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. " शकुन्तला (मेनका पुत्री) की कथा " " शकुंतला की कथा महाभारत के आदिपर्व में मिलती है।शकुन्तला ऋषि विश्वामित्र तथा स्वर्ग की अप्सरा, मेनका की पुत्री थी। देवराज इंद्र ने तपस्यारत महर्षि विश्वामित्र की तपस्या को भंग करने के लिये अप्सरा मेनका को भेजा। मेनका की सुंदरता से मोहित विश्वामित्र ने उससे शारीरिक संबंध बनाए। मेनका गर्भवती हुई और एक कन्या को जनम दिया। मेनका ने उसे जन्म होते ही त्याग दिया था। कण्व ऋषि ने उसे पड़ा हुए पाया और पुत्री के रूप में उसका लालन-पालन किया। "एक दिन राजा दुश्यंत शिकार करते हुए वन में साथियों से बिछड् गये। वहाँ भटकते समय उन्होंने शकुंतला को देखा। मोहित होकर उससे गान्धर्वविवाह किया और उसके साथ सहवास करके यह वचन देकर लौट गये कि राजधानी में पहुँच कर उसे बुलवा लेंगे। इस सहवास से शकुंतला गर्भवती हो गई थी। बाद में जब गर्भवती शकुन्तला दुश्यंत के दरबार में गयी, तो राजा ने उसे नहीं पहचाना। क्योंकि दुर्वासा मुनि के शाप के कारण राजा दुश्यंत की दी हुई अँगूठी खो जाने से दुश्यंत शकुंतला को भूल गए थे। शकुंतला निराश होकर राजमहल के बाहर निकली। " "उस समय उसकी माँ मेनका उसे उठा ले गई और कश्यप ऋषि के आश्रय में उनके आश्रम में रखा जहाँ शकुन्तला ने एक पुत्र को जन्म दिया। कुछ दिनों के बाद एक मछुआरा मछली के पेट से मिली अँगूठी राजा को भेंट करने आया। इस अँगूठी को देखते ही दुश्यन्त को शकुन्तला की याद आई। इसके बाद दुश्यन्त ने शकुन्तला का ढूँढना शुरू किया और पुत्र सहित उसे सम्मानपूर्वक राजमहल ले आए। इसके बाद शकुंतला और दुश्यन्त सुख—पूर्वक जीवन बिताने लगे।" "कहा जाता है कि उनके पुत्र भरत के ही नाम से हमारे देश का नाम भारत कहलाया जाता है। भरत के वंश में ही पाण्डव और कौरवों ने जन्म लिया तथा उनके ही बीच महाभारत नामक विश्वविख्यात संग्राम हुआ।" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. " स्वर्ग लोक की अप्सरा मेनका कि कथा " "मेनका स्वर्ग लोक  की छह सर्वश्रेष्ठ अप्सराओं मे एक है। यह उल्लेख किया गया है कि उसने ऋषि विश्वामित्र  की तपस्या भँंग की। मेनका को स्वर्ग की सबसे सुन्दर अप्सरा माना जाता था।" "मेनका वृषणश्र (ऋग्वेद १-५१-१३) अथवा कश्यप और प्राधा (महाभारत आदिपर्व, ६८-६७) की पुत्री तथा ऊर्णयु नामक गंधर्व की पत्नी थी। अर्जुन के जन्म समारोह तथा स्वागत में इसने नृत्य किया था। अपूर्व सुंदरी होने से पृषत् इस पर मोहित गया जिससे द्रुपद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। " "इंद्र ने विश्वामित्र को तप भ्रष्ट करने के लिये इसे भेजा था जिसमे यह सफल हुई और इसने एक कन्या को जन्म दिया। उसे यह मालिनी तट पर छोड़कर स्वर्ग चली गई। शकुन पक्षियों द्वारा रक्षित एवं पालित होने के कारण महर्षि कण्व ने उस कन्या को शकुन्तला नाम दिया जो कालान्तर में दुष्यन्त की पत्नी और भरत की माता बनी।" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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Shuchi Singhal Jan 16, 2022

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sanjay rastogi Jan 16, 2022

