#🌸 जय श्री कृष्ण *🌹🌻🌻🌹 🌹🙏 जय श्री गणेश जी 🌹🙏 🙏आप सभी आदरणीय भाई एवं बहनों को 🙋राधे राधे जी 💐🙏शुभ रात्रि सादर प्रणाम🙏 *सुविचार ✍️...* *चरित्र* , 🌹☕☕🌹 👉*तारीफ़ चेहरे की नहीं चरित्र की होनी चाहिए साहब 👉क्योंकि अच्छा चेहरा बनाने में चन्द मिनट लगते हैं 👉लेकिन अच्छा चरित्र बनाने में 👉 पुरा जीवन,,,,,,* #🙏 🌷सुविचार📿🌷

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कामेंट्स

🙋ANJALI 😊MISHRA 🙏 Jul 1, 2022
@indian !!या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!! जय माता दी 🌹भाई जी शुभ रात्रि वंदन🙏माता रानी आपको सदा सुखी रखें,आप का हर पल शुभ मंगलमय हो भाईजी 😊रथ यात्रा की आप सपरिवार को बहुत बहुत शुभकामनाएं 💐🙏हरि ॐ नमो नारायण 🙏

Ashwinrchauhan Jul 1, 2022
जय माता दी जय माँ संतोषी शुभ शुक्रवार माता रानी की कृपा आप पर आप के पुरे परिवार पर सदेव बनी रहे मेरी आदरणीय बहना जी आप का हर पल मंगल एवं शुभ रहे भगवान श्री जगन्नाथ जी बलराम जी एवं बहना सुभद्रा जी आप की हर मनोकामना पूरी करे आप का आने वाला दिन शुभ रहे गुड नाईट जगन्नाथ रथयात्रा की हार्दिक शुभकामनाएं आप और आप के सह परीवार को मेरी प्यारी सी बहना जी जय श्री कृष्णा

🙋ANJALI 😊MISHRA 🙏 Jul 1, 2022
@ranjitchavdajilusingh !!या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!! जय माता दी 🌹भाई जी शुभ रात्रि वंदन🙏माता रानी आपको सदा सुखी रखें,आप का हर पल शुभ मंगलमय हो भाईजी 😊रथ यात्रा की आप सपरिवार को बहुत बहुत शुभकामनाएं 💐🙏हरि ॐ नमो नारायण 🙏

🙋ANJALI 😊MISHRA 🙏 Jul 1, 2022
@भारत !!या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता, नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः!! जय माता दी 🌹 भइया जी शुभ रात्रि वंदन🙏माता रानी आपको सदा सुखी रखें,आप का हर पल शुभ मंगलमय हो भइया जी😊रथ यात्रा की आप सपरिवार को बहुत बहुत शुभकामनाएं 💐🙏हरि ॐ नमो नारायण 🙏

Sushil Kumar Sharma Jul 1, 2022
Good Night My Sweet Sister ji 🙏🙏 Aapko Happy Shree Jagannath Swami Rath Yatra Ki Hardik Shubhkamnaye ji 🙏🙏🌹🌹 Jay Mata di 🌹🌹🌹 Mata Rani 🌹🌹 Ki Kripa Dristi Aap Our Aapke Priwar Per Hamesha Sada Bhni Rahe ji 🌹🌹 Aapka Har Pal Har Din Shub Mangalmay Ho ji 🌹🌹🌹 Aap Hamesha Khush Rahe ji 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐.

Ansouya Mundram 🍁 Jul 1, 2022
सर्व मंगल मागल्ये शिवे सर्वाथ साघिके शरणये त्रयमबके गौरी नारायणी नमोस्तुते सप्रेम शुभ रात्रि प्यारी बहना जी माता रानी की कृपा आप और आपके परिवार पर हमेशा बना रहे मेरी प्यारी बहना जी🙏 जय माता दी 🙏🌹 जय माता दी 🙏🌹

Ansouya Mundram 🍁 Jul 1, 2022
जग्गन्नाथ यात्रा की हार्दिक शुभकामनाएं प्यारी बहना जी 🌷 जय श्री राधे कृष्ण 🙏🕉

Radhe Krishna Jul 2, 2022
राम राम जी बहन 🙏🏻🌹🌹

Radhe Krishna Jul 2, 2022
जय शनिदेव 🙏🏻🌹 जय हनुमान 🌸🌸🙏🏻 सुप्रभात वंदन प्यारी बहना जी 🙏🏻🌹🌹 शनिदेव जी व हनुमान जी की कृपा दृष्टि आप और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे बहन 🙏🏻🌹🌹

Radhe Krishna Jul 2, 2022
जय श्री राधे कृष्णा प्यारी बहना जी 🙏🏻🌹 आप का दिन शुभ व मंगलमय हो 🌸🌸🙏🏻

मदन पाल सिंह Jul 2, 2022
जय श्री राम जी शूभ प्रभात वंदन जी पवन सुत हनुमान जी कि कृपा आप व आपके परिवार पर बनीं रहे जी 🙏🏼🙏🏼🙏🏼🌷🌷🚩

