Seemma Valluvar
Seemma Valluvar Oct 17, 2021

।। श्रीमत्कुंजबिहारिणे नमः।। 🚩ठकुरानी का अमृत वरदान🙏 🙏🌹 राधा रानी की जय 🌹🙏 किशोरी जू अपनी सभी सखियों के यहाँ बारी-बारी खेलने जाती थी। तुंगविधा ने अपने गाँव मैं गुड्डे-गुड़िया का विवाह कराया। राधा रानी और ललिता जू अपने अपने गुड्डा और गुड़िया को लेकर डवारा गाँव, जो कि तुंगविधा जी का गाँव है, वहाँ पहुँची। कीरत मैया भी लाडली जू के संग गयी। : किशोरी जू ने बारात के लिये मिट्टी के पकवान बनाये और फिर सब विवाह की रस्मे कराने लगी। इतने मैं वहाँ दुर्वासा ऋषि आ पहुँचे, इनके संग इनके दस हजार शिष्यों की मण्डली भी साथ चलती थी। छोटी-छोटी ब्रजगोपीयो को खेलता देख बाबा बोले: लाली, हमें बरसाने को मार्ग बताओगी। : ललिता जू बोली बाबा जी बरसाने जायके काह करेगो, दुर्वाषा जी बोले हमें बृषभानू जी के यहां जानो है। हमारो पूरो शिष्य परिकर हमारे संग है, भूख लगी है बहुत जोर की.. ललिता जू घबरा गयी, सीधी कीरत मैया के पास पहुँची! मैया, ओ मैया.. एक बाबा जी आयो है, अपने दस हजार शिष्यन के संग.. और बरसाने को मार्ग पूछ रह्यो है, बाबा सौ मिलनो है.. सबकू भोजन करनो है। कीरत मैया समझ गयी की ये जरूर दुर्वासा ऋषि है, आज तो यह निश्चित श्राप दे देंगे, क्योंकि मैं यहाँ हूँ और बाबा भी बरसाने ते बाहर हैं..!! : मैया बोली मोये दिखाय के ला कौन सो बाबा जी है। मैया नोवारी चोवारी पर पहुँची, जहाँ किशोरी जू सब सखियों के संग मिलके खेल रही थी। मैया ने देखा कि लाडली जू दुर्वासा ऋषि से बात कर रही हैं। बाबा तुम्हे हमारे बाबा सौ मिलनो है का..!! बेटी तू बृषभानू जी की पुत्री है क्या.. हाँ बाबा, मैं बृषभानू जू की बेटी राधा हूँ। : दुर्वासा किशोरी जू के दर्शन कर जड़ हो गये लाडली जू ने हिलाया बाबा सो गयो का हमारे बाबा सौ का काम है आपकू.. : दुर्वाषा जी बोले बेटी मोये और मेरे शिष्यों को भूख लगी है, राजा बृषभानू ही हमें भोजन करा सकते हैं। अच्छो इतनी सी बात है, बाबा तू नहाय के आ प्रसाद तैयार मिलेगो, बाबा नहाने चले गये कीरत मैया ओट से निकली, अरी.. राधा तेने जे का व्यथा बोय दयी। लाली ई तो बडो क्रोधी बाबा जी है, नेक-नेक बात पे क्रोधित हे जाय और श्राप दे दे, अब तू इतने लोगन कू भोजन कैसे तैयार करेगी..!! : किशोरी जू सब सखियों से बोली चलो री सब माटी इकट्टी करो ओर माटी गुलाय के मोये दो, सब सखियाँ मिट्टी गलाने लगी। किशोरी जू ने मिट्टी की पूडी, मिट्टी की सब्जी, मिट्टी की मिठाई तैयार कर दी। दुर्वासा आये मिट्टी की वस्तु देख बड़े ही क्रोधित हुऐ। : अरी छोरी, तू हमसे मजाक कर रही है, ये क्या मिट्टी की सामग्री बनाई है.. प्रिया जी बोली बाबाजी काहे कु हल्ला कर रह्यो हो काह खवोगे ईमरती ....ले मिट्टी की ईमारती रख दी औऱ जैसे ही दुर्वासा जी ने मिट्टी की ईमरती मुँह में रखी..... दुनिया का स्वाद भूल गये औऱ काह ख़वोगे...रसगुल्ला ले आह हा उस मिट्टी के रसगुल्ले के रस के आगे सब दुनिया के सब रस फ़िके बाबा औऱ सब शिष्यो ने जीवन मे ऐसा भोजन किया औऱ आशिर्वाद दिया....किशोरी जी को.... जो वृषभानु नंदनी की रसोई पायेगा वो त्रिलोक विजयी हो जायेगा... यशोदा मैंया को जब यह पता चला तो मैंया ने ठाकुर जी के लिए किशोरी जु के हाथों से रसोई बनवाईं तो महाराज ये ठाकुर जी तो बल भी हमारी किशोरीजु का लिए फ़िरते है औऱ नाम अपना करते हैं🙏 श्री राधा श्री राधा श्री राधा

।। श्रीमत्कुंजबिहारिणे नमः।। 
     🚩ठकुरानी का अमृत वरदान🙏
🙏🌹 राधा रानी की जय 🌹🙏
किशोरी जू अपनी सभी सखियों के यहाँ बारी-बारी खेलने जाती थी।
    तुंगविधा ने अपने गाँव मैं गुड्डे-गुड़िया का विवाह कराया। 
 राधा रानी और ललिता जू अपने अपने गुड्डा और गुड़िया को लेकर डवारा गाँव, जो कि तुंगविधा जी का गाँव है, वहाँ पहुँची।
 कीरत मैया भी लाडली जू के संग गयी।
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किशोरी जू ने बारात के लिये मिट्टी के पकवान बनाये और फिर सब विवाह की रस्मे कराने लगी। 
    इतने मैं वहाँ दुर्वासा ऋषि आ पहुँचे, इनके संग इनके दस हजार शिष्यों की मण्डली भी साथ चलती थी। छोटी-छोटी ब्रजगोपीयो को खेलता देख बाबा बोले: लाली, हमें बरसाने को मार्ग बताओगी।
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ललिता जू बोली बाबा जी बरसाने जायके काह करेगो, दुर्वाषा जी बोले हमें बृषभानू जी के यहां जानो है। 
    हमारो पूरो शिष्य परिकर हमारे संग है, भूख लगी है बहुत जोर की..
ललिता जू घबरा गयी, सीधी कीरत मैया के पास पहुँची! मैया, ओ मैया..

एक बाबा जी आयो है, अपने दस हजार शिष्यन के संग.. और बरसाने को मार्ग पूछ रह्यो है, बाबा सौ मिलनो है.. सबकू भोजन करनो है। 
   कीरत मैया समझ गयी की ये जरूर दुर्वासा ऋषि है, आज तो यह निश्चित श्राप दे देंगे, क्योंकि मैं यहाँ हूँ और बाबा भी बरसाने ते बाहर हैं..!!
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मैया बोली मोये दिखाय के ला कौन सो बाबा जी है। 
   मैया नोवारी चोवारी पर पहुँची, जहाँ किशोरी जू सब सखियों के संग मिलके खेल रही थी।
     मैया ने देखा कि लाडली जू दुर्वासा ऋषि से बात कर रही हैं।

बाबा तुम्हे हमारे बाबा सौ मिलनो है का..!!
बेटी तू बृषभानू जी की पुत्री है क्या.. हाँ बाबा, मैं बृषभानू जू की बेटी राधा हूँ।
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दुर्वासा किशोरी जू के दर्शन कर जड़ हो गये लाडली जू ने हिलाया बाबा सो गयो का हमारे बाबा सौ का काम है आपकू..
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दुर्वाषा जी बोले बेटी मोये और मेरे शिष्यों को भूख लगी है, राजा बृषभानू ही हमें भोजन करा सकते हैं।
    अच्छो इतनी सी बात है, बाबा तू नहाय के आ प्रसाद तैयार मिलेगो, बाबा नहाने चले गये कीरत मैया ओट से निकली, अरी.. राधा तेने जे का व्यथा बोय दयी। 
    लाली ई तो बडो क्रोधी बाबा जी है, नेक-नेक बात पे क्रोधित हे जाय और श्राप दे दे, अब तू इतने लोगन कू भोजन कैसे तैयार करेगी..!!
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किशोरी जू सब सखियों से बोली चलो री सब माटी इकट्टी करो ओर माटी गुलाय के मोये दो, सब सखियाँ मिट्टी गलाने लगी।
    किशोरी जू ने मिट्टी की पूडी, मिट्टी की सब्जी, मिट्टी की मिठाई तैयार कर दी। 
    दुर्वासा आये मिट्टी की वस्तु देख बड़े ही क्रोधित हुऐ।
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अरी छोरी, तू हमसे मजाक कर रही है, ये क्या मिट्टी की सामग्री बनाई है..

