विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 शुभ रात्रि विश्राम🙏🌹🙏🌹 अहंकार का नाश - विजयादशमी आप सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं .. काम , क्रोध , मद , मोह , लोभ ओर मत्सर (अहंकार ) इस अवगुणों का त्याग करना और अपने जीवन को दिव्य बनाना ही है विजयादशमी उत्सव । " दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान | तुलसी दया न छांड़िए ,जब लग घटमे प्राण || अर्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है| शारदीय नवरात्र वस्तुत: भगवान राम की शक्ति पूजा है। रावण के साथ युद्ध से पहले भगवान राम ने भी अपराजिता देवी का स्मरण किया था और उनकी पूजा की थी। अपराजिता देवी का पूजन के पीछे भाव यह है कि समस्त दिशाओं में हमारी विजय हो। राम की तरह हमारा चरित्र हो। राम जैसी शक्ति मिले। राम जैसी मर्यादा पर चलते हुए हम पुरुषोत्तम बनें। आसुरी प्रवृत्तियां हम पर हावी न हों। हम किसी का अहित न करें। किसी के साथ अन्याय न करें। अन्याय के आगे सिर न झुकाएं। समस्त दैवीय शक्तियों की एकीकृत देवी मां अपराजिता हमारा कल्याण करें। चूंकि इस दिन देवी की मूर्तियों का विसर्जन भी होता है और नवरात्र के पर्व का समापन भी, इसलिए राम की शक्ति पूजा के संदर्भ में अपराजिता देवी की पूजा होती है। विजयदशमी के दिन अवश्य करें अपराजिता पूजा कहने को शारदीय नवरात्र नौमी कोकन्या भोग के साथ संपन्न हो जाते हैं। लेकिन एसा है नहीं। असल में, शक्ति पर्व का समापन दशहरे के पूजनोपरांत ही संपन्न होता है। राम पूजन से पहले शक्ति पूजन अवश्य करना चाहिए। इस दिन देवी सूक्तम का पाठ समस्त ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करता है। 1. अपराजिता देवी का पूजन अपराह्न को किया जाता है। 2. अष्टचक्र बनाएं या स्वास्तिक। 3. ऊं अपराजितायै नम: का जाप करें 4. ऊं क्रियाशक्तयै नम: और ऊं उमायै नम: का भी जाप करें ( 11 बार) 5. सरल उपाय यह है कि देवी कवच के साथ अर्गला स्तोत्र का पाठ कर लें । सतयुग से आजतक अनेक महान ऋषी मुनिओ ने अनेक उपासनाओं द्वारा विरल सिद्धिया प्राप्त की , अनेक साधको ने तंत्र और यंत्र से अलौकिक शक्तियां पायी ओर ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्ममे लीन हुवे पर आजतक पुलत्स्य ऋषि के कूलमे जिन्होंने जन्म धारण किया और महान सिद्धिया प्राप्त की वो पवीत्र ब्राह्मण ( रावण ) के समान कोई नही है । चारो वेद के ज्ञाता बनकर यज्ञ , याग , तंत्र , मंत्र , यंत्र , पूजा , अनुष्ठानों द्वारा ब्रह्मांड के हरेक देवी देवताओं को प्रसन्न कर अभेद शक्तियां प्राप्त कर रावण दिग्विजय कहलाया था । नवग्रह को पलंग से बांधा मतलब सभी ग्रह देवता , वीर , भैरव ,देवी देवताओं की उपासना कर सिद्ध किया था । महादेव की दिव्य उपासना से महादेव के प्रिय भक्त कहलाये ओर अनेक वरदान प्राप्त किये थे । शिवजी के मुखसे 64 तंत्र का ज्ञान सुनकर खुद रावण ने 65 वा तंत्र ( उडिश तंत्र ) की रचना की थी ऐसे ज्ञाता थे वो । पर एक अटल सत्य है कि सत्ता , सम्पति ओर शक्ति अगर विनम्रता नही हो तो अहंकार को जन्म देती है । यही हुवा रावण के साथ भी । अहंकार पैदा हुवा ओर ऋषिमुनि , साधक , ब्राह्मण को परास्त करने की धुनमें अनेक प्रकार के पापाचार किये और दिग्विजयी रावणका भगवान श्री राम के हाथ ध्वंश हुवा । हमारे मनमे अहम , क्रोध , ईर्ष्या , लोभ जैसे अवगुन पैदा होना ही रावण है । यहां कई लोग बिन बुलाए महाज्ञानी तर्क वितर्क करके खुद को ब्रह्मज्ञानी दिखाने सलाह देने लगते है ये अहंकार है ... घरमे कभी छोटे बच्चे या भाइयो ने सही किया हो फिरभी मैं बड़ा हु जानकार हु ये दिखाने अलग मत देने लगते है ये अहंकार है ... हर घरमे अपने ही परिवार जन , ज्ञातिजन की ईर्ष्या , निंदा करना शुरु हो जाता है ये अहंकार है .... अपने से अशक्त या छोटो पर क्रोध करना , अपशब्द कहना या अन्याय करना ये अहंकार है ... मन , वचन , वाणी से किया हरेक कर्म अवश्य ही फल देता है ये गीता का संदेश है । इस अवगुणों का त्याग करने केलिये सिर्फ विनम्र वाणी से शुरुआत की जाय तो उनके अद्भुत परिणाम देखने मिलते है । नम्र वाणी से जीवन के हरेक क्षेत्र परिवार , समाज , नॉकरी , व्यवसाय सभी जगह लोगो की प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है । हरेक लोग आपको सन्मान देने लगते है । हरेक क्षेत्रमे सफलता मिलने लगती है । विनम्रता के साथ दया , धर्म , सत्य , प्रेम जैसे सद्गुण स्वयम ही प्रकट हो जाते है । सिर्फ नम्रता का एक प्रयत्न जीवन परिवर्तन कर देता है । दया गुण को आत्मसात करना है तो हर दिन एक जीव पर दया करना , पहु , पक्षी , बालक , अशक्त , वृद्ध , याचक , साधक , ब्राह्मण , किसी भी एक जीव को प्रसन्न करो । जीवन प्रेम मय हो जाएगा । ये एक कर्म ही हरेक देवी देवता की प्रसन्नता का कारण बन जायेगा । रावण जैसे महान सिद्ध को जलाना वो हमारी ओकात भी नही है । बस हमारे अंदर के अवगुन स्वरूप रावण का त्याग करना वो विजया दशमी है । जय श्रीराम जय श्रीराम बोलने से कोई रामभक्त नही बन जाता । प्रभु राम के गुण आत्मसात करने का प्रयत्न ही प्रभु राम की प्रसन्नता प्राप्त करवा सकता है । अतुलित बलधाम हनुमानजी की विनम्रता ही प्रभु राम को प्रिय है ।

