Ramesh agrawal
Ramesh agrawal Nov 23, 2021

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kamlesh sharma Nov 23, 2021
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Jasbir Singh nain Jan 21, 2022

संकष्टी चतुर्थी स्पेशल 21 जनवरी , 2022 (शुक्रवार) शुभ प्रभात जी 🌅🪔🙏🙏🙏🙏🙏🙏 संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित होती है। जिसका मतलब होता है ‘कठिन समय से मुक्ति पाना’। महीने में दो चतुर्थी आती है, लेकिन पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को अर्थात कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इसके अलावा इसे द्विजप्रिय संकष्टी के नाम से भी जाना जाता है। भारत के उत्तरी एवं दक्षिणी राज्यों में संकष्टी चतुर्थी का व्रत बड़े ही धूम धाम से किया जाता है। गणेश जी को प्रथम पूज्य माना गया है और हर शुभ कार्य से पहले उन्हें ही पूजा जाता है। इसीलिए इस दिन व्रत रखने वालों के गणेशजी हर दुख दर्द हर लेते हैं। इस दिन महिलाएं पूरे विधि-विधान से भगवान गणेशजी की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता है कि इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की लंबी आयु और खुशहाली के लिए भगवान गणेश का पूजन करती हैं और उपवास रखती हैं। आइए अब जानते है संकष्टी चतुर्थी के व्रत की पूजा विधि के बारे में। इस दिन सुबह स्नान करके साफ हल्के लाल या पीले रंग के कपड़े पहनें। उसके बाद भगवान गणपति के चित्र को लाल रंग का कपड़ा बिछाकर रखें। भगवान गणेश की पूजा करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ मुंह करें। अब भगवान गणपति के सामने दीया जलाएं और लाल गुलाब के फूलों से भगवान गणपति को सजाएं। पूजा में रोली, मोली, चावल, दुर्वा, चंदन, फूल और तांबे के लौटे में जल अर्पित करें। प्रसाद के रूप में तिल के लड्डू, गुड़, केला और मोदक चढ़ाए जा सकते हैं। भगवान गणपति के सामने धूप दीप जलाकर उनकी विधिवत पूजा करें और दिन भार व्रत का पालन करें। फिर शाम के समय भगवान गणेश की प्रतिमा को ताजे फूलों से सजाए और व्रत कथा पढ़ें। इसके बाद संकष्टी चतुर्थी व्रत पारण करें। इस विधि से पूजा करने से भगवान गणेशजी आपके सारे दु:ख दर्द हर देंगे। तो आइए अब जानते है कि संकष्टी चतुर्थी के क्या करें और क्या ना करें। इस दिन भगवान गणेश जी की पूजा करते समय गणेश जी की आरती, मंत्र और गणेश चालीसा का पाठ करें और भगवान श्री गणेश की पूजा के दौरान संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत की कथा अवश्य पढ़ें अथवा सुनें। इसी के साथ गणेश जी को शमी का पत्ता या बेलपत्र अर्पित करें। जिन व्यक्तियों का इस दिन व्रत होता है वे केवल फल, साबूदाना, मूंगफली और आलू ग्रहण करें। इसी के साथ अब जानेंगे कि व्रत के दौरान हमें किन-किन बातों का विशेष तौर से ध्यान रखना चाहिए। भगवान गणेशजी को तुलसी कभी नहीं चढ़ाई जाती है। इसलिए इस दिन भी आप गणेशजी को तुलसी ना चढ़ाएं। संकष्टी चतुर्थी के दिन किसी की बुराई ना करें, किसी स्त्री का अपमान ना करें। संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा एक बार की बात है माता पार्वती और भगवान शिव नदी के पास बैठे हुए थे, तभी