Shyam Yadav
Shyam Yadav Oct 14, 2021

*👩🏻‍🦱👩🏻 जिन बहनों को ससुराल में तकलीफ हो तो 👇* 🌷 *नवरात्रि के इन आखिरी 3 दिनों में विशेष जपने हेतु मंत्र* 🗓️ अष्टमी तिथि ▶️ विशेष 🌹🌹गौरी माता का पूजन का दिन है l 📀 *वीडियो : 1:40 मिनट* 👆👆 ➖➖➖➖➖➖➖➖ 1️⃣👩🏻 *ससुराल में तकलीफ हो तो* 🌷 👩🏻 *जिनको शादी के बाद कठिनाई आती है... ससुराल में ....उनको अष्टमी तिथि को* ( 🌹 *ॐ ह्रीं गौरिये नम: | ॐ ह्रीं गौरिये नम: |* *का जप करे | और प्रार्थना करे "की शिवजी की अति प्रिय हो माँ... हमारे परिवार में ये समस्या न रहें |* 🙏🏻🙏 आपके परिचितों में किसी को भी बेटी, बहन शादी के बाद दिक्कते आती हो तो आप इनको बता दें | ऐसा करें बेटी न कर पाये तो बाप तो करे, भाई करें, बहन करें की मेरी बेटी, बहन को ऐसी तकलीफ न हो ऐसा संकल्प करें, नाम और गोत्र का उच्चारण करके | ➖➖➖➖➖➖➖➖ 2️⃣🔱💫 *नवरात्रि के इन आखिरी 3 दिनों में जपने हेतु विशेष मंत्र 👇* 🌷ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा l ➖➖➖➖➖➖➖➖ 📕 *देवी भागवत में लिखा है कि* 🌹🌼 इस मंत्र का फायदा *भगवान श्री रामजी के गुरु वशिष्ठ जी* ने भी लिया था l 🌹🌼 इसी मंत्र के प्रभाव से *श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैंने सोने की द्वारका* बना ली l 🌹🌼 रावण कहता है कि *मैं इसी मंत्र से सोने की लंका बनाने में सफल* हुआ l 🌹🌼 *कुबेर भंडारी ने भी इसी मंत्र से संपदा पाई थी l* ➖➖➖➖➖➖➖➖ 🌹

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Ravi Kumar Taneja Oct 14, 2021
*꧁🌹दशहरा की हार्दिक शुभकामनाये 🌹꧂* ꧁🌹जय श्री राम 🌹꧂ 🏹 *"दशहरा" के पावन पर्व की आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें! दिव्यता,शक्ति और न्याय के स्वरूप प्रभु श्रीराम जी की कृपा आप सभी पर हमेशा बनी रहे।*🙏🌸🙏 *🏹विजयादशमी के दिन अपने मन में जो रावण के विचार हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता – इन अंदर के शत्रुओं को जीतना है और रोग,अशांति जैसे बाहर के शत्रुओं पर भी विजय पानी है।* दशहरा हमे यह संदेश देता है।🏹 ⚘प्रभु श्री राम आपको और आपके परिवार को शांति, सुख-समृद्धि, मान-सन्मान, यश-कीर्ति प्रदान करें, ईश्वर से हमारी यही प्रार्थना है 🙏🌹🙏!!! 🕉🏹🙏🌻🙏🌻🙏🌻🙏🏹🕉

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 🕉🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🕉 🌹🙏 *ॐ नमो नारायण* 🙏🌹 🌿🌷🌻 *शुभ~दिवस* 🌻🌷🌿 🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳 *स्वर, संगीत ~ @श्री दास जी* *सौजन्य : अखिल भारतीय श्रीदादू सेवक समाज* 🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉 . *ज्यों रसिया रस पीवतां, आपा भूलै और ।* *यों दादू रह गया एक रस, पीवत पीवत ठौर ॥२७१॥* टीका - हे जिज्ञासुओं ! अब स्वयं परमेश्वर अपने भक्तों को उपदेश करते हैं कि जैसे रस का रसिया रस का आस्वादन अपनी ही प्रसन्नता के लिये लेता है, किन्तु रस पीवतां कहिए, आपा और परायापन के भाव को भूल जाते हैं । इसी प्रकार भक्ति - रस का आस्वादन लेते हुए भक्तजन माया व ब्रह्मभाव को भूलकर भक्तिरस में ही अभेद हो रहे हैं । अथवा हे मुमुक्षुओं ! रसिया की भांति परमेश्वर में अभेद होइये, तो शरीर आदिक का अध्यास भूलोगे ॥२७१॥ *(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)* https://youtu.be/Z2eTrf0gwXA https://youtu.be/Z2eTrf0gwXA

