
Rama Devi Sahu
3 days ago
(((( हनुमान जी ने शनिदेव को मुक्त कराया )))) . समुद्र पार करके हनुमान जी लंका पहुँच चुके थे। . अशोक वाटिका में उन्होंने माता सीता के दर्शन किए और श्रीराम का संदेश देकर उन्हें विश्वास दिलाया कि प्रभु शीघ्र ही उन्हें रावण के बंधन से मुक्त कराने आएँगे। . माता सीता की आज्ञा लेकर हनुमान जी जब लंका से लौटने लगे, तभी उनकी दृष्टि एक विचित्र स्थान पर पड़ी। . वहाँ एक अंधेरी कोठरी में कोई दिव्य पुरुष लोहे की जंजीरों में बँधा हुआ था। . हनुमान जी ने पास जाकर पूछा.. “आप कौन हैं? आपको इस प्रकार किसने बाँध रखा है?” . वह पुरुष बोले.. “मैं शनिदेव हूँ। रावण ने अपनी शक्ति और अहंकार के बल पर मुझे बंदी बना रखा है। मुझे यहाँ से मुक्त होने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता।” . हनुमान जी ने कहा.. “शनिदेव! मैं प्रभु श्रीराम का दास हूँ। जब तक उनकी सेवा में मेरा शरीर और प्राण हैं, तब तक किसी भक्त या देवता को इस प्रकार बंधन में देखकर मैं शांत कैसे रह सकता हूँ?” . उन्होंने तुरंत अपनी शक्ति से शनिदेव के बंधन तोड़ दिए। . जैसे ही शनिदेव मुक्त हुए, उन्होंने हनुमान जी से कहा.. “हे पवनपुत्र! आपने आज मुझे बंधन से मुक्त किया है। मैं आपसे प्रसन्न हूँ। आप मुझसे कोई वर माँगिए।” . हनुमान जी मुस्कुराए और बोले.. “मुझे अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। मेरा जीवन तो श्रीराम के चरणों में समर्पित है।” . शनिदेव बोले.. “फिर भी मैं आपको एक वर देना चाहता हूँ।” . हनुमान जी ने कहा.. “यदि सचमुच मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो जो भी व्यक्ति श्रद्धा से श्रीराम का नाम ले और मेरी भक्ति करे, उस पर आपकी पीड़ा अत्यंत हल्की हो जाए।” . शनिदेव ने प्रसन्न होकर कहा.. “तथास्तु! जो मनुष्य श्रद्धा और सच्चे भाव से हनुमान जी का स्मरण करेगा, विशेषकर शनिवार को आपकी पूजा करेगा, उस पर मेरी पीड़ा का प्रभाव कम होगा।” . फिर शनिदेव ने हनुमान जी को प्रणाम किया। . लेकिन कथा का सबसे सुंदर संदेश अभी बाकी था। . शनिदेव ने कहा.. “हे महावीर! संसार में जो मनुष्य अपने कर्मों से दुख पाता है, उसे मैं उसके कर्मों का फल देता हूँ... . परंतु जो मनुष्य सच्चे मन से श्रीराम का नाम लेकर आपके चरणों में शरण लेता है, उसके भीतर सेवा, संयम और भक्ति का प्रकाश जाग उठता है। ऐसी भक्ति उसके जीवन के अंधकार को दूर करने की शक्ति रखती है।” . हनुमान जी ने हाथ जोड़कर कहा.. “मेरे लिए तो सबसे बड़ा वरदान यही है कि मेरे हृदय में श्रीराम का नाम कभी न छूटे।” . और फिर.. “श्रीराम” का नाम लेते हुए हनुमान जी आकाश की ओर उड़ चले। . पीछे खड़े शनिदेव उन्हें निहारते रहे। . उन्हें समझ आ गया था कि संसार में सबसे बड़ी शक्ति किसी को पराजित करने की नहीं, बल्कि किसी दुखी और बंधे हुए को मुक्त कराने की शक्ति है। . कथा का भाव... हनुमान जी ने शनिदेव को इसलिए नहीं बचाया कि उन्हें कोई पुरस्कार चाहिए था। . उन्होंने केवल इसलिए सहायता की क्योंकि सामने एक पीड़ित प्राणी था। . यही सच्ची भक्ति है.. जहाँ अपने लिए कुछ माँगने के बजाय, प्रभु से दूसरों के दुःख दूर करने की प्रार्थना की जाए। . और शायद इसीलिए आज भी जब कोई व्यक्ति कठिन समय में हनुमान जी का नाम लेता है, तो उसके भीतर एक विश्वास जागता है.. . “जिसके सिर पर बजरंगबली का हाथ हो, उसके अंधकार में भी प्रभु का प्रकाश पहुँच जाता है।” 🙏🌺जय श्रीराम.. जय बजरंगबली🌺🙏 ~~~~~~~~~~~~~~~~~

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