प्रिया जी बोली  बाबाजी काहे कु हल्ला कर रह्यो हो
काह खवोगे ईमरती ....ले मिट्टी की ईमारती रख दी
औऱ जैसे ही दुर्वासा जी ने मिट्टी की ईमरती मुँह में रखी.....
दुनिया का स्वाद भूल गये औऱ काह ख़वोगे...रसगुल्ला
ले आह हा उस मिट्टी के रसगुल्ले के रस के आगे सब दुनिया के सब रस फ़िके बाबा औऱ सब शिष्यो ने जीवन मे ऐसा भोजन किया औऱ  आशिर्वाद दिया....किशोरी जी को....
जो वृषभानु नंदनी की रसोई पायेगा वो त्रिलोक विजयी हो जायेगा...

यशोदा मैंया को जब यह पता चला तो मैंया ने
ठाकुर जी के लिए किशोरी जु के हाथों से रसोई बनवाईं
तो महाराज ये ठाकुर जी तो बल भी हमारी किशोरीजु का लिए फ़िरते है औऱ नाम अपना करते हैं🙏
श्री राधा श्री राधा श्री राधा

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कामेंट्स

madan pal 🌷🙏🏼 Oct 17, 2021
जय श्री राधे कृष्णा जी शूभ रात्री वंदन जी आपका हर पल शूभ मगंल हों जी अ🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🌹🌹🌹🌹🌹🌹

dhruvwadhwani Oct 17, 2021
जय श्री राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे जय श्री राधे राधे

dhruvwadhwani Oct 17, 2021
जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय श्री कृष्णा जय कृष्णा जय कृष्णा

Anup Kumar Sinha Oct 17, 2021
जय श्री राधे कृष्ण 🙏🏻🙏🏻 शुभ रात्रि वंंदन, मेरी बहना । आनेवाला कल आपके लिए नयी खुशियाँ लाये । कान्हा जी आपकी सभी मनोकामनाएं पूरी करें 🍁🍁🙏🏻🙏🏻🍁🍁

Renu Singh Oct 17, 2021
Jai Shree Radhe Krishna 🙏🌹 Shubh Ratri Vandan Pyari Bahana Ji 🙏 Thakur Ji ki kripa Se Aàpka Har Din Har Pal Shubh Avam Mangalmay ho 🌸🙏

Kailash Prasad Oct 17, 2021
  *>-~~~~~~--🙏--~~~~~~-<* *🌄 शुभ रात्रि🌄* *वास्तव में हमारा* *जीवन बहुत ही सरल है,* *लेकिन हम ही उसे जटिल बनाने* *पर तूले रहते हैं.!!* *जय श्री राधे कृष्णा* *_________->--🙏--<-_________

Amar gaur Oct 17, 2021
🌷 sweet good night ji 🌷 🌹 जय श्री राम जी जय बजरंग बली जी🙏🌹 🙏🌹 🙏🌷जय श्री महाकाल जी जय श्री कृष्णा श्री राधे राधे जी भगवान भोले नाथ की कृपा आप ओर आप के परिवार पर सदा बनी रहे जी 🌷🌷आप सदा ही मुस्कुराते रहो जी ..🌷💐🌹आप का हर पल शुभ मंगलमय हो जी 🌷🌹💐🙏🙏आप सदा खुश रहो जी ...🌹🌹🌹🌹🌹🌹💐💐🌷🌷

gitaram sharma Oct 17, 2021
जय श्री राधे राधे जी जय श्री राधे कृष्णा जी शुभ रात्रि वंदन जी बहनजी श्री राधे कृष्णा जी की असीम कृपा आपके परिवार मे सदैव ही बनीरहे जी आप के परिवार मे सदैव ही सुख शांति समृद्धि धन वैभव खुशियां बनी रहे जी आप सभी का आनेवाला हर दिन हरपल खुशियों से भरा हुआ शुभ सुखद सुखमय सुखदाई मधुर मंगलमय रहे जी बहनजी श्री राधे रानी जी श्री ठाकुर जी के चरणों मे यही कामना यही प्रार्थना करते है जी आप सपरिवार सकुशल रहे आप सपरिवार स्वस्थ रहे खुश रहे हंसते मुस्कुराते रहे जी जय श्री राधे कृष्णा जी

Bhagat ram Oct 17, 2021
🌹🌹 जय श्री कृष्णा राधे राधे जी 🙏🙏🌿💐🌺🌹 शुभ रात्रि वंदन जी 🙏🙏🌿💐🌺🌹🌹

laltesh kumar sharma Oct 17, 2021
🌹🌿🌹 jai shree radhey krishan ji 🌹🌿🌹 Subh ratri vandan ji 🌹🌿🌹🙏🙏

JAI MAHAKAAL KI 🙏🌹🙏🌹 Oct 17, 2021
*जय श्री राम* *सफल जीवन के चार सुत्र....* *मेहनत करे तो धन बने, सबर करे तो काम, मीठा बोले तो पहचान बने,और इज्जत करे तो नाम...* *शुभ रात्रि विश्राम🙏🌹🙏🌹 आपकी रात्रि शुभ और मंगलमय हो🙏🌹🙏🌹

Mamta Chauhan Oct 17, 2021
Radhe radhe ji🌹🙏 Shubh ratri vandan pyari bahan ji aapka din shubh ho mamgalmay ho aapki sbhi manokamna puri ho🌹 Radhe radhe 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹

sushil jain Oct 17, 2021
Radhe Radhe Ji shubh ratri ji good bless you

Rani Oct 17, 2021
jai shree radhe radhe 🙏🌹subh ratri vandan bahana ji🌿🌺shree Krishn kadhaiya ji ki kripa sadaiv aap ke pure pariwar pr bni rhe aap ka har pal subh magalmay ho🌺🌿aap hamesa khush rhe swasth rhe 🙏🌿🌺

GOVIND CHOUHAN Oct 17, 2021
🌺Jai Shree Radhe Radhe Krishan Mohan Murari Jiii 🌺🌺🌺🙏🙏 Shubh Raatri Vandan Jiii 🙏 Prabhuji Thakurji Jii ki kripa se Aapka hr ek Pl Subh V Mangalmay Hoo Jii 🙏🙏