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. " धृतराष्ट्र, पाण्डु तथा विदुर का जन्म " ("सत्यवती की कथा के दूसरे भाग मे आप ने सत्यवती की विवाह कि कथा पढी अब आगे :-") "सत्यवती के चित्रांगद और विचित्रवीर्य नामक दो पुत्र हुये। शान्तनु का स्वर्गवास चित्रांगद और विचित्रवीर्य के बाल्यकाल में ही हो गया था इसलिये उनका पालन पोषण भीष्म ने किया। भीष्म ने चित्रांगद के बड़े होने पर उन्हें राजगद्दी पर बिठा दिया लेकिन कुछ ही काल में गन्धर्वों से युद्ध करते हुये चित्रांगद मारा गया। इस पर भीष्म ने उनके अनुज विचित्रवीर्य को राज्य सौंप दिया। अब भीष्म को विचित्रवीर्य के विवाह की चिन्ता हुई। उन्हीं दिनों काशीराज की तीन कन्याओं, अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का स्वयंवर होने वाला था। उनके स्वयंवर में जाकर अकेले ही भीष्म ने वहाँ आये समस्त राजाओं को परास्त कर दिया और तीनों कन्याओं का हरण कर के हस्तिनापुर ले आये। बड़ी कन्या अम्बा ने भीष्म को बताया कि वह अपना तन-मन राज शाल्व को अर्पित कर चुकी है। उसकी बात सुन कर भीष्म ने उसे राजा शाल्व के पास भिजवा दिया और अम्बिका और अम्बालिका का विवाह विचित्रवीर्य के साथ करवा दिया।" "राजा शाल्व ने अम्बा को ग्रहण नहीं किया अतः वह हस्तिनापुर लौट कर आ गई और भीष्म से बोली, "हे आर्य! आप मुझे हर कर लाये हैं अतएव आप मुझसे विवाह करें।" किन्तु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण उसके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। अम्बा रुष्ट हो कर परशुराम के पास गई और उनसे अपनी व्यथा सुना कर सहायता माँगी। परशुराम ने अम्बा से कहा, "हे देवि! आप चिन्ता न करें, मैं आपका विवाह भीष्म के साथ करवाउँगा।" परशुराम ने भीष्म को बुलावा भेजा किन्तु भीष्म उनके पास नहीं गये। इस पर क्रोधित होकर परशुराम भीष्म के पास पहुँचे और दोनों वीरों में भयानक युद्ध छिड़ गया। दोनों ही अभूतपूर्व योद्धा थे इसलिये हार-जीत का फैसला नहीं हो सका। आखिर देवताओं ने हस्तक्षेप कर के इस युद्ध को बन्द करवा दिया। अम्बा निराश हो कर वन में तपस्या करने चली गई।" " विचित्रवीर्य अपनी दोनों रानियों के साथ भोग विलास में रत हो गये किन्तु दोनों ही रानियों से उनकी कोई सन्तान नहीं हुई और वे क्षय रोग से पीड़ित हो कर मृत्यु को प्राप्त हो गये। अब कुल नाश होने के भय से माता सत्यवती ने एक दिन भीष्म से कहा, "पुत्र! इस वंश को नष्ट होने से बचाने के लिये मेरी आज्ञा है कि तुम इन दोनों रानियों से पुत्र उत्पन्न करो।" माता की बात सुन कर भीष्म ने कहा, "माता! मैं अपनी प्रतिज्ञा किसी भी स्थिति में भंग नहीं कर सकता।" " यह सुन कर माता सत्यवती को अत्यन्त दुःख हुआ। अचानक उन्हें अपने पुत्र वेदव्यास का स्मरण हो आया। स्मरण करते ही वेदव्यास वहाँ उपस्थित हो गये। सत्यवती उन्हें देख कर बोलीं, "हे पुत्र! तुम्हारे सभी भाई निःसन्तान ही स्वर्गवासी हो गये। अतः मेरे वंश को नाश होने से बचाने के लिये मैं तुम्हें आज्ञा देती हूँ कि तुम उनकी पत्नियों से सन्तान उत्पन्न करो।" वेदव्यास उनकी आज्ञा मान कर बोले, "माता! आप उन दोनों रानियों से कह दीजिये कि वे एक वर्ष तक नियम व्रत का पालन करते रहें तभी उनको गर्भ धारण होगा।" एक वर्ष व्यतीत हो जाने पर वेदव्यास सबसे पहले बड़ी रानी अम्बिका के पास गये। अम्बिका ने उनके तेज से डर कर अपने नेत्र बन्द कर लिये। वेदव्यास लौट कर माता से बोले, "माता अम्बिका का बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा किन्तु नेत्र बन्द करने के दोष के कारण वह अंधा होगा।" सत्यवती को यह सुन कर अत्यन्त दुःख हुआ और उन्होंने वेदव्यास को छोटी रानी अम्बालिका के पास भेजा। अम्बालिका वेदव्यास को देख कर भय से पीली पड़ गई। उसके कक्ष से लौटने पर वेदव्यास ने सत्यवती से कहा, "माता! अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र होगा।" इससे माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ और उन्होंने बड़ी रानी अम्बिका को पुनः वेदव्यास के पास जाने का आदेश दिया। इस बार बड़ी रानी ने स्वयं न जा कर अपनी दासी को वेदव्यास के पास भेज दिया। इस बार वेदव्यास ने माता सत्यवती के पास आ कर कहा, "माते! इस दासी के गर्भ से वेद-वेदान्त में पारंगत अत्यन्त नीतिवान पुत्र उत्पन्न होगा।" इतना कह