Kamala Sevakoti
Kamala Sevakoti Nov 23, 2021

Jai shree Radhey Krishna 🙏🙏🙏🙏🙏🙏jai shree Radhey Krishna 🌷🌷🌷🌷🌷🌷jai shree Radhey Krishna 💖🍁💕🍁💕🍁💖💖💕good morning ji 🙏🙏🙏🙏⚘🙏

Jai shree Radhey Krishna 🙏🙏🙏🙏🙏🙏jai shree Radhey Krishna 🌷🌷🌷🌷🌷🌷jai shree Radhey Krishna 💖🍁💕🍁💕🍁💖💖💕good morning ji  🙏🙏🙏🙏⚘🙏

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कामेंट्स

🌹яαиʝιт ¢нαν∂α🌹 Jan 17, 2022
j̺a̺i̺ s̺h̺r̺e̺e̺ k̺r̺i̺s̺h̺n̺a̺ j̺i̺ v̺e̺r̺y̺ g̺o̺o̺d̺ n̺i̺g̺h̺t̺ j̺i̺ 🌹🙏🏽🌹🙏🏽🌹🙏🏽

Anil Jan 17, 2022
good night 🌹🌻💮🌻🌹

SANTOSH YADAV Jan 17, 2022
जय श्री राधे राधे शुभ रात्रि वंदन जी

Runa Sinha Jan 17, 2022
🥦💕Har Har mahadev 💕🥦 🥦💕Good night bahan🙏💕🥦

snehalata Mishra Jan 17, 2022
राधे राधे जय श्री कृष्ण🙏 शुभ रात्रि वंदन जी🙏 आप का हर पल मंगलमय हो 🙏 जय श्री राम जय हनुमान🙏🌹

Ravi Kumar Taneja Jan 18, 2022
*🌹राम राम जी 🌹* *नमस्कार, शुभ प्रभात स्नेह वंदन जी, आपका जीवन मंगलमय हो🙏💐🙏* जय जय जय बजरंग बली 🙏🌺🙏 जय श्री राम 🙏💐🙏 प्रभु श्रीराम आपको और आपके परिवार को शांति, सुख-समृद्धि, मान-सन्मान, यश-कीर्ति, वैभव-ऐश्वर्य प्रदान करें, प्रभु श्रीराम जी से हमारी यही प्रार्थना है !!!🙏🌹🙏 *‼️सदैव प्रसन्न रहिये!* *जो प्राप्त है,पर्याप्त है‼️* 🕉🦚🦢🙏🌹🙏🦢🦚🕉

Anup Kumar Sinha Jan 18, 2022
जय श्री राम🙏🏻🙏🏻 सुप्रभात वंदन, बहना । भगवान श्री राम और उनके परमभक्त हनुमानजी आप सपरिवार पर प्रसन्न रहें ।आपका दिन शुभ हो 🙏🏻🌼

SANTOSH YADAV Jan 18, 2022
जय श्री गणेश जय श्री हनुमान शुभ मंगलवार वंदन जी

Anup Kumar Sinha Jan 18, 2022
जय श्री राधे कृष्ण 🙏🏻🙏🏻 शुभ रात्रि वंदन, बहना । भगवान कृष्ण आपकी हर मनोकामना पूरी करें और आपके जीवन को खुशियों से भर दें 🙏🏻🎉

Runa Sinha Jan 18, 2022
🌴💕Jai Shri Krishna💕 🌴 🌴💕Radhe Radhe💕 🌴 🌴💕Good night bahan🙏💕 🌴

Shivsankar Shukla Jan 18, 2022
जय सियाराम शुभ रात्रि आदरणीय बहन जय बजरंगबली हनुमान