Rama Devi Sahu Dec 5, 2021

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Seemma Valluvar Dec 6, 2021

शास्त्र कहते हैं कि अठारह दिनों के महाभारत युद्ध में उस समय की पुरुष जनसंख्या का 80% सफाया हो गया था। युद्ध के अंत में, संजय कुरुक्षेत्र के उस स्थान पर गए जहां संसार का सबसे महानतम युद्ध हुआ था। उसने इधर-उधर देखा और सोचने लगा कि क्या वास्तव में यहीं युद्ध हुआ था? यदि यहां युद्ध हुआ था तो जहां वो खड़ा है, वहां की जमीन रक्त से सराबोर होनी चाहिए। क्या वो आज उसी जगह पर खड़ा है जहां महान पांडव और कृष्ण खड़े थे? तभी एक वृद्ध व्यक्ति ने वहां आकर धीमे और शांत स्वर में कहा, "आप उस बारे में सच्चाई कभी नहीं जान पाएंगे!" संजय ने धूल के बड़े से गुबार के बीच दिखाई देने वाले भगवा वस्त्रधारी एक वृद्ध व्यक्ति को देखने के लिए उस ओर सिर को घुमाया। "मुझे पता है कि आप कुरुक्षेत्र युद्ध के बारे में पता लगाने के लिए यहां हैं, लेकिन आप उस युद्ध के बारे में तब तक नहीं जान सकते, जब तक आप ये नहीं जान लेते हैं कि असली युद्ध है क्या?" बूढ़े आदमी ने रहस्यमय ढंग से कहा। "तुम महाभारत का क्या अर्थ जानते हो?" तब संजय ने उस रहस्यमय व्यक्ति से पूछा। वह कहने लगा, "महाभारत एक गाथा मात्र नहीं है, एक वास्तविकता भी है, निश्चित रूप से एक दर्शन भी है।" "क्या आप मुझे बता सकते हैं कि दर्शन क्या है?" संजय ने निवेदन किया। अवश्य जानता हूं, बूढ़े आदमी ने कहना शुरू किया। पांडव कुछ और नहीं, बल्कि आपकी पाँच इंद्रियाँ हैं - दृष्टि, गंध, स्वाद, स्पर्श और श्रवण - और क्या आप जानते हैं कि कौरव क्या हैं? उसने अपनी आँखें संकीर्ण करते हुए पूछा। कौरव ऐसे सौ तरह के विकार हैं, जो आपकी इंद्रियों पर प्रतिदिन हमला करते हैं लेकिन आप उनसे लड़ सकते हैं और जीत भी सकते है।* पर क्या आप जानते हैं कैसे? संजय ने फिर से न में सर हिला दिया। "जब कृष्ण आपके रथ की सवारी करते हैं!" यह कह वह वृद्ध व्यक्ति बड़े प्यार से मुस्कुराया और संजय अंतर्दृष्टि खुलने पर जो नवीन रत्न प्राप्त हुआ उस पर विचार करने लगा.. "कृष्ण आपकी आंतरिक आवाज, आपकी आत्मा, आपका मार्गदर्शक प्रकाश हैं और यदि आप अपने जीवन को उनके हाथों में सौप देते हैं तो आपको फिर चिंता करने की कोई आवश्कता नहीं है।" वृद्ध आदमी ने कहा। संजय अब तक लगभग चेतन अवस्था में पहुंच गया था, लेकिन जल्दी से एक और सवाल लेकर आया। फिर कौरवों के लिए द्रोणाचार्य और भीष्म क्यों लड़ रहे हैं? भीष्म हमारे अहंकार का प्रतीक हैं, अश्वत्थामा हमारी वासनाएं, इच्छाएं हैं, जो कि जल्दी नहीं मरतीं। दुर्योधन हमारी सांसारिक वासनाओं, इच्छाओं का प्रतीक है। द्रोणाचार्य हमारे संस्कार हैं। जयद्रथ हमारे शरीर के प्रति राग का प्रतीक है कि 'मैं ये देह हूं' का भाव। द्रुपद वैराग्य का प्रतीक हैं। अर्जुन मेरी आत्मा हैं, मैं ही अर्जुन हूं और स्वनियंत्रित भी हूं। कृष्ण हमारे परमात्मा हैं। पांच पांडव पांच नीचे वाले चक्र भी हैं, मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक। द्रोपदी कुंडलिनी शक्ति है, वह जागृत शक्ति है, जिसके ५ पति ५ चक्र हैं। ओम शब्द ही कृष्ण का पांचजन्य शंखनाद है, जो मुझ और आप आत्मा को ढ़ाढ़स बंधाता है कि चिंता मत कर मैं तेरे साथ हूं, अपनी बुराइयों पर विजय पा, अपने निम्न विचारों, निम्न इच्छाओं, सांसारिक इच्छाओं, अपने आंतरिक शत्रुओं यानि कौरवों से लड़ाई कर अर्थात अपनी मेटेरियलिस्टिक वासनाओं को त्याग कर और चैतन्य पाठ पर आरूढ़ हो जा, विकार रूपी कौरव अधर्मी एवं दुष्ट प्रकृति के हैं। श्री कृष्ण का साथ होते ही ७२००० नाड़ियों में भगवान की चैतन्य शक्ति भर जाती है, और हमें पता चल जाता है कि मैं चैतन्यता, आत्मा, जागृति हूं, मैं अन्न से बना शरीर नहीं हूं, इसलिए उठो जागो और अपने आपको, अपनी आत्मा को, अपने स्वयं सच को जानो, भगवान को पाओ, यही भगवद प्राप्ति या आत्म साक्षात्कार है, यही इस मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। ये शरीर ही धर्म क्षेत्र, कुरुक्षेत्र है। धृतराष्ट्र अज्ञान से अंधा हुआ मन है। अर्जुन आप हो, संजय आपके आध्यात्मिक गुरु हैं। वृद्ध आदमी ने दुःखी भाव के साथ सिर हिलाया और कहा, "जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं, अपने बड़ों के प्रति आपकी धारणा बदल जाती है। जिन बुजुर्गों के बारे में आपने सोचा था कि आपके बढ़ते वर्षों में वे संपूर्ण थे, अब आपको लगता है वे सभी परिपूर्ण नहीं हैं। उनमें दोष हैं। और एक दिन आपको यह तय करना होगा कि उनका व्यवहार आपके लिए अच्छा या बुरा है। तब आपको यह भी अहसास हो सकता है कि आपको अपनी भलाई के लिए उनका विरोध करना या लड़ना भी पड़ सकता है। यह बड़ा होने का सबसे कठिन हिस्सा है और यही वजह है कि गीता महत्वपूर्ण है।" संजय धरती पर बैठ गया, इसलिए नहीं कि वह थका हुआ था, तक गया था, बल्कि इसलिए कि वह जो समझ लेकर यहां आया था, वो एक-एक कर धराशाई हो रही थी। लेकिन फिर भी उसने लगभग फुसफुसाते हुए एक और प्रश्न पूछा, तब कर्ण के बारे में आपका क्या कहना है? "आह!" वृद्ध ने कहा। आपने अंत के लिए सबसे अच्छा प्रश्न बचाकर रखा हुआ है। "कर्ण आपकी इंद्रियों का भाई है। वह इच्छा है। वह सांसारिक सुख के प्रति आपके राग का प्रतीक है। वह आप का ही एक हिस्सा है, लेकिन वह अपने प्रति अन्याय महसूस करता है और आपके विरोधी विकारों के साथ खड़ा दिखता है। और हर समय विकारों के विचारों के साथ खड़े रहने के कोई न कोई कारण और बहाना बनाता रहता है।" "क्या आपकी इच्छा; आपको विकारों के वशीभूत होकर उनमें बह जाने या अपनाने के लिए प्रेरित नहीं करती रहती है?" वृद्ध ने संजय से पूछा। संजय ने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया और भूमि की तरफ सिर करके सारी विचार श्रंखलाओं को क्रमबद्ध कर मस्तिष्क में बैठाने का प्रयास करने लगा। और जब उसने अपने सिर को ऊपर उठाया, वह वृद्ध व्यक्ति धूल के गुबारों के मध्य कहीं विलीन हो चुका था। लेकिन जाने से पहले वह जीवन की वो दिशा एवं दर्शन दे गया था, जिसे आत्मसात करने के अतिरिक्त संजय के सामने अब कोई अन्य मार्ग नहीं बचा था ।