अचानक माता पार्वती ने चौपड़ खेलने की अपनी इच्छा ज़ाहिर की। लेकिन समस्या की बात यह थी कि वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभाए। इस समस्या का समाधान निकालते हुए शिव और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाल दी। मिट्टी से बने बालक को दोनों ने यह आदेश दिया कि तुम खेल को अच्छी तरह से देखना और यह फैसला लेना कि कौन जीता और कौन हारा। खेल शुरू हुआ जिसमें माता पार्वती बार-बार भगवान शिव को मात देकर विजयी हो रही थीं। खेल चलते रहा लेकिन एक बार गलती से बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। बालक की इस गलती ने माता पार्वती को बहुत क्रोधित कर दिया जिसकी वजह से गुस्से में आकर बालक को श्राप दे दिया और वह लंगड़ा हो गया। बालक ने अपनी भूल के लिए माता से बहुत क्षमा मांगी और उसे माफ़ कर देने को कहा। बालक के बार-बार निवेदन को देखते हुए माता ने कहा कि अब श्राप वापस तो नहीं हो सकता लेकिन वह एक उपाय बता सकती हैं जिससे वह श्राप से मुक्ति पा सकेगा। तभी माता ने कहा कि संकष्टी वाले दिन पूजा करना, जहां पर कुछ कन्याएं आती हो और तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को सच्चे मन से करना। बालक ने व्रत की विधि को जानकर पूरी श्रद्धापूर्वक और विधि अनुसार उसे किया। उसकी सच्ची आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उसकी इच्छा पूछी। तभी बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की अपनी इच्छा को ज़ाहिर किया। गणेश ने उस बालक की मांग को पूरा कर दिया और उसे शिवलोक पंहुचा दिया, लेकिन जब वह पहुंचा तो वहां उसे केवल भगवान शिव ही मिले। माता पार्वती भगवान शिव से नाराज़ होकर कैलाश छोड़कर चली गई होती हैं। जब शिवजी ने उस बच्चे को पूछा की तुम यहां कैसे आए तो उसने बताया कि गणेश की पूजा से उसे यह वरदान प्राप्त हुआ है। यह जानने के बाद भगवान शिव ने भी पार्वती को मनाने के लिए उस व्रत को किया जिसके बाद माता पार्वती भगवान शिव से प्रसन्न होकर वापस कैलाश लौट आती हैं। नमस्कार।

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Bindu Singh Jan 20, 2022

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. " कर्म से बदलते हैं भाग्य " "प्रकृत्य ऋषि का रोज का नियम था कि वह नगर से दूर जंगलों में स्थित शिव मन्दिर में भगवान् शिव की पूजा में लीन रहते थे। कई वर्षो से यह उनका अखण्ड नियम था।" "उसी जंगल में एक नास्तिक डाकू अस्थिमाल का भी डेरा था। अस्थिमाल का भय आसपास के क्षेत्र में व्याप्त था। अस्थिमाल बड़ा नास्तिक था। वह मन्दिरों में भी चोरी-डाका से नहीं चूकता था।" "एक दिन अस्थिमाल की नजर प्रकृत्य ऋषि पर पड़ी। उसने सोचा यह ऋषि जंगल में छुपे मन्दिर में पूजा करता है, हो न हो इसने मन्दिर में काफी माल छुपाकर रखा होगा। आज इसे ही लूटते हैं।" "अस्थिमाल ने प्रकृत्य ऋषि से कहा कि जितना भी धन छुपाकर रखा हो चुपचाप मेरे हवाले कर दो। ऋषि उसे देखकर तनिक भी विचलित हुए बिना बोले- कैसा धन ? मैं तो यहाँ बिना किसी लोभ के पूजा को चला आता हूँ।" "डाकू को उनकी बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने क्रोध में ऋषि प्रकृत्य को जोर से धक्का मारा। ऋषि ठोकर खाकर शिवलिंग के पास जाकर गिरे और उनका सिर फट गया। रक्त की धारा फूट पड़ी।