SANTOSH YADAV Jan 18, 2022
जय श्री राधे राधे शुभ रात्रि वंदन जी

Kanta Jan 18, 2022
Jai shree radhe krishna 🌹 good night sister 🌹

soni Mishra Jul 4, 2022

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Amit Kumar Jul 5, 2022

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gopal gajjar Jul 5, 2022

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gopal gajjar Jul 5, 2022

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. श्री गौर किशोर शिरोमणि (वृन्दावन) रामदासी की माँ एक पतिव्रता स्त्री थीं। पति के देहत्याग के समय उन्होंने सती होने की इच्छा प्रकट की। स्वजनों ने उन्हें समझाया। सती होने में कितना कष्ट होता है बताकर डराया। उसी समय उन्होंने अपनी एक उँगली घी में डुबोकर दीपक की लौ पर रख दी। उँगली धक-धककर जलने लगी। उसे दिखाकर उन्होंने कहा 'देखो, मुझे कुछ भी कष्ट नहीं हो रहा है।' तब पति की ज्वलन्त चिता की सात बार परिक्रमाकर वे उसमें कूद पड़ीं। आज भी वह स्थान, जहाँ वह सती हुई थीं, वर्धमान जिले में गुस्करा स्टेशन के निकट ओर ग्राम में 'सती डांगा' नाम से प्रसिद्ध है। चितारोहण के पूर्व उन्होंने कहा था 'रामदासी विवाह योग्य हो जाय तो उसका विवाह काटोया तहसील के अन्तर्गत चिताहाटी निवासी धनकृष्ण मुखोपाध्याय के पुत्र गौरचन्द्र शिरोमणि से कर देना।' रामदासी की उम्र उस समय डेढ़ वर्ष की थी। गौरचन्द्र भी बालक थे। पढ़ने-लिखने से उनका कोई सरोकार था नहीं। यूं ही लीला-मण्डलियों की लीलाएँ देखते-सुनते इधर-उधर डोला करते। फिर भी सती ने उन्हें अपनी कन्या के योग्य वर के रूपमें वरण किया था। निश्चय ही उन्होंने अपने योगबल से उनके अन्तर में छिपे एक सिद्ध महापुरुष को देख लिया था। उनकी इच्छानुसार रामदासी के विवाह योग्य होने पर उसका विवाह गौरचन्द्र से कर दिया गया। बीस वर्ष की आयु तक गौरचन्द्र की पुस्तकों से भेंट तक न हुई। एक दिन एक ग्रामवासी ने कहा–'गौर ! तू अपने कुल का कलंक बनकर रह गया।' बस उसी दिन से उन्हें पढ़ने की छटपटी लग गयी। किसी पण्डित से कुछ लिखना पढ़ना सीखने के पश्चात् काटोया में पंचानन तर्करत्न की टोल में भरती हो गये। कुछ दिन बाद काटोया के गौरांगवाड़ा के सखी चरनदास पण्डित बाबा के निकट अध्ययनकर भक्ति-शास्त्र में पारङ्गत हो गये। फरीदपुर के श्रीविनोदीलाल ठाकुर महाशय से श्रीकृष्ण मन्त्र में दीक्षा ली। तत्पश्चात् काटोया के श्रीगौरांग महाप्रभु के नाट्य मन्दिर में रहकर अध्ययन-अध्यापन करने लगे। कुछ ही दिनों में एक महान पण्डित के रूप में उनकी ख्याति चारों ओर फैल गयी। महाप्रभु के मन्दिर के सेवारत श्रीबेनीमाधव ठाकुर एक प्रसिद्ध महात्मा थे। उनके संग से शिरोमणि महाशय विशेष रूप से प्रभावित हुए। एक दिन महाप्रभु के मन्दिर में बहुत-से व्रजवासी वैष्णव आकर ठहरे। उनकी सेवा का सुयोग पाकर बेनीमाधव ठाकुर का हृदय आनन्द से नाच उठा। उन्होंने गृहणी से उनके भोग-राग को अच्छी व्यवस्था करने को कहा। वह बोली–'आज़ भोग-याग के लिए घर में है ही क्या ? आपने तो पहले ही वैष्णव-सेवा के आवेश में सब खर्चकर दिया है।' यह सुन ठाकुर चिन्ता में पड़ गये। कुछ उपाय सोचने लगे। थोड़ी देर में शिरोमणिजी ने देखा कि उन्होंने अपने घर का एक दरवाजा निकाल लिया है और उसे सिर पर ढोकर वैष्णव-सेवा के हेतु बाजार में बेचने जा रहे हैं। यह देख उनके नेत्र अश्रुक्ति हो गये, देह कांपने लगा और वे मूर्छित हो गिर पड़े। उस दिन उन्होंने वैष्णव-सेवा का जो पाठ सीखा, वह उनके दैनिक जीवन का एक अङ्ग बन गया। काटोया में रहते समय शिरोमणि महाशय अरुणोदय में श्रीगौरांगी मंगल आरती के दर्शनकर प्रभाती स्मरण-कीर्तन, गङ्गा-स्नान, संस्थानाम-जप मन्त्र-स्मरण, लीला-चिन्तनादि करते-करते दिन के दो बजे तक का समय अतिवाहित करते। तत्पश्चात् जिस स्थान पर वैष्णवगण मूत्र त्याग करते, उसे परिष्कार करते और गङ्गा के पथ पर झाडू लगाते। झाडू लगाकर गङ्गा स्नान, महाप्रभु-दर्शन-परिक्रमादि कर समागत वैष्णव और गोस्वामीगण को दण्डवत् प्रणाम करते, और मन्दिर के बाहर गढ़ में फेंकी हुई वैष्णव-प्रसादी की कणिका उठाकर मुख में डालते। तब चार मुट्ठी चावल उबालकर, उसमें सेंधा नमक डाल गिरधारी का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते। कोई कुछ कहता तो कहते–'मुझे इसके अतिरिक्त और किसी प्रकार का प्रसाद सह्य नहीं होना। इसी बहाने जब उन्हें कहीं कोई निमन्त्रण देता, तो फेंके हुए वैष्णव-उच्छिष्ट में से कणिका लेकर उस निमन्त्रण की रक्षा करते। तीसरे प्रहर छात्रों को लेकर अध्यापन करते। प्रतिदिन जिस विषय का वर्णन करते अन्त में उसका श्रीगौरांग में पर्यवसान और समन्वय दिखाते हुए पाठ पूर्ण करते। एक रहस्य की बात यह है कि पाठ के समय उनके पास बैठे रहते प्रसन्न मुद्रा में एक वृद्ध, अनपढ़, अति सरल हृदय के विदूषक जैसे महानुभाव। उन्हें लोग 'खेपा (पागल) ठाकुर कहकर पुकारा करते। वे उनके पत्रवाहक का कार्य करते। पर लोगों से कहते–'शिरोमणि मेरा छात्र है।' कभी-कभी वे उनकी भर्त्सना भी करते। फिर भी शिरोमणिजी को उनके सान्निध्य से सुख मिलता और उन्हें शिरोमणिजी के सान्निध्य से। काटोया में शिरोमणि महाशय की एक प्रसिद्ध गोष्ठी थी। श्रीविनोदी ठाकुर तो उसके एक प्रमुख सदस्य थे ही। ढाका के उथलिग्राम निवासी अद्वैतवंशी श्रीवृन्दावनचन्द्र गोस्वामी प्रभु और उनके बड़े भाई जगद् बन्धु प्रभु भी गृह त्यागकर और श्रीकिशोरदास बाबाजी महाराज से वेश ग्रहणकर उनकी गोष्ठी