. संक्षिप्त महाभारत-कथा पोस्ट–059 (वन पर्व) आज की कथा में:– द्वैतवन में पाण्डवों का निवास, मार्कण्डेय मुनि और दाल्भ्यबक का उपदेश तथा धर्मराज युधिष्ठिर और द्रौपदी का संवाद, क्षमा की प्रशंसा वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय! जब भगवान् श्रीकृष्ण आदि अपने-अपने स्थान के लिये रवाना हो गये तब प्रजापतियों के समान तेजस्वी पाण्डवों ने वेद वेदांगवेत्ता ब्राह्मणों को सोने की मुहरें, वस्त्र और गौएँ देकर रथ पर सवार हो अगले वन के लिये प्रस्थान किया। इन्द्रसेन सुभद्रा की दाइयों, दासियों और वस्त्राभूषणों को लेकर बीस सैनिकों के संरक्षण में रथ पर द्वारका के लिये रवाना हुआ। उस समय मनस्वी नागरिक धर्मराज युधिष्ठिर के पास आकर उनके बायें खड़े हो गये और उनमें से मुख्य-मुख्य ब्राह्मण प्रसन्नता के साथ धर्मराज से बातचीत करने लगे। पाण्डवगण झुंड-की-झुंड प्रजा को आयी देख खड़े हो गये और उनसे बात करने लगे। उस समय राजा और प्रजा दोनों ही आपस में पिता-पुत्र के समान व्यवहार कर रहे थे। सारी प्रजा कहने लगी–'हा स्वामी! हा धर्मराज! आप हम लोगों को अनाथ करके क्यों जा रहे हैं ? आप कुरुवंशियों में श्रेष्ठ और हमारे स्वामी हैं। आप इस देश तथा हम नागरिकों को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ? क्या पिता कभी अपनी संतान को इस प्रकार अनाथ करता है ? क्रूरबुद्धि दुर्योधन, शकुनि और कर्ण को धिक्कार है, जिन्होंने आप-जैसे धर्मात्मा महापुरुष को कपट-द्यूत के द्वारा छलकर दुःखी करना चाहा है। आप अपने बसाये हुए कैलास के समान चमकीले इन्द्रप्रस्थ को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ? आप हम लोगों को क्यों नहीं बतला जाते कि मयदानव द्वारा निर्मित सभा छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ?' प्रजा की बात सुनकर महापराक्रमी अर्जुन ने सारी प्रजा से ऊँचे स्वर में कहा–'उपस्थित नागरिको ! धर्मराज वन में निवास करने के बाद वह दिव्य सभा और शत्रुओं की कीर्ति छीन लेंगे। तुम लोग अपने धर्म के अनुसार अलग-अलग सत्पुरुषों की सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना, जिससे आगे चलकर हमारा काम बन जाय।' अर्जुन की बात सुनकर सब लोगों ने वैसा करना स्वीकार किया। उन लोगों ने युधिष्ठिर के बहुत कहने पर पाण्डवों को दाहिने करके खिन्नता के साथ अपने-अपने घर की यात्रा की। प्रजा के चले जाने पर सत्यप्रतिज्ञ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा–'हमें बारह वर्ष तक निर्जन वन में रहना है। इसलिये इस जंगल में जहाँ फूल-फल अधिक हों, स्थान रमणीय और सुखदायक हो, ऋषियों के पवित्र आश्रम हों, ऐसा प्रदेश ढूँढ़ लेना चाहिये।' अर्जुन ने धर्मराज का गुरु के समान सम्मान करके कहा–'आपने बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और महापुरुषों की सेवा की है। मनुष्य लोक की कोई भी वस्तु आपके लिये अज्ञात नहीं है। इसलिये आपकी जहाँ इच्छा हो, वहीं निवास करना चाहिये। भाईजी! अब जो वन पड़ेगा, उसका नाम द्वैतवन है। उसमें पवित्र जल से भरा एक सरोवर तो है ही, रंग-बिरंगे फूल भी खिल रहे हैं और आवश्यक फल भी रहते हैं। वह वन पक्षियों के कलरव से परिपूर्ण रहता है। मुझे तो इस वन में रहना अच्छा लगता है, परन्तु आपकी अनुमति हो तभी। आज्ञा कीजिये।' युधिष्ठिर ने कहा–'अर्जुन! मेरी भी यही सम्मति है। आओ, हम लोग द्वैतवन में चलें।' निश्चय हो जाने पर अग्निहोत्री, संन्यासी, स्वाध्यायशील भिक्षुक, वानप्रस्थ, तपस्वी, व्रती, महात्मा ब्राह्मणों के साथ धर्मात्मा पाण्डवों ने द्वैतवन में प्रवेश किया। वहाँ धर्मात्मा तपस्वी एवं पवित्र स्वभाव वाले आश्रमवासी धर्मराज के सामने आये। धर्मराज ने यथायोग्य सबका स्वागत-सत्कार किया। तदनन्तर एक फूलों से लदे कदम्ब-वृक्ष की छाया में आकर बैठ गये। भीमसेन, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल, सहदेव और उनके सेवकों ने रथों से नीचे उतरकर घोड़े खोल दिये और सब धर्मराज के पास आकर बैठ गये। वहाँ रहकर धर्मराज समस्त अतिथि अभ्यागत, ऋषि-मुनि और ब्राह्मणों को कन्द, मूल, फल से तृप्त करने लगे। बड़ी-बड़ी इष्टियाँ, श्राद्धकर्म, शान्तिक-पौष्टिक क्रियाएँ धौम्य पुरोहित के निर्देशानुसार होतीं। समृद्धिशाली पाण्डव इन्द्रप्रस्थ का राज्य छोड़कर द्वैतवन में रहने लगे। इन्हीं दिनों परम तेजस्वी महामुनि मार्कण्डेय पाण्डवों के आश्रम पर आये। महामनस्वी युधिष्ठिर ने देवता, ऋषि और मनुष्यों के पूजनीय मार्कण्डेयजी का विधि पूर्वक स्वागत-सत्कार किया। मार्कण्डेयजी महाराज वनवासी पाण्डव और द्रौपदी की ओर देखकर मुसकराने लगे। धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा–'माननीय ! अन्य सभी तपस्वी मुझे इस दशा में देखकर संकोच के मारे कुछ बोल नहीं पाते और आप मेरी ओर देखकर मुसकरा रहे हैं। इसका क्या अभिप्राय है ?' मार्कण्डेयजी ने कहा–'मैं तुम्हें इस दशा में देखकर प्रसन्नता से नहीं मुसकरा रहा हूँ। मुझे किसी बात का घमण्ड नहीं है। तुम लोगों को इस दशा में देखकर मुझे सत्यनिष्ठ दशरथ नन्दन भगवान् रामचन्द्र की स्मृति हो आयी है। उन्होंने पिता की आज्ञा से एकमात्र धनुष लेकर सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास किया था। उन्हें मैंने ऋष्यमूक पर्वत पर विचरते समय देखा था। भगवान् रामचन्द्र इन्द्र से भी बलवान्, यम को भी दण्ड देने की शक्ति रखने वाले, महामनस्वी तथा निर्दोष थे। फिर भी उन्होंने पिता की आज्ञा से वनवास स्वीकार करके अपने धर्म का पालन किया। यद्यपि उन्हें संग्राम में कोई भी जीत नहीं सकता था, फिर भी उन्होंने राजोचित भोगों का त्याग करके वनवास किया। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को 'मैं बड़ा बलवान् हूँ'–ऐसा समझकर अधर्म नहीं करना चाहिये। भारतवर्ष के बड़े-बड़े इतिहास प्रसिद्ध राजा नाभाग, भगीरथ आदि ने सत्य के बल पर ही पृथ्वी का शासन किया था। धर्मराज ! इस समय जगत्‌ में तुम्हारा यश और तेज देदीप्यमान हो रहा है। तुम्हारी धार्मिकता, सत्यनिष्ठा, सद्व्यवहार जगत् के समस्त प्राणियों से बढ़े-चढ़े हैं। तुम अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वनवास की तपस्या कर लेने के बाद अपनी तेजोमयी राजलक्ष्मी को कौरवों से छीन लोगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।' इस प्रकार कहकर महामुनि मार्कण्डेय पुरोहित धौम्य और पाण्डवों से अनुमति लेकर उत्तर दिशा की ओर चले गये। जबसे महात्मा पाण्डव द्वैतवन में आकर रहने लगे, तब से वह विशाल वन ब्राह्मणों से भर गया। उस वन में तथा सरोवर के आस-पास ऐसी वेदध्वनि होती थी, जिससे वह ब्रह्मलोक के समान जान पड़ता था। वह ध्वनि जो सुनता, उसी के हृदय में वह बस जाती। एक दिन दाल्भ्यबक मुनि ने संध्या के समय धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा–'राजन्! देखो, इस समय द्वैतवन के आश्रम में सब ओर तपस्वी ब्राह्मणों की यज्ञाग्नि प्रज्वलित हो रही है। भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य और अत्रि गोत्रके उत्तम-उत्तम तपस्वी ब्राह्मण इस पवित्र वन में इकट्ठे हुए हैं और तुम्हारे संरक्षण में सुख-सुविधा के साथ अपने-अपने धर्म का पालन कर रहे हैं। मैं तुम लोगों से मैं एक बात कहता हूँ, सावधानी के साथ सुनो। जब ब्राह्मण और क्षत्रिय मिल-जुलकर काम करते हैं, एक-दूसरे की सहायता करते हैं, तब उनकी उन्नति और अभिवृद्धि होती है। फिर तो वे अग्नि और पवन के समान हिल मिलकर शत्रुओं के वन के वन भस्म कर डालते हैं। बिना ब्राह्मण का आश्रय लिये दीर्घकाल तक सतत प्रयत्न करने पर भी किसी को इस लोक और परलोक की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में प्रवीण निर्लोभी ब्राह्मण का आश्रय लेकर ही राजा अपने शत्रुओं का नाश कर सकता है। राजा बलि को ब्राह्मणों की सहायता से ही उन्नति प्राप्त हुई थी। ब्राह्मण एक अनुपम दृष्टि और क्षत्रिय एक अनुपम बल है; ये दोनों जब साथ रहते हैं, तब जगत्‌ में सुख-समृद्धि की अभिवृद्धि होती है। इसलिये विद्वान् क्षत्रिय को चाहिये कि अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति और प्राप्त वस्तु की वृद्धि के लिये ब्राह्मणों की सेवा करके उनसे ज्ञान प्राप्त करे। युधिष्ठिर ! तुम तो सदा-सर्वदा ब्राह्मणों के साथ उत्तम व्यवहार करते ही हो। इसलिये लोक में तुम यशस्वी हो रहे हो।' धर्मराज युधिष्ठिर ने बड़ी प्रसन्नता के साथ दाल्भ्यबक मुनि के उपदेश का अभिनन्दन किया। महात्मा वेदव्यास, नारद, परशुराम, पृथुश्रवा, इन्द्रद्युम्न, भालुकि, हारीत, अग्निवेश्य आदि बहुत से व्रतधारी ब्राह्मणों ने दाल्भ्यबक और धर्मराज युधिष्ठिर का सम्मान किया। वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! एक दिन संध्या के समय वनवासी पाण्डव कुछ शोकग्रस्त से होकर द्रौपदी के साथ बैठकर बातचीत कर रहे थे। बातचीत के सिलसिले में द्रौपदी कहने लगी–'सचमुच दुर्योधन बड़ा क्रूर और दुरात्मा है। हम लोगों को दुःखी देखकर उसे तनिक भी तो दुःख नहीं होता। हरे, हरे ! उसने हम लोगों को मृगछाला ओढ़ाकर घोर जंगल में भेज दिया, परन्तु उसे रत्ती-भर भी पश्चात्ताप नहीं हुआ। अवश्य ही उसका हृदय फौलाद से बना होगा। एक तो उसने कपट-द्यूत में जीत लिया, फिर आप जैसे सरल और धर्मात्मा पुरुष को भरी सभा में कठोर वचन कहे और अब अपने मित्रों के साथ मौज उड़ा रहा है। जब मैं देखती हूँ कि आप लोग सुनहरी पलँग छोड़कर कुश-कास के बिछौनों पर सो रहे हैं, मुझे हाथी दाँत का सिंहासन याद आ जाता है और मैं रो पड़ती हूँ। बड़े-बड़े राजा आप लोगों को घेरे रहते थे, आप लोगों का शरीर चन्दन चर्चित होता था। आज आप अकेले मैले कुचैले जंगलों में भटक रहे हैं। मुझे भला, कैसे शान्ति मिल सकती है ? आपके महलों में प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को इच्छानुसार भोजन कराया जाता था और आज हम लोग फल-मूल खाकर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। मेरे प्यारे स्वामी भीमसेन को वनवासी और दुःखी देखकर आपके चित्त में क्रोध क्यों नहीं उमड़ता ? भीमसेन अकेले ही रणभूमि में सब कौरवों को मार डालने का उत्साह रखते हैं। परन्तु आपका रुख न देखकर मन मसोसकर रह जाते हैं। अर्जुन दो बाँह के होने पर भी हजार बाँहवाले कार्तवीर्य अर्जुन के समान बलशाली हैं। इन्हीं के अस्त्र-कौशल से चकित होकर बड़े-बड़े राजा आपके चरणों में प्रणाम और आपके यज्ञ में आकर ब्राह्मणों की सेवा करते थे। वही देवता और दानवों के पूजनीय पुरुषसिंह अर्जुन आज वनवासी हो रहे हैं। आपके चित्त में क्रोध का उदय क्यों नहीं होता ? साँवला रंग, विशाल शरीर, हाथों में ढाल-तलवार और वीरता में अप्रतिम ! ऐसे नकुल और सहदेव को वनवासी देखकर आप क्यों चुप हो रहे हैं। राजा द्रुपद की पुत्री, महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू, धृष्टद्युम्न की बहन और पाण्डवों की पतिव्रता पत्नी मैं आज वन-वन भटक रही हूँ ! आपकी सहन-शक्ति को धन्य है। ठीक है, आपमें क्रोध नहीं है। जिसमें क्रोध और तेज न हो, वह कैसा क्षत्रिय ? जो समय आने पर अपना तेज नहीं प्रकट कर सकता, सभी प्राणी उसका तिरस्कार करते हैं। शत्रुओं से क्षमा का नहीं, प्रताप के अनुरूप व्यवहार करना चाहिये।' द्रौपदी ने फिर कहा–'राजन् ! पहले जमाने में राजा बलि ने अपने पितामह प्रह्लाद से पूछा था–'पितामह! क्षमा उत्तम है या क्रोध ? आप कृपा करके मुझे ठीक-ठीक समझाइये।' प्रह्लादजी ने कहा–'क्षमा और क्रोध दोनों की एक व्यवस्था है। न सर्वदा क्रोध उचित है और न क्षमा। जो पुरुष सर्वदा क्षमा करते जाते हैं उनके सेवक, पुत्र, दास और उदासीन वृत्ति के पुरुष भी कटु वचन कहकर तिरस्कार करने लगते हैं, अवज्ञा करते हैं। धूर्त पुरुष क्षमाशील को दबाकर उसकी स्त्री को भी हड़पना चाहते हैं। स्त्रियाँ भी स्वेच्छानुसार बर्ताव करने लगतीं और पातिव्रत धर्म से भ्रष्ट होकर अपने पति का भी अपकार कर डालती हैं। इसके अतिरिक्त जो पुरुष कभी क्षमा नहीं करता, हमेशा क्रोध ही करता है, वह क्रोध के आवेश में आकर बिना विचार किये सबको दण्ड ही देने लगता है वह मित्रों का विरोधी और अपने कुटुम्ब का शत्रु हो जाता है। सब ओर से अपमानित होने के कारण उसके धन की हानि होने लगती है, दुत्कार मिलती है। उसके मन में संताप, ईर्ष्या और द्वेष बढ़ने लगते हैं। इससे उसके शत्रुओं की वृद्धि होती है। वह क्रोधवश अन्याय पूर्वक किसी को दण्ड दे बैठता है; इसके फलस्वरूप ऐश्वर्य, स्वजन और अपने प्राणों से भी उसे हाथ धोना पड़ता है। जो सबसे रोब-दाब के साथ ही मिलता है, उससे लोग डरने लगते हैं, उसकी भलाई करने से हाथ खींच लेते हैं और उसमें दोष देखकर चारों ओर फैला देते हैं। इसलिये न तो हमेशा उग्रता का बर्ताव करना चाहिये और न हमेशा सरलता का। समय के अनुसार उग्र और सरल बन जाना चाहिये। जो समय के अनुसार सरलता और उग्रता को धारण करता है, उसे इस लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति होती है। अब मैं तुम्हें क्षमा करने के अवसर बतलाता हूँ। यदि किसी मनुष्य ने पहले उपकार किया हो, फिर उससे कोई बड़ा अपराध बन जाय तो पहले के उपकार पर दृष्टि रखकर उसे क्षमा कर देना चाहिये। यदि कोई मनुष्य मूर्खतावश अपराध कर दे, तब भी क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि सब लोग सभी कामों में चतुर नहीं हो सकते। इसके विपरीत जो लोग जान-बूझकर अपराध करते हों और कहते हों कि हमने जान-बूझकर अपराध नहीं किया है, तो उन्हें थोड़ा अपराध करने पर भी पूरा दण्ड देना चाहिये। कुटिल पुरुषों को क्षमा नहीं करना चाहिये। एक बार का अपराध तो चाहे किसी का भी क्षमा कर देना चाहिये, परन्तु दूसरी बार दण्ड अवश्य देना चाहिये। मृदुलता से उग्र और कोमल दोनों प्रकार के पुरुष वश में किये जा सकते हैं। मृदुल पुरुष के लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। इसलिये मृदुलता ही श्रेष्ठ साधन है। अतः देश, काल, सामर्थ्य और कमजोरी पर पूरा पूरा विचार करके मृदुलता और उग्रता का व्यवहार करना चाहिये। कभी-कभी तो भय से भी क्षमा करनी पड़ती है। यदि कोई ऊपर कही बातों के प्रतिकूल बर्ताव करता हो तो उसे क्षमा न करके क्रोध से काम लेना चाहिये।' द्रौपदी ने आगे कहा–'राजन् ! धृतराष्ट्र के पुत्र अपराध-पर-अपराध करते जा रहे हैं। उनका लालच असीम है। मैं समझती हूँ कि अब उन पर क्रोध करने का समय आ गया है, आप उन्हें क्षमा न करके उन पर क्रोध कीजिये।' युधिष्ठिर ने कहा–'प्रिये ! मनुष्य को क्रोध के वश में न होकर क्रोध को अपने वश में करना चाहिये। जिसने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली, वह कल्याण-भाजन हो गया। क्रोध के कारण मनुष्यों का नाश होता प्रत्यक्ष दीखता है। मैं अवनति के हेतु क्रोध के वश में कैसे हो सकता हूँ? क्रोधी मनुष्य पाप करता है, गुरुजनों को मार डालता है, श्रेष्ठ पुरुष और कल्याणकारक वस्तुओं का भी कठोर वाणी से तिरस्कार करता है। फलतः विपत्ति में पड़ जाता है। क्रोधी मनुष्य यह नहीं समझ सकता कि क्या कहना चाहिये, क्या नहीं। जो मन में आया बक डालता है। उसे इस बात का भी पता नहीं चलता कि क्या करना चाहिये, क्या नहीं। जो चाहे कर डालता है। वह जिलाने योग्य को मार डालता है, मार डालने योग्य की पूजा करता है, और क्रोध के आवेश में आत्महत्या करके अपने आप को नरक में डाल देता हैं। क्रोध दोषों का घर है। बुद्धिमान् पुरुषों ने अपनी लौकिक उन्नति, पारलौकिक सुख और मुक्ति प्राप्त करने के लिये क्रोध पर विजय प्राप्त की है। क्रोध के दोष गिने नहीं जा सकते। इसी से, यही सब सोचने-विचारने से मेरे चित्त में क्रोध नहीं आता। जो मनुष्य क्रोध करने वाले पर भी क्रोध नहीं करता, क्षमा करता है, वह अपनी और क्रोध करने वाले की महासंकट से रक्षा करता है, वह दोनों का रोग दूर करने वाला चिकित्सक है। झूठ बोलने की अपेक्षा सच बोलना कल्याणकारी है। क्रूरता की अपेक्षा कोमलपना उत्तम