इसी बीच आश्चर्य ये हुआ कि ऋषि प्रकृत्य के गिरने के फलस्वरूप शिवालय की छत से सोने की कुछ मोहरें अस्थिमाल के सामने गिरीं। अस्थिमाल अट्टहास करते हुए बोला तू ऋषि होकर झूठ बोलता है। " "झूठे ब्राह्मण तू तो कहता था कि यहाँ कोई धन नहीं फिर ये सोने के सिक्के कहाँ से गिरे। अब अगर तूने मुझे सारे धन का पता नहीं बताया तो मैं यहीं पटक-पटकर तेरे प्राण ले लूँगा।" "प्रकृत्य ऋषि करुणा में भरकर दुखी मन से बोले - हे शिवजी मैंने पूरा जीवन आपकी सेवा पूजा में समर्पित कर दिया फिर ये कैसी विपत्ति आन पड़ी ? प्रभो मेरी रक्षा करें। जब भक्त सच्चे मन से पुकारे तो भोलेनाथ क्यों न आते।" "महेश्वर तत्क्षण प्रकट हुए और ऋषि को कहा कि इस होनी के पीछे का कारण मैं तुम्हें बताता हूँ। यह डाकू पूर्वजन्म में एक ब्राह्मण ही था। इसने कई कल्पों तक मेरी भक्ति की। परन्तु इससे प्रदोष के दिन एक भूल हो गई। " "यह पूरा दिन निराहार रहकर मेरी भक्ति करता रहा। दोपहर में जब इसे प्यास लगी तो यह जल पीने के लिए पास के ही एक सरोवर तक पहुँचा। संयोग से एक गाय का बछड़ा भी दिन भर का प्यासा वहीं पानी पीने आया। तब इसने उस बछड़े को कोहनी मारकर भगा दिया और स्वयं जल पीया। " "इसी कारण इस जन्म में यह डाकू हुआ। तुम पूर्वजन्म में मछुआरे थे। उसी सरोवर से मछलियाँ पकड़कर उन्हें बेचकर अपना जीवन यापन करते थे। जब तुमने उस छोटे बछड़े को निर्जल परेशान देखा तो अपने पात्र में उसके लिए थोड़ा जल लेकर आए। उस पुण्य के कारण तुम्हें यह कुल प्राप्त हुआ।" "पिछले जन्मों के पुण्यों के कारण इसका आज राजतिलक होने वाला था पर इसने इस जन्म में डाकू होते हुए न जाने कितने निरपराध लोगों को मारा व देवालयों में चोरियां की इस कारण इसके पुण्य सीमित हो गए और इसे सिर्फ ये कुछ मुद्रायें ही मिल पायीं।" "तुमने पिछले जन्म में अनगिनत मत्स्यों का आखेट किया जिसके कारण आज का दिन तुम्हारी मृत्यु के लिए तय था पर इस जन्म में तुम्हारे संचित पुण्यों के कारण तुम्हें मृत्यु स्पर्श नहीं कर पायी और सिर्फ यह घाव देकर लौट गई।" "ईश्वर वह नहीं करते जो हमें अच्छा लगता है, ईश्वर वह करते हैं जो हमारे लिए सचमुच अच्छा है। यदि आपके अच्छे कार्यों के परिणाम स्वरूप भी आपको कोई कष्ट प्राप्त हो रहा है तो समझिए कि इस तरह ईश्वर ने आपके बड़े कष्ट हर लिए।" ("हमारी दृष्टि सीमित है परन्तु ईश्वर तो लोक-परलोक सब देखते हैं, सबका हिसाब रखते हैं। हमारा वर्तमान, भूत और भविष्य सभी को जोड़कर हमें वही प्रदान करते हैं जो हमारे लिए उचित है।") ----------::;×:::---------- " भक्त और भगवान की जय " "जय जय श्री महाकाल" " कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