में सम्मिलित हो गये। यह लोग पाठ-कीर्तन और इष्ट-गोष्ठी द्वारा परमानन्द लाभ करते। एक बार जगद् बन्धु प्रभु के अनुरोध से शिरोमणि महाशय ने पैंतीस दिन तक नित्य तीन घण्टे पाठकर 'जन्मादस्य' श्लोक की गौरपक्ष से सामंजस्य रखते हुए बड़ी अद्भुत व्याख्या की। उसे सुन प्रभुपाद ने कहा–'पाठ सुनकर धन्य हुआ। तुम्हारे ऊपर छः गोस्वामियों की पूर्ण कृपा है–इसमें तनिक भी सन्देह नहीं।' एक ब्राह्मण जमींदार के आग्रह पर एक बार शिरोमणि महाशय को एक मास के भागवत्-पाठ के लिए वर्धमान के निकटवर्ती बातोग्राम में सदलबल जाना पड़ा। वहाँ जाकर उन्हें पता चला कि इस ग्राम में विष्णु सन्दिर या शालग्राम की सेवा नहीं है। उसी समय उन्होंने जमींदार को बुलाकर कहा–'जिस ग्राम में विष्णु की अर्चा-पूजा नहीं, उसमें मैं जल भी ग्रहण नहीं करता।' शीघ्र वहाँ से लौटने की तैयारी करने लगे। इतने वैष्णवों के गाँव से भूखे लौटने पर गाँव के अनिष्ट होने के भय से गाँव के सभी लोगों ने अनुनय-विनयकर उन्हें रोकने की बहुत चेष्टा की। पर उन्होंने एक न सुनी। तब जमींदारने एक अश्वारोही को दस मील दूर किसी गाँव में भेजकर किसी परिचित व्यक्ति के यहाँ से शालग्राम मँगवाकर उनकी सेवा करवायी। शिरोमणि महाशय को उनका प्रसाद ग्रहणकर पाठ करने को राजी किया। एक बार मुशिदाबाद जिले के काग्राम के तान्त्रिक ब्राह्मण शिरोमणि महाशय को उनको वैष्णवता की परीक्षा करने के उद्देश्य से, या उनका मखौल उड़ाने के उद्देश्य से, भागवत पाठ के बहाने अपने गाँव ले गये। दो-चार दिन के पाठ के पश्चात् उन्होंने विष्णु मन्दिर के पास पाठ के स्थान पर काली पूजा के लिए पशुबलि का आयोजन किया। कालीपूजा के पश्चात् जब पशुबलि देना प्रारम्भ किया, तो प्रत्येक बार पशु पर दो आघात करना पड़ा। इससे अनिष्ट की आशंकाकर उन्होंने देवी की शरण ली। देवी ने स्वप्न में पुजारी से कहा–'तुमने विष्णु-भक्त का अपमान किया है। मैं तुम्हारा सर्वनाश करूँगी।' तब ब्राह्मणों ने शिरोमणि महाश्य के पास जाकर अपने कृत्य के लिए क्षमा माँगते हुए रक्षा का कुछ उपाय करने की प्रार्थना की। शिरोमणि महाशय ने उन्हें गङ्गा स्नानकर हरिनाम ग्रहण करने का आदेश दिया। ब्राह्मणों ने बिना कुछ और सोचे-विचारे गंगा-स्नान किया और शिरोमणि महाशय से नाम ग्रहणकर देवी को प्रसन्न किया। कुछ दिन बाद शिरोमणि महाशय सपरिवार वृन्दावन चले गये। वहाँ केशीघाट में स्थित एक मकान में, जिसे आज भी लोग 'शिरोमणि कुञ्ज' के नाम से पुकारते हैं, गिरिराज की सेवा लेकर रहने लगे। उनके वृन्दावन आने के पूर्व एक घटना घटी, जिसका विवरण श्रीकुलदानन्द ब्रह्मचारी ने 'सद्गुरु-सङ्ग' नामक ग्रन्थ के द्वितीय खण्ड में इस प्रकार दिया है– 'शिरोमणि महाशय एक प्रवीण पण्डित थे। षड्दर्शन, स्मृति और पुराणादि में उनकी विशेष ख्याति थी। एक दिन एक ब्राह्मण के घर वे श्रीमद्भागवत का पाठ सुनने गये। बहुत-से गणमान्य ब्राह्मण पण्डित उस सभा में उपस्थित थे। भक्त पाठक ने भागवत् पाठ के पूर्व गौर-वन्दना की। उसे सुन शिरोमणि महाशय ने पाटक से कहा–'यह कैसा भागवत् पाठ ? आप भागवत खोलकर देखते हुए गौर-वन्दना क्यों पढ़ रहे हैं ? ब्राह्मण पण्डितों की सभा में शालग्राम को सामने रख भागवत की यह मिथ्या आवृत्ति क्यों ?' भक्त पाठक ने कर जोड़कर कहा–'प्रभो ! मैं भागवत् का ही पाठ कर रहा हूँ। जो मैं उच्चारण कर रहा हूँ वह समस्त भागवत् में लिखा है।' शिरोमणि तब पाठक के निकट जाकर बोले–,दिखाइये तो 'अनपितचरी' श्लोक भागवत् में कहाँ लिखा है।' पाठक ने लाइनों के बीच सादी जगह को दिखाते हुए कहा–'यह देखिये।' शिरोमणि ने कहा–'यहाँ तो कुछ भी नहीं लिखा है।' पाठक बोले–'आपमें दृष्टि शक्ति ही नहीं, तो कैसे देखेंगे ? आँखें साफ करके देखिये न।' शिरोमणि महाशय ने गुस्से में भरकर कहा–'आप शालग्राम सामने रख, भागवत स्पर्श करते हुए इतने पण्डितों के सामने इतना झूठ बोल रहे हैं!' तब पाठक जोर से बोले–'चुप रहिये। मैं इस ब्राह्मण समाज में शालग्राम को साक्षीकर कहता हूँ कि मैं सच कह रहा हूँ। भागवत् में प्रति दो लाइनों के बीच गौर-वन्दना लिखी है। मैं उसे स्पष्ट देख रहा हूँ। आपको नहीं दीखता, तो आप किसी सिद्ध महात्मा से दीक्षा लेकर आयें। सात दिन तक मैं जिन नियमों को कहूँ, उनका पालन करें। आठवें दिन यहाँ आयें। तब भी यदि मैं भागवत् के बीच-बीच में गौर-वन्दना न दिखा सकूँ, तो अपनी जिह्वा काट दूँगा–यह मैं सबके सामने शपथ लेकर कहता हूँ।' शिरोमणि महाशय ने ऐसा ही किया। उन्होंने सिद्ध श्रीचैतन्यदास बाबाजी से दीक्षा ली। सात दिन तक पाठक के बताये नियमों का पालन किया। आठवें दिन उनके पास जाकर भागवत् देखी, तो उन्हें स्पष्ट दो लाइनों के बीच स्वर्ण अक्षरों में गौर-वन्दना लिखी दीखी। उनके नेत्रों से अश्रुधार प्रवाहित होने लगी। वे रोते-रोते अस्थिर हो गये और भूमि पर लोट-पोट होने लगे। उसी समय सब छोड़कर वृन्दावन चले गये। तभी से यहीं रह रहे हैं। वे महातेजस्वी हैं। उनके जैसा दूसरा व्यक्ति इस समय वृन्दावन में नहीं हैं।' वृन्दावन में शिरोमणि महाशय अपराह्न में छात्रों को श्रीमद्भागवत् पढ़ाया करते। एक दिन वे चतुर्थ स्कन्ध के दक्षयज्ञ के प्रसंग का वर्णन कर रहे थे। एक छात्र ने प्रश्न किया–'सतीजी ने किस प्रकार योगबल से अपना शरीर भस्मीभूत कर दिया ?' शिरोमणि महाशय उत्तर में कुछ कहें, उसके पूर्व पास में बैठे एक अपरिचित वैष्णव ने, जो नित्य पाठ सुनने आते और पाठ समाप्त होते हो दण्डवत् कर चले जाते, छात्रों की ओर देखते हुए कहा–'आप लोग इसके उत्तर में सुनना चाहते हैं या देखना चाहते है ?' छात्रों ने कहा–'देखने को मिले तो सुनना कौन चाहेगा ?' 