
Rama Devi Sahu
1 hours ago
जब नारायण के बामन अवतार में राजा बलि ने ठाकुर जी से तीसरे पग को उसके सर पर रखने के लिए बोला तब ठाकुर जी ने प्रसन्न हो कर राजा बलि से वरदान मांगने को कहा राजा बलि ने वरदान में माँगा कि जब भी मैं अपने महल में प्रवेश करूँ या महल से निकलूँ तो मुझे आपके प्रत्यक्ष दर्शन होने चाहिए , ठाकुर जी ने कहा सीधे सीधे बोलो कि मै तुम्हारा द्वारपाल बन जाऊं , बलि ने कहा अब आप जो समझो। वचनबद्ध ठाकुर जी बलि के द्वार पर खड़े हो गए। कई दिन हो गए जब ठाकुर जी नहीं आये तो लक्ष्मी जी को वियोग सताने लगा , वे राजा बलि के महल पहुंची और ठाकुर जी से कहा चलो तब ठाकुर जी ने कहा मैं भक्त के आधीन हूँ जब तक वो मुझे जाने को नहीं कहता तब मैं नहीं जाऊँगा। लक्ष्मी जी एक दीन कन्या का वेश बना कर राजा बलि के समक्ष पहुँची। राजा बलि ने जब कहा कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूँ तब लक्ष्मी जी ने कहा कि मैं आपको भाई मानती हूँ और मैं चाहती हूँ आप मुझे अपनी बहन मानो , राजा बलि ने सहर्ष स्वीकार कर लिया , किन्तु लक्ष्मी जी ने कहा हमको कुछ क्रिया करनी पड़ेगी जिससे हम दोनों एक दूसरे की सुरक्षा के हेतु वचन बद्ध हो जाएँ, तब लक्ष्मी जी ने राजा बलि की कलाई पर एक सूत्र बाँध दिया और राजा बलि से उपहार मांगा , बलि ने पूछा क्या उपहार चाहिए तब लक्ष्मी जी ने कहा वो जो आपका द्वारपाल है मुझे उससे ब्याह करना है , राजा बलि ने कहा अरे वो द्वारपाल नहीं वो जगत पिता साक्षात् नारायण हैं और मेरी भक्ति से रीझ कर वो वहाँ खड़े हैं , वो केवल लक्ष्मी जी का ही वरण करते हैं , तब लक्ष्मी जी अपने स्वरुप में आ गयीं और कहा मैं ही लक्ष्मी हूँ अब मेरे प्राणनाथ को मुझे लौटा दो , राजा बलि ने कहा ऐसे नहीं आपने ब्याह की बात की है तो आप दोनों का ब्याह मेरे महल में ही होगा और तब नारायण और लक्ष्मी जी का ब्याह हुआ और लोग जैसे कन्यादान करते हैं ऐसे ही राजा बलि ने ठाकुर जी का दान लक्ष्मी जी को दिया रक्षा बंधन के उपहार स्वरुप।

Comments (1)

R k jangid phulera Jaipur
Aug 25, 2026
जय माता दी शुभ संध्या वंदन जी 🙏