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🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 🕉🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🕉 🌹🙏 *ॐ नमो नारायण* 🙏🌹 🌿🌷🌻 *शुभ~दिवस* 🌻🌷🌿 🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳 *स्वर, संगीत ~ @श्री दास जी* *सौजन्य : अखिल भारतीय श्रीदादू सेवक समाज* 🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉 . *जहँ सेवक तहँ साहिब बैठा, सेवक सेवा मांहि ।* *दादू सांई सब करै, कोई जानै नांहि ॥२७२॥* टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब भक्तजन परमेश्वर की भक्ति में एक रस होते हैं, तो भक्तों के हृदय में ही प्रकाशमान होकर अपने भक्तों की योग, क्षेम आदिक सब सेवायें परमेश्वर आप स्वयं करते हैं, किन्तु इस बात को भक्तों के अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं जान पाता ॥२७२॥ सांभर नूँता सात को, भोगे दादू होइ । एक दिवालै भाकसी, दादू देखे दोइ ॥ "जैमल" जप हरि नाम को, हरिजी जैमल होइ । सैन्य हनी रणभूमि में, मर्म न जान्यो कोइ ॥ दृष्टान्त - सांभर झील में जब ब्रह्मऋषि विराजते थे, एक रोज एक साहूकार ने महाराज को घर ले जाने का निमंत्रण दिया । इस प्रकार उसी दिन सात निमंत्रण आए । महाराज ने विचार किया कि प्रभु भेज रहे हैं, आप ही स्वयं भक्तों के यहाँ पधारेंगे । प्रभु की प्रेरणा से पहले निमंत्रण आया, उसके साथ ब्रह्मऋषि पधार गए । फिर बाद में ब्रह्मऋषि का रूप बनाकर भगवान स्वयं झील में बैठ गए और दूसरा आया, तो उसके साथ चले गए । इस प्रकार सात निमन्त्रण भगवान ने दादू जी के रूप में जीमे । तब भक्तों को जानकारी हुई कि आज महाराज ने अपने सात रूप बनाए और सातों भक्तों की इच्छा पूर्ति की, परन्तु भगवान ने ब्रह्मऋषि को प्रगट करने के लिए लीला रची थी । *दूसरा परचा* - सांभर के हाकिम ने मजहबी लोगों के कहने पर दादूदयाल ब्रह्मऋषि को बुलवाकर कारागृह में बन्द कर दिया । परमेश्वर दादूदयाल का रूप बनाकर उसी देवालय में बैठ गए और पद गाने लगे । जब हाकिम को पता चला कि वह कारागृह में भी और कुटी में भी बैठे हैं, तब कारागृह से मुक्त करके चरणों में नत - मस्तक होकर प्रणाम किया और चरणों की धूल मस्तक में रमा कर महाराज के ज्ञान को ग्रहण करके कृत - कृत्य हो गया । *तीसरा परचा* - जैमल जी चौहान बौंली ग्राम के जागीरदार थे । ये दादूजी के प्रधान ५२ शिष्यों में माने जाते हैं । बौंली ग्राम को प्राचीन समय में "खालड़" और आजकल सबलपुर कहते हैं । जयमलजी चौहान अपना अधिकांश समय भगवद् भजन में लगाते थे । एक दिन प्रातःकाल जब वे भगवद्भक्ति में तल्लीन थे, एक द्वेषी ठाकुर ने दल - बल के साथ उनके ठिकाने पर चढ़ाई कर दी । तब अपने परमभक्त पर आई विपत्ति को टालने के लिये भगवान् ने सैन्य दल - बल सहित जयमल का रूप धारण करके शत्रु से जा भिड़े और शत्रु - दल को मार भगाया । जब विजयी सैन्य - दल ने ग्राम में आकर परमवीर जयमलजी द्वारा रणक्षेत्र में प्रदर्शित अद्भुत शूरवीरता का गुणगान लोगों को सुनाया तो लोग आश्चर्यान्वित होकर कहने लगे कि राव साहब जैमलजी तो भोर से ही पूजन - पाठ व हरिनाम स्मरण में व्यस्त हैं, बाहर निकले ही नहीं, देख लो ! परन्तु सभी सैनिक दावे के साथ कह रहे थे कि वे जोश - खरोश के साथ युद्धक्षेत्र में हमारा नेतृत्व कर रहे थे । जब सबने महल में जाकर जयमलजी को नाम - स्मरण में ध्यान - मग्न देखा तो उन्हें पूर्ण विश्वास हो गया कि भक्त - वत्सल भगवान् ने ही उनका दूसरा रूप धारण कर लिया था । इससे उनकी प्रसिद्धि दूर - दूर तक फैल गयी थी । *ईर्ष्या* - एक दुष्ट भेषधारी ने उन्हें मारने के लिये उन पर मारण - मन्त्र(मूठ) का प्रयोग भी किया था, जिसका जयमलजी चौहान ने तत्काल "रामरक्षा मन्त्र" की रचना करके मूठ को वापस लौटा दिया था । यह राम रक्षा - मन्त्र अत्यन्त प्रभावी है, जिसका चमत्कार देखा जा सकता है । साधु लोग इसका झाड़ा देकर भूतबाधा, रोग कष्ट आदि अनेक व्याधियों से व्यथित व्यक्तियों का कष्ट - निवारण करते देखे जाते हैं । *(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)* https://youtu.be/rNHaWA6WorI https://youtu.be/rNHaWA6WorI