Anil Jul 2, 2022
good morning सुप्रभात बहेना कैसी है आप सुबह का वंदन जी 🌹🙏🌹

girish Jul 2, 2022
Jai shree krishna ji sweet sister good morning ji 🙏🙏🌹🌹🌹🌹😊❤️

Babulal Jul 2, 2022
Ram Ram Ji 🙏🙏 shubh savera ji

🥀 Suresh Kumar 🥀 Jul 2, 2022
राधे राधे जी 🙏 शुभ प्रभात वंदन मेरी बहन 🥀🥀🌹🙏🌹🥀🥀

Asha Shrivastava Jul 2, 2022

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Bindu Singh Jul 2, 2022

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ritu Jun 30, 2022

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Amit Kumar Jun 30, 2022

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. श्री नित्या नन्ददास बाबा जी (ब्रह्मकुण्ड) रागानुगीय सिद्ध महात्माओं में गोवर्धन के सिद्ध श्रीकृष्णदास बाबा के शिष्य श्रीनित्यानन्ददास बाबा थे अद्वितीय। उनकी मनोगति थी गङ्गा के प्रवाह के समान–अविच्छिन्ना-स्वप्न, जागरण और सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में एक-सी। जागरण में वे रहते गम्भीर, निःस्पन्द, और समाधिस्थ। आहार विहार और शौचादि कृत्य के लिए सेवकों के अनुरोध पर ऐसे उठते, जैसे घोर निद्रा से। निद्रित अवस्था में लीला का दर्शन करते हुए हास्य, रोदन और प्रलाप इस प्रकार करते जैसे जाग रहे हों। चेतनावस्था में मनोभाव गोपन रखते हुए गंभीर रहते। निद्रित अवस्था में भाव गोपनीय नहीं रख सकते। हास्य, रोदन और प्रलाप के रूप में प्रकट कर देते। इसलिए सेवकों के लिए जानना कठिन होता कि वे सो रहे हैं, या जाग रहे। ऐसी अवस्था में उनसे यदि किसी को कोई प्रश्न पूछना होता, तो कैसे पूछता ? कहने-सुनने का तो वहाँ कोई प्रश्न ही न था। पर उनके पास यदि कोई कुछ जिज्ञासा या शंका लेकर जाता, तो वह निराश न लौटता। उनके सान्निध्य में बैठने से हो शंका का समाधान हो जाता। 'तृणादपि सुनीचेन' श्लोक की बाबा सजीव मूर्ति थे। जो कोई भी उनके सामने आता, चाहे उनका शिष्य ही क्यों न होता, उसके दण्डवत् करने के पूर्व वे स्वयं ही उसे दण्डवत् करते। कोई उनके सामने किसी प्रकार की दैन्योक्ति करता, तो उन्हें रोना आ जाता। रोना इसलिए आता कि उनके लिए उनसे अधिक दीन-हीन तो विश्व में और कोई था ही नहीं। जब वह उनके सामने अपना दैन्य प्रकाश करता, तो वे समझते कि वह परोक्ष रूप से उनकी प्रशंसा कर रहा है। उन्हें यह सोचकर दुःख होता कि वे उसकी प्रशंसा के पात्र तो बन नहीं सके, उलटे अपने कपट आचरण से धोखा दे रहे हैं उसे। बाबा थे तो सिद्ध महात्मा, पण्डित रामकृष्ण बाबा और गौरकिशोर शिरोमणि जैसे सिद्ध महात्माओं के भी गुरु। भक्तश्रेष्ठ होने के नाते स्वयं भक्त-वत्सल भगवान् भी थे उनके अधीन। तो फिर वे दीनता का नाटक क्यों करते थे ? क्या दूसरे लोगों को शिक्षा देने के लिए ? नहीं, नाटक का तो ऐसे लोगों के लिए सवाल ही नहीं होता। उनके जो भीतर होता है, वही बाहर होता है। उनकी आन्तरिक अनुभूति ही ऐसी होती है, जो उन्हें दीनातिदीन बना देती है। छोटी वस्तु को अपने छोटेपन का ठीक-ठीक ज्ञान तभी होता है, जब वह बड़ी वस्तु के निकट आती है। सिद्ध महापुरुषों को एक बृहत्तम, श्रेष्ठतम, वस्तु की साक्षात् अनुभूति होती है। इसलिए उन्हें अपनी न्यूनतमता का अनुभव होना स्वाभाविक है। उस श्रेष्ठतम वस्तु का वे प्रत्येक प्राणी में दर्शन करते हैं। इसलिए प्रत्येक प्राणी को अपने से बड़ा और अपने को उससे छोटा मानते हैं। प्रत्येक प्राणी को सरल सहज निष्कपट प्रणाम करते हैं। बाबा से यदि कोई कहता–'आपका अमुक शिष्य, जिसे आपने दण्डवत् की थी, बहुत दुःखी होकर गया है। आपका क्या उसके प्रति इस प्रकार का व्यवहार उचित है ?' तो बाबा भयभीत होकर कहते–'तो मुझे क्या करना चाहिये ? आप उपदेश कघजिये। वे तो महाभागवत् हैं। कृष्ण ने मेरे ऊपर कृपाकर उन्हें मेरे पास भेजा है। यदि मेरे आचरण से उन्हें दुःख होता है, तो मैं अपराधी हूँ। मैं ऐसा आचरण अब न करूँगा।' परन्तु जब फिर वही शिष्य उनके सामने आता, तो इसे भूलकर पूर्ववत् प्रणाम करते। सिद्ध बाबा वृन्दावन में मदनमोहन ठौर में रहकर भजन करते। आज भी उनका आसन वहाँ विराजमान है। उनके शिष्यों में प्रधान और सुविख्यात थे—श्रीगौरकिशोर शिरोमणि महाराज, श्री व्रजकिशोरदास बाबाजी, श्रीनृसिंहदासजी, श्रीरामकृष्णदास पण्डित बाबाजी और श्रीनरोत्तमदास अधिकारी। नवद्वीप के श्रीगौरकिशोरदास बाबाजी भी उन्हीं से भजन-शिक्षा ग्रहणकर सिद्ध हुए थे। ० ० ० पुस्तक: व्रज के भक्त (प्रथम खण्ड) "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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ritu Jul 2, 2022

