Jasbir Singh nain
Jasbir Singh nain Jan 10, 2022

मासिक दुर्गाष्टमी🙏🙏🙏 शुभ प्रभात जी 🪔🪴🙏🙏🙏 10 जनवरी, 2022 (सोमवार) हिंदू धर्म में मासिक दुर्गाष्टमी का विशेष महत्व होता है। नवरात्रि में पड़ने वाली अष्टमी को महाष्टमी कहा जाता है। इसके अलावा हर महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस दिन मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करने के साथ ही भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत भी रखते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से अराधना करने वालों पर मां दुर्गा अपनी कृपा बरसाती हैं। मासिक दुर्गाष्टमी का महत्व मासिक दुर्गाष्टमी के दिन व्रत व पूजन करने से मां जगदंबा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मान्यता है कि मां आदिशक्ति अपने भक्तों के कष्टों को दूर करती हैं। दुर्गाष्टमी व्रत करने से घर में खुशहाली, सुख-समृद्धि और धन आता है। मासिक दुर्गाष्टमी सरल पूजा विधि अष्टमी तिथि के दिन भक्त प्रातःकाल उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। घर में पूजा स्थल साफ-सफाई के बाद गंगाजल से शुद्ध करें। अब पूजा स्थल पर पूजा चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और माता दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। अब इनके समक्ष धूप - दीप जलाएं तथा मां दुर्गा को लाल चुनरी चढ़ाए। इसके बाद अक्षत, लाल पुष्प, फल और मिष्ठान भी अर्पित करें। अब मां दुर्गा की चालीसा करें और आरती उतारें। पूजा के समय इस बातों का रखें ध्यान घर में सुख और समृद्धि के लिए मां की ज्योति आग्नेय कोण में जलाना चाहिए। पूजा करने वाले का मुख पूजा के समय पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए। पूजा के समय पूजा का सामान दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना चाहिए। इस दिन कभी न करें ये गलतियां मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पूजा में तुलसी, आंवला, दूर्वा, मदार और आक के पुष्प का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और घर में कभी भी एक से अधिक मां दुर्गा की प्रतिमा या फोटो नहीं रखना चाहिए। मासिक दुर्गाष्टमी कथा पौराणिक मान्यताओं अनुसार, प्राचीन काल में असुर दंभ को महिषासुर नाम के एक पुत्र की प्राप्ति हुई थी, जिसके भीतर बचपन से ही अमर होने की प्रबल इच्छा थीं। अपनी इसी इच्छा की पूर्ति के लिए उसने अमर होने का वरदान हासिल करने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या आरंभ की। महिषासुर द्वारा की गई इस कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न भी हुए और उन्होंने वैसा ही किया जैसा महिषासुर चाहता था। ब्रह्मा जी ने खुश होकर उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा, ऐसे में महिषासुर, जो सिर्फ अमर होना चाहता था, उसने ब्रह्मा जी से वरदान मांगते हुए खुद को अमर करने के लिए उन्हें बाध्य कर दिया। परन्तु ब्रह्मा जी ने महिषासुर को अमरता का वरदान देने की बात ये कहते हुए टाल दी कि जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म निश्चित है, इसलिए अमरता जैसी किसी बात का कोई अस्तित्व नहीं है। जिसके बाद ब्रह्मा जी की बात सुनकर महिषासुर ने उनसे एक अन्य वरदान मानने की इच्छा जताते हुए कहा कि ठीक है स्वामी, यदि मृत्यु होना तय है तो मुझे ऐसा वरदान दे दीजिये कि मेरी मृत्यु किसी स्त्री के हाथ से ही हो, इसके अलावा अन्य कोई दैत्य, मानव या देवता, कोई भी मेरा वध ना कर पाए। जिसके बाद ब्रह्मा जी ने महिषासुर को दूसरा वरदान दे दिया। ब्रह्मा जी द्वारा वरदान प्राप्त करते ही महिषासुर अहंकार से अंधा हो गया और इसके साथ ही बढ़ गया उसका अन्याय। मौत के भय से मुक्त होकर उसने अपनी सेना के साथ पृथ्वी लोक पर आक्रमण कर दिया, जिससे धरती चारों तरफ से त्राहिमाम-त्राहिमाम होने लगी। उसके बल के आगे समस्त जीवों और प्राणियों को नतमस्तक होना ही पड़ा। जिसके बाद पृथ्वी और पाताल को अपने अधीन करने के बाद अहंकारी महिषासुर ने इन्द्रलोक पर भी आक्रमण कर दिया, जिसमें उन्होंने इन्द्र देव को पराजित कर स्वर्ग पर भी कब्ज़ा कर लिया। महिषासुर से परेशान होकर सभी देवी-देवता त्रिदेवों (महादेव, ब्रह्मा और विष्णु) के पास सहायता मांगने पहुंचे। इस पर विष्णु जी ने उसके अंत के लिए देवी शक्ति के निर्णाम की सलाह दी। जिसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर देवी शक्ति को सहायता के लिए पुकारा और इस पुकार को सुनकर सभी देवताओं के शरीर में से निकले तेज ने एक अत्यंत खूबसूरत सुंदरी का निर्माण किया। उसी तेज से निकली मां आदिशक्ति जिसके रूप और तेज से सभी देवता भी आश्चर्यचकित हो गए। त्रिदेवों की मदद से निर्मित हुई देवी दुर्गा को हिमवान ने सवारी के लिए सिंह दिया और इसी प्रकार वहां मौजूद सभी देवताओं ने भी मां को अपने एक-एक अस्त्र-शस्त्र सौंपे और इस तरह स्वर्ग में देवी दुर्गा को इस समस्या हेतु तैयार किया गया। माना जाता है कि देवी का अत्यंत सुन्दर रूप देखकर महिषासुर उनके प्रति बहुत आकर्षित होने लगा और उसने अपने एक दूत के जरिए देवी के पास विवाह का प्रस्ताव तक पहुंचाया। अहंकारी महिषासुर की इस ओच्छी हरकत ने देवी भगवती को अत्याधिक क्रोधित कर दिया, जिसके बाद ही मां ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा। मां दुर्गा से युद्ध की ललकार सुनकर ब्रह्मा जी से मिले वरदान के अहंकार में अंधा महिषासुर उनसें युद्ध करने के लिए तैयार भी हो गया। इस युद्ध में एक-एक करके महिषासुर की संपूर्ण सेना का मां दुर्गा ने सर्वनाश कर दिया। इस दौरान माना ये भी जाता है कि ये युद्ध पूरे नौ दिनों तक चला जिस दौरान असुरों के सम्राट महिषासुर ने विभिन्न रूप धककर देवी को छलने की कई बार कोशिश की, लेकिन उसकी सभी कोशिश आखिरकार नाकाम रही और देवी भगवती ने अपने चक्र से इस युद्ध में महिषासुर का सिर काटते हुए उसका वध कर दिया। अंत: इस तरह देवी भगवती के हाथों महिषासुर की मृत्यु संभव हो पाई। माना जाता है कि जिस दिन मां भगवती ने स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक को महिषासुर के पापों से मुक्ति दिलाई उस दिन से ही दुर्गा अष्टमी का पर्व प्रारम्भ हुआ।

