heera
heera Jan 23, 2022

🌹🙏 शुभ सोमवार 🙏🌹

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Asha Bakshi Jan 23, 2022
हर हर महादेव 🙏🌹🙏 ओम नमः शिवाय 🙏🌹🙏 शुभ संध्या वंदन आपका हर पल शुभ एवं मंगलमय हो🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

Anju Mishra May 24, 2022

🙏🌹जय श्री गणेशाय नमः 🙏🌹 विघ्नहर्ता भगवान गणेश सभी का कल्याण करें। 💐जाना है भवसागर पार💐 * एक निर्धन विद्वान व्यक्ति चलते चलते पड़ोसी राज्य में पहुँचा। संयोग से उस दिन वहाँ "हस्तिपटबंधन" समारोह था जिसमें एक हाथी की सूंड में माला देकर नगर में घुमाया जाता था। वह जिसके गले में माला डाल देता था उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा बना दिया जाता था। वह व्यक्ति भी समारोह देखने लगा। हाथी ने उसके ही गले में माला डाल दी। सभी ने जयजयकार करते हुए उसे 5 वर्ष के लिए वहां का राजा घोषित कर दिया। राजपुरोहित ने उसका राजतिलक किया और वहाँ के नियम बताते हुए कहा कि आपको केवल 5 वर्ष के लिए राजा बनाया जा रहा है। 5 वर्ष पूर्ण होते ही आपको मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नदी में छोड़ दिया जाएगा। यदि आप में ताकत होगी तो आप उनका मुकाबला करके नदी के पार वाले गाँव में पहुँच सकते हो। आप को वापिस इस नगर में आने नहीं दिया जाएगा। वह निर्धन विद्वान व्यक्ति तो सिहर गया पर उसने सोचा कि अभी तो 5 वर्ष का समय है। कोई उपाय तो निकल ही जाएगा। उसने 5 वर्ष तक विद्वत्तापूर्वक राज्य किया। राज्य की संचालन प्रक्रिया को पूरे मनोयोग से निभाया और इस प्रकार केवल राज्य पर ही नहीं, लोगों के दिलों पर भी राज्य करने लगा। जनता ने ऐसा प्रजावत्सल राजा कभी नहीं देखा था। 5 वर्ष पूर्ण हुए। नियमानुसार राजा को फिर से हाथी पर बैठाकर जुलूस निकाला गया। लोगों की आँखों से आँसुओं की झड़ी लग गई। नदी के तट पर पहुँच कर राजा हाथी से उतरा। राजपुरोहित ने कहा कि अब आप नदी पार करके दूसरी ओर जा सकते हैं। अश्रुपूरित विदाई समारोह के बीच उसने कहा कि मैं इस राज्य के नियमों का सम्मान करता हूँ। अब आप मुझे आज्ञा दें और हो सके तो इस निर्मम नियम में बदलाव करने के बारे में सोच विचार करें। जैसे ही राजा ने नदी की ओर कदम बढाए, लोगों ने अपनी सजल आँखों को ऊपर उठाया। जानते हो वहाँ ऐसा क्या था जिसे देखकर वे खुशी से नाचने लगे ? *उस नदी पर इस पार से उस पार तक राजा के द्वारा बनवाया गया एक पुल था जिस पर राजा शांत भाव से चला जा रहा था, नदी के उस पार वाले सुंदर से गाँव की ओर।* क्या ऐसा ही कुछ हमारे साथ भी घटित नहीं हो रहा ? हमें भी कुछ समय के लिए श्वासों की सम्पत्ति देकर इस अमूल्य जीवन की बागडोर सौंप दी गई है। समय पूरा होते ही हमें यह राज्य छोड़ कर भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना है जहां से हमें फिर से इस राज्य में आने की आज्ञा नहीं है। *यदि हमने धर्म ध्यान का पुल नहीं बनाया तो हम मगरमच्छों व घड़ियालों से युक्त नरकों में डाल दिए जाएंगे और उनका ग्रास बन जाएंगे।* और अगर हम शांत भाव से भवसागर के उस पार वाले लोक में जाना चाहते हैं तो अभी से वह पुल बनाने की शुरूआत कर देनी चाहिए क्योंकि आयु काल पूरा होने के बाद वहां जाना तो निश्चित ही है..!!

