sukhadev awari
sukhadev awari Nov 25, 2021

Radhe-Radhe ji

Radhe-Radhe ji

+82 प्रतिक्रिया 14 कॉमेंट्स • 0 शेयर

कामेंट्स

shah Nov 25, 2021
@sukhadevawari *🙏💞जय श्री कृष्णा💞🙏* *🙏💞राधे राधे💞🙏*

Renu Singh Nov 25, 2021
Jai Shree Radhe Krishna 🙏🌹🙏 Shubh Prabhat Vandan Bhai ji 🙏🌹🙏

Runa Sinha Nov 25, 2021
🌿🍒 Jai Shree Hari Vishnu Bhagwan🍒🌿 🌿🍒Om Namo bhagwate vasudevay🍒🌿 🌿🍒 Good afternoon 🍒🌿

Poonam Aggarwal Nov 25, 2021
🌷🐚🌷🐚🌷🐚🌷 🌷 ॐ नमो नारायण वासुदेव 🌷 जय श्री हरि विष्णुजी की कृपा से आप के घर परिवार में सुख शांति और समृद्धि हमेशा बनी रहे 👣 आप सभी खुश और स्वस्थ रहे शुभ मंगलमय शुभकामनाओं सहित राम राम जी राधे राधे जी 🌹🙏 ‼️ हरि ॐ हरि ॐ हरि ॐ ‼️🙏🌷🐚🌷🐚🌷🐚🌷

Runa Sinha Nov 25, 2021
💖🍭Radhe Radhe 🍭💖 🍭🍭Good night 🍭🍭

. पालनहार "हर समय कण्ठी माला लेकर बैठे रहते हो। कभी कुछ दो पैसे का इंतजाम करो लड़की के लिए लड़का नहीं देखना। आज फिर निर्मला ने रोज की तरह सुबह से ही बड़बड़ाना शुरु कर दिया।" "अरे भाग्य वान ईश्वर पर विश्वास रखो, समय पर सब हो जाएगा। चौबे जी ने अपना गमछा संभालते हुए कहा।इन चरणों में जो भी आये, उसका जन्म सफल हो जाये।हाँ हाँ ईश्वर तो जैसे घर बैठे ही लड़का भेज देंगे। भगवान के पास तो कोई काम है नहीं सिर्फ आपका ध्यान रखने के अलावा।" "अरे क्यों पूरा दिन चकचक करती रहती हो ? वैसे चौबे जी कभी गुस्सा नहीं होते। वो तो बीमारी के चलते नौकरी छोड दी थी। अब बस पूरा दिन बस गोपाल जी की सेवा करते और उन्ही के बारे में ही सोचते हैं।निर्मला बोली जयपुर वाली मौसी बता रही थी, उनके रिश्तेदारी में एक लड़का है। पर देखने तो जब आओगे, जब जेब में 1000-2000 रुपए होंगे। " "जो दस बीस रुपए बचते हैं, उन्हें भी अपने दोस्तों को उधार दे देते हो। आज तक लौटाए हैं किसी दोस्त ने।पर आज तक कभी किसी चीज की कोई कमी हुई है। नहीं ना, आगे भी नहीं होगी ईश्वर की कृपा से। तुम तो मुझे भजन भी नहीं करने देती।भजन ही करना था तो शादी क्यों की ? अब क्या वो बैठे-बिठाए तुम्हारी लड़की की शादी भी कर जाएंगे।" "हाँ रहने दो बस। यह लो थैला पकड़ो और जाओ बाजार से रसोई के लिए सामान ले आओ और हां, जिस लडके के बारे में मैंने बात की है। उसके बारे में जरा सोचना परसों जाना है तुम्हें। अब थोड़े बहुत पैसों के लिए हम एफडी तो तुडवाओगे नहीं सो जो यार दोस्तों को उधार दे रखे हैं उनसे जरा मांग लो।थैला लेकर चौबेजी निकल तो गए लेकिन विचार यही है मन में। पैसों का इंतजाम कैसे होगा ?सब्जी लेने से पहले जरा अपने एक दोस्त से अपने पैसों की बात कर ली जाए। जिस दुकान में काम करता है, वो भी पास ही है।" "मोहनलाल ने अपने मित्र को देखा तो गले लगा लिया। अरे चौबेजी कैसे आना हुआ ?कुछ ना भैया कुछ समस्या आन पड़ी है। पैसो की सख्त जरुरत है ? अपने ही पैसे चौबेजी ऐसे मांग रहे हैं, जैसे उधार मांग रहे हो।देखता हूँ साहब तो बिमार है चार दिन पहले ही दिल का दौरा पड़ा था। अभी दस दिन पहले ही विदेश से आए हैं। वैसे तो ऐसे 6 शोरूम है उनके पास। पर चलो एक दो दिन में आएंगे तो मांग करके तुम्हें दे दूंगा।" "और बताओ बिटिया ठीक है ? कैसा चल रहा है उसका योगा क्लास ?बढ़िया चल रहा है सुबह 5:00 बजे जाती है, पूरा 5000 कमाती है। चौबेजी ने बड़े गर्व से कहा।सर्वगुण संपन्न है जी हमारी लाली। कैबिन से बाहर निकले ही थे, एक जगह नज़र टिकी गई। इतनी सुंदर मूर्ति गोपाल की। चौबे जी अपलक देख रहे थे जैसे अभी बात करने लगेगी।" "तभी मोहनलाल ने ध्यान भंग करते हुए कहा, "बडे साहब ने आर्डर पर बनवाई है। बाहर से बनकर आई है। ऐसी दो बनवाई हैं।"रास्ते भर मूर्ति की छवि उनकी नजरों से ओझल नहीं हो रही थी। काश वो मूर्ति उनके पास होती। भूल नहीं पा रहे हैं... काश अगर उनके पास होती कैसे दिनभर निहारते रहते, क्या क्या सेवा करते सोचते सोचते, घर कब आया पता ही नहीं चला।लेकिन घर के सामने इतनी भीड़ क्यों है ? यह गाड़ी किसकी.. गाड़ी तो काफी महंगी लग रही है ? "अपने घर के दरवाजे में घुसने ही वाले थे कि थैला हाथ से छीनकर निर्मला ने मुस्कुराकर उनका स्वागत किया।कौन आया है ? अंदर सूट बूट में एक आदमी बैठा है। चौबेजी को देखते ही वो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।राधे राधे चौबे जी ने कहा। बैठिए पर क्षमा कीजिए मैंने आपको पहचाना नहीं।" "अरे आप कैसे पहचानेंगे ? हम पहली बार मिल रहे हैं। उसने बड़ी शालीनता के साथ जवाब दिया।जी कहिए, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ ?" "दरअसल मैं आपसे कुछ मांगने आया हूँ।सीधा-सीधा बताइए चौबे जी सोच में पडे थे जाने वह क्या मांग ले.? ..और इतने बड़े आदमी को मुझसे क्या चाहिए ?" "आज से चार दिन पहले मैं सुबह की सैर के लिए गया था। लेकिन उस दिन मेरे साथ एक दुर्घटना हुई।अचानक मुझे हार्टअटैक आ गया। आसपास कोई नहीं था.. मदद के लिए। ना मैं कुछ बोल पा रहा था। तभी एक लड़की स्कूटी पर आती दिखी। मुझे सडक पर पड़े हुए देखकर उसने अपनी स्कूटी रोकी।अकेली वो मुझे उठा नहीं सकती थी। फिर अपनी स्कूटी से दूर से दुकान पर जाकर एक आदमी को बुलाकर लाई। उसकी मदद से उसने मुझे अपनी स्कूटी पर बिठाया और मुझे हॉस्पिटल लेकर गई। अगर थोड़ी सी भी देर हो जाती शायद मेरा अन्त निश्चित था। और वो लड़की कोई और नहीं, आपकी बेटी थी।" "उस आदमी ने हाथ जोड़ते हुए कहा, अगर आप लायक समझे, तो मैं अपने बेटे के लिए आपकी बेटी का हाथ मांगता हूं। ओर जो अनजान की मदद कर सकती है.. वो अपने परिवार का कितना ध्यान रखेगी।चौबेजी एक दम जड़ हो गए। वह विश्वास नहीं कर पा रहे थे..." "हे ईश्वर क्या यह सब सच में ये हो रहा है कि मुझे किसी के दरवाजे पर ना जाना पड़े। इस स्थिति से बाहर निकले भी नहीं थे कि तभी उन्होंने अपने पास रखे हुए बैग में से एक बाक्स निकाला।उन्हें देते हुए कहा कि शगुन का एक छोटा सा उपहार है.. मना मत करना.. "चौबेजी ने खोलते हुए देखा.. इसमें वही बालगोपाल की मूर्ति थी, जिसे अभी शोरूम में देखकर आए थे। जो आंखो के सामने से ओझल नहीं हो रही थी। जिसे देखते ही मन में ये ख्याल आया था कि काश मेरे मंदिर में होती।आज ऊपरवाले ने प्रमाणित कर दिया की मुझे उसका जितना ख्याल है उससे कहीं ज्यादा उसे मेरा ख्याल है।" ----------::;×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