मासिक दुर्गाष्टमी🙏🙏🙏
शुभ प्रभात जी 🪔🪴🙏🙏🙏
10 जनवरी, 2022 (सोमवार)



हिंदू धर्म में मासिक दुर्गाष्टमी का विशेष महत्व होता है। नवरात्रि में पड़ने वाली अष्टमी को महाष्टमी कहा जाता है। इसके अलावा हर महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक दुर्गाष्टमी का व्रत रखा जाता है। इस दिन मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा करने के साथ ही भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए व्रत भी रखते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से अराधना करने वालों पर मां दुर्गा अपनी कृपा बरसाती हैं।

मासिक दुर्गाष्टमी का महत्व

मासिक दुर्गाष्टमी के दिन व्रत व पूजन करने से मां जगदंबा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मान्यता है कि मां आदिशक्ति अपने भक्तों के कष्टों को दूर करती हैं। दुर्गाष्टमी व्रत करने से घर में खुशहाली, सुख-समृद्धि और धन आता है।



मासिक दुर्गाष्टमी सरल पूजा विधि

अष्टमी तिथि के दिन भक्त प्रातःकाल उठकर स्नान कर साफ कपड़े पहनें। घर में पूजा स्थल साफ-सफाई के बाद गंगाजल से शुद्ध करें। अब पूजा स्थल पर पूजा चौकी पर लाल कपड़ा बिछाएं और माता दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करें। अब इनके समक्ष धूप - दीप जलाएं तथा मां दुर्गा को लाल चुनरी चढ़ाए। इसके बाद अक्षत, लाल पुष्प, फल और मिष्ठान भी अर्पित करें। अब मां दुर्गा की चालीसा करें और आरती उतारें।

पूजा के समय इस बातों का रखें ध्यान

घर में सुख और समृद्धि के लिए मां की ज्योति आग्नेय कोण में जलाना चाहिए।

पूजा करने वाले का मुख पूजा के समय पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ होना चाहिए।

