Bindu Singh
Bindu Singh Aug 6, 2022

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कामेंट्स

gajendra Singh kaviya Aug 6, 2022
radhe radhe good morning have a nice day my sweet sis 🌹🌷🌹🌹🌹 aap sada khush raho my pyari bena 🌹🌹🌹🌹🌹 happy Sunday 🍡🍡🌼🍒🌸🥝🫒

H.R.Garg Aug 6, 2022
🙏🌹Jai shree Radhe Krishna shubh prabhat vandan ji 🌹🙏

Bhagat Ram Aug 7, 2022
🌹🌹 जय श्री कृष्णा राधे राधे जी 🙏🙏🌿🌺💐🌹🌹 सुप्रभात वंदन जी 🙏🙏🌿🌺💐🌹🌹

🌷JK🌷 Aug 7, 2022
🙏om surya devay namaha🙏 Have a nice day Good morning ji 🌹🌹🙏🌹🌹

🥀 Preeti Jain 🥀 Aug 7, 2022
🚩🌞 Om surye devah namah 👌👌✍️surye dev ji ka kripa sada aap aur aap ke family 🥀pe bana 🥀rahe aap ka har pal shub aur mangalmay 🥀ho shubh prabhat ji 🙏 jai 🥀jinendra 🙏 om shanti aane wala har 🥀ek pal aap ke liye bahut sari🥀 khushi lekar aaye ji 🙏🙏🌹☕ pyari sistar ji

🇮🇳🇮🇳 संजू 🇮🇳🇮🇳 Aug 7, 2022
जय श्री राधे कृष्णा 🙏 सुप्रभात आपका दिन मंगलमय हो 🙏 भगवान शिव आपको खुश और स्वस्थ रखें 🙏

Kanta Aug 7, 2022
jai Surya dav namah 🌹🙏🌹

Gd Bansal Aug 7, 2022
🙏💐।। ॐ श्री सूर्यदेवाय नमः ।।💐🙏

Harsha Rathod Jul 28, 2022

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Rajput Indra Jul 30, 2022

🙏 समर्पण 🙏 एक बार नारद जी ने द्वारकाधीश से पूछा- "प्रभु! क्या कारण है की सर्वत्र संसार में राधे-राधे हो रहा है। आपकी महापटरानी 'रुकमणी' और अन्य रानियों को तो ब्रज तक में कोई याद नहीं करता।" कृष्ण यह सुनकर नारद के सामने ही पलंग पर धड़ाम से गिर गए। घबराए हुए नारद ने पूछा- क्या हुआ प्रभु ! तब श्री कृष्ण ने कहा- नारद मेरे सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है,तुम कुछ करो। नारद को आश्चर्य हुआ। वे बोले- कि आप त्रिलोकीनाथ हो, आप ही बताओ मैं क्या कर सकता हूं? कृष्ण बोले -"मेरे किसी सच्चे भक्त के पास जाकर,उसके चरणों की रज लेकर आओ, उसे मेरे मस्तक पर लेप करूंगा, तो दर्द ठीक हो जाएगा।" नारद जी असमंजस में वहां से दौड़े और सबसे पहले रुक्मणी के पास जाकर, उन्हें अपने चरणों की धूलि देने को कहा। रुक्मणी ने अपने पांव पीछे खींच लिए। वे बोली कि, "यह आप क्या कर रहे हो ? कृष्ण मेरे पति हैं, मेरे चरणों की रज यदि उनके माथे पर लगी, तो मुझे नर्क में जाना पड़ेगा!" यही जवाब अन्य रानियों ने भी दिया। नारद निराश हो गए और तुरंत मन की गति से राधा जी के पास पहुंच कर, उन्हें सारी बात बतलाई। राधा अत्यंत व्याकुल हो गई और नारद से पूछा -मेरे प्रभु को सर में दर्द हुए कितनी देर हो गई ? नारद ने बतलाया कि, यही कोई दो घंटे हुआ है। इस पर राधा नारद जी पर नाराज हो गई। उन्होंने कहा- "मेरे प्रियतम को दो घंटे से जो वेदना हो रही है, उसके लिए आप ही जिम्मेवार हो। आप मेरे चरणों की रज लेने तुरंत ही क्यों नहीं आए। अभी जितनी ले जाना हो, ले जाओ। उसके बदले में मुझे, एक बार तो क्या, हजार बार भी नरक जाना पड़े,तो स्वीकार है।" राधा की चरण रज लेकर नारद कृष्ण के पास पहुंचे । कृष्ण ने उस रज का अपने मस्तक पर लेप किया और सिर दर्द ठीक हो गया। कृष्णजी ने नारद से पूछा- "कुछ समझ में आया कि, सर्वत्र राधे-राधे क्यों हो रहा है?" नारद बोले कि, हां समझ में आ गया प्रभु! "और यह भी समझ में आया कि, आप जिससे प्रेम करते हो, उसे एक क्षण भी तकलीफ में नहीं देख सकते। चाहे उसके बदले में आपको कैसा भी त्याग क्यों ना करना पड़े।" यही सच्चा प्रेम है। समर्पण लेने की बात नहीं सोचता, केवल देने की सोचता है,केवल देने की।।