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Rama Devi Sahu Dec 5, 2021

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꧁🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚꧂ 💥꧁श्रीसिद्धिविनायक पंचांग꧂💥 🌷☘🌹🍂🍃💐🌻🌸🌺💐. ┈━❀꧁ 🐀🐁🐀 ꧂❀----- 🔔°•🔔•°🔔°•🌄•°🔔°•🔔•°🔔 ☘️☘️☘️☘️ जय श्री महाकालेश्वर विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कर्णामृताय शशिशेखर धारणाय कर्पूरकान्ति धवलाय जटाधराय दारिद्र्यदुःख दहनाय नमश्शिवाय गौरीप्रियाय रजनीश कलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिप कङ्कणाय गङ्गाधराय गजराज विमर्धनाय दारिद्र्यदुःख दहनाय नम:शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः । ॐ श्रां श्रीं श्रीं सः चन्द्राय नमः । सुप्रभातम् ॐ श्रीगणेशाय नमः अथ् पंचांगम् दिनाँक 06-12-2021 सोमवार अक्षांश- 30°:36", रेखांश 76°:80" अम्बाला शहर हरियाणा, पिन कोड- 134 007 ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ ॐ भोलेनाथ नमः, ॐ कैलाश पति नमः,ॐ भूतनाथ नमः, ॐ नंदराज नमः,ॐ नन्दी की सवारी नमः, ॐ ज्योतिलिंग नमः,ॐ महा काल नमः ॐ रुद्रनाथ नमः,ॐ भीमशंकर नमः ॐ नटराज नमः ॐ प्रलेयन्कार नमः,ॐ चंद्रमोली नमः, ॐ डमरूधारी नमः,ॐ चंद्रधारी नमः ॐ मलिकार्जुन नमः,ॐ भीमेश्वर नमः, ॐ विषधारी नमः,ॐ बम भोले नमः, ॐ ओंकार स्वामी नमः, ॐ ओंकारेश्वर नमः, ॐ शंकर त्रिशूलधारी नमः ॐ विश्वनाथ नमः,ॐ अनादिदेव नमः, ॐ उमापति नमः,ॐ गोरापति नमः, ॐ गणपिता नमः,ॐ भोले बाबा नमः, ॐ शिवजी नमः,ॐ शम्भु नमः, ॐ नीलकंठ नमः ॐ महाकालेश्वर नमः,ॐ त्रिपुरारी नमः, ॐ त्रिलोकनाथ नमः,ॐ त्रिनेत्रधारी नमः, ॐ बर्फानी बाबा नमः,ॐ जगतपिता नमः, ॐ मृत्युन्जन नमः,ॐ नागधारी नमः, ॐ रामेश्वर नमः,ॐ लंकेश्वर नमः, ॐ अमरनाथ नमः,ॐ केदारनाथ नमः, ॐ मंगलेश्वर नमः,ॐ अर्धनारीश्वर नमः, ॐ नागार्जुन नमः,ॐ जटाधारी नमः, ॐ नीलेश्वर नमः,ॐ गलसर्पमाला नमः, ॐ दीनानाथ नमः,ॐ सोमनाथ नमः, ॐ जोगी नमः,ॐ भंडारी बाबा नमः, ॐ बमलेहरी नमः,ॐ गोरीशंकर नमः, ॐ शिवाकांत नमः,ॐ महेश्वराए नमः, ॐ महेश नमः,ॐ ओलोकानाथ नमः, ॐ आदिनाथ नमः,ॐ देवदेवेश्वर नमः, ॐ प्राणनाथ नमः,ॐ शिवम् नमः, ॐ महादानी नमः,ॐ शिवदानी नमः, ॐ संकटहारी नमः,ॐ महेश्वर नमः, ॐ रुंडमालाधारी नमः, ॐ जगपालनकर्ता नमः ॐ पशुपति नमः,ॐ संगमेश्वर नमः, ॐ दक्षेश्वर नमः,ॐ घ्रेनश्वर नमः, ॐ मणिमहेश नमः,ॐ अनादी नमः, ॐ अमर नमः, ॐ आशुतोष महाराज नमः ॐ विलवकेश्वर नमः,ॐ अचलेश्वर नमः, ॐ अभयंकर नमः,ॐ पातालेश्वर नमः, ॐ धूधेश्वर नमः,ॐ सर्पधारी नमः, ॐ त्रिलोकिनरेश नमः,ॐ हठ योगी नमः, ॐ विश्लेश्वर नमः,ॐ नागाधिराज नमः, ॐ सर्वेश्वर नमः,ॐ उमाकांत नमः, ॐ बाबा चंद्रेश्वर नमः,ॐ त्रिकालदर्शी नमः ॐ त्रिलोकी स्वामी नमः,ॐ महादेव नमः ॐ गढ़शंकर नमः,ॐ मुक्तेश्वर नमः, ॐ नटेश्वर नमः,ॐ गिरजापति नमः, ॐ भद्रेश्वर नमः,ॐ त्रिपुनाशक नमः, ॐ निर्जेश्वर नमः,ॐ किरातेश्वर नमः, ॐ जागेश्वर नमः, ॐ अबधूतपति नमः, ॐ भीलपति नमः,ॐ जितनाथ नमः, ॐ वृषेश्वर नमः, ॐ भूतेश्वर नमः ॐ बैजनाथ नमःॐ नागेश्वर नमः 🙏🏿🙏🏿🙏🏿 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 ┉┅━❀꧁🐀🐁🐀꧂❀━┅ -----समाप्तिकाल---- 📒तिथि तृतीया 26:34:05 ☄️ नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा 26:19:42 🛑 करण : 🛑 तैतिल 16:10:42 🛑 गर 26:34:05 🔓 पक्ष शुक्ल 🛑 योग गण्ड 20:04:07 🗝️ वार सोमवार 🌄 सूर्योदय 07:05:04 🌃 चन्द्रोदय 09:15:00 🌜 चन्द्र राशि धनु 🏹 🌌 सूर्यास्त 17:21:49 🌑 चन्द्रास्त 19:25:00 ☃️ ऋतु हेमंत 🛑 शक सम्वत 1943 प्लव 🛑 कलि सम्वत 5123 🛑 दिन काल 10:16:44 🛑 विक्रम सम्वत 2078 🛑 मास अमांत मार्गशीर्ष 🛑 मास पूर्णिमांत मार्गशीर्ष 🎷 शुभ समय 🥁 अभिजित 11:52:53 - 12:34:00 ⚫ दुष्टमुहूर्त : 12:34:00 - 13:15:07 14:37:21 - 15:18:28 ⚫ कंटक 09:08:25 - 09:49:32 ⚫ यमघण्ट 11:52:53 - 12:34:00 👿 राहु काल 08:22:10 - 09:39:15 ⚫ कुलिक 14:37:21 - 15:18:28 ⚫ कालवेला 10:30:39 - 11:11:46 ⚫ यमगण्ड 10:56:21 - 12:13:26 ⚫ गुलिक 13:30:32 - 14:47:37 🛑 दिशा शूल पूर्व 💥💥💥💥होरा 🛑चन्द्रमा 07:05:04 - 07:56:28 🛑शनि 07:56:28 - 08:47:52 🛑बृहस्पति 08:47:52 - 09:39:15 🛑मंगल 09:39:15 - 10:30:39 🛑सूर्य 10:30:39 - 11:22:03 🛑शुक्र 11:22:03 - 12:13:27 🛑बुध 12:13:27 - 13:04:50 🛑चन्द्रमा 13:04:50 - 13:56:14 🛑शनि 13:56:14 - 14:47:38 🛑बृहस्पति 14:47:38 - 15:39:01 🛑मंगल 15:39:01 - 16:30:25 🛑सूर्य 16:30:25 - 17:21:49 🛑शुक्र 17:21:49 - 18:30:29 🛑बुध 18:30:29 - 19:39:09 🛑चन्द्रमा 19:39:09 - 20:47:49 💥💥💥💥 चोघडिया ⛩️अमृत 07:05:04 - 08:22:10 👿काल 08:22:10 - 09:39:15 ⛩️शुभ 09:39:15 - 10:56:21 ☘️रोग 10:56:21 - 12:13:26 ⚫उद्वेग 12:13:26 - 13:30:32 🛑चल 13:30:32 - 14:47:37 ⛩️लाभ 14:47:37 - 16:04:43 ⛩️अमृत 16:04:43 - 17:21:49 🛑चल 17:21:49 - 19:04:49 ☘️रोग 19:04:49 - 20:47:49 💥💥💥किस चौघड़िया में क्या करें 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 ┉━❀꧁🐀🐁🐀꧂❀━┅ दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। शास्त्रानुसार प्रत्येक चौघड़िया में निम्नानुसार कार्य किये जाने प्रस्तावित होते हैं:- 👉🏿🛑 चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें । 👉🏿⚫उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें । 👉🏿⛩️शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें । 👉🏿⛩️लाभ में व्यापार करें । 👉🏿☘️रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें । 👉🏿⚫काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है । 👉🏿⛩️अमृत में सभी शुभ कार्य । 