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. संक्षिप्त महाभारत-कथा पोस्ट–060 (वन पर्व) आज की कथा में:– युधिष्ठिर और द्रौपदी का संवाद, निष्काम धर्म की प्रशंसा, द्रौपदी का उद्योग के लिये प्रोत्साहन धर्मराज युधिष्ठिरकी बात सुनकर द्रौपदी ने कहा–'धर्मराज ! इस जगत्‌ में धर्माचरण, दयाभाव, क्षमा, सरलता के व्यवहार से तथा लोक-निन्दा के भय से राज्यलक्ष्मी नहीं मिलती। यह बात प्रत्यक्ष है कि आपमें तथा आपके महाबली भाइयों में प्रजापालन करने योग्य सभी गुण हैं। आपलोग दुःख भोगने योग्य नहीं हैं। फिर भी आपको यह कष्ट सहना पड़ रहा है। आपके भाई राज्य के समय तो धर्म पर प्रेम रखते ही थे, इस दीन-हीन दशा में भी धर्म से बढ़कर और किसी से भी प्रेम नहीं करते। ये धर्म को अपने प्राणों से भी श्रेष्ठ मानते हैं। यह बात ब्राह्मण, देवता और गुरु सभी जानते हैं कि आपका राज्य धर्म के लिये, आपका जीवन धर्म के लिये है। मुझे इस बात का दृढ़ निश्चय है कि आप धर्म के लिये भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा मुझे भी त्याग सकते हैं। मैंने अपने गुरुजनों से सुना है कि यदि कोई अपने धर्म की रक्षा करे तो वह अपने रक्षक की रक्षा करता है। परन्तु मुझे तो ऐसा मालूम हो रहा है कि मानो वह भी आपकी रक्षा नहीं करता। जैसे मनुष्य के पीछे उसकी छाया चला करती है, वैसे ही आपकी बुद्धि सर्वदा धर्म के पीछे चला करती है। आप जब सारी पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट् हो गये थे, उस समय भी आपने छोटे-छोटे राजाओं का भी अपमान नहीं किया था, बड़ों की तो बात ही क्या। आपमें सम्राट्पने का अभिमान बिलकुल नहीं था। आपके महलों में देवताओं के लिये 'स्वाहा' और पितरों के लिये 'स्वधा' की ध्वनि गूँजती रहती थी। तब और अब भी अतिथि-ब्राह्मणों की सेवा होती ही है। आपने साधु, संन्यासी और गृहस्थों की सारी आवश्यकताएँ पूर्ण की थीं, उन्हें तृप्त किया था। उस समय आपके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं थी, जो ब्राह्मणों को न दी जा सके। अब तो आपके यहाँ पाँच दोषों की शान्ति के लिये केवल बलिवैश्वदेव यज्ञ किया जाता है और उसके बाद अतिथियों तथा प्राणियों को खिलाकर शेष बचे हुए अन्न से अपना जीवन निर्वाह हो रहा है। आपकी बुद्धि ऐसी उलटी हो गयी कि आपने राज्य, धन, भाई तथा मुझतक को जुए में हार दिया। आपकी इस आपत्ति विपत्ति को देखकर मेरे मन में बड़ी वेदना होती है, मैं बेहोश सी हो जाती हूँ। मनुष्य ईश्वर के अधीन है, उसकी स्वाधीनता कुछ भी नहीं है। ईश्वर ही प्राणियों के पूर्वजन्म के कर्मबीज के अनुसार उनके सुख-दुःख तथा प्रिय-अप्रिय वस्तुओं की व्यवस्था करता है। जैसे कठपुतली सूत्रधार के इच्छानुसार नाचती है, वैसे ही सारी प्रजा ईश्वरेच्छानुसार संसार के व्यवहार में नाच रही है। ईश्वर सबके भीतर और बाहर व्याप्त रहता है, सबको प्रेरित करता और साक्षीरूप से देखता रहता है। जीव एक कठपुतली है; वह स्वतन्त्र नहीं, ईश्वराधीन है। जैसे सूत में गूँथी हुई मणियाँ, नाथे हुए बैल और जलधारा में गिरे हुए वृक्ष पराधीन होते हैं वैसे ही जीव भी ईश्वर के अधीन है। जो वस्तु जिसमें लीन होती है, तत्स्वरूप ही वह होती है। मिट्टी से उत्पन्न घड़ा आदि, मध्य और अन्त में मिट्टीके अधीन रहता है; ठीक वैसे ही जीव आदि, मध्य और अन्त में ईश्वर के ही अधीन रहता है। जीव को किसी भी बात का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है, इसलिये वह सुख पाने या दुःख हटाने में असमर्थ है। वह ईश्वर की ही प्रेरणा से स्वर्ग या नरक में जाता है। जैसे नन्हें-नन्हें तिनके वायु के अधीन होते हैं, वैसे ही सभी प्राणी ईश्वर के। जैसे बच्चा खिलौनों से खेल-खेलकर उन्हें छोड़ देता है, वैसे ही प्रभु जगत्‌ में जीवों के संयोग-वियोग की लीला करते रहते हैं। राजन् ! मैं तो ऐसा समझती हूँ कि ईश्वर प्राणियों के साथ माता-पिता के समान दया का बर्ताव नहीं करते; वे तो जैसा कोई साधारण पुरुष क्रोध से क्रूरता का व्यवहार करता हो, वैसा ही करते हैं। जब मैं देखती हूँ कि आप जैसे शील-सदाचार सम्पन्न आर्य पुरुष भलीभाँति जीवन-निर्वाह भी नहीं कर सकते, चिन्ता से विह्वल रहते हैं, और अनार्य पुरुष सुख भोगते हैं, तब मुझे बड़ा दुःख होता है। आपकी यह विपत्ति और दुर्योधन की सम्पत्ति देखकर मैं ईश्वर की निन्दा करती हूँ, क्योंकि वह विषम दृष्टि से बर्ताव करता है। यदि कर्म का फल कर्ता को मिलता है, दूसरे को नहीं, तो यह विषम दृष्टि करने का फल अवश्य ही ईश्वर को मिलेगा। यदि कर्म का फल कर्ता को नहीं मिलता, तब तो अपनी उन्नति का कारण लौकिक बल ही है; मुझे निर्बल पुरुषों के लिये बड़ा शोक हो रहा है।' धर्मराज युधिष्ठिर ने कहा–'प्रिये ! मैंने तुम्हारे मधुर, सुन्दर और आश्चर्य भरे वचन सुन लिये; तुम इस समय नास्तिकता की बात कर रही हो। प्रिये ! मैं कर्म का फल पाने के लिये कर्म नहीं करता। मैं तो दान देना धर्म है, इसलिये देता हूँ; यज्ञ करना चाहिये, इसलिये यज्ञ करता हूँ। फल मिले या नहीं, मनुष्य को अपना कर्तव्य करना चाहिये; इसीलिये मैं अपने कर्तव्य का पालन करता हूँ। सुन्दरि ! मैं धर्म-फल के लिये धर्म नहीं करता, धर्म-पालन का कारण यह है कि वेदों की ऐसी आज्ञा है और संत पुरुषों ने उसका पालन किया है। मैंने स्वभाव से ही अपने मन को धर्म में लगा दिया है। किसी भी धर्मज्ञ पुरुष के लिये धर्म के साथ मोल तोल करना बहुत ही निन्दनीय है। जो धर्म को दुहना चाहता है, उसे धर्म का फल नहीं मिलता। जो धर्म करके नास्तिकता वश उस पर शंका करता है, वह पापी है। मैं तुम्हें यह बात बड़ी दृढ़ता के साथ कहता हूँ कि धर्म पर कभी शंका न करना। धर्म पर शंका करने वाले की अधोगति होती है। जो दुर्बल हृदय पुरुष धर्म और ऋषियों के वचनों पर शंका करता है, वह मोक्ष से दूर हो जाता है, वेदपाठी, धर्मात्मा और कुलीन पुरुष को ही वृद्ध कहा जाता है। वह पापी तो चोरों के समान है, जो मूर्खतावश शास्त्रों का उल्लंघन करके धर्म पर शंका करता है। प्रिये ! अभी तुमने कुछ ही दिन पहले परम तपस्वी मार्कण्डेय ऋषि को देखा था, जो धर्म के प्रभाव से चिरजीवी हैं। व्यास, वसिष्ठ, मैत्रेय, नारद, लोमश, शुक्र आदि सभी ऋषि धर्म पालन से ही ज्ञानसम्पन्न हुए हैं। यह बात तुम्हारे सामने है कि वे लोग दिव्य योग से युक्त हैं, शाप-वरदान दे सकते हैं और देवताओं से भी बड़े हैं। उन लोगों ने अपनी अद्भुत शक्ति से वेद और धर्म का साक्षात्कार किया है। वे लोग धर्म की ही महिमा का वर्णन करते हैं। रानी ! तुम अपने मूढ़ मन से ईश्वर और धर्म पर आक्षेप मत करो और न कोई शंका ही करो। धर्म पर शंका करने वाला स्वयं मूर्ख होता है और बड़े-बड़े विचारशील एवं स्थितप्रज्ञों को पागल मानता है। वह बड़े बड़े महापुरुषों की बात और प्रामाणिकता स्वीकार न करने के कारण असहाय है। वह घमण्डी अपने हाथों अपने कल्याण का तिरस्कार करता है और केवल उन लौकिक वस्तुओं को ही सत्य मानता है, जिनसे इन्द्रियों