+32 प्रतिक्रिया 6 कॉमेंट्स • 85 शेयर

꧁🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥🔥꧂ 🦚꧁श्रीसिद्धिविनायक पंचांग꧂🦚 🌷☘🌹🍂🍃💐🌻🌸🌺💐. ┈━❀꧁ 卐卐卐卐 ꧂❀----- 🔔°•🔔•°🔔°•🌄•°🔔°•🔔•°🔔 🌴🌴🌴🌴 जय श्री महाकालेश्वर विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कर्णामृताय शशिशेखर धारणाय कर्पूरकान्ति धवलाय जटाधराय दारिद्र्यदुःख दहनाय नमश्शिवाय गौरीप्रियाय रजनीश कलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिप कङ्कणाय गङ्गाधराय गजराज विमर्धनाय दारिद्र्यदुःख दहनाय नम:शिवाय ॐ नमः शिवाय ॐ ऐं क्लीं सोमाय नमः । ॐ श्रां श्रीं श्रीं सः चन्द्राय नमः । सुप्रभातम् ॐ श्रीगणेशाय नमः अथ् पंचांगम् दिनाँक 24-01-2022 सोमवार अक्षांश- 30°:36", रेखांश 76°:80" अम्बाला शहर हरियाणा, पिन कोड- 134 007 ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्। 🙏🙏🙏🙏 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 ┉┅━❀꧁🐀🐀🐀꧂❀━┅ -----समाप्तिकाल---- 📒 तिथि षष्ठी 08:46:40 ☄️ नक्षत्र हस्त 11:15:36 🛑 करण : 🛑 वणिज 08:46:40 🛑 विष्टि 20:22:30 🔒 पक्ष कृष्ण 🛑 योग सुकर्मा 11:10:11 🗝️ वार सोमवार 🌄 सूर्योदय 07:17:54 🌃 चन्द्रोदय 23:57:59 🌙 चन्द्र 👩🏻‍🦱 कन्या - 23:08:44 तक 🌌 सूर्यास्त 17:51:54 🌑 चन्द्रास्त 11:07:59 ☃️ ऋतु शिशिर 🛑 शक सम्वत 1943 प्लव 🛑 कलि सम्वत 5123 🛑 दिन काल 10:34:00 🛑 विक्रम सम्वत 2078 🛑 मास अमांत पौष 🛑 मास पूर्णिमांत माघ 🎺 शुभ समय 🥁 अभिजित 12:13:46 - 12:56:02 ⚫ दुष्टमुहूर्त : ⚫12:56:02 - 13:38:18 ⚫15:02:50 - 15:45:06 ⚫ कंटक 09:24:42 - 10:06:58 ⚫ यमघण्ट 12:13:46 - 12:56:02 👿 राहु काल 08:37:08 - 09:56:23 ⚫ कुलिक 15:02:50 - 15:45:06 ⚫ कालवेला 10:49:14 - 11:31:30 ⚫ यमगण्ड 11:15:38 - 12:34:53 ⚫ गुलिक 13:54:08 - 15:13:23 🛑 दिशा शूल पूर्व : ┅━❀꧁🌴🌴🌴🌴꧂❀━ सर्व कार्य सिद्धि के लिए होरा मुहूर्त श्रेयस्कर है । होरा मुहूर्त के अनुसार कार्य आरंभ करके प्रत्येक मनुष्य अशुभ समय में से होरा के अनुसार अपना कार्य सिद्ध कर सकता है । 7 ग्रहों के सात होरे हैं । 👉सूर्य की होरा टेंडर देने व नौकरी व राज्य कार्य के चार्ज लेने देने के लिए अच्छी होती है । 👉चंद्रमा की होरा सब कार्यों के लिए अच्छी होती है । 👉मंगल की होरा युद्ध, यात्रा, कर्ज़ देने, सभा सोसाइटी में आना-जाना और मुकदमा के कार्य में अच्छी होती है । 👉 बुध की होरा में विद्यारंभ, कोष संग्रह करना, नवीन व्यापार, नवीन लेख, पुस्तक प्रकाशन, प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने के लिए अच्छी होती है । 👉गुरु की होरा विवाह संबंधी कार्यक्रम, बड़ों से मिलना, कोष संग्रह, नवीन काव्य लेखन, आदि के लिए शुभ है । 👉शुक्र की होरा यात्रा भूषण नवीन वस्त्र धारण, प्रवास, सौभाग्य वर्धक कार्य के लिए शुभ है । 👉शनि की होरा भूमि मकान की नींव नूतन गृह आरंभ, मशीनरी, मिल्स कार्य आरंभ, समस्त स्थिर कार्य शुभ होते हैं। 💥💥💥💥 होरा 🛑चन्द्रमा 07:17:54 - 08:10:44 🛑शनि 08:10:44 - 09:03:34 🛑बृहस्पति 09:03:34 - 09:56:24 🛑मंगल 09:56:24 - 10:49:14 🛑सूर्य 10:49:14 - 11:42:04 🛑शुक्र 11:42:04 - 12:34:54 🛑बुध 12:34:54 - 13:27:44 🛑चन्द्रमा 13:27:44 - 14:20:34 🛑शनि 14:20:34 - 15:13:24 🛑बृहस्पति 15:13:24 - 16:06:14 🛑मंगल 16:06:14 - 16:59:04 🛑सूर्य 16:59:04 - 17:51:54 🛑शुक्र 17:51:54 - 18:59:02 🛑बुध 18:59:02 - 20:06:10 🛑चन्द्रमा 20:06:10 - 21:13:18 ┅━❀꧁🌴🌴🌴🌴꧂❀━ 👉नोट- दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है। प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है। 🛑चर में चक्र चलाइये , उद्वेगे थलगार । ⛩️शुभ में स्त्री श्रृंगार करे,लाभ में करो व्यापार ॥ ☘️रोग में रोगी स्नान करे ,काल करो भण्डार । ⛩️अमृत में काम सभी करो , सहाय करो कर्तार ॥ अर्थात- 👉चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें । 👉उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें । 👉शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें । 👉लाभ में व्यापार करें । 👉रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें । 👉काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है । 👉अमृत में सभी शुभ कार्य करें । 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 💥💥💥💥चोघड़िया ⛩️अमृत 07:17:54 - 08:37:08 ⚫काल 08:37:08 - 09:56:23 ⛩️शुभ 09:56:23 - 11:15:38 ☘️रोग 11:15:38 - 12:34:53 ⚫उद्वेग 12:34:53 - 13:54:08 🛑चल 13:54:08 - 15:13:23 ⛩️लाभ 15:13:23 - 16:32:38 👉अमृत 16:32:38 - 17:51:53 🛑चल 17:51:54 - 19:32:36 ☘️रोग 19:32:36 - 21:13:18 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 ꧁ दैनिक ग्रह गोचर ꧂ 🌞 सूर्य - मकर 🐊 🌙 चन्द्र - कन्या 👩🏻‍🦱 🛑 मंगल - धनु 🏹 🛑 बुध - धनु 🏹 🛑 बृहस्पति - कुम्भ 🏺 🛑 शुक्र - धनु 🏹 🛑 शनि - मकर 🐊 😈 राहु - वृष 🐂 👖 केतु - वृश्चिक 🦂 --------------------------------------------------- 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 व्रत-त्यौहार 31 जनवरी तक ┉┅━❀꧁🐀🐀🐀꧂❀━┅ 🛑 सोमवार 24 जनवरी भद्रा 8:44 से 20:17तक 💥सूर्य श्रवण में 10:19 🛑 मंगलवार 25 जनवरी अष्टमी तिथि का क्षय॰॰ ॰॰ 🛑 बुधवार 26 जनवरी 👉 भारत गणतंत्र दिवस (73वां) 🛑 गुरुवार 27 जनवरी भद्रा 15:26 से 26:17 तक 🛑 शुक्रवार 28 जनवरी षटतिला एकादशी व्रत 👉वक्री बुध पूर्व में उदय 29:42 गंड मूल 7:10 से 🛑 शनिवार 29 जनवरी तिल द्वादशी 👉 शुक्र मार्गी 14:17 गंड मूल 26:49 तक 🛑 रविवार 30 जनवरी भद्रा 17:29 से 27:54 तक प्रदोष व्रत 👉मास शिवरात्रि व्रत 🛑 सोमवार 31 जनवरी पितृ कार्येषु अमावस 14:19 बाद तीर्थ स्थान व तर्पण आदि का महात्म्य 2 दिन हरिद्वार प्रयाग राज आदि। 