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 ꧁ दैनिक ग्रह गोचर ꧂ 🌞 सूर्य - वृश्चिक 🦂 🌙 चन्द्र - धनु 🏹 ⚫ मंगल - वृश्चिक 🦂 ⚫ बुध - वृश्चिक 🦂 ⚫ बृहस्पति - कुम्भ 🏺 ⚫ शुक्र - धनु 🏹 ⚫ शनि - मकर 🐊 😈 राहु - वृष 🐂 👖 केतु - वृश्चिक 🦂 ------------------------------------ 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 व्रत एवम् त्योहार 15 दिसम्बर तक ┉┅━❀꧁🐀🐁🐀꧂❀━┅ दिसंबर (मार्गशीर्ष कृष्ण द्वादशी से पोष कृष्ण त्रयोदशी तक) सन् 2021 ईसवीं, विक्रमी संवत 2078, शाका 1943, हिजरी 1443 । सूर्य दक्षिणायन- उत्तरायण, दक्षिण गोल, हेमंत -शिशिर ऋतु:, ग्रह दर्शन- प्रातः मंगल पूर्व क्षितिज में दिखेगा, सायं शुक्र पश्चिम में, उससे ऊपर शनि होगा। गुरु पश्चिम कपाल में दिखेगा ।बुध अस्त है। व्रत त्योहार 15 दिसंबर तक ☘️☘️☘️ 🛑 6 दिसंबर सोमवार जमादिउलाव्वल मास प्रारंभ 🛑7 दिसंबर मंगलवार भद्रा 13:07 से 23:41 तक राहु कृतिका 3, केतु अनुराधा 1 में 20:27 🛑8 दिसंबर बुधवार 👉शुक्र मकर में 14:03 श्री पंचमी श्री राम विवाह उत्सव नाग पंचमी 🛑 9 दिसंबर गुरुवार पंचक प्रारंभ 10:10 स्कंद (गुह)षष्टि, मंगल अनुराधा में 25:05 👉बुध मूल 1 🏹धनु में 30:05 चंपा षष्टि 🛑शुक्रवार 10 दिसंबर भद्रा 19:10 से 31:12 तक मित्र विष्णु सप्तमी 🛑 शनिवार 11 दिसंबर दुर्गा अष्टमी 🛑रविवार 12 दिसंबर नंदा नवमी, गण्ड मूल 24:00 🛑सोमवार 13 दिसंबर पंचक समाप्त 26:05 🛑 मंगलवार 14 दिसंबर भद्रा 10:35 से 23:36 तक मोक्षदा एकादशी व्रत श्री गीता जयंती गण्ड मूल 28:40 तक 🛑बुधवार 15 दिसंबर 👉💥सूर्य मूल 1 धनु🏹 में 27:42 👉पौष सक्रांति प्रातः 10:06 तक गुरु धनिष्ठा 4 में 8:14 अखंड द्वादशी 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 ┉┅━❀꧁🐀🐁🐀꧂❀━┅ दैनिक भविष्यफल 👩‍❤️‍👨🦀🦁👩🏻‍🦱⚖️🏹🐬 ✒️ नोटः प्रस्तुत भविष्यफल में और आपकी कुंडली व राशि के ग्रहों के आधार पर आपके जीवन में घटित हो रही घटनाओं में कुछ भिन्नता हो सकती है । पूरी जानकारी के लिए किसी देवेज्ञ या भविष्यवक्ता से मिल सकते हैं। 🤷🏻‍♀ आज जिन भाई-बहनों /मित्रों का 🎂जन्मदिन या विवाह की वर्षगांठ 🥁📯 है , उन सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ तथा शुभ आशीर्वाद । भगवान जी आपकी जीवन यात्रा सफल करें । 🐐मेष कीमती वस्तुएं संभालकर रखें। व्ययवृद्धि होगी। तनाव रहेगा। अपरिचितों पर विश्वास न करें। प्रयास में आलस्य व विलंब नहीं करना चाहिए। रुके हुए काम समय पर होने की संभावना है। विरोधी परास्त होंगे। यात्रा कष्टप्रद हो सकती है। धैर्य एवं संयम बना रहेगा। 🐂वृष कोर्ट-कचहरी में अनुकूलता रहेगी। पूजा-पाठ में मन लगेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। झंझटों में न पड़ें। उधार दिया धन मिलने से राहत हो सकती है। जीवनसाथी का सहयोग उलझे मामले सुलझाने में सहायक हो सकेगा। वाहन सावधानी से चलाएँ। 👩‍❤️‍👨मिथुन बेरोजगारी दूर होगी। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। भेंट व उपहार की प्राप्ति होगी। जोखिम न लें। क्रोध एवं उत्तेजना पर संयम रखें। सत्कार्य में रुचि बढ़ेगी। प्रियजनों का पूर्ण सहयोग मिलेगा। व्यावसायिक चिंताएँ दूर होंगी। आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। 🦀कर्क भूमि व भवन संबंधी कार्य लाभ देंगे। रोजगार मिलेगा। शत्रु भय रहेगा। निवेश व नौकरी लाभ देंगे। व्यापार अच्छा चलेगा। कार्य के विस्तार की योजनाएँ बनेंगी। रोजगार में उन्नति एवं लाभ की संभावना है। पठन-पाठन में रुचि बढ़ेगी। लाभदायक समाचार मिलेंगे। 🦁सिंह उत्तेजना पर नियंत्रण रखें। शत्रु सक्रिय रहेंगे। शोक समाचार मिल सकता है। थकान महसूस होगी। व्यावसायिक चिंता रहेगी। संतान के व्यवहार से कष्ट होगा। सहयोगी मदद नहीं करेंगे। व्ययों में कटौती करने का प्रयास करें। वाहन चलाते समय सावधानी रखें। 👩🏻‍🦱कन्या अतिथियों का आवागमन रहेगा। उत्साहवर्धक सूचना मिलेगी। स्वाभिमान बना रहेगा। नई योजनाओं की शुरुआत होगी। संतान की प्रगति संभव है। भूमि व संपत्ति संबंधी कार्य होंगे। पूर्व कर्म फलीभूत होंगे। परिवार में सुखद वातावरण रहेगा। व्यापार में इच्छित लाभ होगा। ⚖️तुला चोट, चोरी व विवाद से हानि संभव है। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। कुसंगति से हानि होगी। अपने काम से काम रखें। स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही न करें। आवास संबंधी समस्या हल होगी। आलस्य न करें। सोचे काम समय पर नहीं हो पाएँगे। 🦂वृश्चिक राजकीय बाधा दूर होकर लाभ होगा। प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी। क्रोध पर नियंत्रण रखें। लाभ होगा। रुके हुए काम समय पर पूरे होने से आत्मविश्वास बढ़ेगा। परिवार की समस्याओं का समाधान हो सकेगा। व्यापार में नई योजनाएँ बनेंगी। व्यापार अच्छा चलेगा। 🏹धनु रोमांस में समय बीतेगा। मेहनत का फल मिलेगा। कार्यसिद्धि से प्रसन्नता रहेगी। व्यवसाय ठीक चलेगा। प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। परिवार में प्रसन्नता का वातावरण रहेगा। व्यापार के कार्य से बाहर जाना पड़ सकता है। कार्यपद्धति में विश्वसनीयता बनाएँ रखें। धनार्जन होगा। 🐊मकर दिन प्रेमभरा गुजरेगा। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। रुका हुआ धन मिलेगा। प्रसन्नता रहेगी। जल्दबाजी न करें। प्रियजनों से पूरी मदद मिलेगी। धन प्राप्ति के योग हैं। स्वयं के सामर्थ्य से ही भाग्योन्नति के अवसर आएँगे। संतान के कार्यों में उन्नति के योग हैं। 🏺कुंभ रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे। पार्टी व पिकनिक का आनंद मिलेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। विवाद न करें। सामाजिक एवं राजकीय ख्याति में अभिवृद्धि होगी। आर्थिक अनुकूलता रहेगी। रुका धन मिलने से धन संग्रह होगा। राज्यपक्ष से लाभ के योग हैं। 🦈मीन नई योजना बनेगी। कार्यप्रणाली में सुधार होगा। मान-सम्मान मिलेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। स्वास्थ्य के प्रति सावधानी रखें। कार्यक्षमता एवं कार्यकुशलता बढ़ेगी। कर्म के प्रति पूर्ण समर्पण व उत्साह रखें। व्यापार में नई योजनाओं से लाभ होगा। आपका दिन शुभ हो। ACHARYA ANIL PARASHAR, VADIC,KP ASTROLOGER.