'तो देखिये'–कहकर वे उत्तर दिशा की ओर मुखकर, आसन लगा बैठ गये और 'जय गौरांग !' कह ध्यानस्थ हो गये। कुछ देर में उनके दाहिने पैर के वृद्धांगुष्ठ से योगाग्नि प्रज्ज्वलित हुई। वह धीरे-धीरे सारे शरीर में फैल गयी और उन्हें भस्मीभूतकर दिया। शिरोमणि महाशय चीख पड़े–'हा ! कैसा सर्वनाश !!' छात्रों ने यमुनाजल से अग्नि निर्वापित करने की बहुत चेष्टा की, पर वे सफल न हुए। शिरोमणि महाशय नित्य प्रातः सर्वप्रथम मेहतरानी को 'माँ' कहकर सम्बोधन करते हुए प्रणाम करते। शिष्यों के प्रश्न करने पर कहते–'जानते नहीं, ये मेरी माँ है। शिशुकाल से मैं इनका ऋणी हूँ। तभी से ये मेरा मल-मूत्र परिष्कार करती आ रही हैं। अब भी कर रही हैं। मातृरूप से ये मेरी जैसी सेवा करती हैं उसे देख मेरा हृदय भर आता है। इसीलिए इन्हें प्रणाम करता हूँ।' वृन्दावन में देश-विदेश से आये गोविन्द दर्शनार्थी यात्रियों को भी शिरोमणि साष्टांग प्रणाम करते। उन्हें प्रणाम करने के सम्बन्ध में जब कोई शिष्य पूछता, तो कहते–'अरे इन महाभाग्यवान यात्रियों के मर्म को तू क्या जाने ! तुम लोग वृन्दावन में रहते हो। नित्य यमुना-स्नान करते हो। तुम्हारे भाव-भक्ति सूत्र में गाँठ पड़ गयी है। यह यात्री बहुत दूर रहते हैं–कोई श्रीहट्ट, कोई ढाका, कोई मुलतान, कोई मद्रास। गोविन्द के भाव में विभावित हो श्रीवृन्दावन धाम के दर्शन करने ये न जाने कितना कष्ट उठाकर आते। ऐसा सुन्दर साधु-सङ्ग, ऐसे गोविन्द–विभावित देह-मन-प्राण और कहाँ मिलेंगे ? इसीलिए मैं भक्ति पूर्वक इन्हें प्रणाम करता हूँ और सोचता हूँ कि कब इनके समान मेरे देह-मन-प्राण भी गोविन्द भाव में विभावित होंगे ?' शिरोमणि महाशय के साथ रास्ता चलना बहुत मुश्किल होता। वे रास्ते में गाय, बैल, बिल्ली, बन्दर, कुत्ता, स्त्री-पुरुष और विग्रहादि को समान भाव से दण्डवत् करते चलते। किसी की मजाल थी जो उनके चरण स्पर्श कर सकता या उनके देखते उन्हें दूर से भी पहले प्रणाम कर सकता ? एक दिन श्रीविजयकृष्ण गोस्वामीपाद के शिष्य श्रीधर उनके दर्शन करने गये। उस समय वे निद्रित थे। उसी अवस्था में उन्होंने उनके चरणों के निकट प्रणाम किया। प्रणामकर जैसे ही उठे, उन्होंने देखा कि उनके चरण निद्रित अवस्था में ही अपने आप दूसरी ओर मुड़ गये हैं। उन्होंने फिर दूसरी ओर जाकर कुछ दूर से चरणों में प्रणाम किया। इस बार भी चरण अपने आप दूसरी तरफ मुड़ गये। इस प्रकार तीन बार श्रीधरजी ने उन्हें प्रणाम किया। तीनों बार निद्रित अवस्था में ही उनके चरण दूसरी ओर मुड़ गये, श्रीधर अवाक् रह गये ! शिरोमणि महाशय को कहीं पाठ-कीर्तन में जाना होता, तो श्रीअद्वैतदासबाबाजी (अत्रदाप्रसाद राय) आदि अपने संगी-साथियों को साथ लेकर जाते। मार्ग में प्रत्येक मन्दिर में पंचांग प्रणाम करते जाते। इसलिए पाठ-कीर्तन में देर से पहुँचते और सबके पीछे बैठ जाते। कोई आगे बैठने के लिए आग्रह करता, तो कहते—'आगे जाकर बैठने में किसी के पाँव लग जाय, तो सर्वनाश होगा। इसलिए पीछे बैठकर जो सुनने को मिल जाय वही ठीक है।' कुछ दिन वृन्दावन में रहने के पश्चात् शिरोमणिजी ऐसे व्याधिग्रस्त हुए कि उनके जीवित रहने की आशा न रही। जीवन का अन्त होते देख उन्होंने मदनमोहन ठौर के सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबाजी महाराज से वेश ले लिया। नाम हुआ श्रीगोरकिशोर शिरोमणि। कुछ दिनों की चिकित्सा के बाद उनका स्वास्थ्य ठीक हो गया। तब सिद्ध श्रीबलरामदास बाबाजी महाराज की आज्ञा से शिरोमणि कुञ्ज छोड़कर मदनमोहन ठौर में गुरुदेव के निकट पृथक भाव से रहते हुए भजन करने लगे। वेश ग्रहण करने के पूर्व ही शिरोमणि महाशय एक सिद्ध महात्मा के रूप में जाने जाते थे। उनके वेशाश्रय के पश्चात् उनके गुरुदेव की ख्याति बहुत बढ़ गयी। लोग दूर-दूर से उनके दर्शन करने आने लगे। भजन में विघ्न पड़ने लगा। यह देख शिरोमणि महाशय ने गुरुदेव की सेवा का भार स्वयं लिया। दर्शनार्थी, जो अपने प्रश्न लेकर नित्यानन्द बाबाजी महाराज के पास आते.. उनकी वे स्वयं ही सुन्दर मीमांसा कर दिया करते। जो लोग उनके दर्शन का आग्रह करते, उनसे शाम साढ़े चार बजे, जब वे पाठ के लिए अपनी कुटिया मे बाहर निकला करते, दर्शन करने को कहते। इस प्रकार गुरुदेव की सेवा करने के कारण उनके अपने एकान्त भजन में बाधा पड़ने पर भी वे विरक्त न होते। दूसरे लोगों को भी, संसारी हों या त्यागी, वे उपदेश करते–'हमें नौबत खाने के कबूतर की तरह भजन करना चाहिये। नौबत खाने में सदा बाजा बजता रहने पर भी कबूतर वहाँ से उड़ नहीं जाते। उसी प्रकार हमें सभी परिस्थितियों में बाधा-विघ्नों और समस्याओं को महाप्रभु द्वारा भेजी हुई जान उनका आदर पूर्वक समाधान करते हुए भजन करना चाहिये।' शिरोमणि महाशय के वेशाश्रय के कुछ ही दिन बाद पण्डित रामकृष्णदास बाबा ने सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबा से दीक्षा ली। सिद्ध बाबा ने उन्हें उपदेश किया–'शिरोमणि तुम्हारा गुरु-भाई है, तो भी उसमें गुरुबुद्धि रखना।' उस समय वृन्दावन में सिद्ध श्रीनित्यानन्ददास बाबा और पण्डित रामकृष्णदास बाबा के अतिरिक्त झाडूमण्डल के सिद्ध श्रीबलरामदास बाबाजी महाराज, शृंगारवट के श्रीब्रह्मानन्द गोस्वामीपाद, श्री नृसिंहानन्द प्रभु, अद्वैतवंश के श्रीराधिकानाथ गोस्वामी प्रभुपाद, श्रीनीलर्माण गोस्वामीपाद, श्रीहरचन्द्र गोस्वामीपाद, ताड़ास के श्रीगंगाप्रसाद राय, श्रीमदनमोहन