🌷☘🌹🌻🌸🌺💐 ┉┅━❀꧁🐀🐀🐀꧂❀━┅ दैनिक भविष्यफल 👩‍❤️‍👨🦀🦁👩🏻‍🦱⚖️🏹🐬 ✒️ नोटः प्रस्तुत भविष्यफल में और आपकी कुंडली व राशि के ग्रहों के आधार पर आपके जीवन में घटित हो रही घटनाओं में कुछ भिन्नता हो सकती है । पूरी जानकारी के लिए किसी देवेज्ञ या भविष्यवक्ता से मिल सकते हैं। 🤷🏻‍♀ आज जिन भाई-बहनों /मित्रों का 🎂जन्मदिन या विवाह की वर्षगांठ 🥁📯 है , उन सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ तथा शुभ आशीर्वाद । प्रभु आपकी जीवन यात्रा सफल करें । मेष🐐 (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, अ) आज के दिन आप अपनी ही आदतों के कारण अंदर ही अंदर परेशान रहेंगे। घर के छोटो अथवा पिता के कारण क्रोध आएगा लेकिन प्रकट करने की जगह मन मे ही रखेंगे। घर मे सुख सुविधा के साथ अन्य आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी पर अधिक खर्च होगा फिर भी आज सभी को संतुष्ट नही कर पाएंगे। माता से लाभ होगा परन्तु पिता से आज कम ही बनेगी। संतान के व्यवहार को लेकर भी चिंतित रहेंगे।ज्यादा मेहनत करने के पक्ष में नही रहेंगे परन्तु ध्यान रहे आज कम मेहनत से भी अधिक लाभ कमाया जा सकता है आरम्भ में थोड़े व्यवधान भी आएंगे लेकिन यह निकट भविष्य में उपयोगी सिद्ध होगा। सेहत ठीक ही रहेगी। वृष🐂 (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो) आज का दिन बीते दिनों की अपेक्षा राहत भरा रहेगा। घर मे कुछ समय के लिए कोई पुराने प्रसंग छिड़ने पर अशांति बनेगी मूकदर्शक बन कर रहे अन्यथा सारा दिन व्यर्थ मानसिक उलझनों के कारण बर्बाद होगा। व्यवसाय से लाभ हानि बराबर रहेगी धन की आमद होने के साथ ही खर्च भी हो जाएगी। मौज शौक एवं मनोरंजन पर दिखावे के लिये विशेष खर्च करेंगे। भाई बंधुओ से आर्थिक लाभ की संभावना है इसे सही जगह पर ही निवेश करें अन्यथा बैठे बिठाये नया झगड़ा मोल लेंगे। पिता का सुख ना के बराबर रहेगा सरकारी कार्यो में फंसने की संभावना है अथवा सरकारी उलझने बढ़ने से परेशानी होगीं। आस पड़ोसियों के कारण खर्च बढेगा। मिथुन👩‍❤️‍👨 (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, हा) आज भी आपका जिद्दी स्वभाव घर मे कलह का कारण बनेगा विशेष कर माता को अधिक कष्ट होगा लेकिन पिता के साथ अच्छी जमेगी। सार्वजनिक क्षेत्र पर कम व्यवहार रखें मित्र मंडली अथवा अन्य कारणों से शर्मिंदा होना पड़ेगा। कार्य व्यवसाय से धन लाभ अवश्य होगा परन्तु आज हाथ खुला रहने के कारण धन आने के साथ ही जाने के रास्ते भी बना लेगा। बड़े भाई बहन से सतर्क रहें आपकी गतिविधयों पर नजर रखे हुए है गलती करने पर दया नही करेंगे। सरकारी कार्य आज अधूरे ही रहेंगे लेकिन निकट भविष्य में अवश्य ही कुछ ना कुछ लाभ देंगे। धर्म आध्यात्म में आज रुचि कम ही रहेगी। मौज शौक सुखोपभोग के लिए हर समय उपस्थित रहेंगे। संतानों की सेहत पर खर्च बढेगा। कर्क🦀 (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो) आज का दिन धन लाभ वाला है विशेष कर व्यवसायियों को पूर्व में कई मेहनत का फल अवश्य ही किसी न किसी रूप में मिलेगा भाई बंधुओ के सहयोग से भी लाभ के साधन बनेंगे परन्तु संतानों के ऊपर खर्च अनियन्त्रित रहने के कारण बचत नही कर पाएंगे। माता के द्वारा प्रसंशा होने पर आंनदित रहेंगे सार्वजनिक क्षेत्र पर भी आदर बढ़ेगा। कार्य व्यवसाय से बुद्धि चातुर्य से हानि वाले कार्यो से भी लाभ कमा लेंगे लेकिन निवेश करते समय अधिक विचार करे गलत जगह होने की संभावना अधिक है। परिवार में माता को छोड़ अन्य सभी विशेष कर पिता अथवा पिता तुल्य व्यक्ति का विरोध देखना पड़ेगा संताने भी उन्हींका पक्ष लेंगी। मित्र मंडली में बैठते समय सतर्क रहें कोई नई परेशानी खड़ी हो सकती है। सेहत पर भी खर्च करना पड़ेगा। सिंह🦁 (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे) आज के दिन आपका स्वभाव उदासीन रहेगा किसी से भी ज्यादा व्यवहार नही रखेंगे। आर्थिक एव व्यावसायिक दृष्टिकोण से यह आपके लिए आज हितकर भी रहेगा। कार्य क्षेत्र पर कोई भी कार्य जबरदस्ती बनाने का प्रयास ना करें वरना हानि ही होगीं। सहज रूप से आवश्यकता अनुसार लाभ हो जाएगा। आध्यात्मिक उन्नति होगी लेकिन इससे अहम भी बढ़ेगा दिखावे के लिए परोपकार करेंगे फिर भी यह शत्रुओ के दमन में सहायता करेगा। माता पिता के एकमत रहने से पैतृक संबंधित अथवा लाभ पाने के लिए अधिक मशक्कत करनी पड़ेगी तभी जाकर सफलता मिलेगी। संतान पक्ष मनमानी करेगी ढील ना दे अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा। आज पिता की सेहत का भी विशेष ध्यान रखें। यात्रा अंत समय मे निरस्त करनी पड़ सकती है। कन्या👩🏻‍🦱 (टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो) आज के दिन आप अधिकांश कार्य हड़बड़ाहट में करेंगे। खुद जल्दी से किसी कार्य को करने के लिए तैयार नही होंगे कोई और उसे करेगा तो उससे ईर्ष्या करेंगे। पति-पत्नी के बीच अंतरंग बातो को