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. श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी प्रभु (श्रृंगारवट वृन्दावन) बंग देश के बाँकुड़ा जिले के पुरुणिया पाट के श्रीरसिकानन्द प्रभु के कनिष्ठ पुत्र श्रीनन्दकिशोरदास गोस्वामी श्रीश्रीमन् नित्यानन्द प्रभुकी सातवीं पीढ़ी में थे। वे शैशव से ही विषयविरक्त थे। नित्यानन्द-सन्तान होने के नाते वैष्णव शिष्टाचार के अनुसार वैष्णव मात्र के पूज्य थे। छोटे-बड़े, गृहस्थ और त्यागी सब उसी दृष्टि से उनका आदर करते थे। पर यह उनके 'तृणादपि सुनीचेन' भाव के प्रतिकूल था। इससे उन्हें हार्दिक कष्ट होता था। उनकी प्रबल इच्छा थी भगवत्-कृपालब्ध किसी विशिष्ट वैष्णव के आनुगत्य में भजन-शिक्षा ग्रहण करने की। यह भी नित्यानन्द प्रभु के वंशज होने के कारण उनके लिए सम्भव नहीं था। जो सभी वैष्णवों के पूज्य थे और स्वयं आचार्य स्वरूप थे, उन्हें कोई वैष्णव अपने अनुगत मानकर भजन-शिक्षा कैसे देता ? इसलिए वे चुपचाप घर छोड़कर वृन्दावन चले गये। उस समय गौड़ीय वैष्णव समाज के मुकुटमणि श्रीविश्वनाथ चक्रवर्तीपाद वृन्दावन में रहते थे। उनसे उन्होंने बिना अपने स्वरूप का परिचय दिये भजन-शिक्षा देने और शास्त्राध्ययन कराने की प्रार्थना की। विश्वनाथ चक्रवर्तीपाद ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की। कुछ दिन वे उनके आनुगत्य में भजन और शास्त्राध्ययन करते रहे। किसी ने न जाना कि वे नित्यानन्द-सन्तान हैं। पर उनकी मां उनके बिना किसी से कहे घर छोड़कर चले जाने के कारण बहुत दुःखी थीं। उन्होंने उन्हें खोजने के लिए कई भक्तों को इधर उधर भेज रखा था। उनमें से एक उन्हें खोजते-खोजते वृन्दावन में चक्रवर्तीपाद के पास जा पहुंचे। चक्रवर्तीपाद को उन्होंने नंदकिशोरदास जी का परिचय देते हुए उनकी मां की दारुण व्यथा का वर्णन किया और घर लौटकर उनकी इच्छानुसार विवाह करने की आज्ञा देने का अनुरोध किया। पर उनकी माँ उनके बिना किसी से कहे घर छोड़कर चले जाने के कारण बहुत दुःखी थीं। उन्होंने उन्हें खोजने के लिए कई वैष्णवों को इधर उधर भेज रखा था। उनमें से एक उन्हें खोजते-खोजते वृन्दावन में चक्रवर्ती पाद के पास जा पहुँचे। चक्रवर्तीपाद को उन्होंने उनके स्वरूप का परिचय देते हुए उनकी माँ की दारुण व्यथा का वर्णन किया और घर लौटकर उनकी इच्छानुसार विवाह करने की आज्ञा देने का अनुरोध किया। चक्रवर्तीपाद परमपूज्या माँ गोस्वामिनी की इच्छा की अवहेलना कैसे करते ? उन्होंने नन्दकिशोर गोस्वामी से कहा–'आपने मुझे अपने शिक्षा गुरु के रूप में अङ्गीकार किया है। मैं यदि कुछ गुरु-दक्षिणा माँगूं तो देंगे ?' 'क्यों नहीं ? आप आज्ञा करें।' नन्दकिशोरजी ने तुरन्त कहा। 'मेरी गुरु-दक्षिणा रूप में आप अब माँ की आज्ञानुसार घर लौट जायें और विवाह करें।' नन्दकिशोरजी घर लौट गये, विवाह किया और एक पुत्र को जन्म दिया। उसके पश्चात् वे फिर गृह त्यागकर वृन्दावन चले गये। अपने साथ सम्वत् १८१५ की वादशाही सनद के साथ श्रीश्रीनिताइ-गौरांग विग्रह लेते गये, जिनकी आज भी शृङ्गारवट में विधिवत् सेवा-पूजा चल रही है। उनका अलौकिक प्रभाव देख तत्कालीन जोधपुर के राजा ने उन्हें बहुत-सी भू-सम्पत्ति प्रदान की, जिसका उनके वंशज निताइ-गौरांग की सेवा में उपयोग कर रहे हैं। श्रीपाद नन्दकिशोरजी के पास भोंदू नाम का एक व्रजवासी बालक रहता था, जो उनकी गैयों की देखभाल करता था। उसे लोग भोंदू इसलिए कहते थे कि उसे छल-कपट और चतुराई छूकर भी नहीं गये थे। उससे यदि उपहास में कोई कुछ झूठ भी कह देता, तो वह उसे मान लेता। शंका करना तो उसे आता ही न था। वह नित्य बालभोग-प्रसाद पाकर श्रीपाद की गायें चराने जमुनापार भांडीरवन में जाया करता। उससे किसी ने कहा था कि भांडीरवन में नन्दलाल ग्वाल-वाल सहित गायें चराने जाते हैं। वह यह सोचकर खुश होता कि किसी दिन उनसे भेंट होगी, तब वह उनसे मित्रता कर लेगा और उनके साथ खेला-कूदा करेगा। भोले-भाले भोंदू के हृदय की भाव-तरङ्ग उमड़-घुमड़कर जा टकरायी भक्तवत्सल भगवान् के मन-मन्दिर से। उनमें भी एक अपूर्व आलोड़न की सृष्टि हुई और जाग पड़ी एक नयी वासना भोंदू के साथ मित्रता कर खेल-कूद का आनन्द लेने की। तो हो गयी एक दिन भेंट दोनों में। भेंट को मित्रता में बदलते देर न लगी। भोंदू नित्य कुछ खाने-पीने की सामग्री अपने साथ ले जाता। नन्दलाल और उनके साथी ग्वाल-बाल उसके साथ खाते-पीते, खेलते और नाचते कूदते। कई दिन श्रीपाद ने देखा भोंदू को सामान सिर पर ढोकर ले जाते। एक दिन उन्होंने पूछा–'भोंदू, यह क्या ले जा रहा है ?" 'जे दाल-बाटी के ताईं है श्रीपाद।' 'दाल-बाटी ? किसके लिए ?' 'नन्दलाल और बिन के साथी ग्वाल-बालन के लिए। हम सब मिलके रोज दाल-बाटी बनामें हैं।' 'नन्दलाल ! कौनसे नन्दलाल रे ?' 'बेई बंसीबारे, जो भांडीरवन में गैया चरामें हैं।' 'बंसीबारे ! भांडीरवन में गैया चरामें हैं ! अच्छा, बता तो उनका मुखारविन्द और वेशभूषा कैसी है ?' 'बे बड़े मलूक हैं। सिर पै मोर-मुकुट धारन करे हैं। कानन में कुण्डल, गले में बनमाला धारन करे हैं और पीरे रंग को ओढ़ना ओढ़े हैं। सच बे बड़े मलूक लगै हैं।' श्रीपाद आश्चर्यचकित नेत्रों से भोंदू की ओर देखते रह गये। उन्हें उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था। पर वे विश्वास किये बिना रह भी नहीं सक रहे थे; क्योंकि वे जानते थे भोंदू झूठ नहीं बोलता। उन्होंने कहा–'अच्छा भोंदू, एक दिन नन्दलाल और उनके साथियों को यहाँ ले आना। उनसे कहना श्रीपाद के यहाँ आपका दाल-बाटी का निमन्त्रण है। वे आ जायेंगे न ?' ‘आमेंगे च्यौं नई। मैं विनकू ले आऊँगो' भोंदूने खुश होकर कहा। उस दिन भाँडीरवन जाते समय भोंदू सोच रहा था–'आज नन्दलाल से श्रीपाद के निमन्त्रण की कहूँगा, तो वह कितना खुश होगा !' पर जब उसने उनमे निमन्त्रण की बात कही, तो वे बोले–'हम काऊकौ नौतौ-औतौ नायं खामें।' भोंदू का चेहरा सुस्त पड़ गया। उसने कहा–'नायँ नन्दलाल, तोको चलनौ परैगौ। मैंनै श्रीपाद से कह दी है, मैं तोय ले जाऊँगौ।' 'नायें, हम नायें जायें। हमकू श्रीपाद सों कहा करनौ ?' नन्दलाल ने गरदन हिलाकर मुँह बिचकाते हुए कहा। भोंदू रोष करना नहीं जानता था, पर उस समय उसे रोष आ गया। उसने नन्दलाल से कुछ नहीं कहा। पर वह अपनी गैयों को अलग कर कहीं अन्यत्र जाने लगा, जैसे वह नन्दलाल से कह रहा हो–'तुझे श्रीपाद से कुछ नहीं करना, तो मुझे भी तुझमे कुछ नहीं करना। बस, हो चुकी मेरी-तेरी मैत्री।' वह थोड़ी दूर ही जा पाया था कि नन्दलालने पुकारा–'भोंदू, ओ भोंदू ! नैक सुन जा।' भोंदू क्या अब सुनने वाला था ? वह और भी तेजी से गैयों को हाँकने लगा। भोंदू सुनने वाला नहीं था, तो भगवान् भी उसे छोड़ने वाले कब थे ? वे भागे उसके पीछे-पीछे। वाह रे व्रज के भगवान् ! तुम्हें 'भगवान्' कहते भी वाणी लजाती है। भगवान्, जो अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड की सृष्टि, स्थिति और प्रलयकर्ता हैं, ब्रह्मा, विष्णु और महेश जिनके अंश के भी अंश हैं, वे क्या किसी व्यक्ति के पीछे ऐसे भागते हैं, जैसे उनकी उससे कोई अपनी गरज अटकी हो, जैसे उसके रूठ जाने से उनका त्रिलोकी का साम्राज्य छिन जाने वाला हो ! पर वे जिसके पीछे भागें वह भागकर जाय कहाँ ? नन्दलाल जा खड़े हुए भोंदू का रास्ता रोककर उसके सामने और बोले–'सुनें नायँ ?' उनका स्वर ऊँचा था, पर उसमें विनय का भाव था। भोंदू ने उनके नेत्रों की ओर देखा, तो वे सजल थे। उसने कहा–'कहा कहँ ?' 