विजय दशमी की हार्दिक शुभकामनाएं
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अहंकार का नाश - विजयादशमी 

    आप सभी को विजयादशमी की शुभकामनाएं .. 

      काम , क्रोध , मद , मोह , लोभ ओर मत्सर (अहंकार ) इस अवगुणों का त्याग करना और अपने जीवन को दिव्य बनाना ही है विजयादशमी उत्सव । 

    "  दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान | 
  तुलसी दया न छांड़िए ,जब लग घटमे प्राण ||

अर्थ: गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं कि मनुष्य को दया कभी नहीं छोड़नी चाहिए क्योंकि दया ही धर्म का मूल है और इसके विपरीत अहंकार समस्त पापों की जड़ होता है|

शारदीय नवरात्र वस्तुत: भगवान राम की शक्ति पूजा है। रावण के साथ युद्ध से पहले भगवान राम ने भी अपराजिता देवी का स्मरण किया था और उनकी पूजा की थी। अपराजिता देवी का पूजन के पीछे भाव यह है कि समस्त दिशाओं में हमारी विजय हो। राम की तरह हमारा चरित्र हो। राम जैसी शक्ति मिले। राम जैसी मर्यादा पर चलते हुए हम पुरुषोत्तम बनें। आसुरी प्रवृत्तियां हम पर हावी न हों। हम किसी का अहित न करें। किसी के साथ अन्याय न करें। अन्याय के आगे सिर न झुकाएं। समस्त दैवीय शक्तियों की एकीकृत देवी मां अपराजिता हमारा कल्याण करें।  चूंकि इस दिन देवी की मूर्तियों का विसर्जन भी होता है और नवरात्र के पर्व का समापन भी, इसलिए राम की शक्ति पूजा के संदर्भ में अपराजिता देवी की पूजा होती है।

विजयदशमी के दिन अवश्य करें अपराजिता पूजा
कहने को शारदीय नवरात्र नौमी कोकन्या भोग के साथ संपन्न हो जाते हैं। लेकिन एसा है नहीं। असल में, शक्ति पर्व का समापन दशहरे के पूजनोपरांत ही संपन्न होता है। राम पूजन से पहले शक्ति पूजन अवश्य करना चाहिए।  इस दिन देवी सूक्तम का पाठ समस्त ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करता है।
 
1. अपराजिता देवी का पूजन अपराह्न को किया जाता है।
2. अष्टचक्र बनाएं या स्वास्तिक।
3. ऊं अपराजितायै नम: का जाप करें
4. ऊं क्रियाशक्तयै नम: और ऊं उमायै नम: का भी जाप करें ( 11 बार)
5. सरल उपाय यह है कि देवी कवच के साथ अर्गला स्तोत्र का पाठ कर लें ।


