Jasbir Singh nain
Jasbir Singh nain Jan 14, 2022

प्रदोष व्रत (शुक्ल) 15 जनवरी, 2022 (शनिवार) शुभ प्रभात जी 🪔🪴🙏🪔🙏🙏🪔🪔🪴🙏🙏🙏🙏 प्रदोष व्रत को त्रयोदशी व्रत के नाम से भी जाना जाता हैं। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को करने से बेहतर स्वास्थ्य और लम्बी आयु की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत एक साल में कई बार आता है । प्रायः यह व्रत महीने में दो बार आता है। जानें क्या है प्रदोष व्रत प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को त्रयोदशी मनाते है। प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आने से पहले का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में भगवान शिव कि पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म में व्रत, पूजा-पाठ, उपवास आदि को काफी महत्व दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से व्रत रखने पर व्यक्ति को मनचाहे वस्तु की प्राप्ति होती है। वैसे तो हिन्दू धर्म में हर महीने की प्रत्येक तिथि को कोई न कोई व्रत या उपवास होते हैं लेकिन लेकिन इन सब में प्रदोष व्रत की बहुत मान्यता है । प्रदोष व्रत का महत्व प्रदोष व्रत को हिन्दू धर्म में बहुत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन पूरी निष्ठा से भगवान शिव की अराधना करने से जातक के सारे कष्ट दूर होते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार एक प्रदोष व्रत करने का फल दो गायों के दान जितना होता है। इस व्रत के महत्व को वेदों के महाज्ञानी सूतजी ने गंगा नदी के तट पर शौनकादि ऋषियों को बताया था। उन्होंने कहा था कि कलयुग में जब अधर्म का बोलबाला रहेगा, लोग धर्म के रास्ते को छोड़ अन्याय की राह पर जा रहे होंगे उस समय प्रदोष व्रत एक माध्यम बनेगा जिसके द्वारा वो शिव की अराधना कर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकेगा और अपने सारे कष्टों को दूर कर सकेगा। सबसे पहले इस व्रत के महत्व के बारे में भगवान शिव ने माता सती को बताया था, उसके बाद सूत जी को इस व्रत के बारे में महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया, जिसके बाद सूत जी ने इस व्रत की महिमा के बारे में शौनकादि ऋषियों को बताया था। प्रदोष व्रत की विधि शाम का समय प्रदोष व्रत पूजन समय के लिए अच्छा माना जाता है क्यूंकि हिन्दू पंचांग के अनुसार सभी शिव मन्दिरों में शाम के समय प्रदोष मंत्र का जाप करतेहैं। ● प्रदोष व्रत करने के लिए सबसे पहले आप त्रयोदशी के दिन सूर्योदय से पहले उठ जाएं। ● स्नान आदि करने के बाद साफ़ वस्त्र पहन लें। ● उसके बाद आप बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल आदि से भगवान शिव की पूजा करें। ● इस व्रत में भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है। ● पूरे दिन का उपवास रखने के बाद सूर्यास्त से कुछ देर पहले दोबारा स्नान कर लें और सफ़ेद रंग का वस्त्र धारण करें। ● आप स्वच्छ जल या गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध कर लें। ● अब आप गाय का गोबर लें और उसकी मदद से मंडप तैयार कर लें। ● पांच अलग-अलग रंगों की मदद से आप मंडप में रंगोली बना लें। ● पूजा की सारी तैयारी करने के बाद आप उतर-पूर्व दिशा में मुंह करके कुशा के आसन पर बैठ जाएं। ● भगवान शिव के मंत्र ऊँ नम: शिवाय का जाप करें और शिव को जल चढ़ाएं। धार्मिक दृष्टिकोण से आप जिस दिन भी प्रदोष व्रत रखना चाहते हों, उस वार के अंतर्गत आने वाली त्रयोदशी को चुनें और उस वार के लिए निर्धारित कथा पढ़ें और सुनें । प्रदोष व्रत कथा किसी भी व्रत को करने के पीछे कोई न कोई पौराणिक महत्व और कथा अवश्य होती है। तो चलिए पढ़ते हैं इस व्रत की पौराणिक कथा के बारे में- एक विधवा ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ रोज़ाना भिक्षा मांगने जाती और संध्या के समय तक लौट आती। हमेशा की तरह एक दिन जब वह भिक्षा लेकर वापस लौट रही थी तो उसने नदी किनारे एक बहुत ही सुन्दर बालक को देखा लेकिन ब्राह्मणी नहीं जानती थी कि वह बालक कौन है और किसका है ? दरअसल उस बालक का नाम धर्मगुप्त था और वह विदर्भ देश का राजकुमार था। उस बालक के पिता को जो कि विदर्भ देश के राजा थे, दुश्मनों ने उन्हें युद्ध में मौत के घाट उतार दिया और राज्य को अपने अधीन कर लिया। पिता के शोक में धर्मगुप्त की माता भी चल बसी और शत्रुओं ने धर्मगुप्त को राज्य से बाहर कर दिया। बालक की हालत देख ब्राह्मणी ने उसे अपना लिया और अपने पुत्र के समान ही उसका भी पालन-पोषण किया कुछ दिनों बाद ब्राह्मणी अपने दोनों बालकों को लेकर देवयोग से देव मंदिर गई, जहाँ उसकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई।ऋषि शाण्डिल्य एक विख्यात ऋषि थे, जिनकी बुद्धि और विवेक की हर जगह चर्चा थी। ऋषि ने ब्राह्मणी को उस बालक के अतीत यानि कि उसके माता-पिता के मौत के बारे में बताया, जिसे सुन ब्राह्मणी बहुत उदास हुई। ऋषि ने ब्राह्मणी और उसके दोनों बेटों को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी और उससे जुड़े पूरे वधि-विधान के बारे में बताया। ऋषि के बताये गए नियमों के अनुसार ब्राह्मणी और बालकों ने व्रत सम्पन्न किया लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि इस व्रत का फल क्या मिल सकता है। कुछ दिनों बाद दोनों बालक वन विहार कर रहे थे तभी उन्हें वहां कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आईं जो कि बेहद सुन्दर थी। राजकुमार धर्मगुप्त अंशुमती नाम की एक गंधर्व कन्या की ओर आकर्षित हो गए। कुछ समय पश्चात् राजकुमार और अंशुमती दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे और कन्या ने राजकुमार को विवाह हेतु अपने पिता गंधर्वराज से मिलने के लिए बुलाया। कन्या के पिता को जब यह पता चला कि वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उसने भगवान शिव की आज्ञा से दोनों का विवाह कराया। राजकुमार धर्मगुप्त की ज़िन्दगी वापस बदलने लगी। उसने बहुत संघर्ष किया और दोबारा अपनी गंधर्व सेना को तैयार किया। राजकुमार ने विदर्भ देश पर वापस आधिपत्य प्राप्त कर लिया। कुछ समय बाद उसे यह मालूम हुआ कि बीते समय में जो कुछ भी उसे हासिल हुआ है वह ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के द्वारा किये गए प्रदोष व्रत का फल था। उसकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे जीवन की हर परेशानी से लड़ने की शक्ति दी। उसी समय से हिदू धर्म में यह मान्यता हो गई कि जो भी व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा करेगा और एकाग्र होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनेगा और पढ़ेगा उसे सौ जन्मों तक कभी किसी परेशानी या फिर दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ेगा। प्रदोष व्रत का उद्यापन जो उपासक इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशी तक रखते हैं, उन्हें इस व्रत का उद्यापन विधिवत तरीके से करना चाहिए। ● व्रत का उद्यापन आप त्रयोदशी तिथि पर ही करें। ● उद्यापन करने से एक दिन पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है। और उद्यापन से पहले वाली रात को कीर्तन करते हुए जागरण करते हैं। ● अगलर दिन सुबह जल्दी उठकर मंडप बनाना होता है और उसे वस्त्रों और रंगोली से सजाया जाता है। ● ऊँ उमा सहित शिवाय नम: मंत्र का 108 बार जाप करते हुए हवन करते हैं। ● खीर का प्रयोग हवन में आहूति के लिए किया जाता है। ● हवन समाप्त होने के बाद भगवान शिव की आरती और शान्ति पाठ करते हैं। ● और अंत में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने इच्छा और सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देते हुए उनसे आशीर्वाद लेते हैं। प्रदोष व्रत से मिलने वाले लाभ अलग-अलग वार के प्रदोष व्रत के अलग-अलग लाभ होते है । ● जो उपासक रविवार को प्रदोष व्रत रखते हैं, उनकी आयु में वृद्धि होती है अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। ● सोमवार के दिन के प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम या चन्द्र प्रदोषम भी कहा जाता है और इसे मनोकामनायों की पूर्ती करने के लिए किया जाता है। ● जो प्रदोष व्रत मंगलवार को रखे जाते हैं उनको भौम प्रदोषम कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से हर तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ सम्बन्धी समस्याएं नहीं होती। बुधवार के दिन इस व्रत को करने से हर तरह की कामना सिद्ध होती है। ● बृहस्पतिवार के दिन प्रदोष व्रत करने से शत्रुओं का नाश होता है। ● वो लोग जो शुक्रवार के दिन प्रदोष व्रत रखते हैं, उनके जीवन में सौभाग्य की वृद्धि होती है और दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है। ● शनिवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम कहा जाता है और लोग इस दिन संतान प्राप्ति की चाह में यह व्रत करते हैं। अपनी इच्छाओं को ध्यान में रख कर प्रदोष व्रत करने से फल की प्राप्ति निश्चित हीं होती है।