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(((( ईमानदारी का इनाम )))) इस साल मेरा पन्द्रह वर्षीय बेटा ग्यारहवी कक्षा मैं प्रवेश पा गया ..क्लास मैं हमेशा से अव्वल आता रहा है ! . पिछले दिनों तनख्वाह मिली तो मैं उसे नयी स्कूल ड्रेस और जूते दिलवाने के लिए बाज़ार ले गया ! . बेटे ने जूते लेने से ये कह कर मना कर दिया की पुराने जूतों को बस थोड़ी-सी मरम्मत की जरुरत है.. वो अभी इस साल काम दे सकते हैं! . अपने जूतों की बजाये उसने मुझे अपने दादा की कमजोर हो चुकी नज़र के लिए नया चश्मा बनवाने को कहा ! . मैंने सोचा बेटा अपने दादा से शायद बहुत प्यार करता है इसलिए अपने जूतों की बजाय उनके चश्मे को ज्यादा जरूरी समझ रहा है ! . खैर मैंने कुछ कहना जरुरी नहीं समझा और उसे लेकर ड्रेस की दुकान पर पहुंचा... . दुकानदार ने बेटे के साइज़ की सफ़ेद शर्ट निकाली ... डाल कर देखने पर शर्ट एक दम फिट थी..... . फिर भी बेटे ने थोड़ी लम्बी शर्ट दिखाने को कहा !!!! . मैंने बेटे से कहा :बेटा ये शर्ट तुम्हें बिल्कुल सही है तो फिर और लम्बी क्यों ? . बेटे ने कहा :पिता जी मुझे शर्ट निक्कर के अंदर ही डालनी होती है इसलिए थोड़ी लम्बी भी होगी तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा.... . लेकिन यही शर्ट मुझे अगली क्लास में भी काम आ जाएगी ... . पिछली वाली शर्ट भी अभी नयी जैसी ही पड़ी है लेकिन छोटी होने की वजह से मैं उसे पहन नहीं पा रहा ! . मैं खामोश रहा !! . घर आते वक़्त मैंने बेटे से पूछा :तुम्हे ये सब बातें कौन सिखाता है बेटा ? . बेटे ने कहा: पिता जी मैं अक्सर देखता था कि कभी माँ अपनी साड़ी छोड़कर तो कभी आप अपने जूतों को छोडकर हमेशा मेरी किताबों और कपड़ो पैर पैसे खर्च कर दिया करते हैं ! . गली- मोहल्ले में सब लोग कहते हैं के आप बहुत ईमानदार आदमी हैं... . और हमारे साथ वाले राजू के पापा को सब लोग चोर, कुत्ता, बे-ईमान, रिश्वतखोर और जाने क्या क्या कहते हैं, . जबकि आप दोनों एक ही ऑफिस में काम करते हैं..... . जब सब लोग आपकी तारीफ करते हैं तो मुझे बड़ा अच्छा लगता है.... . मम्मी और दादा जी भी आपकी तारीफ करते हैं ! . पिता जी मैं चाहता हूँ कि मुझे कभी जीवन में नए कपड़े, नए जूते मिले या न मिले.. . लेकिन कोई आपको चोर, बे-ईमान, रिश्वतखोर या कुत्ता न कहे !!!!! . मैं आपकी ताक़त बनना चाहता हूँ पिता जी, आपकी कमजोरी नहीं ! . बेटे की बात सुनकर मैं निरुतर था! आज मुझे पहली बार मुझे मेरी ईमानदारी का इनाम मिला था !! . आज बहुत दिनों बाद आँखों में ख़ुशी, गर्व और सम्मान के आंसू थे... ~~~~~~~~~~~~~~~~~ ((((((( जय जय श्री राधे ))))))) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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विवाह में गठबंधन का विधान क्यों? 