है। क्रोध की अपेक्षा क्षमा ऊँची है। यदि दुर्योधन मुझे मार भी डाले तो भी मैं अनेकों दोषों से भरे और महात्माओं से परित्यक्त क्रोध को कैसे अपना सकता हूँ। मैंने यह निश्चय कर लिया है कि तत्त्वदर्शी पुरुष में, जिसे तेजस्वी कहते हैं, क्रोध होता ही नहीं। जो अपने क्रोध को ज्ञानदृष्टि से शान्त कर देते हैं, उन्हें ही तेजस्वी समझना चाहिये। क्रोधी मनुष्य जब अपने कर्तव्य को ही भूल जाता है, तब उसे कर्तव्य अथवा मर्यादा का ध्यान रह ही कैसे सकता है। क्रोधी पुरुष अवध्य प्राणियों को मार डालता है, गुरुजनों को मर्मभेदी वचन कहता है; इसलिये यदि अपने में तेज हो तो पहले क्रोध को ही अपने वश में करना चाहिये। काम करने की चतुराई, शत्रु पर विजय प्राप्त करने के उपाय का विचार, विजय प्राप्त करने की शक्ति और स्फूर्ति तेजस्वियों के गुण हैं। ये गुण क्रोधी मनुष्य में नहीं रह सकते। क्रोध के त्याग से ही इनकी प्राप्ति होती है। क्रोध रजोगुण का परिणाम होने के कारण मनुष्यों की मृत्यु है। इसलिये क्रोध छोड़कर शान्त हो जाना चाहिये। एक बार अपने धर्म से हट जाना भी अच्छा, परन्तु क्रोध करना अच्छा नहीं। मैं मूर्खो की बात नहीं कहता; समझदार मनुष्य भला, क्षमा का त्याग कैसे कर सकता है। मनुष्यों में यदि क्षमाशीलता न हो तो सब लोग आपस में लड़-झगड़कर मर मिटें। एक दुःखी दूसरे को दुःख दे, दण्ड देने वाले गुरुजनों पर भी प्रहार करने को उद्यत हो जायँ, तब तो कहीं धर्म रहे ही नहीं, प्राणियों का नाश हो जाय। ऐसी अवस्थामें क्या होगा ? गाली के बदले में गाली, मार के बदले में मार, तिरस्कार के बदले में तिरस्कार। पिता पुत्र को, पुत्र पिता को, पति पत्नी को और पत्नी पति को नष्ट कर डालें। कोई मर्यादा, कोई व्यवस्था, कोई सौहार्द न रहे। जो गाली देने पर भी, मारने पर भी क्षमा करता है, क्रोध को वश में करता है, वह उत्तम विद्वान् है। क्रोधी मूर्ख है, नरक का भागी है। इस सम्बन्ध में महात्मा काश्यप ने क्षमाशील पुरुषों के बीच में क्षमा की साधना का गीत गाया है–क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है, क्षमा स्वाध्याय है। जो मनुष्य क्षमा के इस सर्वोत्कृष्ट स्वरूप को जानता है, वह सब कुछ क्षमा कर सकता है। क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा ही भूत और भविष्यत् है, क्षमा तप है, क्षमा पवित्रता है, क्षमा ने ही इस जगत्‌ को धारण कर रखा है। याज्ञिकों को जो लोक मिलते हैं, उनसे भी ऊपर के लोक क्षमावानों को मिलते हैं। वेदज्ञों को, तपस्वियों को और कर्मनिष्ठों को दूसरे दूसरे लोक मिलते हैं; परन्तु क्षमावानों को ब्रह्मलोक के श्रेष्ठ लोक मिलते हैं। क्षमा तेजस्वियों का तेज है, तपस्वियों का ब्रह्म है और सत्यवानों का सत्य है। क्षमा ही लोकोपकार, क्षमा ही शान्ति है। क्षमा में ही सारे लोक, लोकोपकारक यज्ञ, सत्य और ब्रह्म प्रतिष्ठित हैं। ऐसी क्षमा को भला, मैं कैसे छोड़ सकता हूँ ? ज्ञानी पुरुष को सर्वदा क्षमा ही करना चाहिये। जब सब कुछ क्षमा कर देता है, तब वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है। क्षमावानों को यह लोक और परलोक दोनों तैयार हैं। यहाँ सम्मान और परलोक में शुभ गति। जिन्होंने क्षमा के द्वारा क्रोध को दबा दिया है, उन्हें परम गति प्राप्त हो गयी है। प्रिये ! महात्मा काश्यप ने क्षमा की महिमा इस प्रकार गायी है; इसे सुनकर तुम क्रोध छोड़ो और क्षमा का अवलम्बन करो। भगवान् श्रीकृष्ण, भीष्मपितामह, आचार्य धौम्य, मन्त्री विदुर, कृपाचार्य, संजय और महात्मा वेदव्यास भी क्षमा की ही प्रशंसा करते हैं। क्षमा और दया ही ज्ञानियों का सदाचार है, यही सनातन-धर्म है। मैं सच्चाई के साथ क्षमा और दया का पालन करूँगा। ~~~०~~~ – साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

.                       संक्षिप्त महाभारत-कथा

                                 पोस्ट–059

                                  (वन पर्व)

         आज की कथा में:– द्वैतवन में पाण्डवों का निवास, मार्कण्डेय मुनि और दाल्भ्यबक का उपदेश तथा धर्मराज युधिष्ठिर और द्रौपदी का संवाद, क्षमा की प्रशंसा

          वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय! जब भगवान् श्रीकृष्ण आदि अपने-अपने स्थान के लिये रवाना हो गये तब प्रजापतियों के समान तेजस्वी पाण्डवों ने वेद वेदांगवेत्ता ब्राह्मणों को सोने की मुहरें, वस्त्र और गौएँ देकर रथ पर सवार हो अगले वन के लिये प्रस्थान किया।
          इन्द्रसेन सुभद्रा की दाइयों, दासियों और वस्त्राभूषणों को लेकर बीस सैनिकों के संरक्षण में रथ पर द्वारका के लिये रवाना हुआ। उस समय मनस्वी नागरिक धर्मराज युधिष्ठिर के पास आकर उनके बायें खड़े हो गये और उनमें से मुख्य-मुख्य ब्राह्मण प्रसन्नता के साथ धर्मराज से बातचीत करने लगे।
          पाण्डवगण झुंड-की-झुंड प्रजा को आयी देख खड़े हो गये और उनसे बात करने लगे। उस समय राजा और प्रजा दोनों ही आपस में पिता-पुत्र के समान व्यवहार कर रहे थे।
          सारी प्रजा कहने लगी–'हा स्वामी! हा धर्मराज! आप हम लोगों को अनाथ करके क्यों जा रहे हैं ? आप कुरुवंशियों में श्रेष्ठ और हमारे स्वामी हैं। आप इस देश तथा हम नागरिकों को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ?