को ही सुख मिलता है। वह लोकोत्तर वस्तुओं के सम्बन्ध में सर्वथा अज्ञान है। जो धर्म पर शंका करता है, उसके लिये इस लोक में कोई प्रायश्चित्त नहीं है। वह मूर्ख चाहने पर भी लौकिक और पारलौकिक उन्नति नहीं कर सकता। वह प्रमाण से मुँह मोड़कर वेद और शास्त्रों की निन्दा करने लगता है। कामपूर्ति और लोभ के मार्ग में चलने लगता है। इसके फलस्वरूप उसे नरक की प्राप्ति होती है। जो दृढ़ निश्चय से निश्शंक होकर धर्म का ही पालन करता है, उसे अनन्त सुख की प्राप्ति होती है। जो ऋषियों की बात नहीं मानता, धर्म का पालन नहीं करता, शास्त्रों का उल्लंघन करता है, वह एक जन्म तो क्या, अनेक जन्मों में भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सकता। सर्वज्ञ और सर्वदर्शी ऋषियों ने सनातनधर्म का वर्णन और सत्पुरुषों ने उसका आचरण किया है। उसमें भला, शंका करने का अवसर ही कहाँ है। जैसे समुद्र पार जाने के इच्छुक व्यापारी के लिये जहाज का ही आश्रय है, वैसे ही पारलौकिक सुख प्राप्ति के इच्छुकों के लिये एकमात्र धर्म ही जहाज है। सुन्दरि ! यदि धर्मात्माओं के द्वारा किया हुआ धर्मपालन निष्फल हो जाय तो यह सारा जगत् अज्ञान के घोर अन्धकार में डूब जाय। यदि तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, स्वाध्याय, दान और सरलता निष्फल हो जायँ तो किसी को मोक्ष न मिले, कोई विद्या न पढ़े, किसी को धन न मिले, सब लोग पशु- सरीखे हो जायँ। यदि ऐसा होता तो सत्पुरुष धर्म का आचरण ही क्यों करते। सम्पूर्ण धर्मशास्त्र एक धोखेबाजी होती। बड़े-बड़े ऋषि, देवता, गन्धर्व सामर्थ्यवान् होने पर भी धर्म का पालन क्यों करते ? उन्होंने यह समझकर कि ईश्वर धर्म का फल अवश्य देता है, धर्म का पालन किया है और वास्तव में वही परम कल्याण है। धर्म और अधर्म दोनों ही निष्फल नहीं होते। विद्या और तप का फल तो हम प्रत्यक्ष ही देख रहे हैं। तुम्हें मैं वेद की प्रामाणिकता स्थापित करके धर्म पर श्रद्धा करने को कह रहा हूँ, इतनी ही बात नहीं है। तुम्हारा अपना अनुभव भी तो धर्म की महिमा ही प्रकट करता है। तुम्हारा और तुम्हारे भाई का जन्म यज्ञरूप धर्म के आचरण से हुआ है, यह बात क्या तुम्हें मालूम नहीं है ? तुम्हारे जन्म का वृत्तान्त ही इस बात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि धर्म का फल अवश्य मिलता है। धर्मात्मा पुरुष संतोषी होते हैं। परन्तु बुद्धिहीन पुरुष बहुत फल मिलने पर भी संतुष्ट नहीं होते। पाप और पुण्य के फल का उदय, कर्मोत्पत्ति का हेतु सबका कारण अविद्या और उसका नाश करने वाली विद्या–इन सब बातों को देवताओं ने गुप्त रखा है। साधारण मनुष्य इन बातों को कुछ भी नहीं समझ सकते। जो तत्त्ववेत्ता इनका रहस्य समझ जाते हैं, वे फल के लिये कर्मानुष्ठान नहीं करते किन्तु ज्ञान में स्थित होकर कर्म करते रहते हैं। वास्तव में तो यह विषय देवताओं के लिये भी गोपनीय है। तथापि विरक्त, मितभोजी, जितेन्द्रिय एवं तपस्वी योगी शुद्ध चित्त से ध्यान करके पूर्वोक्त कर्मों का स्वरूप जान लेते हैं। धर्माचरण करने पर भी यदि उसका फल न मिले तो भी धर्म पर सन्देह नहीं करना चाहिये। और भी उद्योग करके यज्ञ करना चाहिये, ईर्ष्या का त्याग करके दान करना चाहिये। इस बात के साक्षी महर्षि कश्यप हैं कि ब्रह्माजी ने सृष्टि के प्रारम्भ में अपने पुत्रों से यह कहा था–'कर्म का फल अवश्य मिलता है और धर्म सनातन है।' प्रिये ! धर्म के सम्बन्ध में तुम्हारा सन्देह कुहरे की तरह नष्ट हो जाय। सब कुछ ठीक है, ऐसा निश्चय करके तुम नास्तिकता का त्याग कर दो और धर्म पर, ईश्वर पर आक्षेप न करो। इसको जानो और उन्हें नमस्कार करो। तुम्हारे मनमें ऐसी बात कभी न आवे। जिनकी कृपा से भक्त पुरुष मृत्युशील से अमर हो जाते हैं, उन सर्वश्रेष्ठ परमात्मा का कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये।' द्रौपदी ने कहा–'धर्मराज! मैं धर्म अथवा ईश्वर की अवमानना और तिरस्कार कभी नहीं करती। मैं इस समय विपत्ति की मारी हूँ, इसलिये ऐसा प्रलाप कर रही हूँ। मैं अभी इस सम्बन्ध में और भी विलाप करूँगी। जानकार मनुष्य को कर्म अवश्य ही करना चाहिये; क्योंकि बिना कर्म किये केवल जड पदार्थ ही जी सकते हैं, चेतन प्राणी नहीं। पूर्वजन्म के कर्मों की बात तो तनिक-सा विचार करते ही सिद्ध हो जाती है; क्योंकि गाय का बछड़ा जन्मते ही दूध के लिये थन पीने लगता और धूप लगने पर छाया में जा बैठता है। अवश्य ही इस क्रिया में पूर्वजन्म के संस्कार काम करते रहते हैं। सब प्राणी अपनी उन्नति समझते हैं और प्रत्यक्षरूप से अपने कर्मों का फल भोग रहे हैं। इसलिये आप कर्म कीजिये, उससे उकताइये मत। आप कर्म के कवच से सुरक्षित होकर सुखी होइये। सहस्रों मनुष्यों में से भी कोई एक कर्म करने की विधि ठीक-ठीक जानता है या नहीं इसमें सन्देह है। यदि हिमालय जैसा पहाड़ भी प्रतिदिन खाया जाय और उसमें वृद्धि न हो तो थोड़े दिनों में क्षीण हो जाता है। इसलिये धन की रक्षा और वृद्धि करने के लिये कर्म करने की बड़ी आवश्यकता है। प्रजा यदि कर्म न करे तो उजड़ जाय। यदि उसका कर्म निष्फल हो जाय तो उसकी उन्नति रुक जाय। यदि कर्म को निष्फल माना जाय तो भी कर्म तो करना ही पड़ेगा; क्योंकि कर्म किये बिना किसी प्रकार जीविका नहीं चल सकती। जो भाग्य के ऊपर भरोसा करके हाथ पर-हाथ धरे बैठे रहते हैं, हठवादी हैं, स्वयं ही वस्तुओं की प्राप्ति मानते हैं, वे पूर्वजन्म के कर्मों को स्वीकार नहीं करते। उन्हें मूर्ख समझना चाहिये। जो कर्म न करके आलस्यमय जीवन व्यतीत करता है, वह पानी में पड़े कच्चे घड़े की भाँति गल जाता है। जो काम करने की शक्ति रहते हुए भी उससे हठवश अलग रहते हैं, वे चिरकाल तक जीवन धारण भी नहीं कर सकते। जो मनुष्य इस सन्देह में रहते हैं कि मुझे अमुक कर्म का फल मिलेगा या नहीं, उन्हें कर्म का कुछ भी फल नहीं मिलता। जो निसन्देह होते हैं, वे अपना काम बना लेते हैं। धीर पुरुष सर्वदा कर्म करने में लगे रहते हैं और फल के सम्बन्ध में कभी सन्देह नहीं करते। परन्तु वैसे मनुष्य होते हैं बहुत थोड़े। किसान हल से धरती जोतकर अन्न बो देता है और सन्तोष के साथ प्रतीक्षा करता है। इसके बाद बोये हुए अन्न को जल से सींचकर अंकुरित करने का काम मेघ करता है। यदि मेघ किसान पर अनुग्रह न करे, जल न बरसे, तो इसमें किसान का कोई अपराध नहीं है। उस समय किसान यही सोचता है कि सब लोगों ने जो काम किया, वही मैंने भी किया। अब मेघ बरसे या न बरसे; फल मिले या न मिले, किसान निर्दोष है। वैसे ही धीर पुरुष को अपनी बुद्धि के अनुसार देश, काल, शक्ति और उपायों का ठीक-ठीक विचार करके अपना काम करना चाहिये। ये बातें मैंने अपने पिताजी के घर पर बृहस्पति-नीति के मर्मज्ञ विद्वानों से सुनी हैं। आप विचार करके अपने कर्तव्य का निश्चय कीजिये। ~~~०~~~ – साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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gopal gajjar Jul 2, 2022