कर वेदव्यास तपस्या करने चले गये।" "समय आने पर अम्बि‍का के गर्भ से जन्मांध धृतराष्ट्र, अम्बालिका के गर्भ से पाण्डु रोग से ग्रसित पाण्डु तथा दासी के गर्भ से धर्मात्मा विदुर का जन्म हुआ।" " समाप्त " ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. " हयग्रीव तथा मत्स्य अवतार की कथा " "हयग्रीवासुर या हयग्रीव एक प्रसिद्ध तथा प्राचीन दैत्य और महर्षि कश्यप और दिति का ज्येष्ठ पुत्र था। उसके अनुज हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु थे तथा उसकी बहिन का नाम होलिका था। ऐसा कहा जाता है कि हयग्रीवासुर एक ऐसा दैत्य था जो जल , थल या आकाश में कहीं भी रह सकता था | " "ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की तथा सप्तऋषि तथा सनाकदि मुनियों की भी उत्पत्ति की। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र सप्तऋषियों में से एक ऋषि महर्षि मरीचि थे। उनके पुत्र महर्षि कश्यप हुए। कश्यप ने दक्ष प्रजापति की सत्रह कन्याओं से विधिपूर्वक विवाह करके उनसे समस्त जातियां उत्पन्न की। कश्यप की एक पत्नी का नाम दिति था जो दैत्यों की माता थीं। महर्षि कश्यप की पहली पत्नी अदिति ने तेजस्वी आदित्य इन्द्र को तो दूसरी पत्नी दिति ने भी तेजस्वी दैत्य हयग्रीव को जन्म दिया। हयग्रीव ब्रह्मा जी से वेद चुराकर ले गया और समुद्र की गहराई में छिपा दिया। भगवान विष्णु को जब इस बात का पता चला तो उन्होंने हयग्रीव का वध करने का निश्चय किया। उन्होंने तत्काल एक छोटी सी मछली का रूप धारण किया और अपने भक्त राजा मनु के पास गए। मनु उस समय भगवान सूर्य नारायण को जलांजलि दे रहे थे कि उन्होंने देखा कि एक छोटी सी मछली उनके हाथ में आ गई। " " मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने कहा ''कि हे राजन् मुझे अपने कमण्डलु में रख लो अन्यथा बड़ी मछलियां मुझे मारकर खा जाएंगी''। दयावान राजा ने उस मत्स्य को अपने कमण्डलु में रख लिया और एक ही रात में मत्स्य इतनी बड़ी हो गई कि राजा ने पहले उसे एक बड़े बर्तन में रखा किन्तु वह बर्तन छोटा पड़ गया तत्पश्चात राजा ने उस मत्स्य को एक सरोवर में रखा किन्तु उस मत्स्य ने सरोवर भी ढांक लिया जब उसे रखने के लिए सब स्थान छोटे पड़ गए। तब मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने अपने वास्तविक रूप में मनु को दर्शन देकर आदेश दिया ''कि हे राजन् तुम मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनो महासागर में आज से सात दिनों बाद प्रलय आएगी इसलिए सभी प्रजातियों को एक नौका में बिठा लो मैं स्वयं तुम्हें दिखाई दूंगा और तुम्हारी नौका को मैं ही खीं चूंगा और हयग्रीव नामक दैत्य ने वेदों को चुराकर समुद्र की गहराई में छिपा दिया है इसलिए मैं उसका वध करने जा रहा हूं ''। मनु ने ऐसा ही किया । " " मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने समुद्र में हयग्रीव के राज्य में प्रवेश किया तो हयग्रीव के सिपाही मत्स्य रूपी भगवान विष्णु को मारने के लिए दौड़े। मत्स्य रूपी भगवान विष्णु ने उनका भी वध कर दिया और हयग्रीव के सिपाहियों को मारकर अंत में उन्होंने हयग्रीव को भी मार डाला तथा वेदों को उसके कारगर से निकालकर उन्हें अपने मुख में स्थापित करके बाहर आ गए तथा उन्होंने मनु की नौका को खींचकर इस संसार को जल प्रलय से बचाया। प्रलय समाप्त होने पर भगवान विष्णु ने वेद ब्रह्मा जी को सौंप दिए।" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. " आज का प्रात: संदेश " "सनातन धर्म में प्रत्येक मनुष्य परमात्मा का ही अंश बताया गया है ! "बाबा तुलसीदास जी लिखते हैं - "ईश्वर अंश जीव अबिनासी " ! "अर्थात प्रत्येक जीवात्मा उस परमपिता परमात्मा का ही अँश है , और यह शरीर मनुष्य को संसार से मिला है ,जिन माता - पिता से हमें यह शरीर प्राप्त हुआ उनकी सेवा करके उन्हें सुख पहुँचाना मनुष्य का पहला कर्तव्य है , जीवन भर माता - पिता की सेवा करके भी उनके ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता , संसार में तरह तरह के सम्बंध मनुष्य बनाता है परंतु उन सभी सम्बंधों में सर्वश्रेष्ठ सम्बंध माता का है ! क्योंकि उसने अपना दूध पिलाकर मनुष्य को हृष्ट पुष्ट बनाया है !" "शास्त्र मे लिखा भी है कि - " मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम्" "अर्थात माता के समान शरीर का पालन - पोषण संसार में कोई दूसरा नहीं कर सकता है, तो माता से सम्बन्धविच्छेद करके कोई सुखी नहीं रह सकता है, क्योंकि माता ही ऐसी है जिसकी कोख में ही पलकर श्री राम , श्री कृष्ण जैसे देवात्माओं ने संसार को सद्मार्ग दिखलाया है ,ठीक उसी प्रकार का सम्बन्ध जीवात्मा और परमात्मा का होता है, जीवात्मा जब अपनी माँ रूपी परमात्मा से सम्बन्धविच्छेद करता है तो वह इस संसार सागर में डूबने लगता है !" "कहा गया है कि "कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति" "अर्थात पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है परंतु माता कभी कुमाता नहीं होती, जीवन भर कष्ट देने के बाद भी संकट में पुत्र यदि एक बार भी माता को पुकारता है तो माँ सारे गिले - शिकवे छोड़कर पुत्र को अपने आँचल में छुपा लेती है ! ऐसी स्नेहमयी माता को भुलाकर उसकी अवहेलना करने वालों को परमात्मा भी दुत्कार देते हैं !" "आज के समाज में प्रायः देखा जा रहा है की संतानों के द्वारा माता-पिता की अवहेलना की जा रही है , अपनी पत्नी का पक्ष लेकर अपने जन्म देने वाली माता को ही भला बुरा कह कर घर से अलग कर देने वाले अनेक लोग इस समाज में दिखाई पड़ रहे हैं ! उनको शायद यह नहीं पता है कि मां और परमात्मा में कोई विशेष अंतर नहीं है ! मैं "कुमार रौनक कश्यप" स्पष्ट करना चाहूंगा की परमात्मा की तुलना माँ से कैसे की जा सकती है इसका उदाहरण मानस में बाबा जी देते हैं कि :- "जब नारद जी भगवान श्री राम से कहते हैं कि हे भगवन जब मैंने विवाह करना चाहा तो आपने क्यों नहीं करने दिया ! "तब मर्यादापुरुषोत्तम नारद को जबाब देते हैं - "सुनु मुनि तोहिं कहहुँ सहरोसा ! जिन्हहिं सकल तजि मोर भरोसा !! " "करहुँ सदा तिन्ह कर रखवारी ! जिमि बालक राखइ महतारी !! " "अर्थात परमात्मा अपने भक्तों की देखभाल उसी प्रकार करते हैं जैसे एक माँ अपने बच्चे की देखभाल करती है ! जैसे एक बच्चा अपनी माँ के आंचल में समा जाना चाहता है उसी प्रकार यह सम्पूर्ण सृष्टि उस परमात्मा की ही गोद में समा जाती है ! " "जीवन भर कर्म - कुकर्म करने बाद भी यदि किसी घोर संकट में मनुष्य में परमात्मा को याद करता है तो वह परमात्मा एक ममतामयी माँ की तरह मनुष्य को अपनी गोद में हिठाकर सहारा देते हैं !" "कुछ लोग इस पर प्रश्न करते हैं कि -- क्या जीवन भर पाप करके भी परमात्मा का स्नेह पाया जा सकता है ??? " इसका जबाब स्वयं भगवान देते हैं कि - "सनमुख होंहिं जीव मोंहिं जबहीं ! जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं !! " "भगवान कहते हैं कि जीवन के जिस क्षण में अर्थात किसी भी क्षण जब भी जीवात्मा मेरे सम्मुख (नाम रूप लीला धाम के माध्यम से ) होता है | एक क्षण के लिए भी यदि मोह - माया छोड़कर मेरी शरण में आ जाता है तो उसके इस जन्म के ही नहीं अपितु करोड़ों जन्मों के पापों का विनाश हो जाता है !" "(इस प्रकार अपनी माँ और करुणानिधान मातृवत प्रेम करने वाले परमात्मा को भुला देना मनुष्य के दुर्भाग्य के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है !)" ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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