ritu saini
ritu saini Nov 23, 2021

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कामेंट्स

सुनील कुमार Nov 23, 2021
जय सिया राम 🙏 🌹 ।। ☀️ सुप्रभात ☀️ ।। आपका दिन 🌇 हो 🌹 राम राम जी 🙏 🌹 🌹

GOVIND CHOUHAN Nov 23, 2021
Jai Shree Radhe Radhe 🌺🙏🙏 Good Morning Jii 🌺🙏🙏Nice Post

santoshi thakur Nov 23, 2021
Jai Bajrang Bali 🙏🏵️ Jai Shree Ram Sister 🙏 Good Morning Ji Aapka Din Shubh Ho Har Pal Mangalmay Ho God Bless You Radhey Radhey Krishna Ji 🌺🙏

Suresh Kumar Mali Nov 23, 2021
राम राम जी आपका दिन शुभ व मंगलमय हो

Sudha Mishra Nov 23, 2021
Jai Shri Ram ji 🙏Jai hanuman ji🌹 Suprabhat vandan ji 🌹 Prabhu Shri Ram ji aur rambhakt hanuman ji ki kripa sda aap pr aapke parivar pr bani rahe 🙏🌹

R.K.SONI (Ganesh Mandir) Nov 23, 2021
Ram Ram Ji🌲🙏 Aap Hmesha khush Rhe ji. V. nice post ji👌👌👌👌🌹🌹🌹🌈🌈🌈🌲🙏🙏

R.K.SONI (Ganesh Mandir) Nov 23, 2021
Ram Ram ji🙏 Radhe Radhe Ji🙏 V. Nice Post Ji👌👌🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌲🌲🌈🌈

Ragni Dhiwer Nov 23, 2021
🥀श्री गणेश जी एवं हनुमान जी 🌼 का आशीर्वाद हमेशा आपके साथ बना रहे🥀 राधे राधे जी🥀🙏🥀

Anil Nov 23, 2021
good night 🌹🙏🌹🙏🌹

Ravi Kumar Taneja Nov 24, 2021
🌲|| ॐ गं गणपतये नमो नमः ||🌲 🌻 || वक्रतुंड महाकाय सुर्य कोटी समप्रभ || || निर्विघ्नं कुरुमदेवं सर्व कार्येशु सर्वदा ||🌻 *🌹आपका दिन मंगलमय हो*🌹 *स्नेहिल शुभ दोपहर वंदना* 🙏🌺🙏 🌼| |ॐ श्री सिद्धिविनायकाय नमो नमः ||🌼 *꧁🌹!! ॐ गं गणपतये नमो: नमः!!🌹꧂* ()(. = .)() <>’ ) )’<> (,,,)’ ‘(,,,) रिद्धि सिद्धि के दाता श्री गणपति महाराज आपकी हर मनोकामना पूरी करें आपका दिन शुभ हो 🙏 🕉🦋🙏🌲🙏🌲🙏🦋🕉

