Nupur Bala Sharma
Nupur Bala Sharma Nov 24, 2021

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संस्कृत में हनुमान चालीसा 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ श्री गुरु चरण सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि । बरनऊं रघुवर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ।। बुद्धि हीन तनु जानिकै सुमिरौं पवनकुमार । बल बुद्धि विद्या देहु मोहि हरहु क्लेश विकार ।। हृद्दर्पणं नीरजपादयोश्च गुरोः पवित्रं रजसेति कृत्वा । फलप्रदायी यदयं च सर्वम् रामस्य पूतञ्च यशो वदामि ।। स्मरामि तुभ्यम् पवनस्य पुत्रम् बलेन रिक्तो मतिहीनदासः । दूरीकरोतु सकलं च दुःखम् विद्यां बलं बुद्धिमपि प्रयच्छ ।। जय हनुमान ज्ञान गुण सागर जय कपीस तिहुं लोक उजागर । जयतु हनुमद्देवो ज्ञानाब्धिश्च गुणागरः । जयतु वानरेशश्च त्रिषु लोकेषु कीर्तिमान् ।।( 1) रामदूत अतुलित बलधामा अंजनि पुत्र पवनसुत नामा । दूतः कोशलराजस्य शक्तिमांश्च न तत्समः । अञ्जना जननी यस्य देवो वायुः पिता स्वयम्।।(2) महावीर विक्रम बजरंगी कुमति निवार सुमति के संगी। हे वज्रांग महावीर त्वमेव च सुविक्रमः। कुत्सितबुद्धिशत्रुस्त्वम् सुबुद्धेः प्रतिपालकः।।(3) कंचन बरन बिराज सुबेसा कानन कुण्डल कुंचित केसा । काञ्चनवर्णसंयुक्तः वासांसि शोभनानि च । कर्णयोः कुण्डले शुभ्रे कुञ्चितानि कचानि च ।।(4) हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै कांधे मूंज जनेऊ साजे । वज्रहस्ती महावीरः ध्वजायुक्तस्तथैव च। स्कन्धे च शोभते यस्य मुञ्जोपवीतशोभनम्।।(5) संकर सुवन केसरी नन्दन तेज प्रताप महाजगबन्दन । नेत्रत्रयस्य पुत्रस्त्वं केशरीनन्दनः खलु । तेजस्वी त्वं यशस्ते च वन्द्यते पृथिवीतले।।(6) विद्यावान गुनी अति चातुर राम काज करिबै को आतुर । विद्यावांश्च गुणागारः कुशलोऽपि कपीश्वरः। रामस्य कार्यसिद्ध्यर्थम् उत्सुको सर्वदैव च ।।(7) प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया राम लखन सीता मन बसिया । राघवेन्द्रचरित्रस्य रसज्ञः सः प्रतापवान् । वसन्ति हृदये तस्य सीता रामश्च लक्ष्मणः।।(8) सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा विकट रूप धरि लंक जरावा । वैदेही सम्मुखे तेन प्रदर्शितस्तनुः लघुः। लंका दग्धा कपीशेन विकटरूपधारिणा । (9) भीम रूप धरि असुर संहारे रामचन्द्र के काज संवारे । हताः रूपेण भीमेन सकलाः रजनीचराः। कार्याणि कोशलेन्द्रस्य सफलीकृतवान् कपिः।।(10) लाय सजीवन लखन जियाये श्री रघुवीर हरषि उर लाए । जीवितो लक्ष्मणस्तेन खल्वानीयौषधम् तथा । रामेण हर्षितो भूत्वा वेष्टितो हृदयेन सः।।