लेकर मतभेद रहेंगे। कार्य व्यवसाय में आज पिता का सहयोग तो कम रहेगा लेकिन प्रतिष्ठा का लाभ अवश्य किसी न किसी रूप में मिलेगा स्वयं के पराक्रम से इसमे वृद्धि भी करेंगे। सार्वजनिक क्षेत्र पर अपनी बचकानी हरकतों से हास्य के पात्र बनेंगे लेकिन इससे आस पास का वातावरण आनंदमय भी होगा। घर मे किसी न किसी की सेहत खराब होने के कारण अस्पताल के चक्कर लगाने पैड सकते है। यात्रा अति आवश्यक होने पर ही करें। व्यसनों से दूर रहे अन्यथा मान हानि होगी। तुला⚖️ (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते) आज के दिन आपका स्वभाव रहस्यमय रहेगा। कहेंगे कुछ लेकिन मन मे कुछ और ही रहेगा इस आदत के चलते घर एवं बाहर आपकी बातों पर विश्वास नही किया जाएगा। अपना काम निकलने के लिये झूठी कहानिया बनाएँगे। संतानों के माध्यम से कुछ न कुछ लाभ होगा लेकिन इनके ऊपर खर्च भी करना पड़ेगा। कार्य व्यवसाय में जोड़ तोड़ के बाद काम चलाऊ आय हो जाएगी। सेहत में उतार चढ़ाव लगा रहेगा सर्दी जुखाम के कारण ज्यादा परेशानी रह सकती है ठंडे एवं तले भुने से परहेज करें अन्यथा संमस्या बढ़ भी सकती हैं। घरेलू कार्यो को करने में टालमटोल करेंगे लेकिन मनोरंजन के लिये तैयार रहेंगे इस वजत से घर मे कहा सुनी होगीं। महिलाए इच्छा पूर्ति होने पर भी असंतुष्ट ही रहेंगी। वृश्चिक🦂 (तो, ना, नी, नू, ने, नो, या, यी, यू) आज का दिन सार्वजनिक क्षेत्र और कार्यो से सम्मान दिलाएगा। दिन का पहला भाग आलस्य में खराब होगा स्वस्थ्य रहने पर भी बीमारी का बहाना बनाकर कार्यो से बचने का प्रयास करेंगे। कार्य क्षेत्र पर मध्यान बाद ही गति आएगी धन लाभ कम समय मे आवश्यकता से अधिक हो जाएगा। घरेलू कार्यो के साथ सामाजिक कार्यो के लिये भी समय निकालना पड़ेगा। सार्वजनिक क्षेत्र पर आपकी क्षवि उदार एवं धनवानों जैसी बनेगी भले अंदर से कुछ और ही रहे। संध्या का समय आनंद मनोरंजन में बीतेगा। अधिक बोलने से बचें अन्यथा घर अथवा मित्र मंडली में अपमानित हो सकते है। धनु🏹 (ये, यो, भा, भी, भू, ध, फा, ढा, भे) आज आप कार्य व्यवसाय को लेकर परेशान रहेंगे भाग दौड़ के पक्ष में नही रहेंगे फिर भी ना चाहकर भी करनी ही पड़ेगी आर्थिक समस्या आज लगभग सभी कार्यो में बाधक बनेगी। भाई बंधुओ के साथ ही समाज से सम्मान मिलेगा लेकिन मन को संतोष नही दे पाएगा। मैन ही मन उलझे रहेंगे लेकिन किसी को बताएंगे नही पर ध्यान दे मन मे चल रही उलझन प्रियजनों से बांटने पर ही कम हो सकती है। माता के साथ आध्यात्मिक बातो को बांटने पर कुछ समय के लिए मानसिक राहत मिलेगी। सार्वजनिक कार्यो में पिता के नाम पर खर्च करना पड़ेगा। कार्य व्यवसाय से ना के बराबर आमद होगी आवश्यकता पूर्ति के लिये भी अन्य के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा। आध्यात्म का सहारा लेने पर शारीरिक पीड़ा अनुभव नही होगी। मकर🐊 (भो, जा, जी, खी, खू, खा, खो, गा, गी) आज के दिन आप शांति की तलाश में रहेंगे लेकिन कोई न कोई प्रसंग मानसिक रूप से अशांत ही बनाये रखेगा। दिन का आरंभ सुस्त रहेगा आलस्य प्रमाद फैलाएंगे। देखा देखी में पूजा पाठ में भी भाग ले सकते है लेकिन मन कही और ही भटकेगा। कार्य व्यवसाय से लाभ के अवसर मिलेंगे धन लाभ प्रयास करने पर अवश्य होगा लेकिन घरेलू और व्यक्तिगत खर्चो के लिए कम ही पड़ेगा। प्रतिस्पर्धी अथवा शत्रु पक्ष के आगे झुकना पड़ेगा तभी शांति मिलेगी। घर मे माता अथवा अन्य स्त्री वर्ग का दिमाग गर्म रहेगा घुटनो अथवा अन्य जोड़ो में समस्या के कारण चिड़चिड़ी रहेंगी काम निकालने में खासी परेशानी आएगी। संतानों का सुख उत्तम रहेगा आज्ञाकारी रहने पर गर्व अनुभव करेंगे। उटपटांग देखना भायेगा। कुंभ🏺 (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा) आज के दिन आप अपनी इच्छाओं की पूर्ति थोड़े व्यवधान के बाद कर सकेंगे। घर मे किसी बात को लेकर माता से ठनेगी प्रेम से व्यवहार कर ही बात मनवाई जा सकती है। व्यवसायी वर्ग कार्य व्यवसाय से आज ज्यादा आशा ना रखें प्रतिस्पर्धा अधिक रहने व समय कम देने के कारण कम लाभ से ही संतोष करना पड़ेगा। खर्च अनियंत्रित रहेंगे सुखोपभोग एवं मनोरंजन पर आंख बंद कर व्यय करेंगे इससे संचित कोष में कमी आएगी। भाई बंधुओ को स्वयं से ज्यादा सम्मान मिलने पर मन मे ईर्ष्या की भावना रहेगी। आज स्वयं अथवा परिवार में किसी सदस्य को छाती अथवा पेट संबंधित संमस्या रहेगी। संतान अथवा अन्य घरेलू कारणों से यात्रा की योजना बनेगी। मीन🦈 (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची) आज के दिन आप आराम से समय बिताना पसंद करेंगे लेकिन घरेलू कारणों से मनोकामना पूर्ति सम्भव नही हो पाएगी। घर के अधूरे कार्य इक्कठे सर पर आने के कारण मध्यान तक कोई ना कोई काम लगा रहेगा। कार्य व्यवसाय को लेकर मन मे चिंता रहेगी दोपहर के बाद व्यवसाय में वृद्धि के योग है धन लाभ भी आसानी से हो जाएगा कार्य क्षेत्र पर प्रतिस्पर्धी हावी रहेंगे फिर भी आपके कार्य को क्षति नही पहुचा पाएंगे। साधना के क्षेत्र से जुड़े लोगों को आध्यात्म में नई अनुभूति होगी पूजा पाठ का सकारत्मक परिणाम मिलने से उत्साहित रहेंगे। घरेलू वातावरण वैसे तो शांत ही रहेगा फिर भी आवश्यकता पूर्ति समय पर करें अन्यथा स्त्रीवर्ग और संतानों की जिद कलह का कारण बन सकती है। कंधे और कमर में दर्द की शिकायत होगी।