मन्दिर के कामदार प्रसिद्ध कीर्तनीया श्रीहाजरा महाशय आदि अनेक सुप्रसिद्ध साधु और वैष्णव भक्त रहते थे। वे छोटे-बड़े सभी साधकों के आचार व्यवहार पर कड़ी दृष्टि रखते थे। यदि कोई साधु-वैष्णवों की मर्यादाका उल्लंघन करता, तो उस पर शासन करते थे। ये सभी शिरोमणिजी को बड़ी श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखते थे। पर एक बार हेतमपुर की रानी वृन्दावन आयी हुई थीं। वे शिरोमणि महाशय का भागवत पाठ सुनकर परमानन्दित हुईं। पाठ के पश्चात् उन्होंने उनके पास दक्षिणा के रूप में कुछ द्रव्य के साथ फल-फूल और वस्त्रादि भेज दिये। उन्होंने सरल भाव से और रानी के हृदय को ठेस न पहुँचे इस विचार से उन्हें स्वीकार कर लिया। तब वृन्दावन के वैष्णवों ने उनकी भर्त्सना की। शिरोमणि महाशय ने दुःखित हो और अपने दोष के गुरुत्व की उपलब्धिकर इस गहित कार्य के लिए दण्ड दिये जाने को प्रार्थना की। वैष्णवों ने आदेश किया कि वे एक वर्ष के भीतर वृन्दावन में जितने मन्दिर हैं सबमें बिना आह्वान के भागवत पाठ करें। वृन्दावन में उस समय तीन हजार मन्दिर थे। एक-एक दिन कई मन्दिरों में पाठ किये बिना इस आदेश का पालन करना कठिन था। वैष्णव चूड़ामणि शिरोमणि महाशय ने इस कठोर आदेश का पूर्णरूप से पालन किया। ताड़ास के प्रधान जमींदार राजर्षि बनमाली बाबू ब्राह्मधर्म में दीक्षित थे। शिरोमणि महाशय और श्रीपाद राधिकानाथ गोस्वामी की कृपा से भक्ति पथ पर आरुढ़ हो वे वृन्दावन में रहकर अपने कुलदेवता श्रीराधाविनोदजी की प्राण से सेवा करने लगे। उनका अनुराग देख शिरोमणि महाशय ने उन्हें इस प्रकार उपदेश किया–'श्रीवैष्णव-सेवा के बिना कृष्ण प्रेम की प्राप्ति नहीं होती। वैष्णवों को उत्तम खाद्य वस्त्रादि दान करना ही वैष्णव-सेवा नहीं है। कभी-कभी तो इस प्रकार की सेवा उनके अनर्थ की सृष्टि का हेतु बन जाती है। उनका अभीष्ट है हरिकथा। हरिकथा के लिए श्रीमद्भागवत और गोस्वामीगण के ग्रन्थों के अनुशीलन की व्यवस्था होना आवश्यक है। तुम्हें भगवान् ने जी धन-सम्पत्ति दे रखी है, उसकी सार्थकता इसमें है कि तुम इसकी व्यवस्था कर दो। यह भी आवश्यक है कि जो अन्धे, वृद्ध या रुग्ण मधुकरी नहीं कर सकते, उनके औषधि, पथ्यादि की समुचित व्यवस्थाकर उनके भजन में सहायता करो। ऐसा करने से तुम्हें अचिरात् प्रेम लाभ होगा।' उनकी आज्ञा शिरोधार्यंकर बनमाली बाबू ने बहुत-से वैष्णव-ग्रन्थों का प्रकाशन किया, जिसके लिए वैष्णव समाज उनका आज भी विशेष रूप से ऋणी है। उन ग्रन्थों के अध्ययन-अध्यापन के लिए विद्यालय की स्थापना की तथा वैष्णवों की चिकित्सा के लिए चिकित्सालय की व्यवस्था की। शिरोमणि महाशय कभी-कभी अपनी कुटिया पर वैष्णवों को आमन्त्रित कर उन्हें प्रसाद सेवन कराते। एक बार निमन्त्रित वैष्णवों ने एक वैष्णव के उनकी पंक्ति में बैठने पर आपत्ति की; क्योंकि उसने कोई घृणित कार्य किया था। शिरोमणिजी ने उन्हें समझाते हुए कहा–'देखिये, माना कि इन्होंने कोई अन्याय आचरण किया है। पर उसके लिए आप इन पर इतना शासन कर रहे हैं। मैंने अपने जीवन में कितना अन्याय आचरण किया है, उसके लिए आप मुझसे कुछ नहीं कहते।' इतना कह, उन्होंने अपने जीवन में जो अनुचित कार्य किये थे, उन्हें निष्कपट भाव से सबको सुनाने लगे। तब वैष्णवों ने अपनी आपत्ति उठा ली। जिसके विरुद्ध आपत्ति की गयी थी, वे भी आगे के लिए सावधान हो गये। शिरोमणि महाशय का हृदय-कलश गौर-प्रेम से इतना परिपूर्ण था कि किसी के तनिक-सा भी हिलाने-डुलाने से उथल पड़ता था। एक बार किसी वैष्णव ने उनसे पूछा–'भक्ति लाभ करने का उपाय क्या है ?' उन्होंने उत्तर में–भक्ति के विषय में कुछ कहने की जैसे ही चेष्टा की, वैसे ही नेत्रों से अश्रुधार बहने लगी, कण्ठ गद्गद हो गया, और शरीर में पुलक हो आया। बहुत रोकथाम के पश्चात् वे बोले–'श्रीगौरांग महाप्रभु का चरणाश्रय करने के अतिरिक्त भक्ति लाभ करने का कोई और उपाय नहीं है। इस कलियुग में श्रीगौरांग ही हैं एकमात्र प्रेमन्दाता। उनके चरणों का आश्रय लो। भक्ति का अभाव दूर होगा।' शिरोमणि महाशय सदा ही भाव-समुद्र में स्वच्छन्द तैरते रहते। थोड़ा-सा भी उद्दीपन होने पर गहरी डुबकी लगा जाते। एक बार एक नर्तकी कहीं से नाच-गानकर लौट रही थी। उसे देख उन्हें ऐसा उद्दीपन हुआ कि भावादिष्ट अवस्था में मूर्च्छित हो भूमि पर गिर पड़े। सांसारिक सम्बन्ध से आध्यात्मिक सम्बन्ध दृढ़तर होता है। इसीलिए सांसारिक सम्बन्ध में अपने प्रियजनों के विछोह की अपेक्षा आध्यात्मिक सम्बन्ध में प्रियजनों का विछोह अधिक असह्य होता है। नवद्वीप के श्रीचैतन्यदास बाबाजी जिस दिन अन्तर्धान हुए, उसी दिन शिरोमणि महाशय ने रात्रि में स्वप्न में सुना कि वे कह रहे हैं–'शिरोमणि मैं आया !' ये समझ गये कि बाबा देह छोड़ चुके हैं। उन्हें गहरा धक्का लगा। कुछ दिन बाद श्रीराधिकाप्रसाद गोस्वामी प्रभुपाद गौडमण्डल गये। उन्हें छोड़ने शिरोमणि महाशय बनमाली बाबू आदि के साथ मथुरा स्टेशन गये। गाड़ी ने जैसे ही सीटी दी, शिरोमणि महाशय रोते-रोते प्लेटफार्म पर हो गिर पड़े। कदाचित् श्रीचैतन्यदास बाबा और श्रीराधिकानाथ गोस्वामी प्रभु का वियोग शिरोमणि महाशय को इतना असह्य हुआ कि श्रीराधिकानाथ गोस्वामी प्रभु के वृन्दावन से चले जानेके चार-पाँच दिन बाद ही सन् १८९० में उन्होंने संसार से प्रयाण किया। ० ० ० पुस्तक: व्रज के भक्त (प्रथम खण्ड) "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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Bindu Singh Jul 3, 2022