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. संक्षिप्त महाभारत-कथा पोस्ट–059 (वन पर्व) आज की कथा में:– द्वैतवन में पाण्डवों का निवास, मार्कण्डेय मुनि और दाल्भ्यबक का उपदेश तथा धर्मराज युधिष्ठिर और द्रौपदी का संवाद, क्षमा की प्रशंसा वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय! जब भगवान् श्रीकृष्ण आदि अपने-अपने स्थान के लिये रवाना हो गये तब प्रजापतियों के समान तेजस्वी पाण्डवों ने वेद वेदांगवेत्ता ब्राह्मणों को सोने की मुहरें, वस्त्र और गौएँ देकर रथ पर सवार हो अगले वन के लिये प्रस्थान किया। इन्द्रसेन सुभद्रा की दाइयों, दासियों और वस्त्राभूषणों को लेकर बीस सैनिकों के संरक्षण में रथ पर द्वारका के लिये रवाना हुआ। उस समय मनस्वी नागरिक धर्मराज युधिष्ठिर के पास आकर उनके बायें खड़े हो गये और उनमें से मुख्य-मुख्य ब्राह्मण प्रसन्नता के साथ धर्मराज से बातचीत करने लगे। पाण्डवगण झुंड-की-झुंड प्रजा को आयी देख खड़े हो गये और उनसे बात करने लगे। उस समय राजा और प्रजा दोनों ही आपस में पिता-पुत्र के समान व्यवहार कर रहे थे। सारी प्रजा कहने लगी–'हा स्वामी! हा धर्मराज! आप हम लोगों को अनाथ करके क्यों जा रहे हैं ? आप कुरुवंशियों में श्रेष्ठ और हमारे स्वामी हैं। आप इस देश तथा हम नागरिकों को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ? क्या पिता कभी अपनी संतान को इस प्रकार अनाथ करता है ? क्रूरबुद्धि दुर्योधन, शकुनि और कर्ण को धिक्कार है, जिन्होंने आप-जैसे धर्मात्मा महापुरुष को कपट-द्यूत के द्वारा छलकर दुःखी करना चाहा है। आप अपने बसाये हुए कैलास के समान चमकीले इन्द्रप्रस्थ को छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ? आप हम लोगों को क्यों नहीं बतला जाते कि मयदानव द्वारा निर्मित सभा छोड़कर कहाँ जा रहे हैं ?' प्रजा की बात सुनकर महापराक्रमी अर्जुन ने सारी प्रजा से ऊँचे स्वर में कहा–'उपस्थित नागरिको ! धर्मराज वन में निवास करने के बाद वह दिव्य सभा और शत्रुओं की कीर्ति छीन लेंगे। तुम लोग अपने धर्म के अनुसार अलग-अलग सत्पुरुषों की सेवा करके उन्हें प्रसन्न करना, जिससे आगे चलकर हमारा काम बन जाय।' अर्जुन की बात सुनकर सब लोगों ने वैसा करना स्वीकार किया। उन लोगों ने युधिष्ठिर के बहुत कहने पर पाण्डवों को दाहिने करके खिन्नता के साथ अपने-अपने घर की यात्रा की। प्रजा के चले जाने पर सत्यप्रतिज्ञ धर्मात्मा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों से कहा–'हमें बारह वर्ष तक निर्जन वन में रहना है। इसलिये इस जंगल में जहाँ फूल-फल अधिक हों, स्थान रमणीय और सुखदायक हो, ऋषियों के पवित्र आश्रम हों, ऐसा प्रदेश ढूँढ़ लेना चाहिये।' अर्जुन ने धर्मराज का गुरु के समान सम्मान करके कहा–'आपने बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और महापुरुषों की सेवा की है। मनुष्य लोक की कोई भी वस्तु आपके लिये अज्ञात नहीं है। इसलिये आपकी जहाँ इच्छा हो, वहीं निवास करना चाहिये। भाईजी! अब जो वन पड़ेगा, उसका नाम द्वैतवन है। उसमें पवित्र जल से भरा एक सरोवर तो है ही, रंग-बिरंगे फूल भी खिल रहे हैं और आवश्यक फल भी रहते हैं। वह वन पक्षियों के कलरव से परिपूर्ण रहता है। मुझे तो इस वन में रहना अच्छा लगता है, परन्तु आपकी अनुमति हो तभी। आज्ञा कीजिये।' युधिष्ठिर ने कहा–'अर्जुन! मेरी भी यही सम्मति है। आओ, हम लोग द्वैतवन में चलें।' निश्चय हो जाने पर अग्निहोत्री, संन्यासी, स्वाध्यायशील भिक्षुक, वानप्रस्थ, तपस्वी, व्रती, महात्मा ब्राह्मणों के साथ धर्मात्मा पाण्डवों ने द्वैतवन में प्रवेश किया। वहाँ धर्मात्मा तपस्वी एवं पवित्र स्वभाव वाले आश्रमवासी धर्मराज के सामने आये। धर्मराज ने यथायोग्य सबका स्वागत-सत्कार किया। तदनन्तर एक फूलों से लदे कदम्ब-वृक्ष की छाया में आकर बैठ गये। भीमसेन, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल, सहदेव और उनके सेवकों ने रथों से नीचे उतरकर घोड़े खोल दिये और सब धर्मराज के पास आकर बैठ गये। वहाँ रहकर धर्मराज समस्त अतिथि अभ्यागत, ऋषि-मुनि और ब्राह्मणों को कन्द, मूल, फल से तृप्त करने लगे। बड़ी-बड़ी इष्टियाँ, श्राद्धकर्म, शान्तिक-पौष्टिक क्रियाएँ धौम्य पुरोहित के निर्देशानुसार होतीं। समृद्धिशाली पाण्डव इन्द्रप्रस्थ का राज्य छोड़कर द्वैतवन में रहने लगे। इन्हीं दिनों परम तेजस्वी महामुनि मार्कण्डेय पाण्डवों के आश्रम पर आये। महामनस्वी युधिष्ठिर ने देवता, ऋषि और मनुष्यों के पूजनीय मार्कण्डेयजी का विधि पूर्वक स्वागत-सत्कार किया। मार्कण्डेयजी महाराज वनवासी पाण्डव और द्रौपदी की ओर देखकर मुसकराने लगे। धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा–'माननीय ! अन्य सभी तपस्वी मुझे इस दशा में देखकर संकोच के मारे कुछ बोल नहीं पाते और आप मेरी ओर देखकर मुसकरा रहे हैं। इसका क्या