+8 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 33 शेयर

. " पराशर ऋषि की कथा " " ऋग्वेद; जिसमें अनेक सूक्त पराशर ऋषि के नाम है " " पोस्ट ०१\१३ " " ( भाग :-०१ ) " ("पाराशर मुनि का आश्रम उत्तरप्रदेश के फतेहपुर जिले के गंगा किनारे बैगाओं नामक ग्राम में स्थित है ") ( "पराशर ऋषि एक मन्त्रद्रष्टा ऋषि, शास्त्रवेत्ता, ब्रह्मज्ञानी एवं स्मृतिकार है। येे महर्षि वसिष्ठ के पौत्र, गोत्रप्रवर्तक, वैदिक सूक्तों के द्रष्टा और ग्रंथकार भी हैं। पराशर शर-शय्या पर पड़े भीष्म से मिलने गये थे। परीक्षित् के प्रायोपवेश के समय उपस्थित कई ऋषि-मुनियों में वे भी थे। वे छब्बीसवें द्वापर के व्यास थे। जनमेजय के सर्पयज्ञ में उपस्थित थे।) " परिचय " परिवार :- शक्ति ऋषि (पिता), अदृश्यन्ति (माता),  वसिष्ठ (पितामह) जीवन साथी:- "काली (सत्यवती, मत्स्यगन्धा, योजनगंधा)" पुत्र :- " महर्षि वेदव्यास "   "भारतीय ज्योतिष के प्रवर्तकों में महर्षि पराशर अग्रगण्य हैं। महर्षि प्रोक्तं ग्रंथों में केवल इन्ही का सम्पूर्ण ग्रंथ 'बृहत्पराशरहोराशास्त्र' नाम से उपलब्ध हैं। अन्य प्रवर्तक ऋषियों के वचन तो इतस्ततः मिलते हैं, लेकिन किसी सम्पूर्ण ग्रंथ के अद्यावधि दर्शन नही होते हैं। यह बात पराशर के मत की सर्व व्यापकता व सार्वभौमिकता का एक पुष्कल प्रमाण है। 'पराशरहोराशास्त्र' की गुणग्रहिता व सम्पूर्णता के कारण ही इनकी यह रचना सर्वत्र प्रचलित है।" "ज्योतिष शास्त्र के सभी ग्रंथों पर यदि दृष्टि डाली जाये तो अनुभव होता है कि परवर्ती आचार्यों के मंतव्यों की मूल भित्ति पराशरीय विचार ही हैं। एक प्रकार से पराशर के ज्योतिषीय विचारों का प्रस्तार ही अवान्तर ग्रंथों में न्यूनाधिक रूप से देखने में आता है।" अतः कहा भी गया है - "तीर्थोदकं च वह्निश्च नान्यतः शुद्धिमर्हतः॥ " "(भवभूति)" "अर्थात - जिस प्रकार वेदों का स्वयं प्रमाण स्वतः सिद्ध है, तीर्थ का जल व अग्नि स्वयं शुद्ध है, उन्हें शुद्ध करने, प्रमाणित करने व ग्राह्य बनाने के लिए किसी पवित्रीकरण की आवश्यकता नही होती उसी प्रकार पराशर के वचनों को प्रमाण रूप में उद्धृत करने की सर्वत्र परिपाटी है। पराशरीय कथनों व निर्णयों को प्रमाणित करने के लिए किसी अन्य ऋषि वाक्यों की आवश्यकता अकिंचित्कर ही है।" " पराशर सम्प्रदाय या पराशरीय विचारधारा, विचारों की उस गंगा के समान है, जो समस्त भारत भूमि को अपने अमृत से आप्लावित करती हुई अपनी चरम गति या मंजिल पर पहुंचती है और अवान्तर अनेक विचारधारा रूपी नदियों को भी अपने भीतर समेटती चलती है।" "अतः 'पराशर मत्त' गंगानद है तो अन्य विचारधाराएं या मत्त नदियाँ ही है। यह एक अविच्छिन्न रूप से बहने वाली, सदानीरा नदी है। इस दृष्टि से देखने पर महर्षि पराशर का स्थान जैमिनी मुनि से ऊँचा ही सिद्ध होता है। जैमिनीय मत्त के पोषण की परंपरा हमें अवान्तर काल में अट्टू रूप में नही मिलती है।" " जैमिनीय मत्त की सभी बातें पराशर सम्प्रदाय में सर्वतोभावेन समाहित हो गयी है, इसका आभास पराशरहोराशास्त्र को देखने से मिल जाता है।" "वराहमिहिर जैसे आचार्य भी पराशर के सिद्धांतों के सामने नतमस्तक हैं। वे अपने ग्रंथों में बहुत पराशर मत्त का उल्लेख करके उसका अंगीकरण करते हैं। अतः पराशर सम्प्रदाय सम्पूर्ण भारत में चतुर्दिक, पुष्पित व पल्लवित होता रहा है तथा ज्योतिष के विषय में उनके द्वारा रचित 'बृहदपराशरहोराशास्त्र' अंतिम निर्णायक ग्रंथ माना जाता है। पराशर, 'फलित ज्योतिष' के आधार स्तंभ हैं इसमें कोई संदेह नही है। " " ०१ :- महर्षि पराशर का काल " " पराशर का काल महाभारत काल के लगभग होना अनुमित है। कलियुग नामक कालखण्ड के प्रारम्भ में होने के कारण उत्तरोत्तर बलियस्त्व के सिद्धांत से कलियुग में पराशर मत्त की सर्वोपरि मान्यता स्पष्ट है।" "कौटिल्य के अर्थशास्त्र के एक या दो स्थानों पर ऐसा आभास मिलता है कि उस समय वशिष्ठ व पितामह सिद्धान्त का प्रचार था अतः नारद, वशिष्ठ, पितामहादि ज्योतिष प्रवर्तकों के पश्चात पराशर का समय मानने से परम्परया इनका अस्तित्व कलियुग के आदि में प्रतीत होता है।" "पराशरः का सृष्टि तत्व निरूपण सूर्य सिद्धांत के तदीय प्रकरण से मेल खाता है। अतः पौराणिक काल में आधुनिक मत्त से पाणिनि से पहले, चाणक्य से भी पहले, वैदिक रचना काल के बाद, पुराण युग में, महाभारत युद्ध की घटना के आसपास पराशर विद्यमान थे।" " अर्थशास्त्र में पराशर का नामोल्लेख पाया जाता है। गरुड़ पुराण में पराशरस्मृति के श्लोकों का संग्रह किया गया है। बृहदारण्यकोपनिषद व तैत्तिरीयारण्यक में व्यास व ऋषि पराशर के नाम आते हैं। "यास्क ने अपने निरुक्त में पराशर के मूल का भी उल्लेख किया है। ये कृष्णद्वैपायन व्यास के पिता थे तथा इनके पिता का नाम 'शक्ति' था। वराह ने पराशर को शक्तिपुत्र या शक्ति पूर्व कहा है।" "अग्निपुराण में स्पष्टतया इन्हें शक्ति का पुत्र ही कहा है। यही पराशर मत्स्यगंधा सत्यवती पर मोहित हुए थे तथा सत्यवती के गर्भ से पराशर पुत्र कृष्णद्वैपायन व्यास उत्पन्न हुए थे, यह सुविदित ही है।" " इन्ही ऋषि पराशर ने कलियुग में व्यवस्था बनाये रखने के लिए 'पराशरस्मृति' या 'द्वादशाध्यायी' धर्मसंहिता की रचना की थी।" "कृते तु मानवो धर्मस्त्रेतायां गौतमः स्मृतः। द्वापरे शंखलिखितः कलौ पराशरः स्मृतः॥" "कृष्णद्वैपायन व्यास जी जब कुछ मुनियों को बदरिकाश्रम(बद्रीनाथ तीर्थ)में स्थित अपने पिता पराशर के पास ले गए थे तब पराशर ने उन्हें वर्णाश्रम धर्म व्यवस्था परक ज्ञान दिया था।" " वराह ने इन्ही शक्तिपुत्र पराशर को होराशास्त्र का प्रवक्ता भी माना है।वराहमिहिर पांचवी सदी में हुए हैं, ऐसा माना जाता है। अतः प्रत्येक परिस्थिति में आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व पराशर के समय की निचली सीमा है।" " श्रीमद् भागवत में एक स्थान पर विदुर व मैत्रेय का वार्तालाप उल्लिखित है। इससे भी मैत्रेय, पराशर व महाभारत की कड़ियाँ मिलती प्रतीत होती है। मैत्रेय को होराशास्त्र बताने वाले महर्षि पराशर महाभारत काल में वृद्धावस्था या चतुर्थाश्रम प्राप्त ऋषि थे। महाभारत का समय परम्परया कम से कम 3000 वर्ष पूर्व माना जाता है। अतः पराशर 2-3 सहस्त्राब्दियों पूर्व भारत में हुए थे।" "पराशर तन्त्र' का उल्लेख भट्टोत्पल ने अनेक स्थानों पर किया है। उन्होंने बृहज्जातक की टीका में 'पाराशरी संहिता' देखने व पढ़ने की बात स्वीकार की है। 'पराशर तन्त्र' नाम से जो उद्धरण दिए गए हैं, उनका विषय तन्त्र अर्थात सिद्धांत ज्योतिष से कम व संहिता से अधिक मेल खाता है।" "शेष भाग अगली पोस्ट में:- ----------::;×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 7 शेयर