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.98 : सिमटी दृष्टि से देखो* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 98)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* *प्यारे लोगो!* मन की चंचलता में संसार है और मन की निश्चलता में परमात्मा है। मन चंचल होता है, विषयों के अवलम्ब से। जैसे भौंरा एक फूल से दूसरे फूल पर जाता है सुगंधि के लिए; क्योंकि बगीचे में विविध प्रकार के फूल रहा करते हैं। जहाँ एक-ही-एक फूल हो और फूल नहीं हो, वहाँ भौंरा एक ही फूल पर रहेगा। इसी प्रकार *रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द; इन पंच विषयों पर मन दौड़ता रहता है।* यदि इन पंच विषयों को हटा दीजिए तो संसार क्या रहता है? जो आँख से देखा जाय, वह रूप है, जो कान से ग्रहण हो वह शब्द है, जो जिभ्या से ग्रहण हो वह रस है, जो त्वचा से ग्रहण हो वह स्पर्श है तथा जो नासिका से ग्रहण हो वह गन्ध है। इन पाँचो को हटा दो तो संसार नहीं रहेगा। इन्हीं पाँचों में विविध प्रकार हैं। एक ही शब्द में छत्तीस प्रकार हैं। तीस राग और छह रागिनी। इसी प्रकार दृश्य कितने प्रकार के हैं, ठिकाना नहीं। इन्हीं सब विषयों की ओर मन दौड़ता रहता है। *मन केवल एक ही विषय पर नहीं दौड़ता। जहाँ एक विषय है, वहाँ दूसरा विषय भी है। एक विषय दूसरे विषय का साथी है। इन सब विषयों में मन जब किसी एक विषय पर रहता है तो अन्य विषयों पर भी दौड़ता है।* दूसरी बात यह कि घर में बहुत चीजें हैं, सबको निकाल दीजिए तो केवल शून्य बच जाता है। मन बिना किसी एक पर रहे नहीं मानता। मन से पंच विषयों को हटा दीजिए तो संसार नहीं बचता, तब परमात्मा बचता है। *ईश्वर में मन को लगाना चाहे तो पंच-विषयों से मन को हटा लीजिए।* परमात्मा की ओर हो जाएगा। ईश्वर की भक्ति यही है कि निर्विषय की ओर मन जाए। *ध्यान करना भक्ति है।* मन को निर्विषय करना ध्यान है। ‘ध्यानं निर्विषयं मनः।‘ संसार को पंच-विषयमय कहते हैं, तीन को छोड़ देने पर दो रहने पर भी संसार है नाम और रूप। शब्द और दृश्य। शब्द और दृश्य चले गए तो संसार भी चला गया। नाम और रूप संसार है। *संसार-मुख नहीं, ईश्वर-मुख होना है।* संसार को नहीं, ईश्वर को पकड़ना है। नाम और रूप छूट जायँ, तो ईश्वर को पाओगे। शब्द बहुत-से हैं और रूप भी बहुतसे हैं। ये कैसे छूटे? तो *किसी एक शब्द को जपो और सब शब्दों को छोड़ दो, यही गुरु-मंत्र है।* इसी तरह रूप भी बहुत हैं तो एक रूप को लो और सब रूपों को छोड़ दो। *जो रूप गुरु ने दिखाया है, उस रूप पर आसक्त होकर उसमें लगे रहो। अब नाम-रूप में सिमटाव हो गया।