प्रदोष व्रत (शुक्ल)

15 जनवरी, 2022 (शनिवार)
शुभ प्रभात जी 🪔🪴🙏🪔🙏🙏🪔🪔🪴🙏🙏🙏🙏
प्रदोष व्रत को त्रयोदशी व्रत के नाम से भी जाना जाता हैं। यह व्रत माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित है। पुराणों के अनुसार इस व्रत को करने से बेहतर स्वास्थ्य और लम्बी आयु की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार प्रदोष व्रत एक साल में कई बार आता है । प्रायः यह व्रत महीने में दो बार आता है।



जानें क्या है प्रदोष व्रत

प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष को त्रयोदशी मनाते है। प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद और रात्रि के आने से पहले का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में भगवान शिव कि पूजा की जाती है। हिन्दू धर्म में व्रत, पूजा-पाठ, उपवास आदि को काफी महत्व दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से व्रत रखने पर व्यक्ति को मनचाहे वस्तु की प्राप्ति होती है। वैसे तो हिन्दू धर्म में हर महीने की प्रत्येक तिथि को कोई न कोई व्रत या उपवास होते हैं लेकिन लेकिन इन सब में प्रदोष व्रत की बहुत मान्यता है ।


प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत को हिन्दू धर्म में बहुत शुभ और महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन पूरी निष्ठा से भगवान शिव की अराधना करने से जातक के सारे कष्ट दूर होते हैं और मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। पुराणों के अनुसार एक प्रदोष व्रत करने का फल दो गायों के दान जितना होता है। इस व्रत के महत्व को वेदों के महाज्ञानी सूतजी ने गंगा नदी के तट पर शौनकादि ऋषियों को बताया था। उन्होंने कहा था कि कलयुग में जब अधर्म का बोलबाला रहेगा, लोग धर्म के रास्ते को छोड़ अन्याय की राह पर जा रहे होंगे उस समय प्रदोष व्रत एक माध्यम बनेगा जिसके द्वारा वो शिव की अराधना कर अपने पापों का प्रायश्चित कर सकेगा और अपने सारे कष्टों को दूर कर सकेगा। सबसे पहले इस व्रत के महत्व के बारे में भगवान शिव ने माता सती को बताया था, उसके बाद सूत जी को इस व्रत के बारे में महर्षि वेदव्यास जी ने सुनाया, जिसके बाद सूत जी ने इस व्रत की महिमा के बारे में शौनकादि ऋषियों को बताया था।