'मैं कहूँ, मैं श्रीपाद को निमन्त्रण अस्वीकार नायँ करूँ। मैं तो कहूँ, मैं शृङ्गारवट नायँ जाऊँगौ तू तौ भोरौ है, जानें नायँ शृङ्गारवट राधारानी को ठौर है। हुआँ दाऊ दादा कैसे जायगौ ? मेरे सखा कैसे जायेंगे ? श्रीपादकूँ ह्याँई आवनी होयगौ अपने माथे पै सामग्री लैकें। वे अपने हाथ से दाल-बाटी बनामेंगे, तो हम पामेंगे।' भोंदू प्रसन्न हो गया। उसने उसी प्रसन्न मुद्रा में श्रीपाद से जाकर सब कुछ निवेदन किया। श्रीपाद दूसरे दिन प्रचुर सामग्री अपने मस्तक पर वहनकर भांडीरवन ले गये। वे राम-कृष्ण और ग्वाल-बालो के साथ उनका क्रीड़ा विनोद देखकर कृतार्थ हुए। थोड़ी देर में सब कुछ अन्तर्हित हो गया। तब वे मूच्छित हो भूमि पर गिर पड़े। उस समय उन्हें आदेश हुआ–'अधीर न हो। घर जाओ और मेरी लीला स्थलियों का वर्णन करो।' इस आदेश का पालन कर श्रीपाद ने 'श्रीवृन्दावन-लीलामृत' और 'श्रीश्रीरसकलिका' नाम के दो ग्रंथों का प्रणयन किया। ० ० ० पुस्तक: व्रज के भक्त (प्रथम खण्ड) "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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. "योगक्षेम का वहन" पोस्ट - 05 (अन्तिम) गतांक से आगे:- भगवान् बोले-‘इसमें तुम्हारा कोई दोष ही नहीं है। तुम तो मुझ पर ही निर्भर थे। मेरे आने में जो विलम्ब हुआ, यह मेरे स्वभाव का दोष है, पर अभी तक तुमने भोजन क्यों नहीं किया ?' पंडितजी ने कहा-'जब आप कह गये थे कि मैं फिर आकर मिलूँगा, तब बिना आपके आये मैं कैसे भोजन करता। आप भोजन कीजिये, उसके बाद हम लोग भी प्रसाद पायेंगे।' भगवान् ने कहा-'नहीं-नहीं चलो हम लोग एक साथ ही भोजन करें।' फिर ब्राह्मण-पत्नी ने भगवान् का संकेत पाकर दोनों को भोजन कराया। ब्राह्मण देवता ने अत्यन्त प्रेम-विह्वल होकर प्रसाद पाया। भोजन के बाद भगवान् बोले-'तुम्हारी जो इच्छा हो, सो माँग लो; तुम्हारे लिये कुछ दुर्लभ नहीं है।' ब्राह्मण ने कहा-'जब आप स्वयं ही पधार गये, तब अब भी माँगना बाकी ही रहा क्या ? नाथ ! मैं तो यही चाहता हूँ कि अब तो मेरे मन में योगक्षेम की भी इच्छा न रहे और केवल आप में ही मेरा अनन्य विशुद्ध प्रेम हो।' भगवान् 'तथास्तु' कहकर अन्तर्धान हो गये।' इसके बाद ब्राह्मण-पत्नी ने भी प्रसाद पाया। इधर जब से उन छोटे भाइयों ने अपने ज्येष्ठ भ्राता भगवद्भक्त ब्राह्मण को अलग कर दिया था, तब से वे उत्तरोत्तर नितान्त दरिद्री और दुःखी होते चले गये। उनकी इतनी हीन दशा हो गयी कि न तो उनको कहीं से कुछ उधार ही मिलता था और न माँगने पर ही। जब उन्होंने सुना कि हमारे भाई इतने धनी हो गये हैं कि उनके द्वार पर सदा याचकों की भीड़ लगी रहती है, तब वे भी अपने भाई के पास गये। परम भक्त पंडितजी ने भाइयों को आये देखकर उन्हें हृदय से लगा लिया और उनकी कुशल-क्षेम पूछी। उन्होंने उत्तर में कहा- 'आप-जैसे सज्जन पुरुष से अलग होकर हमें कुशल कहाँ ? हम तो मुँह दिखाने लायक भी नहीं हैं। फिर भी आप हम लोगों पर दया करके प्रेमसे मिलते हैं, यह आपका सौहार्द है।' बड़े भाईने कहा-नहीं-नहीं भैया ! ऐसा मत कहो। हम तीनों सहोदर भाई हैं। हम लोग कभी अलग थोड़े ही हो सकते हैं। यह तो एक होनहार थी। हम लोग जैसे प्रेम से पहले रहा करते थे, अब भी हमें वैसे ही रहना चाहिये। संसार में सहोदर भाई के समान अपना हितैषी और प्रेमी कौन है ? तुम लोगों को लज्जा या पश्चात्ताप न करके पूर्ववत् ही प्रेम करना चाहिये। यह जो कुछ ऐश्वर्य देखते हो, इसमें भैया ! मेरा क्या है। यह सब श्रीभगवान् की विभूति है। जो कोई भी भगवान् पर निर्भर हो जाता है, भगवान् सब प्रकार से उसका योगक्षेम वहन करते हैं। जैसे बालक माता पिता पर निर्भर होकर निश्चिन्त विचरता है और माता-पिता ही सब प्रकार से उसका पालन पोषण करते हैं, उसी प्रकार, नहीं-नहीं, उससे भी बढ़कर भगवान् अपने आश्रित का पालन-पोषण और संरक्षण करते हैं। यही क्या, वे तो अपने-आपको ही उसके समर्पण कर देते हैं। अतः तुमलोगोंको- अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (गीता ९। २२) -इस श्लोक में कही हुई बात पर विश्वास करके नित्य-निरन्तर भगवान् का ही चिन्तन करना चाहिये तथा अर्थ और भाव को समझकर नित्य श्रीगीता का अध्ययनाध्यापन करना चाहिये। इसके बाद वे दोनों भाई बड़े भाई के साथ रहकर उनकी आज्ञा के अनुसार नित्य-निरन्तर जप, ध्यान तथा गीता का पाठ करने लगे एवं थोड़े ही समयमें भगवान् की भक्ति करके भगवत्कृपा से भगवान् को प्राप्त हो गये। यह कहानी कहाँ तक सच्ची है, इसका पता नहीं है; किंतु हमें इससे यह शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये कि भगवान् पर निर्भर होने पर भगवान् योगक्षेम का वहन करते हैं। अतः हम भी इस पर विश्वास करके भगवान् पर निर्भर हो जायँ। सबसे उत्तम बात तो यह है कि नित्य-निरन्तर भगवान् का निष्काम भाव से चिन्तन करना चाहिये। योगक्षेम की भी इच्छा न करके भगवान् में केवल अहैतुक विशुद्ध प्रेम हो, इसी के लिये प्रयत्न करना चाहिये। किंतु यदि योगक्षेम की ही इच्छा हो तो सच्चे-पारमार्थिक योगक्षेम की इच्छा करनी चाहिये। अप्राप्त की प्राप्ति का नाम ‘योग’ है और प्राप्त की रक्षा का नाम 'क्षेम' है। पारमार्थिक योगक्षेम का अभिप्राय यह है कि परमात्मा की प्राप्ति के मार्ग में जहाँ तक हम आगे बढ़ चुके हैं, उस प्राप्त साधन सम्पत्ति की तो भगवान् रक्षा करते हैं और भगवान् की प्राप्ति में जो कुछ कमी है, उसकी पूर्ति भगवान् कर देते हैं। ऐसा भगवान् ने आश्वासन दिया है। इस प्रकार समझकर और इस पर विश्वास करके भगवान् पर निर्भर एवं निर्भय हो जायँ, भगवच्चिन्तन के सिवा और कुछ भी चिन्ता न करें। जो लोग सांसारिक योगक्षेम के लिये भगवान् को भजते हैं, वे भी न भजने वालों की अपेक्षा बहुत उत्तम हैं; क्योंकि भगवान् ने अर्थार्थी, आर्त आदि भक्तों को भी उदार-श्रेष्ठ बतलाया है- 'उदाराः सर्व एवैते' (गीता ७।१८)-और ज्ञानी निष्काम अनन्य भक्त को तो अपना स्वरूप ही बतलाया है; क्योंकि उस निष्कामी ज्ञानी को एक भगवान् के सिवा अन्य कोई गति है ही नहीं। अतः हमको उचित है कि हम भगवान् के निष्काम ज्ञानी अनन्य भक्त बनें; क्योंकि ऐसा भक्त भगवान् को अत्यन्त प्रिय है। भगवान् ने कहा है- तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ (गीता ७॥ १७) ‘उन भक्तों में नित्य मुझ में एकी भाव से स्थित अनन्यप्रेम-भक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है; क्योंकि मुझको तत्त्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है।' ----------:::×:::---------- लेखनी: श्रीजयदयालजी गोयन्दका पुस्तक: 'शिक्षाप्रद ग्यारह कहानियाँ' कोडः २८३ प्रकाशक: गीताप्रेस (गोरखपुर) "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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Somya Dec 5, 2021

