Jasbir Singh nain
Jasbir Singh nain Nov 20, 2021

रविवार की व्रत कथा शुभ प्रभात जी 🌅 जय सूर्य देव जी 🙏🌅🙏🌹🙏🙏🙏🪔 रविवार का दिन सूर्य भगवान के लिए समर्पित है। इसलिए रविवार व्रत उनके लिए ही रखा जाता है। शास्त्रों में सूर्य को सृष्टि की आत्मा कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य ग्रह सभी ग्रहों के राजा हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह कमज़ोर होता है तो वह व्यक्ति रविवार का व्रत कर अपने सूर्य ग्रह को मजबूत बना सकता है। यह धरती पर ऊर्जा का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है। पेड़-पौधों, मनुष्यों और अन्य जीव-जंतुओं को सूर्य से ही ऊर्जा मिलती है। रविवार व्रत का महत्व हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में देवी/देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए भक्तों को पूजा-अर्चना, व्रत का पालन तथा दान करने के लिए कहा गया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्रत या उपवास करना ईश्वर की भक्ति करने का मार्ग है। धार्मिक दृष्टि से ऐसा कहा जाता है कि सूर्य की कृपा जिस व्यक्ति के ऊपर हो जाए तो उस व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और नौकरी में उच्च पद की प्राप्ति होती है। सूर्य के प्रभाव से व्यक्ति के अंदर राजसी गुण पैदा होते हैं। व्यक्ति समाज का नेतृत्व करता है। इसलिए सूर्य की कृपा दृष्टि पाने के लिए भक्तजन रविवार को उनका व्रत रखते हैं। लेकिन इस व्रत को विधि अनुसार ही किया जाना चाहिए। रविवार व्रत की विधि रविवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें । स्नान कर स्वच्छ कपड़े धारण करें । सूर्य देव का स्मरण करें । सूर्योदय के समय जल में रोली, लाल पुष्प, अक्षत तथा दुर्वा मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें । अर्घ्य देने से पूर्व सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें । व्रत के दौरान रविवार व्रत कथा का पाठ करें । सूर्यास्त के समय पूजा अर्चना के बाद सात्विक भोजन करें । सूर्य का वैदिक मंत्र ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च। हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।। सूर्य का तांत्रिक मंत्र ॐ घृणि सूर्याय नमः सूर्य का बीज मंत्र ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः व्रत हेतु पूजा सामग्री धूप,अगरबत्ती,जल पात्र,रोली,लाल चंद,लाल पुष्प,अक्षत दुर्वा,कपूर,पंचामृत आदि । सूर्यदेव की व्रत कथा प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुनकर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकंपा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिंता एवं कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था। उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई। प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुंदर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुंदर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं। पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरंत उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी। बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ। उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उसे नगर के राजा के पास भेज दिया। सुंदर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यासी बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरंत लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा. तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया। राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दंड दिया। फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए, राजतय में चारों ओर खुशहाली छा गई। स्त्री-पुरुष सुखी जीवन यापन करने लगे तथा सभी लोगों के शारीरिक कष्ट भी दूर हो गए। श्री सूर्य देव की आरती जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥ रजनीपति मदहारी, शतदल जीवनदाता। षटपद मन मुदकारी, हे दिनमणि दाता॥ जग के हे रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥ नभमंडल के वासी, ज्योति प्रकाशक देवा। निज जन हित सुखरासी, तेरी हम सबें सेवा॥ करते हैं रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥ कनक बदन मन मोहित, रुचिर प्रभा प्यारी। निज मंडल से मंडित, अजर अमर छविधारी॥ हे सुरवर रविदेव, जय जय जय रविदेव। जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