प्रदोष व्रत की विधि

शाम का समय प्रदोष व्रत पूजन समय के लिए अच्छा माना जाता है क्यूंकि हिन्दू पंचांग के अनुसार सभी शिव मन्दिरों में शाम के समय प्रदोष मंत्र का जाप करतेहैं।

● प्रदोष व्रत करने के लिए सबसे पहले आप त्रयोदशी के दिन सूर्योदय से पहले उठ जाएं।
● स्नान आदि करने के बाद साफ़ वस्त्र पहन लें।
● उसके बाद आप बेलपत्र, अक्षत, दीप, धूप, गंगाजल आदि से भगवान शिव की पूजा करें।
● इस व्रत में भोजन ग्रहण नहीं किया जाता है।
● पूरे दिन का उपवास रखने के बाद सूर्यास्त से कुछ देर पहले दोबारा स्नान कर लें और सफ़ेद रंग का वस्त्र धारण करें।
● आप स्वच्छ जल या गंगा जल से पूजा स्थल को शुद्ध कर लें।
● अब आप गाय का गोबर लें और उसकी मदद से मंडप तैयार कर लें।
● पांच अलग-अलग रंगों की मदद से आप मंडप में रंगोली बना लें।
● पूजा की सारी तैयारी करने के बाद आप उतर-पूर्व दिशा में मुंह करके कुशा के आसन पर बैठ जाएं।
● भगवान शिव के मंत्र ऊँ नम: शिवाय का जाप करें और शिव को जल चढ़ाएं।

धार्मिक दृष्टिकोण से आप जिस दिन भी प्रदोष व्रत रखना चाहते हों, उस वार के अंतर्गत आने वाली त्रयोदशी को चुनें और उस वार के लिए निर्धारित कथा पढ़ें और सुनें ।



प्रदोष व्रत कथा

किसी भी व्रत को करने के पीछे कोई न कोई पौराणिक महत्व और कथा अवश्य होती है। तो चलिए पढ़ते हैं इस व्रत की पौराणिक कथा के बारे में-
एक विधवा ब्राह्मणी अपने बेटे के साथ रोज़ाना भिक्षा मांगने जाती और संध्या के समय तक लौट आती। हमेशा की तरह एक दिन जब वह भिक्षा लेकर वापस लौट रही थी तो उसने नदी किनारे एक बहुत ही सुन्दर बालक को देखा लेकिन ब्राह्मणी नहीं जानती थी कि वह बालक कौन है और किसका है ?

दरअसल उस बालक का नाम धर्मगुप्त था और वह विदर्भ देश का राजकुमार था। उस बालक के पिता को जो कि विदर्भ देश के राजा थे, दुश्मनों ने उन्हें युद्ध में मौत के घाट उतार दिया और राज्य को अपने अधीन कर लिया। पिता के शोक में धर्मगुप्त की माता भी चल बसी और शत्रुओं ने धर्मगुप्त को राज्य से बाहर कर दिया। बालक की हालत देख ब्राह्मणी ने उसे अपना लिया और अपने पुत्र के समान ही उसका भी पालन-पोषण किया

कुछ दिनों बाद ब्राह्मणी अपने दोनों बालकों को लेकर देवयोग से देव मंदिर गई, जहाँ उसकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई।ऋषि शाण्डिल्य एक विख्यात ऋषि थे, जिनकी बुद्धि और विवेक की हर जगह चर्चा थी।