* केवल एक ही नाम और एक ही रूप है, फिर भी संसार मौजूद है। एक नाम और एक रूप में जो मन रहा तो स्थूल नाम रूप में रहा। एक ही नाम रूप में रहते-रहते मन का इतना सिमटाव हुआ कि एक पर रह सकता है। जैसे राम कहो, वाह गुरु कहो अथवा ओ३म् कहो, इसमें भी विस्तार है। बिल्कुल विस्तार सिमटाव में आ जाय, ऐसा कौन रूप है? जो रूप सब रूपों का बीज है, वही एक रूप है जिसमें विस्तार नहीं है। *जब वर्णात्मक नाम को जपते हैं तो उसका सिमटाव नाद में होता है।* नाम का सिमटाव नाद में और रूप का सिमटाव विन्दु में होता है। इसलिए विन्दु में सिमटाव होने से स्थूल से सूक्ष्म में चले आए। नाम-रूप छूटे नहीं हैं। भगवान, तो क्या छूट सकते। वे तो सर्वगत हैं। विन्दु रूप भी हरि का है। अणोरणीयाम् रूप का वर्णन भी श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने किया है। विन्दु रूप भगवान का ज्योर्तिमय रूप है। यह इस दृष्टि से देखा नहीं जाता। दृष्टियोग-अभ्यास से प्राप्त होता है। वह दिव्य दृष्टि है। फैली दृष्टि से नहीं सिमटी दृष्टि से देखिए। ऐसा सिमटाव हो, ऐसा निशाना कि जिसका निशान हो कि केवल वही रहे। अर्जुन, भीष्म, कर्ण सबका ऐसा निशान था। दृष्टि समेटने के लिए बाहर मत देखो, अंदर देखो। *फैली दृष्टि से नहीं, सिमटी दृष्टि से देखो।* इसी तरह अणोरणीयाम् रूप भगवान का दर्शन होता है। फिर भी सूक्ष्म जगत रहता है। इस दर्शन से भी ऊपर उठना होगा। विराटरूप जगतरूप है। जगतरूप से ऊपर उठने के लिए अरूपी को लेना होगा। इसलिए नाद लेना पड़ेगा। नाद अरूप है। जहाँ मन का पूर्ण सिमटाव होता है, वहीं नाद का उदय होता है। विन्दु पर मन का पूर्ण सिमटाव होता है, वहीं नाद मिलता है। इसीलिए ध्यानविन्दूपनिषद् में कहा है - *बीजाक्षरं परम विन्दुं नादं तस्योपरिस्थितम्। सशब्दं चाक्षरे क्षीणे निःशब्दं परमं पदम्।।* शब्द में भी जबतक विविधता है, तबतक संसार है और तबतक परमात्मा का दर्शन नहीं होता है। जब अक्षर ब्रह्म में शब्द लय हो जाता है, वहीं परमात्मा का दर्शन होता है। शून्य के बिना सगुण शब्द नहीं होता। शून्य से सगुण शब्द की उत्पत्ति है और वहीं लय भी होता है। उसी प्रकार ईश्वर से निर्गुण शब्द का उदय होता है और वह शब्द फिर ईश्वर में जाकर लय हो जाता है। तब वहीं 'नि:शब्दं परमं पदम्' है। ‘एक अनीह अरूप अनामा' ही ‘नि:शब्दं परमं पदम्' है। *मन की स्थिरता में भक्ति है, मन की चंचलता में भक्ति नहीं है।* नाम-रूप के द्वारा इसको टप कर ईश्वर को प्राप्त करो। यही भक्ति है। यह प्रवचन मुंगेर जिलान्तर्गत श्रीसंतमत सत्संग मंदिर फुलवड़िया में दिनांक 31.10.1954 ईo के सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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*।।ॐ श्री सद्गुरवे नमः।।* *महर्षि मेँहीँ अमृत-कलश, 1.97 : एहि तें मैं हरि ज्ञान गँवायो* *(साभार – सत्संग-सुधा सागर, 97)* *बन्दौं गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नररूप हरि। महामोह तमपुंज, जासु वचन रविकर निकर।।