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Pt. Manoj Shukla Oct 22, 2021

परा-अपरा का परिचय : मुंडकोपनिषद अनुसार परा यौगिक साधना है और अपरा अध्यात्मिक ज्ञान है। जिस विद्या से 'अक्षरब्रह्म' का ज्ञान होता है, वह 'परा' विद्या है और जिससे ऋग, यजु, साम, अथर्व, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष का ज्ञान होता है, वह 'अपरा' विद्या है। परा विद्या वह है जिसके द्वारा परलोक यानी स्वर्गादि लोकों के सुख-साधनों के बारे में जाना जा सकता है, इन्हीं विद्याओं के जरिए इन्हें पाने के मार्ग भी पता किए जाते हैं।  जगत 3 स्तरों वाला है। एक, स्थूल जगत जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। दूसरा, सूक्ष्म जगत जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं तथा तीसरा, कारण जगत जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है। इन तीनों स्तरों में जो व्यक्ति जाग्रत हो जाता है, साक्षीभाव में ठहर जाता है वह परा और अपरा दोनों ही प्रकार की विद्याओं में पारंगत हो जाता है।

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श्रीकृष्ण जी की के सात विशेष विग्रह 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ वृंदावन वह स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण ने बाललीलाएं की व अनेक राक्षसों का वध किया। यहां श्रीकृष्ण के विश्वप्रसिद्ध मंदिर भी हैं। आज हम आपको 7 ऐसी चमत्कारी श्रीकृष्ण प्रतिमाओं के बारे में बता रहे हैं, जिनका संबंध वृंदावन से है। इन 7 प्रतिमाओं में से 3 आज भी वृंदावन के मंदिरों में स्थापित हैं, वहीं 4 अन्य स्थानों पर प्रतिष्ठित हैं- 1. गोविंद देवजी, जयपुर 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ रूप गोस्वामी को श्रीकृष्ण की यह मूर्ति वृंदावन के गौमा टीला नामक स्थान से वि. सं. 1592 (सन् 1535) में मिली थी। उन्होंने उसी स्थान पर छोटी सी कुटिया इस मूर्ति को स्थापित किया। इनके बाद रघुनाथ भट्ट गोस्वामी ने गोविंदजी की सेवा पूजा संभाली, उन्हीं के समय में आमेर नरेश मानसिंह ने गोविंदजी का भव्य मंदिर बनवाया। इस मंदिर में गोविंद जी 80 साल विराजे। औरंगजेब के शासनकाल में ब्रज पर हुए हमले के समय गोविंदजी को उनके भक्त जयपुर ले गए, तब से गोविंदजी जयपुर के राजकीय (महल) मंदिर में विराजमान हैं। 2. मदन मोहनजी, करौली 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ यह मूर्ति अद्वैतप्रभु को वृंदावन में कालीदह के पास द्वादशादित्य टीले से प्राप्त हुई थी। उन्होंने सेवा-पूजा के लिए यह मूर्ति मथुरा के एक चतुर्वेदी परिवार को सौंप दी और चतुर्वेदी परिवार से मांगकर सनातन गोस्वामी ने वि.सं. 1590 (सन् 1533) में फिर से वृंदावन के उसी टीले पर स्थापित की। बाद में क्रमश: मुलतान के नमक व्यापारी रामदास कपूर और उड़ीसा के राजा ने यहां मदनमोहनजी का विशाल मंदिर बनवाया। मुगलिया आक्रमण के समय इन्हें भी भक्त जयपुर ले गए पर कालांतर में करौली के राजा गोपालसिंह ने अपने राजमहल के पास बड़ा सा मंदिर बनवाकर मदनमोहनजी की मूर्ति को स्थापित किया। तब से मदनमोहनजी करौली (राजस्थान) में ही दर्शन दे रहे हैं। 3. गोपीनाथजी, जयपुर 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ श्रीकृष्ण की यह मूर्ति संत परमानंद भट्ट को यमुना किनारे वंशीवट पर मिली और उन्होंने इस प्रतिमा को निधिवन के पास विराजमान कर मधु गोस्वामी को इनकी सेवा पूजा सौंपी। बाद में रायसल राजपूतों ने यहां मंदिर बनवाया पर औरंगजेब के आक्रमण के दौरान इस प्रतिमा को भी जयपुर ले जाया गया, तब से गोपीनाथजी वहां पुरानी बस्ती स्थित गोपीनाथ मंदिर में विराजमान हैं। 