ऋषि ने ब्राह्मणी को उस बालक के अतीत यानि कि उसके माता-पिता के मौत के बारे में बताया, जिसे सुन ब्राह्मणी बहुत उदास हुई। ऋषि ने ब्राह्मणी और उसके दोनों बेटों को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी और उससे जुड़े पूरे वधि-विधान के बारे में बताया। ऋषि के बताये गए नियमों के अनुसार ब्राह्मणी और बालकों ने व्रत सम्पन्न किया लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि इस व्रत का फल क्या मिल सकता है।

कुछ दिनों बाद दोनों बालक वन विहार कर रहे थे तभी उन्हें वहां कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आईं जो कि बेहद सुन्दर थी। राजकुमार धर्मगुप्त अंशुमती नाम की एक गंधर्व कन्या की ओर आकर्षित हो गए। कुछ समय पश्चात् राजकुमार और अंशुमती दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे और कन्या ने राजकुमार को विवाह हेतु अपने पिता गंधर्वराज से मिलने के लिए बुलाया। कन्या के पिता को जब यह पता चला कि वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार है तो उसने भगवान शिव की आज्ञा से दोनों का विवाह कराया।

राजकुमार धर्मगुप्त की ज़िन्दगी वापस बदलने लगी। उसने बहुत संघर्ष किया और दोबारा अपनी गंधर्व सेना को तैयार किया। राजकुमार ने विदर्भ देश पर वापस आधिपत्य प्राप्त कर लिया। कुछ समय बाद उसे यह मालूम हुआ कि बीते समय में जो कुछ भी उसे हासिल हुआ है वह ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के द्वारा किये गए प्रदोष व्रत का फल था। उसकी सच्ची आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे जीवन की हर परेशानी से लड़ने की शक्ति दी। उसी समय से हिदू धर्म में यह मान्यता हो गई कि जो भी व्यक्ति प्रदोष व्रत के दिन शिवपूजा करेगा और एकाग्र होकर प्रदोष व्रत की कथा सुनेगा और पढ़ेगा उसे सौ जन्मों तक कभी किसी परेशानी या फिर दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ेगा।


प्रदोष व्रत का उद्यापन

जो उपासक इस व्रत को ग्यारह या फिर 26 त्रयोदशी तक रखते हैं, उन्हें इस व्रत का उद्यापन विधिवत तरीके से करना चाहिए।

● व्रत का उद्यापन आप त्रयोदशी तिथि पर ही करें।
● उद्यापन करने से एक दिन पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है। और उद्यापन से पहले वाली रात को कीर्तन करते हुए जागरण करते हैं।
● अगलर दिन सुबह जल्दी उठकर मंडप बनाना होता है और उसे वस्त्रों और रंगोली से सजाया जाता है।
● ऊँ उमा सहित शिवाय नम: मंत्र का 108 बार जाप करते हुए हवन करते हैं।
● खीर का प्रयोग हवन में आहूति के लिए किया जाता है।
● हवन समाप्त होने के बाद भगवान शिव की आरती और शान्ति पाठ करते हैं।
● और अंत में दो ब्रह्माणों को भोजन कराया जाता है और अपने इच्छा और सामर्थ्य अनुसार दान दक्षिणा देते हुए उनसे आशीर्वाद लेते हैं।



प्रदोष व्रत से मिलने वाले लाभ

अलग-अलग वार के प्रदोष व्रत के अलग-अलग लाभ होते है ।
● जो उपासक रविवार को प्रदोष व्रत रखते हैं, उनकी आयु में वृद्धि होती है अच्छा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।
● सोमवार के दिन के प्रदोष व्रत को सोम प्रदोषम या चन्द्र प्रदोषम भी कहा जाता है और इसे मनोकामनायों की पूर्ती करने के लिए किया जाता है।
● जो प्रदोष व्रत मंगलवार को रखे जाते हैं उनको भौम प्रदोषम कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से हर तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ सम्बन्धी समस्याएं नहीं होती। बुधवार के दिन इस व्रत को करने से हर तरह की कामना सिद्ध होती है।
● बृहस्पतिवार के दिन प्रदोष व्रत करने से शत्रुओं का नाश होता है।
● वो लोग जो शुक्रवार के दिन प्रदोष व्रत रखते हैं, उनके जीवन में सौभाग्य की वृद्धि होती है और दांपत्य जीवन में सुख-शांति आती है।
● शनिवार के दिन आने वाले प्रदोष व्रत को शनि प्रदोषम कहा जाता है और लोग इस दिन संतान प्राप्ति की चाह में यह व्रत करते हैं। अपनी इच्छाओं को ध्यान में रख कर प्रदोष व्रत करने से फल की प्राप्ति निश्चित हीं होती है।