. " कल्माषपाद कि कथा " ( " कल्माषपाद इक्ष्वाकुवंशीय नरेश ऋतुपर्ण के पौत्र तथा सुदास (सौदास) के पुत्र थे। इनका अन्य नाम 'मित्रसह' भी था। इनकी रानी मदयती थीं जिन्हें इन्होंने वसिष्ठ की सेवा में अर्पित किया !") "पौराणिक इतिवृत्त है कि एक दिन राजकुमार कल्माषपाद शिकार से लौट रहे थे। पुल के तंग रास्ते पर एक ही व्यक्ति चल सकता था। उसी मार्ग पर दूसरी ओर से ऋषि वशिष्ठ के ज्येष्ठ पुत्र शक्ति मुनि आ रहे थे। राजकुमार कल्माषपाद ने शक्ति मुनि को पहले पुल पार करने के लिए रास्ता नहीं दिया। दोनों ही हठधर्मी से अड़े रहे। बहुत देर होने पर शक्ति मुनि ने नाराज होकर कल्माषपाद को श्राप देकर कहा, 'अरे निकृष्ठ! तू राक्षस हो जा।" "राजकुमार कल्माषपाद तत्काल राक्षस बन गया, लेकिन राक्षस में बदलते ही वह शक्ति मुनि सहित ऋषि वशिष्ठ के अन्य सभी पुत्रों का भी भक्षण कर गया!शाप मिलते ही विश्वामित्र ऋषि से प्रेरित किंकर नामक राक्षस ने इनके शरीर में प्रवेश किया। राक्षस-स्वभाव-युक्त होने का शाप एक तपस्वी ब्राह्मण ने भी दिया था जिसे इन्होंने अपने रसोइए को मनुष्य का मांस देने को प्रेरित किया था। राक्षस स्वभाव से युक्त होकर शक्तिमुनि तथा वसिष्ठ के अन्य पुत्रों का इन्होने भक्षण कर लिया। उस समय शक्ति मुनि की पत्नी गर्भवती थीं। उनके गर्भ में 12 वर्ष तक रहने के पश्चात पाराशर मुनि का जन्म हुआ। इसी अवस्था में इन्होंने मैथुन के लिए उद्यत एक ब्राह्मण का भक्षण कर लिया था अत: ब्राह्मणपत्नी आंगिरसी ने इन्हें अपनी पत्नी से समागम करते ही मृत्यु होने का शाप दिया। वसिष्ठ ने इनकी पत्नी के गर्भ से अश्मक नामक पुत्र उत्पन्न किया।" " अपनी घोर तपस्या, संयम और साधना से उन्होंने शीघ्र ही ऋषि की पदवी प्राप्त कर ली। दूसरी ओर महर्षि वशिष्ठ ने राजकुमार कल्माषपाद को भी क्षमादान देकर अपनी योग शक्ति से उन्हें राक्षस शरीर के श्राप से मुक्त कर दिया। जब ऋषि पाराशर को कल्माषपाद द्वारा राक्षस रूप में अपने पिता तथा अन्य पूर्वजों के भक्षण करने का रहस्य ज्ञात हुआ, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए और प्रतिशोध लेने पर उतारू हो गए। तब महर्षि वशिष्ठ ने अपने ऋषि पौत्र पाराशर को कहा, 'हे पुत्र पाराशर! क्षमा परम धर्म है। इसलिए तुम क्रोध और प्रतिशोध की भावना त्यागकर क्षमाशील बनो! यही ऋषितुल्य आचरण होगा।' पाराशर ने क्रोध और प्रतिशोध की भावना त्यागकर कल्माषपाद को क्षमा कर दिया।" (महाभारत, शांतिपर्व २३४-३०) ----------::;×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 9 शेयर