अभिप्राय है ?' मार्कण्डेयजी ने कहा–'मैं तुम्हें इस दशा में देखकर प्रसन्नता से नहीं मुसकरा रहा हूँ। मुझे किसी बात का घमण्ड नहीं है। तुम लोगों को इस दशा में देखकर मुझे सत्यनिष्ठ दशरथ नन्दन भगवान् रामचन्द्र की स्मृति हो आयी है। उन्होंने पिता की आज्ञा से एकमात्र धनुष लेकर सीता और लक्ष्मण के साथ वनवास किया था। उन्हें मैंने ऋष्यमूक पर्वत पर विचरते समय देखा था। भगवान् रामचन्द्र इन्द्र से भी बलवान्, यम को भी दण्ड देने की शक्ति रखने वाले, महामनस्वी तथा निर्दोष थे। फिर भी उन्होंने पिता की आज्ञा से वनवास स्वीकार करके अपने धर्म का पालन किया। यद्यपि उन्हें संग्राम में कोई भी जीत नहीं सकता था, फिर भी उन्होंने राजोचित भोगों का त्याग करके वनवास किया। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को 'मैं बड़ा बलवान् हूँ'–ऐसा समझकर अधर्म नहीं करना चाहिये। भारतवर्ष के बड़े-बड़े इतिहास प्रसिद्ध राजा नाभाग, भगीरथ आदि ने सत्य के बल पर ही पृथ्वी का शासन किया था। धर्मराज ! इस समय जगत्‌ में तुम्हारा यश और तेज देदीप्यमान हो रहा है। तुम्हारी धार्मिकता, सत्यनिष्ठा, सद्व्यवहार जगत् के समस्त प्राणियों से बढ़े-चढ़े हैं। तुम अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वनवास की तपस्या कर लेने के बाद अपनी तेजोमयी राजलक्ष्मी को कौरवों से छीन लोगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।' इस प्रकार कहकर महामुनि मार्कण्डेय पुरोहित धौम्य और पाण्डवों से अनुमति लेकर उत्तर दिशा की ओर चले गये। जबसे महात्मा पाण्डव द्वैतवन में आकर रहने लगे, तब से वह विशाल वन ब्राह्मणों से भर गया। उस वन में तथा सरोवर के आस-पास ऐसी वेदध्वनि होती थी, जिससे वह ब्रह्मलोक के समान जान पड़ता था। वह ध्वनि जो सुनता, उसी के हृदय में वह बस जाती। एक दिन दाल्भ्यबक मुनि ने संध्या के समय धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा–'राजन्! देखो, इस समय द्वैतवन के आश्रम में सब ओर तपस्वी ब्राह्मणों की यज्ञाग्नि प्रज्वलित हो रही है। भृगु, अंगिरा, वसिष्ठ, कश्यप, अगस्त्य और अत्रि गोत्रके उत्तम-उत्तम तपस्वी ब्राह्मण इस पवित्र वन में इकट्ठे हुए हैं और तुम्हारे संरक्षण में सुख-सुविधा के साथ अपने-अपने धर्म का पालन कर रहे हैं। मैं तुम लोगों से मैं एक बात कहता हूँ, सावधानी के साथ सुनो। जब ब्राह्मण और क्षत्रिय मिल-जुलकर काम करते हैं, एक-दूसरे की सहायता करते हैं, तब उनकी उन्नति और अभिवृद्धि होती है। फिर तो वे अग्नि और पवन के समान हिल मिलकर शत्रुओं के वन के वन भस्म कर डालते हैं। बिना ब्राह्मण का आश्रय लिये दीर्घकाल तक सतत प्रयत्न करने पर भी किसी को इस लोक और परलोक की प्राप्ति नहीं हो सकती। धर्मशास्त्र और अर्थशास्त्र में प्रवीण निर्लोभी ब्राह्मण का आश्रय लेकर ही राजा अपने शत्रुओं का नाश कर सकता है। राजा बलि को ब्राह्मणों की सहायता से ही उन्नति प्राप्त हुई थी। ब्राह्मण एक अनुपम दृष्टि और क्षत्रिय एक अनुपम बल है; ये दोनों जब साथ रहते हैं, तब जगत्‌ में सुख-समृद्धि की अभिवृद्धि होती है। इसलिये विद्वान् क्षत्रिय को चाहिये कि अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति और प्राप्त वस्तु की वृद्धि के लिये ब्राह्मणों की सेवा करके उनसे ज्ञान प्राप्त करे। युधिष्ठिर ! तुम तो सदा-सर्वदा ब्राह्मणों के साथ उत्तम व्यवहार करते ही हो। इसलिये लोक में तुम यशस्वी हो रहे हो।' धर्मराज युधिष्ठिर ने बड़ी प्रसन्नता के साथ दाल्भ्यबक मुनि के उपदेश का अभिनन्दन किया। महात्मा वेदव्यास, नारद, परशुराम, पृथुश्रवा, इन्द्रद्युम्न, भालुकि, हारीत, अग्निवेश्य आदि बहुत से व्रतधारी ब्राह्मणों ने दाल्भ्यबक और धर्मराज युधिष्ठिर का सम्मान किया। वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! एक दिन संध्या के समय वनवासी पाण्डव कुछ शोकग्रस्त से होकर द्रौपदी के साथ बैठकर बातचीत कर रहे थे। बातचीत के सिलसिले में द्रौपदी कहने लगी–'सचमुच दुर्योधन बड़ा क्रूर और दुरात्मा है। हम लोगों को दुःखी देखकर उसे तनिक भी तो दुःख नहीं होता। हरे, हरे ! उसने हम लोगों को मृगछाला ओढ़ाकर घोर जंगल में भेज दिया, परन्तु उसे रत्ती-भर भी पश्चात्ताप नहीं हुआ। अवश्य ही उसका हृदय फौलाद से बना होगा। एक तो उसने कपट-द्यूत में जीत लिया, फिर आप जैसे सरल और धर्मात्मा पुरुष को भरी सभा में कठोर वचन कहे और अब अपने मित्रों के साथ मौज उड़ा रहा है। जब मैं देखती हूँ कि आप लोग सुनहरी पलँग छोड़कर कुश-कास के बिछौनों पर सो रहे हैं, मुझे हाथी दाँत का सिंहासन याद आ जाता है और मैं रो पड़ती हूँ। बड़े-बड़े राजा आप लोगों को घेरे रहते थे, आप लोगों का शरीर चन्दन चर्चित होता था। आज आप अकेले मैले कुचैले जंगलों में भटक रहे हैं। मुझे भला, कैसे शान्ति मिल सकती है ? आपके महलों में प्रतिदिन हजारों ब्राह्मणों को