. " महर्षि विश्वामित्र की कथा " " वैदिक काल के एक महान ऋषि " " पोस्ट १\४ " ("विश्वामित्र वैदिक काल के विख्यात ऋषि (योगी) थे। ऋषि विश्वामित्र बड़े ही प्रतापी और तेजस्वी महापुरुष थे। ऋषि धर्म ग्रहण करने के पूर्व वे बड़े पराक्रमी और प्रजावत्सल नरेश थे ") " कथा आरंभ " " प्रजापति के पुत्र कुश, कुश के पुत्र कुशनाभ और कुशनाभ के पुत्र राजा गाधि थे। विश्वामित्र जी उन्हीं गाधि के पुत्र थे। विश्वामित्र शब्द विश्व और मित्र से बना है जिसका अर्थ है- सबके साथ मैत्री अथवा प्रेम। एक दिन राजा विश्वामित्र अपनी सेना को लेकर वशिष्ठ ऋषि के आश्रम में गये। विश्वामित्र जी उन्हें प्रणाम करके वहीं बैठ गये। वशिष्ठ जी ने विश्वामित्र जी का यथोचित आदर सत्कार किया और उनसे कुछ दिन आश्रम में ही रह कर आतिथ्य ग्रहण करने का अनुरोध किया। इस पर यह विचार करके कि मेरे साथ विशाल सेना है और सेना सहित मेरा आतिथ्य करने में वशिष्ठ जी को कष्ट होगा, विश्वामित्र जी ने नम्रतापूर्वक अपने जाने की अनुमति माँगी किन्तु वशिष्ठ जी के अत्यधिक अनुरोध करने पर थोड़े दिनों के लिये उनका आतिथ्य स्वीकार कर लिया।" "वशिष्ठ जी ने नंदिनी गौ का आह्वान करके विश्वामित्र तथा उनकी सेना के लिये छः प्रकार के व्यंजन तथा समस्त प्रकार के सुख सुविधा की व्यवस्था कर दिया। वशिष्ठ जी के आतिथ्य से विश्वामित्र और उनके साथ आये सभी लोग बहुत प्रसन्न हुये।" "नंदिनी गौ का चमत्कार देखकर विश्वामित्र ने उस गौ को वशिष्ठ जी से माँगा पर वशिष्ठ जी बोले राजन! यह गौ मेरा जीवन है और इसे मैं किसी भी कीमत पर किसी को नहीं दे सकता।" "वशिष्ठ जी के इस प्रकार कहने पर विश्वामित्र ने बलात् उस गौ को पकड़ लेने का आदेश दे दिया और उसके सैनिक उस गौ को डण्डे से मार मार कर हाँकने लगे। नंदिनी गौ ने क्रोधित होकर उन सैनिकों से अपना बन्धन छुड़ा लिया और वशिष्ठ जी के पास आकर विलाप करने लगी। वशिष्ठ जी बोले कि हे नंदिनी! यह राजा मेरा अतिथि है इसलिये मैं इसको शाप भी नहीं दे सकता और इसके पास विशाल सेना होने के कारण इससे युद्ध में भी विजय प्राप्त नहीं कर सकता। मैं स्वयं को विवश अनुभव कर रहा हूँ। उनके इन वचनोंको सुन कर नंदिनी ने कहा कि हे ब्रह्मर्षि! आप मुझे आज्ञा दीजिये, मैं एक क्षण में इस क्षत्रिय राजा को उसकी विशाल सेनासहित नष्ट कर दूँगी। और कोई उपाय न देख कर वशिष्ठ जी ने नंदिनी को अनुमति दे दी।" "आज्ञा पाते ही नंदिनी ने योगबल से अत्यंत पराक्रमी मारक शस्त्रास्त्रों से युक्त पराक्रमी योद्धाओं को उत्पन्न किया जिन्होंने शीघ्र ही शत्रु सेना को गाजर मूली की भाँति काटना आरम्भ कर दिया। अपनी सेना का नाश होते देख विश्वामित्र के सौ पुत्र अत्यन्त कुपित हो वशिष्ठ जी को मारने दौड़े। वशिष्ठ जी ने उनमें से एक पुत्र को छोड़ कर शेष सभी को भस्म कर दिया।" " अपनी सेना तथा पुत्रों के नष्ट हो जाने से विश्वामित्र बड़े दुःखी हुये। अपने बचे हुये पुत्र को राज सिंहासन सौंप कर वे तपस्या करने के लिये हिमालय की कन्दराओं में चले गये। कठोर तपस्या करके विश्वामित्र जी ने महादेव जी को प्रसन्न कर लिया ओर उनसे दिव्य शक्तियों के साथ सम्पूर्ण धनुर्विद्या के ज्ञान का वरदान प्राप्त कर लिया।" क्रमशः:- ----------::;×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