रविवार की व्रत कथा
शुभ प्रभात जी 🌅 जय सूर्य देव जी 🙏🌅🙏🌹🙏🙏🙏🪔
रविवार का दिन सूर्य भगवान के लिए समर्पित है। इसलिए रविवार व्रत उनके लिए ही रखा जाता है। शास्त्रों में सूर्य को सृष्टि की आत्मा कहा गया है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य ग्रह को आत्मा का कारक माना गया है। सूर्य ग्रह सभी ग्रहों के राजा हैं। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह कमज़ोर होता है तो वह व्यक्ति रविवार का व्रत कर अपने सूर्य ग्रह को मजबूत बना सकता है। यह धरती पर ऊर्जा का सबसे बड़ा प्राकृतिक स्रोत है। पेड़-पौधों, मनुष्यों और अन्य जीव-जंतुओं को सूर्य से ही ऊर्जा मिलती है।



रविवार व्रत का महत्व

हिन्दू धार्मिक ग्रंथो में देवी/देवताओं का आशीर्वाद पाने के लिए भक्तों को पूजा-अर्चना, व्रत का पालन तथा दान करने के लिए कहा गया है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि व्रत या उपवास करना ईश्वर की भक्ति करने का मार्ग है। धार्मिक दृष्टि से ऐसा कहा जाता है कि सूर्य की कृपा जिस व्यक्ति के ऊपर हो जाए तो उस व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और नौकरी में उच्च पद की प्राप्ति होती है। सूर्य के प्रभाव से व्यक्ति के अंदर राजसी गुण पैदा होते हैं। व्यक्ति समाज का नेतृत्व करता है। इसलिए सूर्य की कृपा दृष्टि पाने के लिए भक्तजन रविवार को उनका व्रत रखते हैं। लेकिन इस व्रत को विधि अनुसार ही किया जाना चाहिए।



रविवार व्रत की विधि

रविवार के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठें ।

स्नान कर स्वच्छ कपड़े धारण करें ।

सूर्य देव का स्मरण करें ।

सूर्योदय के समय जल में रोली, लाल पुष्प, अक्षत तथा दुर्वा मिलाकर सूर्य को अर्घ्य दें ।

अर्घ्य देने से पूर्व सूर्य के बीज मंत्र का जाप करें ।

व्रत के दौरान रविवार व्रत कथा का पाठ करें ।

सूर्यास्त के समय पूजा अर्चना के बाद सात्विक भोजन करें ।



सूर्य का वैदिक मंत्र

ॐ आ कृष्णेन रजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यं च।
हिरण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।।

सूर्य का तांत्रिक मंत्र

ॐ घृणि सूर्याय नमः

सूर्य का बीज मंत्र

ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः

व्रत हेतु पूजा सामग्री

धूप,अगरबत्ती,जल पात्र,रोली,लाल चंद,लाल पुष्प,अक्षत दुर्वा,कपूर,पंचामृत आदि ।



सूर्यदेव की व्रत कथा

प्राचीन काल में एक बुढ़िया रहती थी। वह नियमित रूप से रविवार का व्रत करती। रविवार के दिन सूर्योदय से पहले उठकर बुढ़िया स्नानादि से निवृत्त होकर आंगन को गोबर से लीपकर स्वच्छ करती, उसके बाद सूर्य भगवान की पूजा करते हुए रविवार व्रत कथा सुनकर सूर्य भगवान का भोग लगाकर दिन में एक समय भोजन करती। सूर्य भगवान की अनुकंपा से बुढ़िया को किसी प्रकार की चिंता एवं कष्ट नहीं था। धीरे-धीरे उसका घर धन-धान्य से भर रहा था।

उस बुढ़िया को सुखी होते देख उसकी पड़ोसन उससे जलने लगी। बुढ़िया ने कोई गाय नहीं पाल रखी थी। अतः वह अपनी पड़ोसन के आंगन में बंधी गाय का गोबर लाती थी। पड़ोसन ने कुछ सोचकर अपनी गाय को घर के भीतर बांध दिया। रविवार को गोबर न मिलने से बुढ़िया अपना आंगन नहीं लीप सकी। आंगन न लीप पाने के कारण उस बुढ़िया ने सूर्य भगवान को भोग नहीं लगाया और उस दिन स्वयं भी भोजन नहीं किया। सूर्यास्त होने पर बुढ़िया भूखी-प्यासी सो गई।