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. " धर्म निष्ठा " " ! महाभारत का युद्ध! " "युद्धिष्ठर को अपनी मृत्यु का रहस्य बताने के बाद देवव्रत भीष्म समझ गए कि कल का दिन उनकी पराजय का दिन है। जीवन भर बिना किसी लोभ के अपने राष्ट्र और कुल की रक्षा के लिए समर्पित रहे उस महायोद्धा के प्रयाण का समय आ गया था।" " मृत्यु जीवन की पूर्णता है, जो सदैव उदासी के साथ ही आती है। देवव्रत उदास थे, और उदास व्यक्ति सदैव ममता का द्वार खटखटाना चाहता है। रात्रि के नीरव अंधकार में भीष्म अनायास ही टहलते-टहलते मां गङ्गा के तट पर पहुँच गए। " "दूर तक फैली अथाह जल राशि और तट पर बैठा उस युग का सर्वश्रेष्ठ योद्धा! जल में थोड़ी हलचल हुई और माँ साक्षात समक्ष खड़ी हो गईं। कहा, "आ गए पुत्र?" "भीष्म ने एक उदास मुस्कुराहट के साथ कहा, "आ ही गया माँ! इस उदास जीवन के अंत का समय आ गया। जाने कबसे अपने कर्मों का दण्ड भोगते देवव्रत की मुक्ति का समय आ गया। विडम्बना देखो, जीवन में कभी पराजित नहीं होने वाले भीष्म ने आज स्वयं अपने प्रिय युद्धिष्ठिर को बताया कि वे मुझे कैसे मार सकते हैं। अच्छा ही है, स्वयं ही अपने वध का कारण बन कर अर्जुन को अपने पितामह की हत्या के अपराधबोध से थोड़ा मुक्त कर जाऊंगा।" "फिर उदास क्यों हो पुत्र?" माता ने उनके माथे को सहलाते हुए पूछा। "कल तक जब नियति अपनी उंगलियों पर नचा रही थी तो सोचने का समय ही नहीं मिला, पर अब सोच रहा हूँ कि कैसा बीता यह शापित जीवन! अपनी प्रतिज्ञा के बंधन में बंध कर क्या क्या न किया मां! आज जब अपनी निष्ठा को नैतिकता के तराजू पर तौलता हूँ तो लगता है जैसे पराजित हो गया हूँ।" "इतना क्यों सोचते हो? तुम वैरागी नहीं गृहस्थ थे पुत्र! तुम इस हस्तिनापुर के निष्ठावान सैनिक थे। तुम्हारी निष्ठा अपने राष्ट्र के प्रति थी और तुमने जीवन के हर क्षण को बिना कुछ सोचे विचारे अपने राष्ट्र के नाम समर्पित कर दिया। फिर अच्छे-बुरे की चिन्ता क्यों करनी? राष्ट्र के हित में किये गए कार्यों को व्यक्तिगत नैतिकता की तराजू से मुक्त रखना चाहिए पुत्र!" माता अपने वृद्ध पुत्र को नन्हे बालक की तरह समझा रही थी। माता के लिए बच्चे कभी बड़े नहीं होते." "भीष्म ने गम्भीरता के साथ ही कहा, "बात केवल इतनी ही भर नहीं है माता! जीवन में जाने कितनी बार अपने ही हाथों अपनी आत्मा को चोट पहुँचाई, जाने कितनी बार स्वयं का वध किया। यहाँ तक कि जीवन के अंतिम युद्ध में भी अपने प्रिय अर्जुन के विरुद्ध शस्त्र उठाना पड़ा। क्या पाया मैंने..." "निष्ठा धर्म के प्रति हो या राष्ट्र के प्रति, वह मनुष्य से पल पल बलिदान मांगती है पुत्र! मनुष्य को हर क्षण अपने मोह, अपने प्रेम का त्याग करना पड़ता है। जो ऐसा कर पाते हैं वे ही अपने युग की प्रतिष्ठा होते हैं। इस युग में दो ही तो लोग हैं जो इतना कर सके हैं। एक कृष्ण और दूसरे तुम... तुम इस युग की प्रतिष्ठा हो पुत्र, तुम इस युग की प्रतिष्ठा हो... सभ्यताओं का इतिहास क्या होगा, यह तुम जैसे स्वयंसेवकों की पीड़ा तय करती है।" "भीष्म विभोर हो रहे थे। मां ने फिर कहा, "दुखी मत होवो पुत्र! दुर्योधन जैसी मानसिकता भीष्म जैसे चरित्रों का आदर कभी नहीं करती, पर हर युग का युद्धिष्ठर तुम्हारे सामने श्रद्धा से शीश झुकायेगा। यही तुम्हारी कुल उपलब्धि है।" "भीष्म ने सिर झुका कर माता को प्रणाम किया और शिविर की ओर लौट चले। गङ्गा तट से लौटता वृद्ध वस्तुतः माता से मृत्यु की ओर बढ़ रहा था। यही यात्रा जीवन कहलाती है शायद..." ----------::;×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

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