(11) रघुपति कीन्ही बहुत बडाई तुम मम प्रिय भरत सम भाई । प्राशंसत् मनसा रामः कपीशं बलपुंगवम्। प्रियं समं मदर्थं त्वम् कैकेयीनन्दनेन च।।(12) सहस बदन तुम्हरो जस गावैं अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं । यशो मुखैः सहस्रैश्च गीयते तव वानर । हनुमन्तं परिष्वज्य प्रोक्तवान् रघुनन्दनः।।(13) सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा नारद सारद सहित अहीसा। सनकादिसमाः सर्वे देवाः ब्रह्मादयोऽपि च । भारतीसहितः शेषो देवर्षिः नारदः खलु।।(14) जम कुबेर दिगपाल जहां ते कबि कोबिद कहि सकहि कहां ते। कुबेरो यमराजश्च दिक्पालाः सकलाः स्वयम् । पण्डिताः कवयः सर्वे शक्ताः न कीर्तिमण्डने।।(15) तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा राम मिलाय राज पद दीन्हा। उपकृतश्च सुग्रीवो वायुपुत्रेण धीमता। वानराणामधीपोऽभूद् रामस्य कृपया हि सः।।(16) तुम्हरो मन्त्र विभीषण माना लंकेश्वर भए सब जग जाना । तवैव चोपदेशेन दशवक्त्रसहोदरः । प्राप्नोति नृपत्वं सः जानाति सकलं जगत्।।(17) जुग सहस्र जोजन पर भानू लील्यो ताहि मधुर फल जानू। योजनानां सहस्राणि दूरे भुवः स्थितो रविः । सुमधुरं फलं मत्वा निगीर्णः भवता पुनः।।18) प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं जलधि लांघि गए अचरज नाहिं। मुद्रिकां कोशलेन्द्रस्य मुखे जग्राह वानरः । गतवानब्धिपारं सः नैतद् विस्मयकारकम् ।।(19) दुर्गम काज जगत के जेते सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते। यानि कानि च विश्वस्य कार्याणि दुष्कराणि हि । भवद्कृपाप्रसादेन सुकराणि पुनः खलु ।।20) राम दुआरे तुम रखवारे होत न आज्ञा बिनु पैसारे। द्वारे च कोशलेशस्य रक्षको वायुनन्दनः। तवानुज्ञां विना कोऽपि न प्रवेशितुमर्हति।।(21) सब सुख लहै तुम्हारी सरना तुम रक्षक काहु को डरना । लभन्ते शरणं प्राप्ताः सर्वाण्येव सुखानि च। भवति रक्षके लोके भयं मनाग् न जायते।।(22) आपन तेज सम्हारो आपे तीनो लोक हांक ते कांपै । समर्थो न च संसारे वेगं रोद्धुं बली खलु । कम्पन्ते च त्रयो लोकाः गर्जनेन तव प्रभो ।।(23) भूत पिसाच निकट नहिं आवै महाबीर जब नाम सुनावै। श्रुत्वा नाम महावीरं वायुपुत्रस्य धीमतः। भूतादयः पिशाचाश्च पलायन्ते हि दूरतः।।(24) नासै रोग हरै सब पीरा जो समिरै हनुमत बलबीरा। हनुमन्तं कपीशं च ध्यायन्ति सततं हि ये। नश्यन्ति व्याधयः तेषां पीडाः दूरीभवन्ति च।।(25) संकट ते हनुमान छुडावै मन क्रम बचन ध्यान जो लावै। मनसा कर्मणा वाचा ध्यायन्ति हि ये जनाः। दुःखानि च प्रणश्यन्ति हनुमन्तम् पुनः पुनः।।26) सब पर राम तपस्वी राजा तिनके काज सकल तुम साजा । नृपाणाञ्च नृपो रामः तपस्वी रघुनन्दनः । तेषामपि च कार्याणि सिद्धानि भवता खलु।।