आने दिया। इसलिए अगली बार किसी का जवाब देने, प्रतिक्रिया देने, किसी से बदला लेने से पहले एक लम्हे के लिए रुकना और सोचना जरूर।' ध्यान रखें। कई बार शैतान हमारे बीच सिर्फ गधा छोड़ता है और बाकी विनाश हम खुद कर देते हैं !! सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है।। 🙏🙏🙏🙏🌳🌳🌳🙏🙏🙏🙏🙏

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