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कामेंट्स

Ravi Kumar Taneja Jan 15, 2022
सुप्रभात स्नेह वंदना जी 🙏🌻🙏 🌻जो राम को लाये है, हम उनको लाएंगे!!! 🌻पूरे भारत वर्ष में हम भगवा फहरायेगे 🙏💐🙏 जागो हिंदू जागो 🙏🪴🙏 प्रभु श्रीराम जी की कृपा से आप स्वस्थ रहे,मस्त रहे, मुस्कुराते रहें, तथा प्रसन्न: रहे🕉🌞🙏🌻🙏🌻🙏🌞🕉

Ravi Kumar Taneja Jan 15, 2022
सुप्रभात स्नेह वंदना जी 🙏🌻🙏 🌻जो राम को लाये है, हम उनको लाएंगे!!! 🌻पूरे भारत वर्ष में हम भगवा फहरायेगे 🙏💐🙏 जागो हिंदू जागो 🙏🪴🙏 प्रभु श्रीराम जी की कृपा से आप स्वस्थ रहे,मस्त रहे, मुस्कुराते रहें, तथा प्रसन्न: रहे🕉🌞🙏🌻🙏🌻🙏🌞🕉

Brajesh Sharma Jan 15, 2022
जय सूर्य पुत्र शनि देव महाराज ॐ नमः शिवाय.. हर हर महादेव राम राम जी जय जय श्री राम खुश रहें मस्त रहें स्वस्थ रहें.. राम राम जी

SANTOSH YADAV Jan 15, 2022
जय श्री गणेश जय श्री शनिदेव शुभ शनिवार वंदन जी

madan pal 🌷🙏🏼 Jan 15, 2022
जय श्री राम जी शूभ प्रभात वंदन जी पवन सुत हनुमान जी व सुर्य पुत्र शनि देव जी की कृपा आप व आपके परिवार पर बनीं रहे हो जी 🌹🌹🌹🌹🌹🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼

Ravi Kumar Taneja Jan 15, 2022
*🌹🌴‼जय श्रीकृष्ण ‼🌴🌹* *श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारी,* *हे नाथ नारायण वासुदेवाय!!!* *🌹 Զเधॆ Զเधॆ🌹* 🍃🍃🍃🕉🍃🍃🍃 शुभ रात्री स्नेह वंदना जी 🙏🌻🙏 🌻जो राम को लाये है, हम उनको लाएंगे!!! 🌻पूरे भारत वर्ष में हम भगवा फहरायेगे 🙏💐🙏 जागो हिंदू जागो 🙏🪴🙏 प्रभु श्रीराम जी की कृपा से आप स्वस्थ रहे,मस्त रहे, मुस्कुराते रहें, तथा प्रसन्न: रहे🕉🌞🙏🌻🙏🌻🙏🌞🕉

SANTOSH YADAV Jan 16, 2022
जय श्री गणेश ओम नमो भगवते सुर्य देवाय नमः शुभ रविवार वंदन जी

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Jan 16, 2022
🌹 जय सूर्यदेव वंदन जी🌹 👏भगवान सूर्यदेव जी कि आशीर्वाद सदा बनी रहे 🌞 🙏आपका दिन शुभ और मंगलमय हो🙏 🙏🌹नमस्ते जी🌹🙏