पूजा के समय पूजा का सामान दक्षिण-पूर्व दिशा में रखना चाहिए।



इस दिन कभी न करें ये गलतियां

मासिक दुर्गाष्टमी की पूजा करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि पूजा में तुलसी, आंवला, दूर्वा, मदार और आक के पुष्प का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और घर में कभी भी एक से अधिक मां दुर्गा की प्रतिमा या फोटो नहीं रखना चाहिए।

मासिक दुर्गाष्टमी कथा

पौराणिक मान्यताओं अनुसार, प्राचीन काल में असुर दंभ को महिषासुर नाम के एक पुत्र की प्राप्ति हुई थी, जिसके भीतर बचपन से ही अमर होने की प्रबल इच्छा थीं। अपनी इसी इच्छा की पूर्ति के लिए उसने अमर होने का वरदान हासिल करने के लिए ब्रह्मा जी की घोर तपस्या आरंभ की। महिषासुर द्वारा की गई इस कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी प्रसन्न भी हुए और उन्होंने वैसा ही किया जैसा महिषासुर चाहता था। ब्रह्मा जी ने खुश होकर उसे मनचाहा वरदान मांगने को कहा, ऐसे में महिषासुर, जो सिर्फ अमर होना चाहता था, उसने ब्रह्मा जी से वरदान मांगते हुए खुद को अमर करने के लिए उन्हें बाध्य कर दिया।



परन्तु ब्रह्मा जी ने महिषासुर को अमरता का वरदान देने की बात ये कहते हुए टाल दी कि जन्म के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद जन्म निश्चित है, इसलिए अमरता जैसी किसी बात का कोई अस्तित्व नहीं है। जिसके बाद ब्रह्मा जी की बात सुनकर महिषासुर ने उनसे एक अन्य वरदान मानने की इच्छा जताते हुए कहा कि ठीक है स्वामी, यदि मृत्यु होना तय है तो मुझे ऐसा वरदान दे दीजिये कि मेरी मृत्यु किसी स्त्री के हाथ से ही हो, इसके अलावा अन्य कोई दैत्य, मानव या देवता, कोई भी मेरा वध ना कर पाए।

जिसके बाद ब्रह्मा जी ने महिषासुर को दूसरा वरदान दे दिया। ब्रह्मा जी द्वारा वरदान प्राप्त करते ही महिषासुर अहंकार से अंधा हो गया और इसके साथ ही बढ़ गया उसका अन्याय। मौत के भय से मुक्त होकर उसने अपनी सेना के साथ पृथ्वी लोक पर आक्रमण कर दिया, जिससे धरती चारों तरफ से त्राहिमाम-त्राहिमाम होने लगी। उसके बल के आगे समस्त जीवों और प्राणियों को नतमस्तक होना ही पड़ा। जिसके बाद पृथ्वी और पाताल को अपने अधीन करने के बाद अहंकारी महिषासुर ने इन्द्रलोक पर भी आक्रमण कर दिया, जिसमें उन्होंने इन्द्र देव को पराजित कर स्वर्ग पर भी कब्ज़ा कर लिया।

महिषासुर से परेशान होकर सभी देवी-देवता त्रिदेवों (महादेव, ब्रह्मा और विष्णु) के पास सहायता मांगने पहुंचे। इस पर विष्णु जी ने उसके अंत के लिए देवी शक्ति के निर्णाम की सलाह दी। जिसके बाद सभी देवताओं ने मिलकर देवी शक्ति को सहायता के लिए पुकारा और इस पुकार को सुनकर सभी देवताओं के शरीर में से निकले तेज ने एक अत्यंत खूबसूरत सुंदरी का निर्माण किया। उसी तेज से निकली मां आदिशक्ति जिसके रूप और तेज से सभी देवता भी आश्चर्यचकित हो गए।



त्रिदेवों की मदद से निर्मित हुई देवी दुर्गा को हिमवान ने सवारी के लिए सिंह दिया और इसी प्रकार वहां मौजूद सभी देवताओं ने भी मां को अपने एक-एक अस्त्र-शस्त्र सौंपे और इस तरह स्वर्ग में देवी दुर्गा को इस समस्या हेतु तैयार किया गया। माना जाता है कि देवी का अत्यंत सुन्दर रूप देखकर महिषासुर उनके प्रति बहुत आकर्षित होने लगा और उसने अपने एक दूत के जरिए देवी के पास विवाह का प्रस्ताव तक पहुंचाया। अहंकारी महिषासुर की इस ओच्छी हरकत ने देवी भगवती को अत्याधिक क्रोधित कर दिया, जिसके बाद ही मां ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा।