* प्यारे लोगो! आपलोगों को संसार की वस्तुओं में से कुछ-न-कुछ अवश्य प्राप्त है। किंतु इन वस्तुओं से आप अपने को कैसा समझते हैं, मालूम है। सांसारिक वस्तुओं में से अधिक या कम जो कुछ भी प्राप्त है, इसमें संतुष्टि नहीं आती है। *जहाँ संतुष्टि नहीं है, वहाँ सुख-शान्ति नहीं है।* यह खोज अवश्य चाहिए कि जिसको पाकर पूरी संतुष्टि हो जाए, वह क्या है? इसके लिए संसार में कोई खोजे तो संसार के सभी पदार्थ इन्द्रियों के द्वारा जानते हैं। रूप को आँख से, शब्द को कान से आदि; इन सब पंच विषयों से विशेष कुछ संसार में नहीं है। यदि है भी तो आप कैसे जान सकते हैं। इसलिए संत महात्मा कहते हैं कि जिसमें पूरी संतुष्टि है, वह पूरी संतुष्टि देनेवाला पदार्थ परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उस परमात्मा की खोज करो। इसका कारण है कि परमात्मा पूर्ण हैं और इन्द्रियाँ अपूर्ण शक्तिवाली हैं। अपूर्ण शक्तिवाली इन्द्रियों से पूर्ण सुख-शान्ति को कैसे प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए पूर्ण परमात्मा को खोजो। वह परमात्मा कहाँ है, स्वरूपतः वह क्या है? इसका पता लगाओ। मुख्तसर में है कि जो इन्द्रियों से अगोचर है, आत्मगम्य है, वह वही है। वह सर्वत्र है। कहीं से भी खाली नहीं है। बाहर-भीतर एक रस सब में है। ‘बाहरि भीतर एको जानहु इहु गुर गिआन बताई।' (गुरु नानक साहब) इसलिए उसकी खोज करो। जो वस्तु आपके घर में हो और दूसरे के घर में भी हो तो उसे लेने की सुगमता कहाँ होगी? अपने घर में या दूसरे घर में? अपने घर की वस्तुओं को लेने में ही सुगम है। दूसरी बात है कि इन्द्रियों से विषयों का बाहर में ज्ञान होता है, किंतु परमात्मा इन्द्रिय-ज्ञान द्वारा जाना नहीं जाता। तब फिर उसे बाहर में इन्द्रियों से खोजकर कैसे प्राप्त कर सकते हैं। संत कबीर साहब ने कहा है - ‘परमातम गुरु निकट विराजै जागु जागु मन मेरे।‘ परमात्मा अपने अंदर में अत्यंत निकट है। यह शरीर कब गुजर जाएगा, ठिकाना नहीं। भजन करने का अवसर निकल जाता है, पीछे पछतावा होती है। इसलिए इसके छूटने के पहले से ही भजन करो। परमात्मा को ढूढ़ने में विलम्ब मत करो। *काल्ह करै सो आज कर, आज करै सो अब। पल में परलै होयगा, बहुरि करैगा कब।। - संत कबीर साहब* इसलिए जल्दी खोज करनी चाहिए। फिर कहा – *जुगन जुगन तोहि सोवत बीते, अजहुँ न जाग सबेरे। - संत कबीर साहब* *माया मुख जागे सभै, सो सूता कर जान। दरिया जागे ब्रह्म दिसि, सो जागा परमान। - संत दरिया साहब* गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज का कहना है – *मोह निशा सब सोवनिहारा। देखिअ सपन अनेक प्रकारा।।* जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति; ये तीनों अवस्थाएँ सबको प्रतिदिन हुआ करती हैं। यह कैसे होता है? जागने के समय में एक स्थान में, स्वप्न में दूसरे स्थान में, सुषुप्ति में तीसरे स्थान में जीव रहता है। *स्थान-भेद से अवस्था-भेद और अवस्था-भेद से ज्ञान-भेद होता है।* अभी आप जगे हुए हैं, किंतु साधु-संत इस जगना को भी जगना नहीं कहते हैं। तीन अवस्थाओं से ऊपर तुरीय अवस्था में अपने को ले जाओ तब जगना है। ‘तीन अवस्था तजहु भजहु भगवन्त।' जबतक तुरीय में जीव नहीं जाता है, तबतक जगना नहीं है। केवल विचार में जान लेने से जगना नहीं है, जगना तब होता है, जब चौथी अवस्था में जाओ। इसके लिए गुरु से यत्न जानो। गुरु यत्न बता भी दे और यत्न जाननेवाला अभ्यास नहीं करे तो वहाँ कैसे पहुँच सकता है? *जितने पदार्थों में हमारी आसक्ति होती है, वहाँ-वहाँ हम लसकते हैं। इस लसकाव से अपने को विचार द्वारा छुड़ाओ और अंतर-अभ्यास द्वारा उस लसकाव के संबंध को ढीला करो।* तुरीय का मैदान भी बहुत लम्बा है। इसमें बढ़ने पर आसक्ति छूटती जाती है। साधु-संत लोग ईश्वर की खोज अपने अंदर करने कहते हैं। गुरु नानकदेव ने भी कहा है - *काहे रे वन खोजन जाई। सरब निवासी सदा अलेपा, तोही संग समाई।। पुहुप मधि जिउ बासु बस्तु है, मुकुर माहिं जैसे छाई। तैसे ही हरि बसे निरंतर, घटही खोजहु भाई।। बाहरि भीतरि एको जानहु, इहु गुर गिआन बताई। जन नानक बिनु आपा चीनै, मिटै न भ्रम की काई।।* गोस्वामी तुलसीदासजी को भी अपने अन्दर में ईश्वर की प्राप्ति हुई। वे कहते हैं – *एहि ते मैं हरिज्ञान गँवायो। परिहरि हृदय कमल रघुनाथहिं, बाहर फिरत विकल भयधायो।। ज्यों कुरंग निज अंग रुचिर मद, अति मतिहीन मरम नहिं पायो। खोजत गिरि तरु लता भूमि बिल, परम सुगंध कहाँ ते आयो।। ज्यों सर विमल वारि परिपूरन, ऊपर कछु सेंवार तृन छायो। जारत हियो ताहि तजिहौं सठ, चाहत यहि विधि तृषा बुझायो।। व्यापित त्रिविध ताप तन दारुण, तापर दुसह दरिद्र सतायो। अपने धाम नाम सुरतरु तजि, विषय बबूर बाग मन लायो।। तुम्ह सम ज्ञाननिधान मोहि सम, मूढ़ न आन पुरानन्हि गायो। तुलसिदास प्रभु यह विचारि जिय, कीजै नाथ उचित मन भायो।।* लोग ग्रंथों को पढ़-पढ़कर व्याख्यानों को सुन-सुनकर ईश्वर का ज्ञान समझते हैं। किंतु यह ज्ञान पूर्ण नहीं है। पूर्ण ज्ञान प्रत्यक्षता में है। गोस्वामी तुलसीदासजी अपने लिए कहते हैं – *ज्यों सर विमल वारि परिपूरन, ऊपर कछु सँवार तृन छायो। जारत हियो ताहि तजिहौं सठ, चाहत यहि विधि तृषा बुझायो।।