          क्या पिता कभी अपनी संतान को इस प्रकार अनाथ करता है ? क्रूरबुद्धि दुर्योधन, शकुनि और कर्ण को धिक्कार है, जिन्होंने आप-जैसे धर्मात्मा महापुरुष को कपट-द्यूत के द्वारा छलकर दुःखी करना चाहा है।
          आप अपने बसाये हुए कैलास के समान चमकीले इन्द्रप्रस्थ को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ? आप हम लोगों को क्यों नहीं बतला जाते कि मयदानव द्वारा निर्मित सभा छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ?'
          प्रजा की बात सुनकर महापराक्रमी अर्जुन ने सारी प्रजा से ऊँचे स्वर में कहा–'उपस्थित नागरिको ! धर्मराज वन में निवास करने के बाद वह दिव्य सभा और शत्रुओं की कीर्ति छीन लेंगे। तुम लोग अपने धर्म के अनुसार अलग-अलग सत्पुरुषों की सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना, जिससे आगे चलकर हमारा काम बन जाय।'
          अर्जुन की बात सुनकर सब लोगों ने वैसा करना स्वीकार किया। उन लोगों ने युधिष्ठिर के बहुत कहने पर पाण्डवों को दाहिने करके खिन्नता के साथ अपने-अपने घर की यात्रा की।
          प्रजा के चले जाने पर सत्यप्रतिज्ञ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा–'हमें बारह वर्ष तक निर्जन वन में रहना है। इसलिये इस जंगल में जहाँ फूल-फल अधिक हों, स्थान रमणीय और सुखदायक हो, ऋषियों के पवित्र आश्रम हों, ऐसा प्रदेश ढूँढ़ लेना चाहिये।'
          अर्जुन ने धर्मराज का गुरु के समान सम्मान करके कहा–'आपने बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और महापुरुषों की सेवा की है। मनुष्य लोक की कोई भी वस्तु आपके लिये अज्ञात नहीं है। इसलिये आपकी जहाँ इच्छा हो, वहीं निवास करना चाहिये।
          भाईजी! अब जो वन पड़ेगा, उसका नाम द्वैतवन है। उसमें पवित्र जल से भरा एक सरोवर तो है ही, रंग-बिरंगे फूल भी खिल रहे हैं और आवश्यक फल भी रहते हैं। वह वन पक्षियों के कलरव से परिपूर्ण रहता है। मुझे तो इस वन में रहना अच्छा लगता है, परन्तु आपकी अनुमति हो तभी। आज्ञा कीजिये।'
          युधिष्ठिर ने कहा–'अर्जुन! मेरी भी यही सम्मति है। आओ, हम लोग द्वैतवन में चलें।' निश्चय हो जाने पर अग्निहोत्री, संन्यासी, स्वाध्यायशील भिक्षुक, वानप्रस्थ, तपस्वी, व्रती, महात्मा ब्राह्मणों के साथ धर्मात्मा पाण्डवों ने द्वैतवन में प्रवेश किया।
          वहाँ धर्मात्मा तपस्वी एवं पवित्र स्वभाव वाले आश्रमवासी धर्मराज के सामने आये। धर्मराज ने यथायोग्य सबका स्वागत-सत्कार किया। तदनन्तर एक फूलों से लदे कदम्ब-वृक्ष की छाया में आकर बैठ गये।
          भीमसेन, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल, सहदेव और उनके सेवकों ने रथों से नीचे उतरकर घोड़े खोल दिये और सब धर्मराज के पास आकर बैठ गये। वहाँ रहकर धर्मराज समस्त अतिथि अभ्यागत, ऋषि-मुनि और ब्राह्मणों को कन्द, मूल, फल से तृप्त करने लगे।
          बड़ी-बड़ी इष्टियाँ, श्राद्धकर्म, शान्तिक-पौष्टिक क्रियाएँ धौम्य पुरोहित के निर्देशानुसार होतीं। समृद्धिशाली पाण्डव इन्द्रप्रस्थ का राज्य छोड़कर द्वैतवन में रहने लगे।
          इन्हीं दिनों परम तेजस्वी महामुनि मार्कण्डेय पाण्डवों के आश्रम पर आये। महामनस्वी युधिष्ठिर ने देवता, ऋषि और मनुष्यों के पूजनीय मार्कण्डेयजी का विधि पूर्वक स्वागत-सत्कार किया। मार्कण्डेयजी महाराज वनवासी पाण्डव और द्रौपदी की ओर देखकर मुसकराने लगे।
          धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा–'माननीय ! अन्य सभी तपस्वी मुझे इस दशा में देखकर संकोच के मारे कुछ बोल नहीं पाते और आप मेरी ओर देखकर मुसकरा रहे हैं। इसका क्या अभिप्राय है ?'