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गठबंधन विवाह संस्कार का प्रतीकात्मक स्वरूप है। पाणिग्रहण के बाद वर के कंधे पर डाले सफेद दुपट्टे में वधू की साड़ी के एक कोने की गांठ बांध दी जाती है, इसे आम बोलचाल की भाषा में गठबंधन बोलते हैं। इस बंधन का प्रतीक अर्थ है-दोनों के शरीर और मन का एक संयुक्त इकाई के रूप में एक नई सत्ता की शुरुआत। अब दोनों एक-दूसरे के साथ पूरी तरह से बंधे हुए हैं और उनसे यह आशा की जाती है कि वे जिन लक्ष्यों के साथ आपस में बंधे हैं, उन्हें आजीवन निरंतर याद रखेंगे। जीवन लक्ष्य की यात्रा में वे एक-दूसरे के पूरक बनकर चलेंगे। इसीलिए गठबंधन को अटूट अर्थात् कभी न टूटने वाला अजर और अमर माना गया ह है। गठबंधन करते समय वधू के पल्ले और वर के दुपट्टे के बीच सिक्का (पैसा), पुष्प, हलदी, दूर्वा और अक्षत (चावल) ये पांच चीजें भी बांधते हैं, जिनका अपना-अपना महत्त्व है। विवाह पद्धति के अनुसार यह महत्त्व इस प्रकार है सिक्का (पैसा)-धन पर किसी एक का पूर्ण अधिकार नहीं होगा, बल्कि समान अधिकार रहेगा। पुष्प-प्रतीक है, प्रसन्नता और शुभकामनाओं का। सदैव हंसते खिलखिलाते रहें । एक-दूसरे को देखकर प्रसन्न हों। एक-दूसरे की प्रशंसा करें। अपमान न करें। हलदी-आरोग्य और गुरु का प्रतीक है। एक-दूसरे के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को सुविकसित रखने के लिए प्रयत्नशील रहें। मन में कभी लघुता व्याप्त न होने दें । दूर्वा-कभी प्रेम भावना न मुरझाने का प्रतीक है। उल्लेखनीय है कि दूर्वा का जीवन तत्त्व कभी नष्ट नहीं होता। सूखी दिखने पर भी यह पानी में डालने पर हरी हो जाती है। दोनों के मन में इसी प्रकार से एक-दूसरे के लिए अटूट प्रेम और आत्मीयता बनी रहे। चंद्र-चकोर की भांति वे एक-दूसरे पर निछावर होते रहें। अक्षत (चावल)-अन्नपूर्णा का प्रतीक है। जो अन्न कमाएं, उसे अकेले नहीं, बल्कि मिल-जुलकर खाएं। परिवार, 1. समाज के प्रति सेवा एवं उत्तरदायित्व का लक्ष्य भी ध्यान में रखें। इसी की प्रेरणा के लिए अक्षत रखे जाते हैं। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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सिकंदर भारत आया। एक फकीर से मिला। फकीर नग्न था। सिकंदर ने कहा, तुम्हारे पास कुछ भी नहीं! फकीर ने कहा, यह सारा जगत मेरा है! मैंने इसे बिना जीते जीत लिया है। सिकंदर ने पूछा, बिना जीते कोई कैसे जगत को जीत सकता है? उस फकीर ने कहा, मैंने इस जगत के मालिक को जीत लिया है। और जब मालिक अपने हाथ में है तो कौन फिक्र करे छोटी-मोटी चीजों को जीतने की! जब मालिक अपना है तो उसकी मालकियत अपनी है। और जीतने का ढंग यहां और है, तलवार उठाना नहीं–सिर झुकाना। हम झुक गए मालिक के चरणों में, झुक कर हम मालिक के अंग हो गए। यह सारी मालकियत अपनी है। सिकंदर खुश हुआ था, ये बातें प्यारी थीं! सिकंदर ने कहा, लेकिन मैंने भी जगत जीता है, अपने ढंग से जीता है। फकीर ने कहा कि ऐसा समझो कि रेगिस्तान में तुम खो जाओ और गहन प्यास लगे और मैं एक लोटे में जल लेकर उपस्थित हो