* सूरदासजी महाराज भी यही कहते हैं – *अपुनपौ आपुन ही में पायो। शब्दहिं शब्द भयो उजियारो, सतगुरु भेद बतायो। ज्यों कुरंग नाभि कस्तुरी, ढूँढ़त फिरत भुलायो। फिर चेत्यो जब चेतन ह्वै करि, आपुन ही तनु छायो।। राज कुँआर कण्ठे मणि भूषण, भ्रम भयो कह्यो गँवायो। दियो बताइ और सत जन तब, तनु को पाप नशायो। सपने माहिं नारि को भ्रम भयो, बालक कहुँ हिरायो। जागि लख्यो ज्यों को त्यों ही है, ना कहूँ गयो न आयो।। सूरदास समुझै की यह गति, मन ही मन मुसुकायो। कहि न जाय या सुख की महिमा, ज्यों गूँगो गुर खायो।।* गोस्वामी तुलसीदासजी की तरह सूरदासजी भी मृगा की उपमा देते हैं। फिर ये एक माई की उपमा देते हैं कि जैसे कोई माई अपने बच्चे को साथ में लेकर सो गई और स्वप्न में देखती है कि बच्चा खो गया। किंतु जगने पर उसे अपने नजदीक ही मिलता है। उसी तरह माया में सोया हुआ प्राणी को ईश्वर खोया हुआ मालूम होता है, किंतु ईश्वर उसके नजदीक में ही है। पलटू साहब भी कहते हैं - *बैरागिन भूली आप में जल में खोजै राम।। जल में खोजै राम जाय के तीरथ छानै। भरमै चारिउ खूँट नहीं सुधि अपनी आनै।। फूल माहिं ज्यों बास काठ में अगिन छिपानी। खोदे बिनु नहिं मिलै अहै धरती में पानी।। दूध मँहै घृत रहै छिपी मिंहदी में लाली। ऐसे पूरन ब्रह्म कहूँ तिल भरि नहिं खाली।। पलटू सत्संग बीच में करि ले अपना काम। बैरागिन भूली आप में जल में खोजै राम।।* हमलोगों का यह संतमत-सत्संग है। संतमत वह है, जो सब संतों की राय है। यह ज्ञान कि ईश्वर अपने अंदर है, अपने अंदर उसकी खोज करो यही सब संतों की राय है। लोग ईश्वर की खोज में दूर-दूर तक हैरान न हों, उसकी खोज अपने अंदर में करें। इसलिए संतों का सत्संग है। शरीर से जैसे मनुष्य है, उसी प्रकार ज्ञान से भी मनुष्य होना चाहिए। *जब बाहर के विषयों को छोड़कर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है, तब वह पूरा मनुष्य होता है।* इसलिए हमलोगों को चाहिए कि पूरा मनुष्य बनें और सारे क्लेशों से दूर हो जाएँ। *त्रैकाल संध्या अवश्य करनी चाहिए।* ब्राह्ममुहूर्त में उठकर मुँह-हाथ धोकर, दिन में स्नान के बाद और फिर सायंकाल; तीनों काल संध्या करो। यह कितने पूर्व से है ठिकाना नहीं। हमारे मुसलमान भाइयों के लिए पंचबख्ती नमाज है। बहुत मुसलमान भाई करते हैं, वे बहुत अच्छा करते हैं। जो नहीं करते हैं, वे ठीक नहीं करते हैं, पाप करते हैं। उसी तरह *हमारे भारतीय वैदिक धर्मावलम्बी को भी त्रैकाल संध्या करनी चाहिए। जो नहीं करते हैं, वे ठीक नहीं करते, पाप करते हैं।* अपने अंदर में परमात्मा की खोज होनी चाहिए। मन्दिरों में जो दर्शन होता है, वह अपूर्ण है। इच्छा रह ही जाती है कि प्रत्यक्ष दर्शन होता। इसलिए अपने अंदर में खोजिए। यह प्रवचन रोहतास जिलान्तर्गत श्रीसंतमत सत्संग मंदिर डेहरी ऑन सोन में दिनांक 18.10.1954 ईo के सत्संग में हुआ था। *श्री सद्गुरु महाराज की जय*

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