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. "कबीर जी की पगड़ी" एक बार संत कबीर ने बड़ी कुशलता से पगड़ी बनाई। झीना- झीना कपडा बुना और उसे गोलाई में लपेटा। हो गई पगड़ी तैयार। वह पगड़ी जिसे हर कोई बड़ी शान से अपने सिर सजाता हैं। यह नई नवेली पगड़ी लेकर संत कबीर दुनिया की हाट में जा बैठे। ऊँची-ऊँची पुकार उठाई, 'शानदार पगड़ी ! जानदार पगड़ी ! दो टके की भाई ! दो टके की भाई !' एक खरीददार निकट आया। उसने घुमा- घुमाकर पगड़ी का निरीक्षण किया। फिर कबीर जी से प्रश्न किया, 'क्यों महाशय एक टके में दोगे क्या ?' कबीर जी ने अस्वीकार कर दिया, 'न भाई ! दो टके की है। दो टके में ही सौदा होना चाहिए।' खरीददार भी नट गया। पगड़ी छोड़कर आगे बढ़ गया। यही प्रतिक्रिया हर खरीददार की रही। सुबह से शाम हो गई। कबीर जी अपनी पगड़ी बगल में दबाकर खाली जेब वापिस लौट आए। थके- माँदे कदमों से घर-आँगन में प्रवेश करने ही वाले थे कि तभी एक पड़ोसी से भेंट हो गई। उसकी दृष्टि पगड़ी पर पड़ गई। क्या हुआ संत जी, इसकी बिक्री नहीं हुई ? पड़ोसी ने जिज्ञासा की। कबीर जी ने दिन भर का क्रम कह सुनाया। पड़ोसी ने कबीर जी से पगड़ी ले ली, आप इसे बेचने की सेवा मुझे दे दीजिए। मैं कल प्रातः ही बाजार चला जाऊँगा। अगली सुबह कबीर जी के पड़ोसी ने ऊँची-ऊँची बोली लगाई, 'शानदार पगड़ी ! जानदार पगड़ी ! आठ टके की भाई ! आठ टके की भाई !' पहला खरीददार निकट आया, बोला, 'बड़ी महंगी पगड़ी हैं ! दिखाना जरा !' पडोसी, पगड़ी भी तो शानदार है। ऐसी और कही नहीं मिलेगी। खरीददार, ठीक दाम लगा लो, भईया। पड़ोसी बोला, चलो, आपके लिए छह टका लगा देते हैं। खरीददार, ये लो पाँच टका। पगड़ी दे दो। एक घंटे के भीतर-भीतर पड़ोसी वापस लौट आया। कबीर जी के चरणों में पाँच टके अर्पित किए। पैसे देखकर कबीर जी के मुख से अनायास ही निकल पड़ा - सत्य गया पाताल में, झूठ रहा जग छाए। दो टके की पगड़ी, पाँच टके में जाए॥ यही इस जगत का व्यावहारिक सत्य है। सत्य के पारखी इस जगत में बहुत कम होते हैं। संसार में अक्सर सत्य का सही मूल्य नहीं मिलता, लेकिन असत्य बहुत ज्यादा कीमत पर बिकता हैं। इसलिए कबीरदास जी ने कहा है - सच्चे का कोई ग्राहक नाही, झूठा जगत पतीजै जी। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. "भक्ति का सार" भीलकन्या जीवंती महाराज वृषपर्वा की प्रिय सेविका थी। जीवंती की भगवान में अटूट आस्था थी और वृषपर्वा भी इस बात को जानते थे। वह प्रभु-भक्ति में लीन रहते हुए निरन्तर अपने कर्तव्यपालन में रत रहती। एक दिन महाराज वृषपर्वा ने सोचा कि ऐसा भक्तिभाव रखने वाली नारी को दासता में रखना उचित नहीं और उन्होंने उसे मुक्त करने का निर्णय ले लिया। किन्तु उसे मुक्त करते समय वृषपर्वा के मन में खुशी के साथ-साथ किन्चित चिन्ता का भाव भी था। चिंन्ता यह कि अब उसकी जीविका कैसे चल पाएगी। ऐसा सोचते हुए उनके मन में विचार आया कि क्यों न इस पवित्र व्यक्तित्व को राजदरबार में राजगुरु का पद दे दिया जाए। यद्यपि ऐसा करना उनके लिए थोड़ा कठिन था, क्योंकि एक भीलकन्या को राजगुरु के पद पर प्रतिष्ठित होते देखना शायद राजदरबारियों को पसन्द नहीं आता। वृषपर्वा इन्हीं विचारों में खोए हुए थे, तभी जीवंती का स्वर उनके कानों में पड़ा–"आप क्या सोचने लगे महाराज ! मेरे जीवन की व्यवस्था के लिए आप व्यर्थ चिन्तित न हों। भगवान पर पूर्ण भरोसा ही तो भक्ति है। भक्त तो हमेशा यही भरोसा करता है कि जिसने जीवन दिया, क्या वह इतना न कर सकेगा कि उस जीवन को जीने के लिए समुचित व्यवस्था जुटा दे। मेरी अनुभूति यही कहती है कि भगवान अवश्य ही मुझे स्वीकार कर लेंगे। जो मेरे इस कथन पर भरोसा नहीं कर पाते, समझो कि उन्होंने कभी भगवान को पुकारा ही नहीं। कभी उन्होंने अपने आपको पूरा का पूरा उनके हाथ में सौंपा ही नहीं।" जीवंती की बातें महाराज वृषपर्वा के दिल को छू रही थीं। उसने आगे कहा–"भक्ति का मार्ग अति सुगम है, परन्तु उसका पहला कदम बड़ा ही कठिन है क्योंकि प्राय: सभी के मन में ऐसा ही बना रहता है कि हम अपने सूत्रधार स्वयं बने रहें। इसीलिए कई तपस्वियों का, सिद्धों, साधकों का अहंकार मरता नहीं। बस नए-नए रूप धारण कर लेता है। कल भोगी था, अब त्यागी हो जाता है। नए मुखौटे पहन लेता है। उनके मन से यह बात मिटती नहीं कि मैं कुछ करके रहूँगा। लेकिन भक्त तो सदा यही अनुभव करता है कि मैं ही झूठा भ्रम है। मैं हूँ ही कहाँ ? तू ही तो है तो तू ही कर !" जीवंती की ये बातें सुन महाराज वृषपर्वा को भक्ति का सार समझ में आया। ० ० ० "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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Rama Devi Sahu Jan 19, 2022