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. "अच्छा पैसा ही अच्छे काम में लगता है" अबुल अब्बास ईश्वर-विश्वासी त्यागी महात्मा थे; वे किसी से भीख नहीं माँगते, टोपी सीकर अपना गुजारा करते। एक टोपी की कीमत सिर्फ दो पैसे लेते। इनमें से, जो याचक पहले मिलता, उसे एक पैसा दे देते। बचे बरत नहीं लिये जाते, तब तक नयी टोपी नहीं सीते। भजन ही करते रहते। इनका एक धनी शिष्य था, उसके पास धर्मादे की निकाली हुई कुछ रकम थी। उसने एक दिन पूछा, 'भगवन् ! मैं किसको दान करूँ ?' महात्मा ने कहा- "जिसे सुपात्र समझो, उसी को दान करो।' शिष्य ने रास्ते में एक गरीब अन्धे को देखा और उसे सुपात्र समझकर एक सोने की मोहर दे दी। दूसरे दिन उसी रास्ते से शिष्य फिर निकला। पहले दिनवाला अन्धा दूसरे अन्धे से कह रहा था कि 'कल एक आदमी ने मुझको एक सोने की मोहर दी थी, मैंने उससे खूब शराब पी और रात को अमुक वेश्या के यहाँ गया।" शिष्य को यह सुनकर बड़ा खेद हुआ। उसने महात्मा के पास जाकर सारी बात कही। महात्मा ने उसने हाथ में एक पैसा देकर बोले- 'जा, जो सबसे पहले मिले उसी को पैसा दे देना और फिर देखना कि वह क्या करता है। यह, पैसा टोपी सीकर कमाया हुआ था। शिष्य पैसा लेकर निकला, उसे एक मनुष्य मिला; उसने उसको पैसा दे दिया और उसके पीछे-पीछे चलना शुरू किया। वह मनुष्य एक निर्जन स्थान में गया और उसने अपने कपड़ों में छिपाये हुए एक मरे पक्षी को निकालकर फेंक दिया। शिष्य ने उससे पूछा कि 'तुमने मरे हुए पक्षी को कपड़ों में क्यों छिपाया था और अब क्यों निकालकर फेंक दिया?' उसने कहा-आज सात दिन से मेरे कुटुम्ब को दाना-पानी नहीं मिला। भीख माँगना मुझे पसन्द नहीं; आज इस जगह मरे पक्षी को पड़ा देख मैंने लाचार होकर अपनी और परिवार की भूख मिटाने के लिये इसे उठा लिया था और घर लेकर जा रहा था। आपने मुझे बिना माँगे ही पैसा दे दिया, इसलिये अब मुझे इस मरे पक्षी की जरूरत नहीं रही। अतएव जहाँ से उठाया था, वही लाकर डाल दिया। शिष्य को उसकी बात सुनकर बड़ा अचरज हुआ। उसने महात्मा के पास जाकर सारा वृतांत कहा। महात्मा बोले-'यह स्पष्ट है कि तुमने दुराचारियों के साथ मिलकर अन्यायपूर्वक धन कमाया होगा, इसी से उस धन का दान दुराचारी अन्धे को दिया गया और उसने उससे सुरापान और वेश्यागमन किया मेरे न्यायपूर्वक कमाये हुए एक पैसे ने एक कुटुम्ब को निषिद्ध आहार से बचा लिया। ऐसा होना स्वाभाविक ही है। अच्छा पैसा ही अच्छे काम में लगता है।" -कल्याण ९४|१ (बोधकथा अंक) ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " *******************************************

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