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gopal gajjar Jul 4, 2022

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. संक्षिप्त महाभारत-कथा पोस्ट–063 (वन पर्व) आज की कथा में:– स्वर्ग में अर्जुन की अस्त्र एवं नृत्य-शिक्षा, उर्वशी के प्रति मातृभाव, इन्द्र का लोमश मुनि को पाण्डवों के पास भेजना तथा अर्जुन के स्वर्ग जाने पर धृतराष्ट्र और पाण्डवों की स्थिति तथा बृहदश्व का आगमन वैशम्पायनजी कहते हैं–'जनमेजय ! देवताओं के चले जाने पर अर्जुन वहीं रहकर देवराज इन्द्र के रथ की प्रतीक्षा कर रहे थे। थोड़ी ही देर में इन्द्र का सारथि मातलि दिव्य रथ लेकर वहाँ उपस्थित हुआ। उस रथ की उज्ज्वल कान्ति से आकाश का अँधेरा मिट रहा था, बादल तितर-बितर हो रहे थे। भीषण ध्वनि से दिशाएँ प्रतिध्वनित हो रही थीं। उसकी कान्ति दिव्य थी। रथ में तलवार, शक्ति, गदाएँ, तेजस्वी भाले, वज्र, पहियों वाली तोपें, वायुवेग से गोलियाँ फेंकने वाले यन्त्र, तमंचे तथा और भी बहुत-से अस्त्र-शस्त्र भरे हुए थे। दस हजार वायुगामी घोड़े उसमें जुते हुए थे। उस मायामय दिव्य रथ की चमक से आँखें चौंधिया जातीं। सोने के दण्ड में कमल के समान श्यामवर्ण की वैजयन्ती नामक ध्वजा फहरा रही थी। मातलि सारथि ने अर्जुन के पास आकर प्रणाम करके कहा–'इन्द्रनन्दन! श्रीमान् देवराज इन्द्र आपसे मिलना चाहते हैं। आप उनके इस प्यारे रथ में सवार होकर शीघ्र ही चलिये।' सारथि की बात सुनकर अर्जुन के मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने गंगा स्नान करके पवित्रता के साथ विधि पूर्वक मन्त्र का जप किया। तदनन्तर शास्त्रोक्त रीति से देवता, ऋषि और पितरों का तर्पण किया। फिर मन्दराचल से आज्ञा माँगकर इन्द्रके दिव्य रथ पर आ बैठे। उस समय इन्द्र का रथ और भी चमक उठा। क्षणभर में ही वह रथ मन्दराचल से उठकर वहाँ के तपस्वी ऋषि-मुनियों की दृष्टि से ओझल हो गया। अर्जुन ने देखा–वहाँ सूर्य का, चन्द्रमा का अथवा अग्नि का प्रकाश नहीं था। हजारों विमान वहाँ अद्भुत रूप में चमक रहे थे। वे अपनी पुण्यप्राप्त कान्ति से चमकते रहते हैं और पृथ्वी से तारों के रूप में दीपक के समान दीखते हैं। जब अर्जुन ने इस विषय में मातलि से प्रश्न किया, तब मातलि ने कहा–'वीर ! पृथ्वी पर से जिन्हें आप तारों के रूप में देखते हैं, वे पुण्यात्मा पुरुषों के निवास स्थान हैं।' अब तक वह रथ सिद्ध पुरुषों का मार्ग लाँघकर आगे निकल गया था। इसके बाद राजर्षियों के पुण्यवान् लोक पड़े। तदनन्तर इन्द्र की पुरी अमरावती के दर्शन हुए। स्वर्ग की शोभा, सुगन्धि, दिव्यता, अभिजन और दृश्य अनूठा ही था। यह लोक बड़े-बड़े पुण्यात्मा पुरुषों को प्राप्त होता है। जिसने तप नहीं किया, अग्निहोत्र नहीं किया, जो युद्ध से पीठ दिखाकर भाग गया, वह इस लोक का दर्शन नहीं कर सकता। जो यज्ञ नहीं करते, व्रत नहीं करते, वेदमन्त्र नहीं जानते, तीर्थो में स्नान नहीं करते, यज्ञ और दानों से बचे रहते हैं, यज्ञ में विघ्न डालते रहते हैं, क्षुद्र हैं, शराबी, गुरुस्त्रीगामी, मांसभोजी और दुरात्मा हैं, उन्हें किसी प्रकार स्वर्ग का दर्शन नहीं हो सकता। अमरावती में देवताओं के सहस्रों इच्छानुसार चलने वाले विमान खड़े थे, सहस्रों इधर-उधर आ-जा रहे थे। जब अप्सरा और गन्धर्वों ने देखा कि अर्जुन स्वर्ग में आ गये हैं, तब वे उनकी स्तुति-सेवा करने लगे। देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षि प्रसन्न होकर उदारचरित्र अर्जुन की पूजा में लग गये। बाजे बजने लगे। अर्जुन ने क्रमशः साध्य देवता, विश्वेदेव, पवन, अश्विनीकुमार, आदित्य, वसु, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, तुम्बुरु, नारद तथा हाहा-हूहू आदि गन्धर्वों के दर्शन किये। वे अर्जुन का स्वागत करने के लिये ही बैठे हुए थे। उनके साथ व्यवहार के अनुसार मिलकर आगे जाने पर अर्जुन को देवराज इन्द्र के दर्शन हुए। रथ से उतरकर अर्जुन ने देवराज इन्द्र के पास जा, सिर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया। इन्द्र ने अपने प्रेमपूर्ण हाथों से अर्जुन को उठाकर अपने पवित्र देवासन पर बैठा लिया और फिर अपनी गोद में बैठाकर प्रेम से सिर सूँघा। संगीतविद्या और सामगान के कुशल गायक तुम्बुरु आदि गन्धर्व प्रेम के साथ मनोहर गाथाएँ गाने लगे। अन्तःकरण तथा बुद्धि को लुभाने वाली–घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरूथिनी, गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा, मधुस्वरा आदि अप्सराएँ नाचने लगीं। इन्द्र के अभिप्राय के अनुसार देवता और गन्धर्वो ने उत्तम अर्घ्य से अर्जुन का सेवा-सत्कार किया उनके पैर धुलवाकर आचमन कराया। इसके अनन्तर अर्जुन देवराज इन्द्र के भवन में गये। वीर अर्जुन इन्द्र के महल में ठहरकर अस्त्रों के प्रयोग और उपसंहार का अभ्यास करने लगे। वे इन्द्र के प्रिय और शत्रुघाती वज्र का भी अभ्यास करने लगे। उन्होंने अचानक ही घटा छा जाने, गर्जना करने और बिजलियों के चमकने का भी अभ्यास कर लिया। समस्त शस्त्र-अस्त्र का ज्ञान प्राप्त करने के अनन्तर अर्जुन अपने वनवासी भाइयों का स्मरण करके स्वर्ग से मर्त्यलोक में आना चाहते थे। परन्तु इन्द्र की आज्ञा से वे पाँच वर्ष तक स्वर्ग में ही रहे। एक दिन अनुकूल अवसर पाकर देवराज इन्द्र ने अस्त्रविद्या के मर्मज्ञ अर्जुन से कहा–'प्रिय अर्जुन ! अब तुम चित्रसेन गन्धर्व से नाचना और गाना सीख लो। साथ ही मर्त्यलोक में जो बाजे नहीं हैं, उन्हें भी बजाना सीख लो।' इन्द्र के मित्रता करा देने पर अर्जुन चित्रसेन से मिलकर गाने-बजाने और नाचने का अभ्यास करने लगे। अर्जुन इस विद्या में प्रवीण हो गये। यह सब करते समय भी जब अर्जुन को अपने भाइयों और माता की याद आ जाती, तब वे दुःख से विह्वल हो जाते। एक दिन की बात है। इन्द्र ने देखा कि अर्जुन निर्निमेष नेत्रों से उर्वशी की ओर देख रहा है। उन्होंने चित्रसेन को एकान्त में बुलाकर कहा–'तुम उर्वशी अप्सरा के पास जाकर मेरा सन्देश कहो कि वह अर्जुन के पास जाय।' चित्रसेन ने उस परम सुन्दरी अप्सरा के पास जाकर कहा–'मैं देवराज इन्द्र की आज्ञा से तुम्हारे पास आया हूँ। तुम उनका अभिप्राय सुनो। मध्यम पाण्डव अर्जुन सौन्दर्य, स्वभाव, रूप, व्रत, जितेन्द्रियता आदि स्वाभाविक गुणों से देवताओं और मनुष्यों में प्रतिष्ठित, बलवान् तथा प्रतिभा सम्पन्न हैं। विद्या, ऐश्वर्य, तेज, प्रताप, क्षमा, मात्सर्यहीनता, वेद-वेदांगज्ञान तथा अन्य शास्त्रोंके अभ्यास में बड़े निपुण हैं। आठ प्रकार की गुरुसेवा