प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उस बुढ़िया की आंख खुली तो वह अपने घर के आंगन में सुंदर गाय और बछड़े को देखकर हैरान हो गई। गाय को आंगन में बांधकर उसने जल्दी से उसे चारा लाकर खिलाया। पड़ोसन ने उस बुढ़िया के आंगन में बंधी सुंदर गाय और बछड़े को देखा तो वह उससे और अधिक जलने लगी। तभी गाय ने सोने का गोबर किया। गोबर को देखते ही पड़ोसन की आंखें फट गईं।

पड़ोसन ने उस बुढ़िया को आसपास न पाकर तुरंत उस गोबर को उठाया और अपने घर ले गई तथा अपनी गाय का गोबर वहां रख आई। सोने के गोबर से पड़ोसन कुछ ही दिनों में धनवान हो गई। गाय प्रति दिन सूर्योदय से पूर्व सोने का गोबर किया करती थी और बुढ़िया के उठने के पहले पड़ोसन उस गोबर को उठाकर ले जाती थी।

बहुत दिनों तक बुढ़िया को सोने के गोबर के बारे में कुछ पता ही नहीं चला। बुढ़िया पहले की तरह हर रविवार को भगवान सूर्यदेव का व्रत करती रही और कथा सुनती रही। लेकिन सूर्य भगवान को जब पड़ोसन की चालाकी का पता चला तो उन्होंने तेज आंधी चलाई। आंधी का प्रकोप देखकर बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बांध दिया। सुबह उठकर बुढ़िया ने सोने का गोबर देखा उसे बहुत आश्चर्य हुआ।

उस दिन के बाद बुढ़िया गाय को घर के भीतर बांधने लगी। सोने के गोबर से बुढ़िया कुछ ही दिन में बहुत धनी हो गई। उस बुढ़िया के धनी होने से पड़ोसन बुरी तरह जल-भुनकर राख हो गई और उसने अपने पति को समझा-बुझाकर उसे नगर के राजा के पास भेज दिया। सुंदर गाय को देखकर राजा बहुत खुश हुआ। सुबह जब राजा ने सोने का गोबर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

उधर सूर्य भगवान को भूखी-प्यासी बुढ़िया को इस तरह प्रार्थना करते देख उस पर बहुत करुणा आई। उसी रात सूर्य भगवान ने राजा को स्वप्न में कहा, राजन, बुढ़िया की गाय व बछड़ा तुरंत लौटा दो, नहीं तो तुम पर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ेगा. तुम्हारा महल नष्ट हो जाएगा। सूर्य भगवान के स्वप्न से बुरी तरह भयभीत राजा ने प्रातः उठते ही गाय और बछड़ा बुढ़िया को लौटा दिया।

राजा ने बहुत-सा धन देकर बुढ़िया से अपनी गलती के लिए क्षमा मांगी। राजा ने पड़ोसन और उसके पति को उनकी इस दुष्टता के लिए दंड दिया। फिर राजा ने पूरे राज्य में घोषणा कराई कि सभी स्त्री-पुरुष रविवार का व्रत किया करें। रविवार का व्रत करने से सभी लोगों के घर धन-धान्य से भर गए, राजतय में चारों ओर खुशहाली छा गई। स्त्री-पुरुष सुखी जीवन यापन करने लगे तथा सभी लोगों के शारीरिक कष्ट भी दूर हो गए।



श्री सूर्य देव की आरती

जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

रजनीपति मदहारी, शतदल जीवनदाता।
षटपद मन मुदकारी, हे दिनमणि दाता॥

जग के हे रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

नभमंडल के वासी, ज्योति प्रकाशक देवा।
निज जन हित सुखरासी, तेरी हम सबें सेवा॥

करते हैं रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

कनक बदन मन मोहित, रुचिर प्रभा प्यारी।
निज मंडल से मंडित, अजर अमर छविधारी॥

हे सुरवर रविदेव, जय जय जय रविदेव।
जय जय जय रविदेव, जय जय जय रविदेव॥

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कामेंट्स

योगेश जानी Nov 21, 2021
ॐ सूयॅदेवाय नमः शुभ रविवार आप का दिन शुभहो नमस्ते

Brajesh Sharma Nov 21, 2021
👌❤🙏🎋🇮🇳👌🎋❤🇮🇳🙏👌🎋 ॐआदित्याय नमः ॐसूर्याय नमः ॐभास्कराय नमः राम राम जी जय जय श्री राम