(27) और मनोरथ जो कोई लावै सोई अमित जीवन फल पावै। कामान्यन्यानि च सर्वाणि कश्चिदपि करोति यः। प्राप्नोति फलमिष्टं सः जीवने नात्र संशयः।।(28) चारो जुग परताप तुम्हारा है प्रसिद्ध जगत उजियारा । कृतादिषु च सर्वेषु युगेषु सः प्रतापवान् । यशः कीर्तिश्च सर्वत्र दोदीप्यते महीतले ।।(29) साधु सन्त के तुम रखवारे असुर निकन्दन राम दुलारे। साधूनां खलु सन्तानां रक्षयिता कपीश्वरः। असुराणाञ्च संहर्ता रामस्य प्रियवानर ।।(30) अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता अस वर दीन जानकी माता । सिद्धिदो निधिदः त्वञ्च जनकनन्दिनी स्वयम् । दत्तवती वरं तुभ्यं जननी विश्वरूपिणी ।।(31) राम रसायन तुम्हरे पासा सदा रहो रघुपति के दासा । कराग्रे वायुपुत्रस्य चौषधिः रामरूपिणी । रामस्य कोशलेशस्य पादारविन्दवन्दनात् ।।(32) तुम्हरे भजन राम को पावै जन्म जन्म के दुख बिसरावै । पूजया मारुतपुत्रस्य नरः प्राप्नोति राघवम् । जन्मनां कोटिसंख्यानां दूरीभवन्ति पातकाः।।(33) अन्त काल रघुवर पुर जाई जहां जन्म हरिभक्त कहाई । देहान्ते च पुरं रामं भक्ताः हनुमतः सदा। प्राप्य जन्मनि सर्वे हरिभक्ताः पुनः पुनः ।।(34) और देवता चित्त न धरई हनुमत सेइ सर्व सुख करई । देवानामपि सर्वेषां संस्मरणं वृथा खलु। कपिश्रेष्ठस्य सेवा हि प्रददाति सुखं परम् ।।(35) संकट कटै मिटै सब पीरा जो सुमिरै हनुमत बलबीरा। करोति संकटं दूरं संकटमोचनः कपिः। नाशयति च दुःखानि केवलं स्मरणं कपेः।।(36) जय जय हनुमान गोसाईं कृपा करहु गुरुदेव की नाईं । जयतु वानरेशश्च जयतु हनुमद् प्रभुः। गुरुदेवकृपातुल्यम् करोतु मम मंगलम् ।।(37) जो सत बार पाठ कर कोई छूटहि बन्दि महासुख होई। श्रद्धया येन केनापि शतवारं च पठ्यते। मुच्यते बन्धनाच्छीघ्रम् प्राप्नोति परमं सुखम्।।(38) जो यह पढै हनुमान चालीसा होय सिद्धि साखी गौरीसा। स्तोत्रं तु रामदूतस्य चत्वारिंशच्च संख्यकम्। पठित्वा सिद्धिमाप्नोति साक्षी कामरिपुः स्वयम् ।।39) तुलसीदास सदा हरि चेरा कीजै नाथ हृदय मँह डेरा। सर्वदा रघुनाथस्य तुलसी सेवकः परम्। (सर्वदा रघुनाथस्य रवीन्द्रः सेवकः परम्) विज्ञायेति कपिश्रेष्ठ वासं मे हृदये कुरु ।।(40) पवनतनय संकट हरन मंगल मूरति रूप । राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ।। विघ्नोपनाशी पवनस्य पुत्रः कल्याणकारी हृदये कपीश । सौमित्रिणा राघवसीतया च सार्धं निवासं कुरु रामदूत ।। देवदत्तो गुरुर्यस्य मार्कण्डेयश्च गोत्रकम्। अनुवादः कृतस्तेन कृपया पितृपादयोः।।। टंकण अशुद्धि के लिए क्षमा जय श्री राम 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