और आठ प्रकार के गुणों वाली बुद्धि को खूब जानते हैं। वे स्वयं ब्रह्मचारी और उत्साही तो हैं ही, मातृकुल और पितृकुल से शुद्ध हैं। उनकी अवस्था भी तरुण है। जैसे इन्द्र स्वर्ग की रक्षा करते हैं, वैसे ही वे बिना किसी की सहायता के पृथ्वी की रक्षा कर सकते हैं। वे अपनी नहीं, दूसरों की प्रशंसा करते हैं, सूक्ष्म से सूक्ष्म समस्या को भी स्थूल बात की तरह जान लेते हैं। उनकी वाणी बड़ी मीठी है, मित्रों को खूब खिलाते-पिलाते हैं। सत्यप्रेमी, अहंकार रहित, प्रेमपात्र और दृढ़प्रतिज्ञ हैं। वे अपने सेवकों पर बड़ा प्रेम रखते हैं और गुणों में इन्द्र के समकक्ष हैं तुमने अवश्य ही अर्जुन के गुण सुने होंगे। वे तुम्हारी सेवा से स्वर्ग का सुख प्राप्त करें। इसके लिये तुम्हें मेरी बात माननी चाहिये।' उर्वशी ने चित्रसेन का सत्कार किया और प्रसन्न होकर कहा–'गन्धर्वराज! तुमने अर्जुन के जिन प्रधान प्रधान गुणों का वर्णन किया है, उन्हें मैं पहले ही सुनकर उन पर मोहित हो चुकी हूँ। मैं अर्जुन से प्रेम करती हूँ और उन्हें पहले ही वर चुकी हूँ। अब देवराज की आज्ञा और तुम्हारे प्रेम से उनके प्रति मेरा आकर्षण और भी बढ़ा है। मैं अर्जुन की सेवा करूँगी। आप जा सकते हैं।' चित्रसेन के चले जाने के बाद अर्जुन की सेवा करने की लालसा से उर्वशी ने आनन्द के साथ सुगन्ध स्नान किया। वह सुन्दर तो थी ही, अच्छे-अच्छे वस्त्राभूषण भी धारण कर लिये। सुगन्धित पुष्पों की माला पहनकर उर्वशी सब प्रकार से सज-धज चुकी। तब वह मुसकराती हुई पवन और मन के समान तेज गति से क्षणभर में ही अर्जुन के स्थान पर जा पहुँची। द्वारपालों ने उसके आगमन का समाचार अर्जुन के पास पहुँचाया। उर्वशी अर्जुन के पास पहुँच गयी। अर्जुन मन-ही-मन अनेकों प्रकार की शंका करने लगे। उन्होंने संकोचवश अपनी आँखें बन्द करके प्रणाम किया और गुरुजन के समान आदर-सत्कार करके कहने लगे। अर्जुन ने कहा–'देवि मैं तुम्हें सिर झुकाकर नमस्कार करता हूँ | मैं तुम्हारा सेवक हूँ, मुझे आज्ञा करो।' उर्वशी अचेत-सी हो गयी। उर्वशी ने कहा–'देवराज इन्द्र की आज्ञा से चित्रसेन गन्धर्व मेरे पास आया था। उसने मेरे पास आकर आपके गुणों का वर्णन किया और आपके पास आने की प्रेरणा की। आपके पिता इन्द्र और चित्रसेन गन्धर्व की आज्ञा से मैं आपकी सेवा करने के लिये आयी हूँ। केवल आज्ञा की ही बात नहीं। जब से मैंने आपके गुणों को सुना है, तभी से मेरा मन आप पर लग गया है। मैं काम के वश में हूँ। बहुत दिनों से मैं लालसा कर रही थी। आप मुझे स्वीकार कीजिये।' उर्वशी की बात सुनकर अर्जुन संकोच के मारे धरती में गड़-से गये। उन्होंने अपने हाथों से कान बन्द कर लिये और बोले–'हरे हरे, कहीं यह बात मेरे कान में प्रवेश न कर जाय। देवि! निस्सन्देह तुम मेरी गुरुपत्नी के समान हो। देवसभा में मैंने तुम्हें निर्निमेष नेत्रों से देखा था अवश्य, परन्तु मेरे मन में कोई बुरा भाव नहीं था। मैं यही सोच रहा था–पुरुवंश की यही आनन्दमयी माता है। तुम्हें पहचानते ही मेरी आँखें आनन्द से खिल उठीं। इसी से मैं तुमको देख रहा था। देवि! मेरे सम्बन्ध में और कोई बात सोचनी ही नहीं चाहिये। तुम मेरे लिये बड़ों की भी बड़ी और मेरे पूर्वजों की जननी हो।' उर्वशी ने कहा–'वीर! हम अप्सराओं का किसी के साथ विवाह नहीं होता। हम स्वतन्त्र हैं। इसलिये मुझे गुरुजन की पदवी पर बैठाना उचित नहीं है। आप मुझ पर प्रसन्न हो जाइये और मुझ कामपीड़िता का त्याग मत कीजिये। मैं काम-वेग से जल रही हूँ। आप मेरा दुःख मिटाइये।' अर्जुन ने कहा–'देवि ! मैं तुमसे सत्य-सत्य कह रहा हूँ। दिशा और विदिशाएँ अपने अधिदेवताओं के साथ मेरी बात सुन लें। जैसे कुन्ती, माद्री और इन्द्रपत्नी शची मेरी माताएँ हैं, वैसे ही तुम भी पुरुवंश की जननी होने के कारण मेरी पूजनीया माता हो। मैं तुम्हारे चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। तुम माता के समान मेरी पूजनीय और मैं तुम्हारा पुत्र के समान रक्षणीय हूँ।' अर्जुन की बात सुनकर उर्वशी क्रोध के मारे काँपने लगी। उर्वशी ने भौहें टेढ़ी करके अर्जुन को शाप दिया–'अर्जुन ! मैं तुम्हारे पिता इन्द्र की आज्ञा से कामातुर होकर तुम्हारे पास आयी हूँ, फिर भी तुम मेरी इच्छा पूर्ण नहीं कर रहे हो। इसलिये जाओ, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक होकर रहना पड़ेगा और सम्मानरहित होकर तुम नपुंसक के नाम से प्रसिद्ध होओगे।' उस समय उर्वशी के ओंठ फड़क रहे थे। साँसें लम्बी चल रही थीं। वह अपने निवास स्थान पर लौट गयी। अर्जुन शीघ्रता से चित्रसेन के पास गये और उर्वशी ने जो कुछ कहा था, वह सब कह सुनाया। चित्रसेन ने सारी बातें इन्द्र से कहीं। इन्द्र ने अर्जुन को एकान्त में बुलाकर बहुत कुछ समझाया बुझाया और तनिक हँसते हुए कहा। इन्द्र बोले–'प्रिय अर्जुन ! तुम्हारे जैसा पुत्र पाकर कुन्ती सचमुच पुत्रवती हुई। तुमने अपने धैर्य से ऋषियों को भी जीत लिया। उर्वशी ने तुम्हें जो शाप दिया है, उससे तुम्हारा बहुत काम बनेगा। जिस समय तुम तेरहवें वर्ष में गुप्तवास करोगे, उस समय तुम नपुंसक के रूप में एक वर्ष तक छिपकर यह शाप भोगोगे। फिर तुम्हें पुरुषत्वकी प्राप्ति हो जायगी।' अर्जुन बहुत प्रसन्न हुए। उनकी चिन्ता मिट गयी। वे गन्धर्वराज चित्रसेन के साथ रहकर स्वर्ग के सुख लूटने लगे। जनमेजय! अर्जुन का यह चरित्र इतना पवित्र है कि जो इसका प्रतिदिन श्रवण करता है, उसके मन में भी पाप करने की इच्छा नहीं होती। वास्तव में अर्जुन का यह चरित्र ऐसा ही है। इन्हीं दिनों एक दिन महर्षि लोमश स्वर्ग में आये। उन्होंने देखा कि अर्जुन इन्द्र के आधे आसन पर बैठे हुए हैं। वे भी एक आसन पर बैठ गये और मन-ही-मन सोचने लगे– 'अर्जुन को यह आसन कैसे मिल गया ? इसने कौन-सा ऐसा पुण्य किया है, किन देशों को जीता है, जिससे इसे सर्वदेववन्दित इन्द्रासन प्राप्त हुआ है ?' देवराज इन्द्र ने लोमश मुनि के मन की बात जान ली। इन्द्र ने कहा–'ब्रह्मर्षे! आपके मन में जो विचार उत्पन्न हुआ है, उसका उत्तर मैं देता हूँ। यह अर्जुन केवल मनुष्य नहीं है। यह मनुष्य रूपधारी देवता है। मनुष्यों में तो इसका अवतार हुआ है। यह सनातन ऋषि नर है। इसने इस समय पृथ्वी पर अवतार ग्रहण किया है। महर्षि नर और नारायण कार्यवश पवित्र पृथ्वी पर श्रीकृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। इस समय निवातकवच नामक दैत्य मदोन्मत्त होकर मेरा अनिष्ट कर रहे हैं। वे वरदान पाकर अपने आपे को भूल गये हैं। इसमें सन्देह नहीं कि भगवान् श्रीकृष्ण ने जैसे