मां दुर्गा से युद्ध की ललकार सुनकर ब्रह्मा जी से मिले वरदान के अहंकार में अंधा महिषासुर उनसें युद्ध करने के लिए तैयार भी हो गया। इस युद्ध में एक-एक करके महिषासुर की संपूर्ण सेना का मां दुर्गा ने सर्वनाश कर दिया। इस दौरान माना ये भी जाता है कि ये युद्ध पूरे नौ दिनों तक चला जिस दौरान असुरों के सम्राट महिषासुर ने विभिन्न रूप धककर देवी को छलने की कई बार कोशिश की, लेकिन उसकी सभी कोशिश आखिरकार नाकाम रही और देवी भगवती ने अपने चक्र से इस युद्ध में महिषासुर का सिर काटते हुए उसका वध कर दिया। अंत: इस तरह देवी भगवती के हाथों महिषासुर की मृत्यु संभव हो पाई।

माना जाता है कि जिस दिन मां भगवती ने स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक को महिषासुर के पापों से मुक्ति दिलाई उस दिन से ही दुर्गा अष्टमी का पर्व प्रारम्भ हुआ।

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कामेंट्स

SANTOSH YADAV Jan 10, 2022
जय श्री गणेश ओम नमः शिवाय शुभ सोमवार वंदन जी

Brajesh Sharma Jan 10, 2022
ॐ नमः शिवाय.. हर हर महादेव *त्रुटि रहित न मैं हूँ, न तुम हो,* *दोनों मनुष्य हैं,* *भगवान न मैं हूँ,  न तुम हो।* *परस्पर  हम  दोष देते हैं,* *एक दूसरे  को,* *पर  अपने  अंदर* *झाँकता न मैं हूँ,न तुम हो।* *भ्रम ने पैदां कर दी इंसानों में दूरियाँ*, *पर  सच में बुरा न मैं हूँ, न तुम हो!!*   हर हर महादेव.. राम राम जी खुश रहें मस्त रहें स्वस्थ रहें व्यस्त रहें

पं. सर्व कान्त शुक्ला Jan 10, 2022
।।।। हर हर महादेव।।।। ।।।।। ॐ नमः शिवाय।।।।। ।।।। सुबह का सादर सप्रेम वंदन।।। 🌹🙏🏻🌹

SANTOSH YADAV Jan 11, 2022
जय श्री गणेश जय श्री हनुमान शुभ मंगलवार वंदन जी

Brajesh Sharma Jan 11, 2022
जय जय श्री राधे कृष्णा जी राम लक्ष्मण जानकी जय बोलो हनुमान की राम राम जी जय जय श्री राम ॐ नमः शिवाय.. हर हर महादेव खुश रहें मस्त रहें स्वस्थ रहें व्यस्त रहें

Laxmi Narain Khinchi Jan 12, 2022
🌹🌹🌹 Jai shree Radhe Krishna Ji 🙏🙏 Suparbhat Sneha Vandan Ji 🙏🙏 Have a wonderful day 💛❤️💛🥀🥀 Ishwar aapki har manokamna puri kare Ji 💛❤️💛🙏🙏🌷🌷🌷