          मार्कण्डेयजी ने कहा–'मैं तुम्हें इस दशा में देखकर प्रसन्नता से नहीं मुसकरा रहा हूँ। मुझे किसी बात का घमण्ड नहीं है। तुम लोगों को इस दशा में देखकर मुझे सत्यनिष्ठ दशरथ नन्दन भगवान् रामचन्द्र की स्मृति हो आयी है।
          उन्होंने पिता की आज्ञा से एकमात्र धनुष लेकर सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास किया था। उन्हें मैंने ऋष्यमूक पर्वत पर विचरते समय देखा था।
          भगवान् रामचन्द्र इन्द्र से भी बलवान्, यम को भी दण्ड देने की शक्ति रखने वाले, महामनस्वी तथा निर्दोष थे। फिर भी उन्होंने पिता की आज्ञा से वनवास स्वीकार करके अपने धर्म का पालन किया।
          यद्यपि उन्हें संग्राम में कोई भी जीत नहीं सकता था, फिर भी उन्होंने राजोचित भोगों का त्याग करके वनवास किया। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को 'मैं बड़ा बलवान् हूँ'–ऐसा समझकर अधर्म नहीं करना चाहिये।
          भारतवर्ष के बड़े-बड़े इतिहास प्रसिद्ध राजा नाभाग, भगीरथ आदि ने सत्य के बल पर ही पृथ्वी का शासन किया था। धर्मराज ! इस समय जगत्‌ में तुम्हारा यश और तेज देदीप्यमान हो रहा है।
          तुम्हारी धार्मिकता, सत्यनिष्ठा, सद्व्यवहार जगत् के समस्त प्राणियों से बढ़े-चढ़े हैं। तुम अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वनवास की तपस्या कर लेने के बाद अपनी तेजोमयी राजलक्ष्मी को कौरवों से छीन लोगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।'
          इस प्रकार कहकर महामुनि मार्कण्डेय पुरोहित धौम्य और पाण्डवों से अनुमति लेकर उत्तर दिशा की ओर चले गये।
          जबसे महात्मा पाण्डव द्वैतवन में आकर रहने लगे, तब से वह विशाल वन ब्राह्मणों से भर गया। उस वन में तथा सरोवर के आस-पास ऐसी वेदध्वनि होती थी, जिससे वह ब्रह्मलोक के समान जान पड़ता था। वह ध्वनि जो सुनता, उसी के हृदय में वह बस जाती।
          एक दिन दाल्भ्यबक मुनि ने संध्या के समय धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा–'राजन्! देखो, इस समय द्वैतवन के आश्रम में सब ओर तपस्वी ब्राह्मणों की यज्ञाग्नि प्रज्वलित हो रही है। भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य और अत्रि गोत्रके उत्तम-उत्तम तपस्वी ब्राह्मण इस पवित्र वन में इकट्ठे हुए हैं और तुम्हारे संरक्षण में सुख-सुविधा के साथ अपने-अपने धर्म का पालन कर रहे हैं।
          मैं तुम लोगों से मैं एक बात कहता हूँ, सावधानी के साथ सुनो। जब ब्राह्मण और क्षत्रिय मिल-जुलकर काम करते हैं, एक-दूसरे की सहायता करते हैं, तब उनकी उन्नति और अभिवृद्धि होती है। फिर तो वे अग्नि और पवन के समान हिल मिलकर शत्रुओं के वन के वन भस्म कर डालते हैं।
          बिना ब्राह्मण का आश्रय लिये दीर्घकाल तक सतत प्रयत्न करने पर भी किसी को इस लोक और परलोक की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में प्रवीण निर्लोभी ब्राह्मण का आश्रय लेकर ही राजा अपने शत्रुओं का नाश कर सकता है।
          राजा बलि को ब्राह्मणों की सहायता से ही उन्नति प्राप्त हुई थी। ब्राह्मण एक अनुपम दृष्टि और क्षत्रिय एक अनुपम बल है; ये दोनों जब साथ रहते हैं, तब जगत्‌ में सुख-समृद्धि की अभिवृद्धि होती है। इसलिये विद्वान् क्षत्रिय को चाहिये कि अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति और प्राप्त वस्तु की वृद्धि के लिये ब्राह्मणों की सेवा करके उनसे ज्ञान प्राप्त करे।
          युधिष्ठिर ! तुम तो सदा-सर्वदा ब्राह्मणों के साथ उत्तम व्यवहार करते ही हो। इसलिये लोक में तुम यशस्वी हो रहे हो।'
          धर्मराज युधिष्ठिर ने बड़ी प्रसन्नता के साथ दाल्भ्यबक मुनि के उपदेश का अभिनन्दन किया। महात्मा वेदव्यास, नारद, परशुराम, पृथुश्रवा, इन्द्रद्युम्न, भालुकि, हारीत, अग्निवेश्य आदि बहुत से व्रतधारी ब्राह्मणों ने दाल्भ्यबक और धर्मराज युधिष्ठिर का सम्मान किया।
          वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! एक दिन संध्या के समय वनवासी पाण्डव कुछ शोकग्रस्त से होकर द्रौपदी के साथ बैठकर बातचीत कर रहे थे। बातचीत के सिलसिले में द्रौपदी कहने लगी–'सचमुच दुर्योधन बड़ा क्रूर और दुरात्मा है। हम लोगों को दुःखी देखकर उसे तनिक भी तो दुःख नहीं होता।
          हरे, हरे ! उसने हम लोगों को मृगछाला ओढ़ाकर घोर जंगल में भेज दिया, परन्तु उसे रत्ती-भर भी पश्चात्ताप नहीं हुआ। अवश्य ही उसका हृदय फौलाद से बना होगा।
          एक तो उसने कपट-द्यूत में जीत लिया, फिर आप जैसे सरल और धर्मात्मा पुरुष को भरी सभा में कठोर वचन कहे और अब अपने मित्रों के साथ मौज उड़ा रहा है। 
          जब मैं देखती हूँ कि आप लोग सुनहरी पलँग छोड़कर कुश-कास के बिछौनों पर सो रहे हैं, मुझे हाथी दाँत का सिंहासन याद आ जाता है और मैं रो पड़ती हूँ।
          बड़े-बड़े राजा आप लोगों को घेरे रहते थे, आप लोगों का शरीर चन्दन चर्चित होता था। आज आप अकेले मैले कुचैले जंगलों में भटक रहे हैं। मुझे भला, कैसे शान्ति मिल सकती है ?
          आपके महलों में प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को इच्छानुसार भोजन कराया जाता था और आज हम लोग फल-मूल खाकर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। मेरे प्यारे स्वामी भीमसेन को वनवासी और दुःखी देखकर आपके चित्त में क्रोध क्यों नहीं उमड़ता ?