इच्छानुसार भोजन कराया जाता था और आज हम लोग फल-मूल खाकर जीवन निर्वाह कर रहे हैं। मेरे प्यारे स्वामी भीमसेन को वनवासी और दुःखी देखकर आपके चित्त में क्रोध क्यों नहीं उमड़ता ? भीमसेन अकेले ही रणभूमि में सब कौरवों को मार डालने का उत्साह रखते हैं। परन्तु आपका रुख न देखकर मन मसोसकर रह जाते हैं। अर्जुन दो बाँह के होने पर भी हजार बाँहवाले कार्तवीर्य अर्जुन के समान बलशाली हैं। इन्हीं के अस्त्र-कौशल से चकित होकर बड़े-बड़े राजा आपके चरणों में प्रणाम और आपके यज्ञ में आकर ब्राह्मणों की सेवा करते थे। वही देवता और दानवों के पूजनीय पुरुषसिंह अर्जुन आज वनवासी हो रहे हैं। आपके चित्त में क्रोध का उदय क्यों नहीं होता ? साँवला रंग, विशाल शरीर, हाथों में ढाल-तलवार और वीरता में अप्रतिम ! ऐसे नकुल और सहदेव को वनवासी देखकर आप क्यों चुप हो रहे हैं। राजा द्रुपद की पुत्री, महात्मा पाण्डु की पुत्रवधू, धृष्टद्युम्न की बहन और पाण्डवों की पतिव्रता पत्नी मैं आज वन-वन भटक रही हूँ ! आपकी सहन-शक्ति को धन्य है। ठीक है, आपमें क्रोध नहीं है। जिसमें क्रोध और तेज न हो, वह कैसा क्षत्रिय ? जो समय आने पर अपना तेज नहीं प्रकट कर सकता, सभी प्राणी उसका तिरस्कार करते हैं। शत्रुओं से क्षमा का नहीं, प्रताप के अनुरूप व्यवहार करना चाहिये।' द्रौपदी ने फिर कहा–'राजन् ! पहले जमाने में राजा बलि ने अपने पितामह प्रह्लाद से पूछा था–'पितामह! क्षमा उत्तम है या क्रोध ? आप कृपा करके मुझे ठीक-ठीक समझाइये।' प्रह्लादजी ने कहा–'क्षमा और क्रोध दोनों की एक व्यवस्था है। न सर्वदा क्रोध उचित है और न क्षमा। जो पुरुष सर्वदा क्षमा करते जाते हैं उनके सेवक, पुत्र, दास और उदासीन वृत्ति के पुरुष भी कटु वचन कहकर तिरस्कार करने लगते हैं, अवज्ञा करते हैं। धूर्त पुरुष क्षमाशील को दबाकर उसकी स्त्री को भी हड़पना चाहते हैं। स्त्रियाँ भी स्वेच्छानुसार बर्ताव करने लगतीं और पातिव्रत धर्म से भ्रष्ट होकर अपने पति का भी अपकार कर डालती हैं। इसके अतिरिक्त जो पुरुष कभी क्षमा नहीं करता, हमेशा क्रोध ही करता है, वह क्रोध के आवेश में आकर बिना विचार किये सबको दण्ड ही देने लगता है वह मित्रों का विरोधी और अपने कुटुम्ब का शत्रु हो जाता है। सब ओर से अपमानित होने के कारण उसके धन की हानि होने लगती है, दुत्कार मिलती है। उसके मन में संताप, ईर्ष्या और द्वेष बढ़ने लगते हैं। इससे उसके शत्रुओं की वृद्धि होती है। वह क्रोधवश अन्याय पूर्वक किसी को दण्ड दे बैठता है; इसके फलस्वरूप ऐश्वर्य, स्वजन और अपने प्राणों से भी उसे हाथ धोना पड़ता है। जो सबसे रोब-दाब के साथ ही मिलता है, उससे लोग डरने लगते हैं, उसकी भलाई करने से हाथ खींच लेते हैं और उसमें दोष देखकर चारों ओर फैला देते हैं। इसलिये न तो हमेशा उग्रता का बर्ताव करना चाहिये और न हमेशा सरलता का। समय के अनुसार उग्र और सरल बन जाना चाहिये। जो समय के अनुसार सरलता और उग्रता को धारण करता है, उसे इस लोक और परलोक में सुख की प्राप्ति होती है। अब मैं तुम्हें क्षमा करने के अवसर बतलाता हूँ। यदि किसी मनुष्य ने पहले उपकार किया हो, फिर उससे कोई बड़ा अपराध बन जाय तो पहले के उपकार पर दृष्टि रखकर उसे क्षमा कर देना चाहिये। यदि कोई मनुष्य मूर्खतावश अपराध कर दे, तब भी क्षमा कर देना चाहिये; क्योंकि सब लोग सभी कामों में चतुर नहीं हो सकते। इसके विपरीत जो लोग जान-बूझकर अपराध करते हों और कहते हों कि हमने जान-बूझकर अपराध नहीं किया है, तो उन्हें थोड़ा अपराध करने पर भी पूरा दण्ड देना चाहिये। कुटिल पुरुषों को क्षमा नहीं करना चाहिये। एक बार का अपराध तो चाहे किसी का भी क्षमा कर देना चाहिये, परन्तु दूसरी बार दण्ड अवश्य देना चाहिये। मृदुलता से उग्र और कोमल दोनों प्रकार के पुरुष वश में किये जा सकते हैं। मृदुल पुरुष के लिये कुछ भी असाध्य नहीं है। इसलिये मृदुलता ही श्रेष्ठ साधन है। अतः देश, काल, सामर्थ्य और कमजोरी पर पूरा पूरा विचार करके मृदुलता और उग्रता का व्यवहार करना चाहिये। कभी-कभी तो भय से भी क्षमा करनी पड़ती है। यदि कोई ऊपर कही बातों के प्रतिकूल बर्ताव करता हो तो उसे क्षमा न करके क्रोध से काम लेना चाहिये।' द्रौपदी ने आगे कहा–'राजन् ! धृतराष्ट्र के पुत्र अपराध-पर-अपराध करते जा रहे हैं। उनका लालच असीम है। मैं समझती हूँ कि अब उन पर क्रोध करने का समय आ गया है, आप उन्हें क्षमा न करके उन पर क्रोध कीजिये।' युधिष्ठिर ने कहा–'प्रिये ! मनुष्य को क्रोध के वश में न होकर क्रोध को अपने वश में करना चाहिये। जिसने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली, वह कल्याण-भाजन हो गया। क्रोध के कारण मनुष्यों का नाश होता प्रत्यक्ष दीखता है। मैं अवनति के हेतु क्रोध के वश में कैसे हो सकता हूँ? क्रोधी मनुष्य पाप करता है, गुरुजनों को मार डालता है, श्रेष्ठ पुरुष और कल्याणकारक वस्तुओं का भी