Jasbir Singh nain Jan 21, 2022

संकष्टी चतुर्थी स्पेशल 21 जनवरी , 2022 (शुक्रवार) शुभ प्रभात जी 🌅🪔🙏🙏🙏🙏🙏🙏 संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित होती है। जिसका मतलब होता है ‘कठिन समय से मुक्ति पाना’। महीने में दो चतुर्थी आती है, लेकिन पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को अर्थात कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इसके अलावा इसे द्विजप्रिय संकष्टी के नाम से भी जाना जाता है। भारत के उत्तरी एवं दक्षिणी राज्यों में संकष्टी चतुर्थी का व्रत बड़े ही धूम धाम से किया जाता है। गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है और हर शुभ कार्य से पहले उन्हें ही पूजा जाता है। इसीलिए इस दिन व्रत रखने वालों के गणेशजी हर दुख दर्द हर लेते हैं। इस दिन महिलाएं पूरे विधि-विधान से भगवान गणेशजी की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की लंबी आयु और खुशहाली के लिए भगवान गणेश का पूजन करती हैं और उपवास रखती हैं। आइए अब जानते है संकष्टी चतुर्थी के व्रत की पूजा विधि के बारे में। इस दिन सुबह स्नान करके साफ हल्के लाल या पीले रंग के कपड़े पहनें। उसके बाद भगवान गणपति के चित्र को लाल रंग का कपड़ा बिछाकर रखें। भगवान गणेश की पूजा करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुंह करें। अब भगवान गणपति के सामने दीया जलाएं और लाल गुलाब के फूलों से भगवान गणपति को सजाएं। पूजा में रोली, मोली, चावल, दुर्वा, चंदन, फूल और तांबे के लौटे में जल अर्पित करें। प्रसाद के रूप में तिल के लड्डू, गुड़, केला और मोदक चढ़ाए जा सकते हैं। भगवान गणपति के सामने धूप दीप जलाकर उनकी विधिवत पूजा करें और दिन भार व्रत का पालन करें। फिर शाम के समय भगवान गणेश की प्रतिमा को ताजे फूलों से सजाए और व्रत कथा पढ़ें। इसके बाद संकष्टी चतुर्थी व्रत पारण करें। इस विधि से पूजा करने से भगवान गणेशजी आपके सारे दु:ख दर्द हर देंगे। तो आइए अब जानते है कि संकष्टी चतुर्थी के क्या करें और क्या ना करें। इस दिन भगवान गणेश जी की पूजा करते समय गणेश जी की आरती, मंत्र और गणेश चालीसा का पाठ करें और भगवान श्री गणेश की पूजा के दौरान संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की कथा अवश्य पढ़ें अथवा सुनें। इसी के साथ गणेश जी को शमी का पत्ता या बेलपत्र अर्पित करें। जिन व्यक्तियों का इस दिन व्रत होता है वे केवल फल, साबूदाना, मूंगफली और आलू ग्रहण करें। इसी के साथ अब जानेंगे कि व्रत के दौरान हमें किन-किन बातों का विशेष तौर से ध्यान रखना चाहिए। भगवान गणेशजी को तुलसी कभी नहीं चढ़ाई जाती है। इसलिए इस दिन भी आप गणेशजी को तुलसी ना चढ़ाएं। संकष्टी चतुर्थी के दिन किसी की बुराई ना करें, किसी स्त्री का अपमान ना करें। संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा एक बार की बात है माता पार्वती और भगवान शिव नदी के पास बैठे हुए थे, तभी अचानक माता पार्वती ने चौपड़ खेलने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की। लेकिन समस्या की बात यह थी कि वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभाए। इस समस्या का समाधान निकालते हुए शिव और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाल दी। मिट्टी से बने बालक को दोनों ने यह आदेश दिया कि तुम खेल को अच्छी तरह से देखना और यह फैसला लेना कि कौन जीता और कौन हारा। खेल शुरू हुआ जिसमें माता पार्वती बार-बार भगवान शिव को मात देकर विजयी हो रही थीं। खेल चलते रहा लेकिन एक बार गलती से बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। बालक की इस गलती ने माता पार्वती को बहुत क्रोधित कर दिया जिसकी वजह से गुस्से में आकर बालक को श्राप दे दिया और वह लंगड़ा हो गया। बालक ने अपनी भूल के लिए माता से बहुत क्षमा मांगी और उसे माफ़ कर देने को कहा। बालक के बार-बार निवेदन को देखते हुए माता ने कहा कि अब श्राप वापस तो नहीं हो सकता लेकिन वह एक उपाय बता सकती हैं जिससे वह श्राप से मुक्ति पा सकेगा। तभी माता ने कहा कि संकष्टी वाले दिन पूजा करना, जहां पर कुछ कन्याएं आती हो और तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को सच्चे मन से करना। बालक ने व्रत की विधि को जानकर पूरी श्रद्धापूर्वक और विधि अनुसार उसे किया। उसकी सच्ची आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उसकी इच्छा पूछी। तभी बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की अपनी इच्छा को ज़ाहिर किया। गणेश ने उस बालक की मांग को पूरा कर दिया और उसे शिवलोक पंहुचा दिया, लेकिन जब वह पहुंचा तो वहां उसे केवल भगवान शिव ही मिले। माता पार्वती भगवान शिव से नाराज़ होकर कैलाश छोड़कर चली गई होती हैं। जब शिवजी ने उस बच्चे को पूछा की तुम यहां कैसे आए तो उसने बताया कि गणेश की पूजा से उसे यह वरदान प्राप्त हुआ है। यह जानने के बाद भगवान शिव ने भी पार्वती को मनाने के लिए उस व्रत को किया जिसके बाद माता पार्वती भगवान शिव से प्रसन्न होकर वापस कैलाश लौट आती हैं। नमस्कार।

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