          भीमसेन अकेले ही रणभूमि में सब कौरवों को मार डालने का उत्साह रखते हैं। परन्तु आपका रुख न देखकर मन मसोसकर रह जाते हैं। अर्जुन दो बाँह के होने पर भी हजार बाँहवाले कार्तवीर्य अर्जुन के समान बलशाली हैं।
          इन्हीं के अस्त्र-कौशल से चकित होकर बड़े-बड़े राजा आपके चरणों में प्रणाम और आपके यज्ञ में आकर ब्राह्मणों की सेवा करते थे। वही देवता और दानवों के पूजनीय पुरुषसिंह अर्जुन आज वनवासी हो रहे हैं। आपके चित्त में क्रोध का उदय क्यों नहीं होता ?
          साँवला रंग, विशाल शरीर, हाथों में ढाल-तलवार और वीरता में अप्रतिम ! ऐसे नकुल और सहदेव को वनवासी देखकर आप क्यों चुप हो रहे हैं।
          राजा द्रुपद की पुत्री, महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू, धृष्टद्युम्न की बहन और पाण्डवों की पतिव्रता पत्नी मैं आज वन-वन भटक रही हूँ ! आपकी सहन-शक्ति को धन्य है।
          ठीक है, आपमें क्रोध नहीं है। जिसमें क्रोध और तेज न हो, वह कैसा क्षत्रिय ? जो समय आने पर अपना तेज नहीं प्रकट कर सकता, सभी प्राणी उसका तिरस्कार करते हैं। शत्रुओं से क्षमा का नहीं, प्रताप के अनुरूप व्यवहार करना चाहिये।'
          द्रौपदी ने फिर कहा–'राजन् ! पहले जमाने में राजा बलि ने अपने पितामह प्रह्लाद से पूछा था–'पितामह! क्षमा उत्तम है या क्रोध ? आप कृपा करके मुझे ठीक-ठीक समझाइये।'
          प्रह्लादजी ने कहा–'क्षमा और क्रोध दोनों की एक व्यवस्था है। न सर्वदा क्रोध उचित है और न क्षमा। जो पुरुष सर्वदा क्षमा करते जाते हैं उनके सेवक, पुत्र, दास और उदासीन वृत्ति के पुरुष भी कटु वचन कहकर तिरस्कार करने लगते हैं, अवज्ञा करते हैं।
          धूर्त पुरुष क्षमाशील को दबाकर उसकी स्त्री को भी हड़पना चाहते हैं। स्त्रियाँ भी स्वेच्छानुसार बर्ताव करने लगतीं और पातिव्रत धर्म से भ्रष्ट होकर अपने पति का भी अपकार कर डालती हैं।
          इसके अतिरिक्त जो पुरुष कभी क्षमा नहीं करता, हमेशा क्रोध ही करता है, वह क्रोध के आवेश में आकर बिना विचार किये सबको दण्ड ही देने लगता है वह मित्रों का विरोधी और अपने कुटुम्ब का शत्रु हो जाता है।
          सब ओर से अपमानित होने के कारण उसके धन की हानि होने लगती है, दुत्कार मिलती है। उसके मन में संताप, ईर्ष्या और द्वेष बढ़ने लगते हैं। इससे उसके शत्रुओं की वृद्धि होती है। वह क्रोधवश अन्याय पूर्वक किसी को दण्ड दे बैठता है; इसके फलस्वरूप ऐश्वर्य, स्वजन और अपने प्राणों से भी उसे हाथ धोना पड़ता है।
          जो सबसे रोब-दाब के साथ ही मिलता है, उससे लोग डरने लगते हैं, उसकी भलाई करने से हाथ खींच लेते हैं और उसमें दोष देखकर चारों ओर फैला देते हैं। इसलिये न तो हमेशा उग्रता का बर्ताव करना चाहिये और न हमेशा सरलता का।
          समय के अनुसार उग्र और सरल बन जाना चाहिये। जो समय के अनुसार सरलता और उग्रता को धारण करता है, उसे इस लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति होती है। अब मैं तुम्हें क्षमा करने के अवसर बतलाता हूँ।
          यदि किसी मनुष्य ने पहले उपकार किया हो, फिर उससे कोई बड़ा अपराध बन जाय तो पहले के उपकार पर दृष्टि रखकर उसे क्षमा कर देना चाहिये।
          यदि कोई मनुष्य मूर्खतावश अपराध कर दे, तब भी क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि सब लोग सभी कामों में चतुर नहीं हो सकते। इसके विपरीत जो लोग जान-बूझकर अपराध करते हों और कहते हों कि हमने जान-बूझकर अपराध नहीं किया है, तो उन्हें थोड़ा अपराध करने पर भी पूरा दण्ड देना चाहिये। कुटिल पुरुषों को क्षमा नहीं करना चाहिये।
          एक बार का अपराध तो चाहे किसी का भी क्षमा कर देना चाहिये, परन्तु दूसरी बार दण्ड अवश्य देना चाहिये। मृदुलता से उग्र और कोमल दोनों प्रकार के पुरुष वश में किये जा सकते हैं।
          मृदुल पुरुष के लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। इसलिये मृदुलता ही श्रेष्ठ साधन है। अतः देश, काल, सामर्थ्य और कमजोरी पर पूरा पूरा विचार करके मृदुलता और उग्रता का व्यवहार करना चाहिये।
          कभी-कभी तो भय से भी क्षमा करनी पड़ती है। यदि कोई ऊपर कही बातों के प्रतिकूल बर्ताव करता हो तो उसे क्षमा न करके क्रोध से काम लेना चाहिये।'
          द्रौपदी ने आगे कहा–'राजन् ! धृतराष्ट्र के पुत्र अपराध-पर-अपराध करते जा रहे हैं। उनका लालच असीम है। मैं समझती हूँ कि अब उन पर क्रोध करने का समय आ गया है, आप उन्हें क्षमा न करके उन पर क्रोध कीजिये।'
          युधिष्ठिर ने कहा–'प्रिये ! मनुष्य को क्रोध के वश में न होकर क्रोध को अपने वश में करना चाहिये। जिसने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली, वह कल्याण-भाजन हो गया।
          क्रोध के कारण मनुष्यों का नाश होता प्रत्यक्ष दीखता है। मैं अवनति के हेतु क्रोध के वश में कैसे हो सकता हूँ? क्रोधी मनुष्य पाप करता है, गुरुजनों को मार डालता है, श्रेष्ठ पुरुष और कल्याणकारक वस्तुओं का भी कठोर वाणी से तिरस्कार करता है। फलतः विपत्ति में पड़ जाता है।
          क्रोधी मनुष्य यह नहीं समझ सकता कि क्या कहना चाहिये, क्या नहीं। जो मन में आया बक डालता है। उसे इस बात का भी पता नहीं चलता कि क्या करना चाहिये, क्या नहीं। जो चाहे कर डालता है।