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#हनुमान_चालीसा की रचना कैसे हुई,,...🍂🍂🍂🍂 यह कहानी नहीं, अपितु एक सत्य कथा है, अधिकांश लोग अपरिचित है इस कथा से,...🍂🍂🍂🍂 पवनपुत्र श्रीहनुमानजी की आराधना तो सभी लोग करते हैं और हनुमान चालीसा का पाठ भी करते हैं, पर इसकी रचना कहां और कैसे हुई यह जानकारी बहुत ही कम लोगों को होगी। बात 1600 ईसवी की है, अकबर और तुलसीदास जी के समय का काल था। एक बार गोस्वामी तुलसीदासजी मथुरा जा रहे थे, रात होने से पहले उन्होंने अपना पडाव आगरा में डाला, लोगों को पता लगा कि तुलसीदासजी आगरा में पधारे हैं। यह सुनकर उनके दर्शनों के लिए लोगों का ताँता लग गया। जब यह बात बादशाह अकबर को पता लगी तो उन्होंने वीरबल से पूछा कि यह तुलसीदासजी कौन हैं.....❓❓ तब वीरबल ने बताया, इन्होंने ही श्रीरामचरितमानस की रचना की है, यह रामभक्त तुलसीदास जी है। मैं भी इनके दर्शन करके आया हूँ।अकबर ने भी उनके दर्शन की इच्छा व्यक्त की और कहा में भी उनके दर्शन करना चाहता हूँ। बादशाह अकबर ने अपने सिपाहियों की एक टुकड़ी को तुलसीदासजी के पास भेजा, जिन्होंने तुलसीदासजी को बादशाह का पैगाम सुनाया, कि आप लाल किले में हाजिर हों। यह पैगाम सुनकर तुलसीदासजी ने कहा कि मैं भगवान श्रीराम का भक्त हूँ, मुझे बादशाह और लाल किले से क्या लेना देना और लाल किले में जाने से साफ मना कर दिया। जब यह बात बादशाह अकबर तक पहुँची तो उन्हें बहुत बुरा लगा और बादशाह अकबर गुस्से में लाल हो गया, और उन्होंने तुलसीदास जी को जंज़ीरों से जकड़बा कर लाल किला लाने का आदेश दिया, जब तुलसीदास जी जंजीरों से जकड़े लाल किला पहुंचे तो अकबर ने कहा की आप कोई करिश्माई व्यक्ति लगते हो, कोई करिश्मा करके दिखाओ। तुलसीदासजी ने कहा मैं तो सिर्फ भगवान श्रीराम जी का भक्त हूँ, कोई जादूगर नही हूँ जो आपको कोई करिश्मा दिखा सकूँ। यह सुनकर अकबर आग बबूला हो गया और आदेश दिया की इनको जंजीरों से जकड़ कर काल कोठरी में डाल दिया जाये। दूसरे दिन इसी आगरा के लाल किले पर लाखो बंदरो ने एक साथ हमला बोल दिया, पूरा किला तहस-नहस कर डाला, किले में त्राहि-त्राहि मच गई, तब अकबर ने वीरबल को बुलाकर पूंछा कि वीरबल यह क्या हो रहा है....❓❓ वीरबल ने कहा- हुज़ूर आप करिश्मा देखना चाहते थे तो देखिये। अकबर ने तुलसीदासजी को यथाशीघ्र काल कोठरी से निकल वाया और जंजीरें खोल दी गई। तुलसीदास जी ने वीरबल से कहा मुझे बिना अपराध के सजा मिली है। मैंने काल कोठरी में भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण किया, रोता जा रहा था और मेरे हाथ अपने आप कुछ लिख रहे थे, यह 40 चौपाई, हनुमान जी की प्रेरणा से लिखी गई हैं। जो भी व्यक्ति कष्ट में या संकट में होगा और इनका पाठ करेगा ,उसके कष्ट और सारे संकट दूर होंगे, इसे हनुमान चालीसा के नाम से जाना जायेगा। अकबर बहुत लज्जित हुए और तुलसीदासजी से माफ़ी मांगी , पूर्णतः सम्मान और पूरी हिफाजत, लाव लश्कर से मथुरा भिजवाया था । आज हनुमान चालीसा का पाठ सभी लोग कर रहे हैं और हनुमानजी की कृपा उन सभी पर हो रही है। सभी के संकट दूर हो रहे हैं। हनुमानजी को इसीलिए "संकट मोचन" भी कहा जाता है। आप सबका भी कल्याण हो, यही शुभेच्छा है । संकट मोचन आपके सारे संकट दूर करें, जय श्री राम,.....🌹🌹

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parveensharma27731 Nov 23, 2021

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Runa Sinha Nov 23, 2021

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Renu Singh Nov 23, 2021

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ILA SINHA Nov 23, 2021

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prakash patel Nov 25, 2021

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