4. जुगलकिशोर जी, पन्ना 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भगवान श्रीकृष्ण की यह मूर्ति हरिरामजी व्यास को वि.सं. 1620 की माघ शुक्ल एकादशी को वृंदावन के किशोरवन नामक स्थान पर मिली। व्यासजी ने उस प्रतिमा को वहीं प्रतिष्ठित किया। बाद में ओरछा के राजा मधुकर शाह ने किशोरवन के पास मंदिर बनवाया। यहां भगवान जुगलकिशोर अनेक वर्षों तक बिराजे पर मुगलिया हमले के समय जुगलकिशोरजी को उनके भक्त ओरछा के पास पन्ना ले गए। पन्ना (मध्य प्रदेश) में आज भी पुराने जुगलकिशोर मंदिर में दर्शन दे रहे हैं। 5. राधारमणजी, वृंदावन 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ गोपाल भट्ट गोस्वामी को गंडक नदी में एक शालिग्राम मिला। वे उसे वृंदावन ले आए और केशीघाट के पास मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया। एक दिन किसी दर्शनार्थी ने कटाक्ष कर दिया कि चंदन लगाए शालिग्रामजी तो ऐसे लगते हैं मानो कढ़ी में बैगन पड़े हों। यह सुनकर गोस्वामीजी बहुत दुखी हुए पर सुबह होते ही शालिग्राम से राधारमण की दिव्य प्रतिमा प्रकट हो गई। यह दिन वि.सं. 1599 (सन् 1542) की वैशाख पूर्णिमा का था। वर्तमान मंदिर में इनकी प्रतिष्ठापना सं. 1884 में की गई। उल्लेखनीय है कि मुगलिया हमलों के बावजूद यही एक मात्र ऐसी प्रतिमा है, जो वृंदावन से कहीं बाहर नहीं गई। इसे भक्तों ने वृंदावन में ही छुपाकर रखा। इनकी सबसे विशेष बात यह है कि जन्माष्टमी को जहां दुनिया के सभी कृष्ण मंदिरों में रात्रि बारह बजे उत्सव पूजा-अर्चना, आरती होती है, वहीं राधारमणजी का जन्म अभिषेक दोपहर बारह बजे होता है, मान्यता है ठाकुरजी सुकोमल होते हैं उन्हें रात्रि में जगाना ठीक नहीं। 6. राधाबल्लभजी, वृंदावन 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भगवान श्रीकृष्ण की यह सुंदर प्रतिमा हित हरिवंशजी को दहेज में मिली थी। उनका विवाह देवबंद से वृंदावन आते समय चटथावल गांव में आत्मदेव ब्राह्मण की बेटी से हुआ था। पहले वृंदावन के सेवाकुंज में (संवत् 1591) और बाद में सुंदरलाल भटनागर (कुछ लोग रहीम को यह श्रेय देते हैं) द्वारा बनवाए गए लाल पत्थर वाले पुराने मंदिर में राधाबल्लभजी प्रतिष्ठित हुए। मुगलिया हमले के समय भक्त इन्हें कामा (राजस्थान) ले गए थे। वि.सं. 1842 में एक बार फिर भक्त इस प्रतिमा को वृंदावन ले आए और यहां नवनिर्मित मंदिर में प्रतिष्ठित किया, तब से राधाबल्लभजी की प्रतिमा यहीं विराजमान है। 7. बांकेबिहारीजी, वृंदावन 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी को स्वामी हरिदासजी की आराधना को साकार रूप देने के लिए बांकेबिहारीजी की प्रतिमा निधिवन में प्रकट हुई। स्वामीजी ने इस प्रतिमा को वहीं प्रतिष्ठित कर दिया। मुगलों के आक्रमण के समय भक्त इन्हें भरतपुर ले गए। वृंदावन के भरतपुर वाला बगीचा नाम के स्थान पर वि.सं. 1921 में मंदिर निर्माण होने पर बांकेबिहारी एक बार फिर वृंदावन में प्रतिष्ठित हुए, तब से यहीं भक्तों को दर्शन दे रहे हैं। बिहारीजी की प्रमुख विशेषता यह है कि यहां साल में केवल एक दिन (जन्माष्टमी के बाद भोर में) मंगला आरती होती है, जबकि वैष्णवी मंदिरों में यह नित्य सुबह मंगला आरती होने की परंपरा है। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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