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' " सच्चा दोस्त " "एक दिन जंगल में सभी बड़े जानवरों ने मिलकर कुश्ती प्रतियोगिता करवाने का प्लान बनाया। जीतने वाले को इनाम दिया जाएगा, यह भी निर्णय लिया गया।" "तय हुआ कि पहले भालू और बघेरा कुश्ती के मैदान में आएंगे और हार-जीत का फैसला करेगा हाथी राजा।" "किन्नु गिलहरी बोली, “मैं भी कुश्ती लडंगी।” उसकी बात सुनकर सारे जानवर उसका मजाक उड़ाते हुए बोले, “तुम मक्खी से लड़ो कुश्ती।" "एक बोला, “बित्ता भर की जान, मगर देखो तो कैसे सबकी बराबरी करने की सोच रही है। यह क्या कर पाएगी?” यह सुनकर गिलहरी एक कोने में चुपचाप जाकर बैठ गई।" "तभी भालू की चीख सुनाई दी। सब उधर दौड़े। देखा कि कुश्ती लड़ते वक्त भालू का पैर एक मोटी रस्सी में फंस गया था। कोई भी उसकी मदद के लिए आगे नहीं आया।" "तभी गिलहरी दौड़ी हुई आई और उसने अपने तेज धारदार दांतों से रस्सी काट दी। भालू की जान में जान आई। तभी ईनाम देने की घोषणा हुई-: भालु आज का विजेता है। "भालु ने आगे बढ़कर ट्रॉफी ली और गिलहरी को देते हुए कहा, “विजेता मैं नहीं, किन्नू है, जिसने मेरी मदद की। सच्चा दोस्त वही होता है, जो मुसीबत में काम आए..!!" ----------:::×:::---------- " जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " **********************************************

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Mamta Chauhan Jan 19, 2022

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Shuchi Singhal Jan 19, 2022

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