SANTOSH YADAV Jan 16, 2022
जय श्री राधे राधे शुभ रात्रि वंदन जी

my mandir Jan 25, 2022

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Garima Gahlot Rajput Jan 25, 2022

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PRABHAT KUMAR Jan 25, 2022

🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 🔛🔛 *#जय_श्री_राम_जय_जय_महावीर_हनुमान* 🔛🔛 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 *🌜 मधुर सपनों के साथ शुभ रात्रि प्रिय आदरणीय साथियों 🌛* 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🚩🚩 *#महावीर_हनुमान_ऐसे_बने_महाशक्तिशाली* 🚩🚩 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *वाल्मीकि रामायण के अनुसार, बाल्यकाल में जब हनुमान सूर्यदेव को फल समझकर खाने को दौड़े और सूर्य को निगल लिया तो हनुमान से अपरिचित तो घबराकर देवराज इंद्र ने हनुमानजी पर वज्र का वार किया। वज्र के प्रहार से हनुमान निश्तेज हो गए। यह देखकर वायुदेव बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने समस्त संसार में वायु का प्रवाह रोक दिया। संसार में हाहाकार मच गया। तब परमपिता ब्रह्मा ने हनुमान को स्पर्श कर पुन: चैतन्य किया। उस समय सभी देवताओं ने हनुमानजी को वरदान दिए। इन वरदानों से ही हनुमानजी परम शक्तिशाली बन गए।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *1. भगवान सूर्य ने हनुमानजी को अपने तेज का सौवां भाग दिया । उन्होंने कहा की शास्त्रों का यह बहुत बड़ा ग्यानी होता और इसका यश सभी लोको में फैलेगा | बाद में सूर्य हनुमान जी के गुरु भी बने |* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *2. धर्मराज यमराज ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह मेरे दण्ड से अवध्य और निरोग होगा।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *3. धन के देवता कुबेर ने वरदान दिया कि इस बालक को युद्ध में कभी विषाद नहीं होगा तथा मेरी गदा संग्राम में भी इसका वध न कर सकेगी।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *4. भगवान शंकर ने यह वरदान दिया कि यह मेरे और मेरे शस्त्रों द्वारा भी अवध्य रहेगा।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *5. देवशिल्पी विश्वकर्मा ने वरदान दिया कि मेरे बनाए हुए जितने भी शस्त्र हैं, उनसे यह अवध्य रहेगा और चिंरजीवी होगा।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *6. देवराज इंद्र ने हनुमानजी को यह वरदान दिया कि यह बालक आज से मेरे वज्र द्वारा भी अवध्य रहेगा।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *7. जलदेवता वरुण ने यह वरदान दिया कि दस लाख वर्ष की आयु हो जाने पर भी मेरे पाश और जल से इस बालक की मृत्यु नहीं होगी।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *8. परमपिता ब्रह्मा ने हनुमानजी को वरदान दिया कि यह बालक दीर्घायु, महात्मा और सभी प्रकार के ब्रह्दण्डों से बचा रहेगा | यह अपने अनुसार अपने आकार और छोटा और बड़ा कर पायेगा | युद्ध में कोई भी इसे जीत नहीं पाएगा। यह अपनी गति को भी तीव्र या मंद कार्य पायेगा ।* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *9. इसके अलावा जब हनुमान ने श्री राम की दीर्घआयु की कामना से सम्पूर्ण शरीर पर सिंदूर लगा लिया तब उन्हें माता सीता ने अमर होने का आशीर्वाद दे दिया | तब से बालाजी अष्ट चिरंजीवी में से एक है |* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛 *#नोट : उक्त जानकारी सोशल मीडिया से प्राप्त किया गया है।* 📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰📰 *( इस आलेख में दी गई जानकारियाँ धार्मिक आस्था और लौकिक मान्यताओं पर आधारित है जिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है। )* 🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛🔛

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Garima Gahlot Rajput Jan 25, 2022

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Dheeraj Shukla Jan 25, 2022

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Deepak Jan 25, 2022

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