. बांके बिहारी की लीला "वृंदावन में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। वह बांके बिहारी से असीम प्यार करता था। वह बांके बिहारी का इतना दीवाना था कि सुबह शाम जब तक वह मंदिर ना जाए उसे किसी भी काम में मन नहीं लगता था। मंदिर में जब भी भंडारा होता वह प्रमुख रूप से भाग लेता." "एक दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हो गई और जिस दिन ब्राह्मण की बेटी की शादी तय हुई उसी दिन ब्राह्मण का बांके बिहारी के मंदिर में भी ड्यूटी लग गई,ब्राह्मण परेशान हो गया कि वह करें तो क्या करें बेटी की शादी भी जरूरी है और बांके बिहारी की आज्ञा भी ठुकरा नहीं सकता। " "ब्राह्मण ने सोचा कि अगर यह बात वह अपनी पत्नी से बताएगा तो उसकी पत्नी नाराज हो जाएगी वह कहेगी कि कोई क्या अपनी बेटी की शादी भी छोड़ता है।" "एक दिन अगर तुम भंडारे में नहीं जाओगे तो भंडारा रुक नहीं जाएगा कोई और संभाल लेगा लेकिन बेटी की शादी दोबारा तो नहीं होगी।ब्राह्मण परेशान हो गया था वह जानता था कि कुछ भी हो जाएगा उसकी पत्नी उसे भंडारे में जाने नहीं देगी। लेकिन उसका मन नहीं मान रहा था वह अपने बांके बिहारी से नजरे नहीं चुरा सकता था." "उसने अपनी बेटी की शादी के दिन ही अपने घर में बिना बताए चुपचाप समय से पहले ही मंदिर पहुंच चुका था।मंदिर में जाकर प्यार से सब को भंडारा खिलाया और शाम होते ही जल्दी से घर वापस पहुंचा क्योंकि बेटी की शादी में भी पहुंचना था लेकिन ब्राह्मण को पहुंचते-पहुंचते देर हो चुकी थी और बिटिया की शादी हो कर बिटिया की विदाई भी हो चुकी थी।" "वह घर पहुंचा तो उसकी पत्नी उससे बोली आओ चाय पी लो बहुत थक चुके होंगे।सोचने लगा कि घर वाले कोई भी उसे डांट नहीं रहे हैं और ना ही परिवार के कोई भी सदस्य उससे कोई सवाल कर रहा है.कि वह शादी में नहीं था फिर भी पत्नी सही से उसे प्यार से बात कर रही थी। "ब्राह्मण ने भी सोचा छोड़ो क्या गड़े मुर्दे उखाड़ना है जो हो गया सो हो गया, सब प्रभु की इच्छा है पत्नी अगर प्यार से बात कर रही है इससे अच्छी बात क्या है।कुछ दिनों के बाद बेटी की शादी में जो फोटोग्राफी हुई थी फोटोग्राफर शादी का एल्बम घर पर दे गया।" "ब्राह्मण ने सोचा, इस शादी में तो शरीक हुआ नहीं था चलो एल्बम देख लेता हूं बेटी की शादी कैसी हुई थी।मगर यह क्या, वह तो देख रहा है इस शादी में हर जगह उसकी भी तस्वीर है.जो जगह जगह विवाह की जिम्मेदारियाँ सम्भाल रहे थे। ब्राह्मण फूट फूट कर रोने लगा और कहने लगा, प्रभु तेरी कैसी लीला है! "वो रोता हुआ बिहारी जी के मंदिर पहुँचा और चरणों में गिरकर बोला.प्रभु मैं जीवन भर तुम्हारी नियमत रूप से सेवा करूंगा!" " कोई कमी नहीं उस घर में जिस घर में हरि करते निवास" " श्री कृष्ण सहारा जीवन का बस इतना रखना विश्वास" ----------::;×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ************************************************

+7 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 11 शेयर
sukhadev awari Jan 24, 2022

+25 प्रतिक्रिया 5 कॉमेंट्स • 3 शेयर

. "द्रौपदी का दान" इन्सान जैसा कर्म करता है, कुदरत या परमात्मा उसे वैसा ही उसे लौटा देता है। एक बार द्रौपदी सुबह तड़के स्नान करने यमुना घाट पर गयी भोर का समय था। तभी उसका ध्यान सहज ही एक साधु की ओर गया जिसके शरीर पर मात्र एक लँगोटी थी। साधु स्नान के पश्चात अपनी दूसरी लँगोटी लेने गया तो वो लँगोटी अचानक हवा के झोंके से उड़ पानी में चली गयी ओर बह गयी। संयोगवश साधु ने जो लंगोटी पहनी वो भी फटी हुई थी। साधु सोच मे पड़ गया कि अब वह अपनी लाज कैसे बचाए। थोड़ी देर में सूर्योदय हो जाएगा और घाट पर भीड़ बढ़ जाएगी। साधु तेजी से पानी के बाहर आया और झाड़ी में छिप गया। द्रौपदी यह सारा दृश्य देख अपनी साड़ी जो पहन रखी थी, उसमे आधी फाड़ कर उस साधु के पास गयी ओर उसे आधी साड़ी देते हुए बोली- "तात! मैं आपकी परेशानी समझ गयी। इस वस्त्र से अपनी लाज ढ़क लीजिए। साधु ने सकुचाते हुए साड़ी का टुकड़ा ले लिया और आशीष दिया। जिस तरह आज तुमने मेरी लाज बचायी उसी तरह एक दिन भगवान तुम्हारी लाज बचाएंगे। जब भरी सभा मे चीरहरण के समय द्रौपदी की करुण पुकार नारद ने भगवान तक पहुँचायी तो भगवान ने कहा- "कर्मों के बदले मेरी कृपा बरसती है, क्या कोई पुण्य है। द्रौपदीके खाते में?" जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान हिसाब में मिला, जिसका ब्याज भी कई गुणा बढ़ गया था। जिसको चुकता करने भगवान पहुँच गये द्रौपदी की मदद करने, दुस्सासन चीर खींचता गया और हजारों गज कपड़ा बढ़ता गया। इंसान यदि सुकर्म करे तो उसका फल सूद सहित मिलता है, और दुष्कर्म करे तो सूद सहित भोगना पड़ता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