          वह जिलाने योग्य को मार डालता है, मार डालने योग्य की पूजा करता है, और क्रोध के आवेश में आत्महत्या करके अपने आप को नरक में डाल देता हैं। क्रोध दोषों का घर है।
          बुद्धिमान् पुरुषों ने अपनी लौकिक उन्नति, पारलौकिक सुख और मुक्ति प्राप्त करने के लिये क्रोध पर विजय प्राप्त की है। क्रोध के दोष गिने नहीं जा सकते। इसी से, यही सब सोचने-विचारने से मेरे चित्त में क्रोध नहीं आता।
          जो मनुष्य क्रोध करने वाले पर भी क्रोध नहीं करता, क्षमा करता है, वह अपनी और क्रोध करने वाले की महासंकट से रक्षा करता है, वह दोनों का रोग दूर करने वाला चिकित्सक है।
          झूठ बोलने की अपेक्षा सच बोलना कल्याणकारी है। क्रूरता की अपेक्षा कोमलपना उत्तम है। क्रोध की अपेक्षा क्षमा ऊँची है। यदि दुर्योधन मुझे मार भी डाले तो भी मैं अनेकों दोषों से भरे और महात्माओं से परित्यक्त क्रोध को कैसे अपना सकता हूँ।
          मैंने यह निश्चय कर लिया है कि तत्त्वदर्शी पुरुष में, जिसे तेजस्वी कहते हैं, क्रोध होता ही नहीं। जो अपने क्रोध को ज्ञानदृष्टि से शान्त कर देते हैं, उन्हें ही तेजस्वी समझना चाहिये।
          क्रोधी मनुष्य जब अपने कर्तव्य को ही भूल जाता है, तब उसे कर्तव्य अथवा मर्यादा का ध्यान रह ही कैसे सकता है। क्रोधी पुरुष अवध्य प्राणियों को मार डालता है, गुरुजनों को मर्मभेदी वचन कहता है; इसलिये यदि अपने में तेज हो तो पहले क्रोध को ही अपने वश में करना चाहिये।
          काम करने की चतुराई, शत्रु पर विजय प्राप्त करने के उपाय का विचार, विजय प्राप्त करने की शक्ति और स्फूर्ति तेजस्वियों के गुण हैं। ये गुण क्रोधी मनुष्य में नहीं रह सकते। क्रोध के त्याग से ही इनकी प्राप्ति होती है।
          क्रोध रजोगुण का परिणाम होने के कारण मनुष्यों की मृत्यु है। इसलिये क्रोध छोड़कर शान्त हो जाना चाहिये। एक बार अपने धर्म से हट जाना भी अच्छा, परन्तु क्रोध करना अच्छा नहीं।
          मैं मूर्खो की बात नहीं कहता; समझदार मनुष्य भला, क्षमा का त्याग कैसे कर सकता है। मनुष्यों में यदि क्षमाशीलता न हो तो सब लोग आपस में लड़-झगड़कर मर मिटें। एक दुःखी दूसरे को दुःख दे, दण्ड देने वाले गुरुजनों पर भी प्रहार करने को उद्यत हो जायँ, तब तो कहीं धर्म रहे ही नहीं, प्राणियों का नाश हो जाय। ऐसी अवस्थामें क्या होगा ?
          गाली के बदले में गाली, मार के बदले में मार, तिरस्कार के बदले में तिरस्कार। पिता पुत्र को, पुत्र पिता को, पति पत्नी को और पत्नी पति को नष्ट कर डालें। कोई मर्यादा, कोई व्यवस्था, कोई सौहार्द न रहे।
          जो गाली देने पर भी, मारने पर भी क्षमा करता है, क्रोध को वश में करता है, वह उत्तम विद्वान् है। क्रोधी मूर्ख है, नरक का भागी है। इस सम्बन्ध में महात्मा काश्यप ने क्षमाशील पुरुषों के बीच में क्षमा की साधना का गीत गाया है–क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है, क्षमा स्वाध्याय है।
          जो मनुष्य क्षमा के इस सर्वोत्कृष्ट स्वरूप को जानता है, वह सब कुछ क्षमा कर सकता है। क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा ही भूत और भविष्यत् है, क्षमा तप है, क्षमा पवित्रता है, क्षमा ने ही इस जगत्‌ को धारण कर रखा है।
          याज्ञिकों को जो लोक मिलते हैं, उनसे भी ऊपर के लोक क्षमावानों को मिलते हैं। वेदज्ञों को, तपस्वियों को और कर्मनिष्ठों को दूसरे दूसरे लोक मिलते हैं; परन्तु क्षमावानों को ब्रह्मलोक के श्रेष्ठ लोक मिलते हैं।
          क्षमा तेजस्वियों का तेज है, तपस्वियों का ब्रह्म है और सत्यवानों का सत्य है। क्षमा ही लोकोपकार, क्षमा ही शान्ति है। क्षमा में ही सारे लोक, लोकोपकारक यज्ञ, सत्य और ब्रह्म प्रतिष्ठित हैं। ऐसी क्षमा को भला, मैं कैसे छोड़ सकता हूँ ?
          ज्ञानी पुरुष को सर्वदा क्षमा ही करना चाहिये। जब सब कुछ क्षमा कर देता है, तब वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है। क्षमावानों को यह लोक और परलोक दोनों तैयार हैं। यहाँ सम्मान और परलोक में शुभ गति। जिन्होंने क्षमा के द्वारा क्रोध को दबा दिया है, उन्हें परम गति प्राप्त हो गयी है।
          प्रिये ! महात्मा काश्यप ने क्षमा की महिमा इस प्रकार गायी है; इसे सुनकर तुम क्रोध छोड़ो और क्षमा का अवलम्बन करो।
          भगवान् श्रीकृष्ण, भीष्मपितामह, आचार्य धौम्य, मन्त्री विदुर, कृपाचार्य, संजय और महात्मा वेदव्यास भी क्षमा की ही प्रशंसा करते हैं। क्षमा और दया ही ज्ञानियों का सदाचार है, यही सनातन-धर्म है। मैं सच्चाई के साथ क्षमा और दया का पालन करूँगा।
                              ~~~०~~~
                                   – साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर)

                   ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः
                       " कुमार रौनक कश्यप "
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🌷JK🌷 Jul 30, 2022

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Kanta Jul 30, 2022

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