Rajbirsingh Nov 21, 2021
Good morning Nain Sahab Aradhya Ki Aradhna Asan Nahi Dhanyavad

Vijay Sharma_9737329188 Nov 21, 2021
@jasbirnain ॐ आदित्ये नम:👏☘️🍀🌺 सुप्रभात वंदनजी🍁✨🌟🙏 सूर्यदेव जी की कृपा सदैव आप पर बनी रहे✴️☀️💥👏

Shivsanker Shukla Nov 21, 2021
सप्रेम सुप्रभात भैया जी राधे-राधे

kamala Maheshwari Nov 21, 2021
जयश्री कृष्णा जी ऊं सुर्यदेवाय नमः जय श्री राधे रानी कीबाकैविहारी कीकानहाकी कृपादृष्टि सदैव आपके उपर बनी रहेंआज  केदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं जी,, जय श्री कृष्णा जी ♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠♦️💠

R.K.SONI (Ganesh Mandir) Nov 21, 2021
Radhe Radhe Ji🙏 Aap Hmesha Khush Rhe Ji. V. Nice Post Ji. 👌👌👌🌹🌹🌹🌹🌲🌲🌲🌹🌹🙏

my mandir Nov 25, 2021

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Sajjan Singhal Nov 26, 2021

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Garima Gahlot Rajput Nov 25, 2021

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Ramesh agrawal Nov 25, 2021

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my mandir Nov 24, 2021

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Anju Mishra Nov 25, 2021

जय श्री राधे कृष्णा *हे कृष्ण.... 🌸* 🌸जब छोड़ चलु इस दुनिया को, होठों पर नाम तुम्हारा हो, जब छोड़ चलु इस दुनिया को, होठों पर नाम तुम्हारा हो 🌸चाहे स्वर्ग मिले या नर्क मिले, हृदय में वास तुम्हारा हो तन श्याम नाम की चादर हो, जब गहरी नींद में सोयी रहूँ कानो में मेरे गुंजित हो, कान्हा बस नाम तुम्हारा हो 🌸रस्ते में तुम्हारा मंदिर हो, जब मंजिल को प्रस्थान करूँ चौखट पे तेरी मनमोहन, अंतिम प्रणाम हमारा हो 🌸उस वक्त कन्हैया आ जाना, जब चिता पर जाके शयन करूँ मेरे मुख में तुलसी दल देना, इतना बस काम तुम्हारा हो 🌸गर सेवा की मैंने तेरी, तो उसका ये उपहार मिले इस तुच्छ भगत का साँवरिये, नहीं आना कभी भी दुबारा हो 🌸जब छोड़ चलु इस दुनिया को, होठों पर नाम तुम्हारा हो चाहे स्वर्ग मिले या नर्क मिले, ह्रदय में वास तुम्हारा हो. *⛅ राधे राधे*

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Jasbir Singh nain Nov 23, 2021