  सतयुग से आजतक अनेक महान ऋषी मुनिओ ने अनेक उपासनाओं द्वारा विरल सिद्धिया प्राप्त की , अनेक साधको ने तंत्र और यंत्र से अलौकिक शक्तियां पायी ओर ब्रह्म ज्ञान प्राप्त कर ब्रह्ममे लीन हुवे पर आजतक पुलत्स्य ऋषि के कूलमे जिन्होंने जन्म धारण किया और महान सिद्धिया प्राप्त की वो पवीत्र ब्राह्मण ( रावण ) के समान कोई नही है । चारो वेद के ज्ञाता बनकर यज्ञ , याग , तंत्र , मंत्र , यंत्र , पूजा , अनुष्ठानों द्वारा ब्रह्मांड के हरेक देवी देवताओं को प्रसन्न कर अभेद शक्तियां प्राप्त कर रावण दिग्विजय कहलाया था । नवग्रह को पलंग से बांधा मतलब सभी ग्रह देवता , वीर , भैरव ,देवी देवताओं की उपासना कर सिद्ध किया था । महादेव की दिव्य उपासना से महादेव के प्रिय भक्त कहलाये ओर अनेक वरदान प्राप्त किये थे । शिवजी के मुखसे 64 तंत्र का ज्ञान सुनकर खुद रावण ने 65 वा तंत्र ( उडिश तंत्र ) की रचना की थी ऐसे ज्ञाता थे वो । 

    पर एक अटल सत्य है कि सत्ता , सम्पति ओर शक्ति अगर विनम्रता नही हो तो अहंकार को जन्म देती है । यही हुवा रावण के साथ भी । अहंकार पैदा हुवा ओर ऋषिमुनि , साधक , ब्राह्मण को परास्त करने की धुनमें अनेक प्रकार के पापाचार किये और दिग्विजयी रावणका भगवान श्री राम के हाथ ध्वंश हुवा । हमारे मनमे अहम , क्रोध , ईर्ष्या , लोभ जैसे अवगुन पैदा होना ही रावण है । यहां कई लोग बिन बुलाए महाज्ञानी तर्क वितर्क करके खुद को ब्रह्मज्ञानी दिखाने सलाह देने लगते है ये अहंकार है ... घरमे कभी छोटे बच्चे या भाइयो ने सही किया हो फिरभी मैं बड़ा हु जानकार हु ये दिखाने अलग मत देने लगते है ये अहंकार है ... हर घरमे अपने ही परिवार जन , ज्ञातिजन की ईर्ष्या , निंदा करना शुरु हो जाता है ये अहंकार है .... अपने से अशक्त या छोटो पर क्रोध करना , अपशब्द कहना या अन्याय करना ये अहंकार है ... मन , वचन , वाणी से किया हरेक कर्म अवश्य ही फल देता है ये गीता का संदेश है । 


     इस अवगुणों का त्याग करने केलिये सिर्फ विनम्र वाणी से शुरुआत की जाय तो उनके अद्भुत परिणाम देखने मिलते है । नम्र वाणी से जीवन के हरेक क्षेत्र परिवार , समाज , नॉकरी , व्यवसाय सभी जगह लोगो की प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है । हरेक लोग आपको सन्मान देने लगते है । हरेक क्षेत्रमे सफलता मिलने लगती है । विनम्रता के साथ दया , धर्म , सत्य , प्रेम जैसे सद्गुण स्वयम ही प्रकट हो जाते है । सिर्फ नम्रता का एक प्रयत्न जीवन परिवर्तन कर देता है । दया गुण को आत्मसात करना है तो हर दिन एक जीव पर दया करना , पहु , पक्षी , बालक , अशक्त , वृद्ध , याचक , साधक , ब्राह्मण , किसी भी एक जीव को प्रसन्न करो । जीवन प्रेम मय हो जाएगा । ये एक कर्म ही हरेक देवी देवता की प्रसन्नता का कारण बन जायेगा ।

    रावण जैसे महान सिद्ध को जलाना वो हमारी ओकात भी नही है । बस हमारे अंदर के अवगुन स्वरूप रावण का त्याग करना वो विजया दशमी है । जय श्रीराम जय श्रीराम बोलने से कोई रामभक्त नही बन जाता । प्रभु राम के गुण आत्मसात करने का प्रयत्न ही प्रभु राम की प्रसन्नता प्राप्त करवा सकता है । अतुलित बलधाम हनुमानजी की विनम्रता ही प्रभु राम को प्रिय है ।

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Rakesh.Kr Dec 6, 2021

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Sudha Mishra Dec 6, 2021

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Rakesh.Kr Dec 6, 2021

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Pooja Rajpoot Dec 6, 2021

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pradeep rajpurohit Dec 6, 2021

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manojshekhar Dec 6, 2021

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Rakesh.Kr Dec 6, 2021

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sachin jain Dec 6, 2021

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