जाऊं, तो एक लोटा जल के लिए तुम अपना कितना राज्य मुझे देने को राजी नहीं हो जाओगे, अगर तुम मर रहे हो, तड़फ रहे हो? सिकंदर ने कहा, अगर ऐसी स्थिति हो तो मैं आधा राज्य दे दूंगा; मगर लोटा जल ले लूंगा। क्योंकि प्राण थोड़े ही गंवाऊंगा! फकीर ने कहा, लेकिन मैं बेचूं तब न! आधे राज्य में मैं बेचूंगा? कीमत और बढ़ाओ। ज्यादा से ज्यादा कितना दे सकते हो? सिकंदर ने कहा, अगर ऐसी ही जिद तुम्हारी हो और मुझे प्यास लगी हो और मैं मर रहा होऊं, तड़फ रहा होऊं, तो पूरा राज्य दे दूंगा। तो फकीर ने कहा, कितना तुम्हारे राज्य का मूल्य है– एक लोटा भर पानी! इसमें तुमने जीवन गंवाया! प्यास इतनी अनिवार्य है कि पूरा राज्य भी कोई दे सकता है। जैसे प्यास शरीर के लिए अनिवार्य है… शरीर में तो कम से कम बीस प्रतिशत और कुछ भी है, लेकिन आत्मा में तो सौ प्रतिशत धर्म है। धर्म का अर्थ स्वभाव है। हरि ॐ........

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Parmeshwar Kabir May 25, 2022

🍃 *कबीर बड़ा या कृष्ण* 🍃 *(Part 71)* *‘‘श्राद्ध-पिण्डदान के प्रति रूची ऋषि का वेदमत‘‘* मार्कण्डेय पुराण में ‘‘रौच्य ऋषि के जन्म’’ की कथा आती है। एक रुची ऋषि था। वह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदों अनुसार साधना करता था। विवाह नहीं कराया था। रुची ऋषि के पिता, दादा, परदादा तथा तीसरे दादा सब पित्तर (भूत) योनि में भूखे-प्यासे भटक रहे थे। एक दिन उन चारों ने रुची ऋषि को दर्शन दिए तथा कहा कि बेटा! आप ने विवाह क्यों नहीं किया? विवाह करके हमारे श्राद्ध करना। रुची ऋषि ने कहा कि हे पितामहो! वेद में इस श्राद्ध आदि कर्म को अविद्या कहा है, मूर्खों का कार्य कहा है। फिर आप मुझे इस कर्म को करने को क्यों कह रहे हो? पित्तरों ने कहा कि यह बात सत्य है कि श्राद्ध आदि कर्म को वेदों में अविद्या अर्थात् मूर्खों का कार्य ही कहा है। फिर उन पित्तरों ने वेदविरूद्ध ज्ञान बताकर रूची ऋषि को भ्रमित कर दिया क्योंकि मोह भी अज्ञान की जड़ है। मार्कण्डेय पुराण के प्रकरण से सिद्ध हुआ कि वेदों में तथा वेदों के ही संक्षिप्त रुप गीता में श्राद्ध-पिण्डोदक आदि भूत पूजा के कर्म को निषेध बताया है, नहीं करना चाहिए। उन मूर्ख ऋषियों ने अपने पुत्र को भी श्राद्ध करने के लिए विवश किया। उसने विवाह कराया, उससे रौच्य ऋषि का जन्म हुआ, बेटा भी पाप का भागी बना लिया। पितर बना दिया। 🥀Markendya Purana 🥀 प्रश्न 30:- क्या गायत्री मंत्र ’’ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्‘‘ से पूर्ण मोक्ष संभव है? उत्तर:- जिसे गायत्री मन्त्र कहते हो, वह यजुर्वेद के अध्याय 36 का मन्त्र 3 है जिसके आगे ‘‘ओम्‘‘ अक्षर नहीं है। यदि ‘‘ओम्’‘ अक्षर को इस वेद मन्त्र के साथ जोड़ा जाता है तो परमात्मा का अपमान है क्योंकि ओम् (ऊँ) अक्षर तो ब्रह्म का जाप है। यजुर्वेद अध्याय 36 मन्त्र 3 में परम अक्षर ब्रह्म की महिमा है। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति पत्र तो लिख रहा है प्रधानमंत्री को और लिख रहा है सेवा में ‘मुख्यमंत्री जी’ तो वह प्रधानमंत्री का अपमान कर रहा है। फिर बात रही इस मन्त्र यजुर्वेद के अध्याय 36 मन्त्र 3 को बार-बार जाप करने की, यह क्रिया मोक्षदायक नहीं है। मन्त्र का मूल पाठ इस प्रकार है:- भूर्भुवः स्वः तत् सवितु वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् अनुवाद:- (भूः) स्वयंभू परमात्मा पृथ्वी लोक को (भवः) गोलोक आदि भवनों को वचन से प्रकट करने वाला है (स्वः) स्वर्गलोक आदि सुख धाम हैं। (तत्) वह (सवितुः) उन सर्व का जनक परमात्मा है। (वरेणीयम) सर्व साधकांे को वरण करने योग्य अर्थात् अच्छी आत्माओं के भक्ति योग्य है। (भृगो) तेजोमय अर्थात् प्रकाशमान (देवस्य) परमात्मा का (धीमहि) उच्च विचार रखते हुए अर्थात् बड़ी समझ से (धियो यो नः प्रचोदयात्) जो बुद्धिमानों के समान विवेचन करता है, वह विवेकशील व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बनता है। भावार्थ: परमात्मा स्वयंभू जो भूमि, गोलोक आदि लोक तथा स्वर्ग लोक है उन सर्व का सृजनहार है। उस उज्जवल परमेश्वर की भक्ति श्रेष्ठ भक्तों को यह विचार रखते हुए करनी चाहिए कि जो पुरुषोत्तम (सर्व श्रेष्ठ परमात्मा) है, जो सर्व प्रभुओं से श्रेष्ठ है, उसकी भक्ति करें जो सुखधाम अर्थात् सर्वसुख का दाता है। उपरोक्त मन्त्र का यह हिन्दी अनुवाद व भावार्थ है। इस की संस्कृत या हिन्दी अनुवाद को पढ़ते रहने से मोक्ष नहीं है क्योंकि यह तो परमात्मा की महिमा का एक अंश है अर्थात् हजारों वेद मन्त्रों में से यजुर्वेद अध्याय 36 का मंत्र सँख्या 3 केवल एक मन्त्र है। यदि कोई चारों वेदों को भी पढ़ता रहे तो भी मोक्ष नहीं। मोक्ष होगा वेदों में वर्णित ज्ञान के अनुसार भक्ति क्रिया करने से। उदाहरण:- विद्युत की महिमा है कि बिजली अंधेरे को उजाले में बदल देती है, बिजली ट्यूबवेल चलाती है जिससे फसल की सिंचाई होती है। बिजली आटा पीसती है, आदि-आदि बहुत से गुण बिजली के लिखे हैं। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन बिजली के गुणों का पाठ करता रहे तो उसे बिजली का लाभ प्राप्त नहीं होगा। लाभ प्राप्त होगा बिजली का कनेक्शन लेने से। कनेक्शन कैसे प्राप्त हो सकता है? उस विधि को प्राप्त करके फिर बिजली के गुणों का लाभ प्राप्त हो सकता है। केवल बिजली की महिमा को गाने मात्र से नहीं। इसी प्रकार वेद मन्त्रों में अर्थात् श्रीमद् भगवत् गीता (जो चारों वेदों का सार है) में मोक्ष प्राप्ति के लिए जो ज्ञान कहा है, उसके अनुसार आचरण करने से मोक्ष लाभ अर्थात् परमेश्वर प्राप्ति होती है। ••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••• आध्यात्मिक जानकारी के लिए आप संत रामपाल जी महाराज जी के मंगलमय प्रवचन सुनिए। Sant Rampal Ji Maharaj YOUTUBE चैनल पर प्रतिदिन 7:30-8.30 बजे।

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