कालिन्दी के कालियह्रद से सर्पो का उच्छेद किया था, वैसे ही वे दृष्टिमात्र से निवातकवच दैत्यों को अनुचरों सहित नष्ट कर सकते हैं। परन्तु इस छोटे-से काम के लिये भगवान् श्रीकृष्ण से कुछ कहना ठीक नहीं है; क्योंकि वे महान् तेज:पुंज हैं। उनका क्रोध कहीं जाग उठे तो वह सारे जगत्‌ को जलाकर भस्म कर सकता है। इस काम के लिये तो अकेले अर्जुन ही पर्याप्त हैं। ये निवातकवचों का नाश करके तब मनुष्यलोक में जायँगे। ब्रह्मर्षे! आप पृथ्वी पर जाकर काम्यक वन में रहने वाले दृढ़प्रतिज्ञ धर्मात्मा युधिष्ठिर से मिलिये और कहिये–'वे अर्जुन की तनिक भी चिन्ता न करें।' साथ ही यह भी कहियेगा–''अब अर्जुन अस्त्रविद्या में निपुण हो गया है वह दिव्य नृत्य, गायन और वादनकला में भी बड़ा कुशल हो गया है। आप अपने भाइयों के साथ एकान्त और पवित्र तीर्थों की यात्रा कीजिये तीर्थयात्रा से सारे पाप ताप नष्ट हो जायँगे और आप पवित्र होकर राज्य भोगेंगे।' ब्रह्मर्षे! आप बड़े तपस्वी और समर्थ हैं, इसलिये पृथ्वी पर विचरते समय पाण्डवों का ध्यान रखियेगा।' इन्द्र की बात सुनकर लोमश मुनि काम्यक वन में पाण्डवों के पास आये। वैशम्पायनजी ने कहा–'जनमेजय ! राजा धृतराष्ट्र को अर्जुन के स्वर्ग में निवास करने का समाचार भगवान् व्यास से प्राप्त हुआ। उनके जाने के बाद धृतराष्ट्र ने संजय से कहा–'संजय ! मैंने अर्जुन का सब समाचार पूर्णरूप से सुन लिया है। क्या तुम्हें भी उस बात का पता है ? मेरे पुत्र दुर्योधन की बुद्धि मन्द है। इसी से वह बुरे कामों और विषय भोगों में लगा रहता है। वह अपनी दुष्टता के कारण राज्य का नाश कर डालेगा। धर्मराज युधिष्ठिर बड़े महात्मा हैं। वे साधारण बातचीत में भी सत्य बोलते हैं। उन्हें अर्जुन-सा वीर योद्धा प्राप्त है। अवश्य ही उनका राज्य त्रिलोकी में हो सकता है। जिस समय अर्जुन अपने पैने बाणों का प्रयोग करेगा उस समय भला, कौन उसके सामने खड़ा हो सकेगा।' संजय ने कहा–'महाराज ! आपने दुर्योधन के सम्बन्ध में जो कुछ कहा है, वह सत्य है। अर्जुन के सम्बन्ध में मैंने यह सुना है कि उन्होंने युद्ध में अपने धनुष का बल दिखाकर भगवान् शंकर को प्रसन्न कर लिया है। अर्जुन की परीक्षा करने के लिये देवाधिदेव भगवान् शंकर स्वयं भील का वेष धारण करके उनके पास आये थे और उनसे युद्ध किया था। उन्होंने युद्ध में प्रसन्न होकर अर्जुन को दिव्य अस्त्र दिया। अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर सब लोकपालों ने आकर अर्जुन को दर्शन दिये और दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिये। ऐसा भाग्यशाली अर्जुन के सिवा और कौन है ? अर्जुनका बल अपार है, उनकी शक्ति अपरिमित है।' धृतराष्ट्र ने कहा–'संजय ! मेरे पुत्रों ने पाण्डवों को बड़ा कष्ट दिया है। पाण्डवों की शक्ति बढ़ती ही जा रही है। जिस समय बलराम और श्रीकृष्ण पाण्डवों की सहायता करने के लिये यदुकुल के योद्धाओं को उत्साहित करेंगे, उस समय कौरवपक्ष का कोई भी वीर उनका सामना नहीं कर सकेगा। अर्जुन के धनुष की टंकार और भीमसेन की गदा का वेग सह सके, हमारे पक्ष में ऐसा कोई भी राजा नहीं है। मैंने दुर्योधन की बातों में आकर अपने हितैषी पुरुषों की हितभरी बातें नहीं मानीं। जान पड़ता है मुझे पीछे से उन्हें सोच-सोचकर पछताना पड़ेगा।' संजय ने कहा–'राजन् ! आप सब कुछ कर सकते थे। परन्तु स्नेहवश आपने अपने पुत्र को बुरे कामों से रोका नहीं। उपेक्षा करते रहे। उसी का भयंकर फल आपके सामने आने वाला है। जिस समय पाण्डव कपट-द्यूत में हारकर पहले पहल काम्यक वन गये थे, तब भगवान् श्रीकृष्ण ने वहाँ जाकर उन्हें आश्वासन दिया था। उन्होंने तथा धृष्टद्युम्न, राजा विराट, धृष्टकेतु तथा केकय आदि ने वहाँ पाण्डवों से जो कुछ कहा था वह दूतों से मालूम होने पर मैंने आपकी सेवा में निवेदन कर दिया था। जिस समय वे सब हम लोगों पर चढ़ाई करेंगे उस समय कौन उनका सामना करेगा ?' जनमेजय ने पूछा–'भगवन्! महात्मा अर्जुन जब अस्त्र प्राप्त करने के लिये इन्द्रलोक चले गये, तब पाण्डवों ने क्या किया ?' वैशम्पायनजी ने कहा–'जनमेजय उन दिनों पाण्डव काम्यक वन में निवास कर रहे थे। वे राज्य के नाश और अर्जुन के वियोग से बड़े ही दुःखी हो रहे थे। एक दिन की बात है, पाण्डव और द्रौपदी इसी सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर रहे थे। भीमसेन ने राजा युधिष्ठिर से कहा–'भाईजी ! अर्जुन पर ही हम लोगों का सब भार है। वही हमारे प्राणों का आधार है, वह इस समय आपकी आज्ञा से अस्त्रविद्या सीखने के लिये गया हुआ है। इसमें सन्देह नहीं कि यदि अर्जुन का कहीं कुछ अनिष्ट हो गया तो राजा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, सात्यकि, भगवान् श्रीकृष्ण और हम लोग भी जीवित नहीं रहेंगे। अर्जुन के बाहुबल के आधार पर ही हम लोग ऐसा समझते हैं कि शत्रु हमसे हारे हुए हैं, पृथ्वी हमारे वश में आ गयी है। हमारी बाँहों में बल है। भगवान् श्रीकृष्ण हमारे सहायक और रक्षक हैं। हमारे मन में कौरवों को पीस डालने के लिये बार-बार क्रोध उठता है। परन्तु हम आपके कारण उसे पीकर रह जाते हैं। हम भगवान् श्रीकृष्ण की सहायता से कर्ण आदि सब शत्रुओं को मार डालेंगे और अपने बाहुबल से सारी पृथ्वी को जीतकर राज्य करेंगे। भाईजी ! जब तक दुर्योधन पृथ्वी को पूर्णरीति से अपने वश में कर ले, उसके पहले ही उसे और उसके कुटुम्ब को मार डालना चाहिये। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा गया है कि कपटी पुरुष को कपट करके भी मार डालना चाहिये। इसलिये यदि आप मुझे आज्ञा दें तो मैं आग की तरह भभककर वहाँ जाऊँ और दुर्योधन का नाश कर डालूँ।' भीमसेनकी बात सुनकर युधिष्ठिर ने उन्हें शान्त करते हुए माथा सूँघा और कहा–'मेरे बलशाली भैया ! तेरह वर्ष पूरे हो जाने दो। फिर तुम और अर्जुन दोनों मिलकर दुर्योधन का नाश करना। मैं असत्य नहीं बोल सकता; क्योंकि मुझमें असत्य है ही नहीं। भीमसेन ! जब तुम बिना कपट के भी दुर्योधन और उसके सहायकों का नाश कर सकते हो, तब कपट करने की क्या आवश्यकता है ?' धर्मराज युधिष्ठिर इस प्रकार भीमसेन को समझा ही रहे थे कि महर्षि बृहदश्व उनके आश्रम में आते हुए दीख पड़े। ~~~०~~~ – साभार: गीताप्रेस (गोरखपुर) ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नम: " कुमार रौनक कश्यप " ***********************************************

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gopal gajjar Jul 4, 2022

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