बुधवार को करें गणेशजी का व्रत शुभ प्रभात जी 🪔 जय श्री गणेश जी 🪔🪴🙏🙏🙏🙏🙏 हिन्दू ज्योतिषशास्त्र के अनुसार बुधवार को अगर कोई व्यक्ति व्रत रखता है तो उसके ज्ञान में वृद्धि होती है। जो लोग व्यापार से जुड़े हैं और इस क्षेत्र में आने वाली बाधाओं से बचना चाहते हैं तो ऐसे लोगों के लिए भी यह व्रत बहुत लाभकारी सिद्ध होता है। इसके अलावा जिन लोगों की कुंडली में बुध ग्रह कमजोर होता है और इसके अच्छे परिणाम उनको नहीं मिलते तो ऐसे लोगों के लिए भी बुधवार का व्रत करना बहुत फलदायी माना जाता है। अगर कुंडली में बुध अशुभ भाव का स्वामी है तो ऐसे जातकों को भी बुधवार का व्रत रखना चाहिए। बुधवार व्रत का महत्व जो लोग बुधवार को सच्चे मन से व्रत लेते हैं उनको इसके कई अच्छे फल मिलते हैं। बुधवार को व्रत रखने से मनुष्य का बौद्धिक विकास होता है और साथ ही उन्हें सोचने-समझने की क्षमता में भी वृद्धि होती है। बुधवार का व्रत बुध ग्रह के शुभ परिणाम प्राप्त करने के लिए भी रखा जाता है। इसके अलावा इस व्रत को रखने से घर में धन और सुख समृद्धि आती है। बुध एक सौम्य ग्रह है जिसके अच्छे प्रभाव इंसान को कई उपलब्धियाँ दिलाते हैं इसलिए कई लोग इस व्रत का पालन करते हैं। बुध को मजबूत करने के लिए बुध यंत्र को बुध की होरा और बुध के नक्षत्र के समय करें स्थापित। बुधवार व्रत की संपूर्ण विधि बुधवार के दिन व्रत रखें और भगवान बुध की पूजा करें। इस दिन पूजा के वक्त बुधवार व्रत कथा का पाठ करें और उसके बाद आरती करें। उपवास में दिन के वक्त न सोए व किसी से वाद-विवाद करने से बचें। सूर्यास्त के बाद पूजा करें और भगवान बुध को दीप, धूप, गुड़ और दही चढ़ाएं। पूजा समाप्ति के बाद सबको प्रसाद बांटें और अंत में खुद प्रसाद का सेवन करें। बुधवार व्रत की पूजा सामग्री बुधवार व्रत की पूजा को करने के लिए कुछ चीजें बहुत महत्वपूर्ण हैं। जिनके बिना पूजा अधूरी रहती है। ये चीजें हैं:- भगवान बुध की मूर्ति कांस्य का एक पात्र हरा वस्त्र पंचामृत (गाय का कच्चा दूध, दही, घी, शहद एवं शर्करा मिला हुआ) पान, सुपारी, लौंग, इलाइची कपूर और पूजा के पात्र गणेशजी की व्रत कथा एक बुढ़िया थी। वह बहुत ही ग़रीब और अंधी थीं। उसके एक बेटा और बहू थे। वह बुढ़िया सदैव गणेश जी की पूजा किया करती थी। एक दिन गणेश जी प्रकट होकर उस बुढ़िया से बोले- ‘बुढ़िया मां! तू जो चाहे सो मांग ले।’ बुढ़िया बोली- ‘मुझसे तो मांगना नहीं आता। कैसे और क्या मांगू?’ तब गणेशजी बोले - ‘अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग ले।’ तब बुढ़िया ने अपने बेटे से कहा- ‘गणेशजी कहते हैं ‘तू कुछ मांग ले’ बता मैं क्या मांगू?’ पुत्र ने कहा- ‘मां! तू धन मांग ले।’ बहू से पूछा तो बहू ने कहा- ‘नाती मांग ले।’ तब बुढ़िया ने सोचा कि ये तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: उस बुढ़िया ने पड़ोसिनों से पूछा, तो उन्होंने कहा- ‘बुढ़िया! तू तो थोड़े दिन जीएगी, क्यों तू धन मांगे और क्यों नाती मांगे। तू तो अपनी आंखों की रोशनी मांग ले, जिससे तेरी ज़िन्दगी आराम से कट जाए।’ इस पर बुढ़िया बोली- ‘यदि आप प्रसन्न हैं, तो मुझे नौ करोड़ की माया दें, निरोगी काया दें, अमर सुहाग दें, आंखों की रोशनी दें, नाती दें, पोता, दें और सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।’ यह सुनकर तब गणेशजी बोले- ‘बुढ़िया मां! तुने तो हमें ठग दिया। फिर भी जो तूने मांगा है वचन के अनुसार सब तुझे मिलेगा।’ और यह कहकर गणेशजी अंतर्धान हो गए। उधर बुढ़िया माँ ने जो कुछ मांगा वह सबकुछ मिल गया। हे गणेशजी महाराज! जैसे तुमने उस बुढ़िया माँ को सबकुछ दिया, वैसे ही सबको देना।

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