कठोर वाणी से तिरस्कार करता है। फलतः विपत्ति में पड़ जाता है। क्रोधी मनुष्य यह नहीं समझ सकता कि क्या कहना चाहिये, क्या नहीं। जो मन में आया बक डालता है। उसे इस बात का भी पता नहीं चलता कि क्या करना चाहिये, क्या नहीं। जो चाहे कर डालता है। वह जिलाने योग्य को मार डालता है, मार डालने योग्य की पूजा करता है, और क्रोध के आवेश में आत्महत्या करके अपने आप को नरक में डाल देता हैं। क्रोध दोषों का घर है। बुद्धिमान् पुरुषों ने अपनी लौकिक उन्नति, पारलौकिक सुख और मुक्ति प्राप्त करने के लिये क्रोध पर विजय प्राप्त की है। क्रोध के दोष गिने नहीं जा सकते। इसी से, यही सब सोचने-विचारने से मेरे चित्त में क्रोध नहीं आता। जो मनुष्य क्रोध करने वाले पर भी क्रोध नहीं करता, क्षमा करता है, वह अपनी और क्रोध करने वाले की महासंकट से रक्षा करता है, वह दोनों का रोग दूर करने वाला चिकित्सक है। झूठ बोलने की अपेक्षा सच बोलना कल्याणकारी है। क्रूरता की अपेक्षा कोमलपना उत्तम है। क्रोध की अपेक्षा क्षमा ऊँची है। यदि दुर्योधन मुझे मार भी डाले तो भी मैं अनेकों दोषों से भरे और महात्माओं से परित्यक्त क्रोध को कैसे अपना सकता हूँ। मैंने यह निश्चय कर लिया है कि तत्त्वदर्शी पुरुष में, जिसे तेजस्वी कहते हैं, क्रोध होता ही नहीं। जो अपने क्रोध को ज्ञानदृष्टि से शान्त कर देते हैं, उन्हें ही तेजस्वी समझना चाहिये। क्रोधी मनुष्य जब अपने कर्तव्य को ही भूल जाता है, तब उसे कर्तव्य अथवा मर्यादा का ध्यान रह ही कैसे सकता है। क्रोधी पुरुष अवध्य प्राणियों को मार डालता है, गुरुजनों को मर्मभेदी वचन कहता है; इसलिये यदि अपने में तेज हो तो पहले क्रोध को ही अपने वश में करना चाहिये। काम करने की चतुराई, शत्रु पर विजय प्राप्त करने के उपाय का विचार, विजय प्राप्त करने की शक्ति और स्फूर्ति तेजस्वियों के गुण हैं। ये गुण क्रोधी मनुष्य में नहीं रह सकते। क्रोध के त्याग से ही इनकी प्राप्ति होती है। क्रोध रजोगुण का परिणाम होने के कारण मनुष्यों की मृत्यु है। इसलिये क्रोध छोड़कर शान्त हो जाना चाहिये। एक बार अपने धर्म से हट जाना भी अच्छा, परन्तु क्रोध करना अच्छा नहीं। मैं मूर्खो की बात नहीं कहता; समझदार मनुष्य भला, क्षमा का त्याग कैसे कर सकता है। मनुष्यों में यदि क्षमाशीलता न हो तो सब लोग आपस में लड़-झगड़कर मर मिटें। एक दुःखी दूसरे को दुःख दे, दण्ड देने वाले गुरुजनों पर भी प्रहार करने को उद्यत हो जायँ, तब तो कहीं धर्म रहे ही नहीं, प्राणियों का नाश हो जाय। ऐसी अवस्थामें क्या होगा ? गाली के बदले में गाली, मार के बदले में मार, तिरस्कार के बदले में तिरस्कार। पिता पुत्र को, पुत्र पिता को, पति पत्नी को और पत्नी पति को नष्ट कर डालें। कोई मर्यादा, कोई व्यवस्था, कोई सौहार्द न रहे। जो गाली देने पर भी, मारने पर भी क्षमा करता है, क्रोध को वश में करता है, वह उत्तम विद्वान् है। क्रोधी मूर्ख है, नरक का भागी है। इस सम्बन्ध में महात्मा काश्यप ने क्षमाशील पुरुषों के बीच में क्षमा की साधना का गीत गाया है–क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है, क्षमा स्वाध्याय है। जो मनुष्य क्षमा के इस सर्वोत्कृष्ट स्वरूप को जानता है, वह सब कुछ क्षमा कर सकता है। क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा ही भूत और भविष्यत् है, क्षमा तप है, क्षमा पवित्रता है, क्षमा ने ही इस जगत्‌ को धारण कर रखा है। याज्ञिकों को जो लोक मिलते हैं, उनसे भी ऊपर के लोक क्षमावानों को मिलते हैं। वेदज्ञों को, तपस्वियों को और कर्मनिष्ठों को दूसरे दूसरे लोक मिलते हैं; परन्तु क्षमावानों को ब्रह्मलोक के श्रेष्ठ लोक मिलते हैं। क्षमा तेजस्वियों का तेज है, तपस्वियों का ब्रह्म है और सत्यवानों का सत्य है। क्षमा ही लोकोपकार, क्षमा ही शान्ति है। क्षमा में ही सारे लोक, लोकोपकारक यज्ञ, सत्य और ब्रह्म प्रतिष्ठित हैं। ऐसी क्षमा को भला, मैं कैसे छोड़ सकता हूँ ? ज्ञानी पुरुष को सर्वदा क्षमा ही करना चाहिये। जब सब कुछ क्षमा कर देता है, तब वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है। क्षमावानों को यह लोक और परलोक दोनों तैयार हैं। यहाँ सम्मान और परलोक में शुभ गति। जिन्होंने क्षमा के द्वारा क्रोध को दबा दिया है, उन्हें परम गति प्राप्त हो गयी है। प्रिये ! महात्मा काश्यप ने क्षमा की महिमा इस प्रकार गायी है; इसे सुनकर तुम क्रोध छोड़ो और क्षमा का अवलम्बन करो। भगवान् श्रीकृष्ण, भीष्मपितामह, आचार्य धौम्य, मन्त्री विदुर, कृपाचार्य, संजय और महात्मा वेदव्यास भी क्षमा की ही प्रशंसा करते हैं। क्षमा और दया ही ज्ञानियों का सदाचार है, यही सनातन-धर्म है। मैं सच्चाई के साथ क्षमा और दया का पालन करूँगा। ~~~०~~~ – साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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