+6 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 7 शेयर

. "कर्मबंधन" एक राजा बड़ा धर्मात्मा, न्यायकारी और परमेश्वर का भक्त था। उसने ठाकुरजी का मंदिर बनवाया और एक ब्राह्मण को उसका पुजारी नियुक्त किया। वह ब्राह्मण बड़ा सदाचारी, धर्मात्मा और संतोषी था। वह राजा से कभी कोई याचना नहीं करता था, राजा भी उसके स्वभाव पर बहुत प्रसन्न था। उसे राजा के मंदिर में पूजा करते हुए बीस वर्ष गुजर गये। उसने कभी भी राजा से किसी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं किया। राजा के यहाँ एक लड़का पैदा हुआ। राजा ने उसे पढ़ा लिखाकर विद्वान बनाया और बड़ा होने पर उसकी शादी एक सुंदर राजकन्या के साथ करा दी। शादी करके जिस दिन राजकन्या को अपने राजमहल में लाये उस रात्रि में राजकुमारी को नींद न आयी। वह इधर-उधर घूमने लगी जब अपने पति के पलंग के पास आयी तो क्या देखती है कि हीरे जवाहरात जड़ित मूठेवाली एक तलवार पड़ी है। जब उस राजकन्या ने देखने के लिए वह तलवार म्यान में से बाहर निकाली, तब तीक्ष्ण धारवाली और बिजली के समान प्रकाशवाली तलवार देखकर वह डर गयी व डर के मारे उसके हाथ से तलवार गिर पड़ी और राजकुमार की गर्दन पर जा लगी। राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। राजकन्या पति के मरने का बहुत शोक करने लगी। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की कि 'हे प्रभु ! मुझसे अचानक यह पाप कैसे हो गया ? पति की मृत्यु मेरे ही हाथों हो गयी। आप तो जानते ही हैं, परंतु सभा में मैं सत्य न कहूँगी क्योंकि इससे मेरे माता-पिता और सास-ससुर को कलंक लगेगा तथा इस बात पर कोई विश्वास भी न करेगा।' प्रातःकाल में जब पुजारी कुएँ पर स्नान करने आया तो राजकन्या ने उसको देखकर विलाप करना शुरु किया और इस प्रकार कहने लगीः "मेरे पति को कोई मार गया।" लोग इकट्ठे हो गये और राजा साहब आकर पूछने लगेः "किसने मारा है ?" वह कहने लगीः "मैं जानती तो नहीं कि कौन था। परंतु उसे ठाकुरजी के मंदिर में जाते देखा था।" राजा समेत सब लोग ठाकुरजी के मंदिर में आये तो ब्राह्मण को पूजा करते हुए देखा। उन्होंने उसको पकड़ लिया और पूछाः "तूने राजकुमार को क्यों मारा ?" ब्राह्मण ने कहाः "मैंने राजकुमार को नहीं मारा। मैंने तो उनका राजमहल भी नहीं देखा है। इसमें ईश्वर साक्षी हैं। बिना देखे किसी पर अपराध का दोष लगाना ठीक नहीं।" ब्राह्मण की तो कोई बात ही नहीं सुनता था। कोई कुछ कहता था तो कोई कुछ। राजा के दिल में बार-बार विचार आता था कि यह ब्राह्मण निर्दोष है परंतु बहुतों के कहने पर राजा ने ब्राह्मण से कहाः "मैं तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं देता लेकिन जिस हाथ से तुमने मेरे पुत्र को तलवार से मारा है, तेरा वह हाथ काटने का आदेश देता हूँ।" ऐसा कहकर राजा ने उसका हाथ कटवा दिया। इस पर ब्राह्मण बड़ा दुःखी हुआ और राजा को अधर्मी जान उस देश को छोड़कर चला गया। वहाँ वह खोज करने लगा कि कोई विद्वान ज्योतिषी मिले तो बिना किसी अपराध हाथ कटने का कारण उससे पूछूँ। किसी ने उसे बताया कि काशी में एक विद्वान ज्योतिषी रहते हैं। तब वह उनके घर पर पहुँचा। ज्योतिषी कहीं बाहर गये थे, उसने उनकी धर्मपत्नी से पूछाः "माताजी ! आपके पति ज्योतिषी जी महाराज कहाँ गये हैं ?" तब उस स्त्री ने अपने मुख से अयोग्य, असह्य दुर्वचन कहे, जिनको सुनकर वह ब्राह्मण हैरान हुआ और मन ही मन कहने लगा कि "मैं तो अपना हाथ कटने का कारण पूछने आया था, परन्तु अब इनका ही हाल पहले पूछूँगा।" इतने में ज्योतिषी आ गये। घर में प्रवेश करते ही ब्राह्मणी ने अनेक दुर्वचन कहकर उनका तिरस्कार किया। परन्तु ज्योतिषी जी चुप रहे और अपनी स्त्री को कुछ भी नहीं कहा। तदनंतर वे अपनी गद्दी पर आ बैठे। ब्राह्मण को देखकर ज्योतिषी ने उनसे कहाः "कहिये, ब्राह्मण देवता ! कैसे आना हुआ ?" "आया तो था अपने बारे में पूछने के लिए परन्तु पहले आप अपना हाल बताइये कि आपकी पत्नी अपनी जुबान से आपका इतना तिरस्कार क्यों करती है ? जो किसी से भी नहीं सहा जाता और आप सहन कर लेते हैं, इसका कारण है ?" "यह मेरी स्त्री नहीं, मेरा कर्म है। दुनिया में जिसको भी देखते हो अर्थात् भाई, पुत्र, शिष्य, पिता, गुरु, सम्बंधी - जो कुछ भी है, सब अपना कर्म ही हैं। यह स्त्री नहीं, मेरा किया हुआ कर्म ही है और यह भोगे बिना कटेगा नहीं। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्। नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतेरपि॥ (अपना किया हुआ जो भी कुछ शुभ-अशुभ कर्म है, वह अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना भोगे तो सैंकड़ों-करोड़ों कल्पों के गुजरने पर भी कर्म नहीं टल सकता।) इसलिए मैं अपने कर्म खुशी से भोग रहा हूँ और अपनी स्त्री की ताड़ना भी नहीं करता, ताकि आगे इस कर्म का फल न भोगना पड़े।" "महाराज ! आपने क्या कर्म किया था ?" "सुनिये, पूर्वजन्म में मैं कौआ था और मेरी स्त्री गधी थी। इसकी पीठ पर फोड़ा था, फोड़े की पीड़ा से यह बड़ी दुःखी थी और कमजोर भी हो गयी थी। मेरा स्वभाव बड़ा दुष्ट था, इसलिए मैं इसके फोड़े में चोंच मारकर इसे ज्यादा दुःखी करता था। जब दर्द के कारण यह कूदती थी तो इसकी फजीहत देखकर मैं खुश होता था। मेरे डर के कारण यह सहसा बाहर नहीं निकलती थी किन्तु मैं इसको ढूँढता फिरता था। यह जहाँ मिले वहीं इसे दुःखी करता था। आखिर मेरे द्वारा बहुत सताये जाने पर त्रस्त होकर यह गाँव से दस-बारह मील दूर जंगल में चली गयी। वहाँ गंगा जी के किनारे सघन वन में हरा-हरा घास खाकर और मेरी चोटों से बचकर सुखपूर्वक रहने लगी। लेकिन मैं इसके बिना नहीं रह सकता था। इसको ढूँढते-ढूँढते मैं उसी वन में जा पहुँचा और वहाँ इसे देखते ही मैं इसकी पीठ पर जोर-से चोंच मारी तो मेरी चोंच इसकी हड्डी में चुभ गयी। इस पर इसने अनेक प्रयास किये, फिर भी चोंच न छूटी। मैंने भी चोंच निकालने का बड़ा प्रयत्न किया मगर न निकली। 'पानी के भय से ही यह दुष्ट मुझे छोड़ेगा।' ऐसा सोचकर यह गंगाजी में प्रवेश कर गयी परन्तु वहाँ भी मैं अपनी चोंच निकाल न पाया। आखिर में यह बड़े प्रवाह में प्रवेश कर गयी। गंगा का प्रवाह तेज होने के कारण हम दोनों बह गये और बीच में ही मर गये। तब गंगा जी के प्रभाव से यह तो ब्राह्मणी बनी और मैं बड़ा भारी ज्योतिषी बना। अब वही मेरी स्त्री हुई। जो मेरे मरणपर्यन्त अपने मुख से गाली निकालकर मुझे दुःख देगी और मैं भी अपने पूर्वकर्मों का फल समझकर सहन करता रहूँगा, इसका दोष नहीं मानूँगा क्योंकि यह किये हुए कर्मों का ही फल है। इसलिए मैं शान्त रहता हूँ। अब अपना प्रश्न पूछो।" ब्राह्मण ने अपना सब समाचार सुनाया और पूछाः "अधर्मी पापी राजा ने मुझ निरपराध का हाथ क्यों कटवाया ?" ज्योतिषीः "राजा ने आपका हाथ नहीं कटवाया, आपके कर्म ने ही आपका हाथ कटवाया है।" "किस प्रकार ?" "पूर्वजन्म में आप एक तपस्वी थे और राजकन्या गौ थी तथा राजकुमार कसाई था। वह कसाई जब गौ को मारने लगा, तब गौ बेचारी जान बचाकर आपके सामने से जंगल में भाग गयी। पीछे से कसाई आया और आप से पूछा कि "इधर कोई गाय तो नहीं गया है ?" आपने प्रण कर रखा था कि 'झूठ नहीं बोलूँगा।' अतः जिस तरफ गौ गयी थी, उस तरफ आपने हाथ से इशारा किया तो उस कसाई ने जाकर गौ को मार डाला। गंगा के किनारे वह उसकी चमड़ी निकाल रहा था, इतने में ही उस जंगल से शेर आया और गौ एवं कसाई दोनों को खाकर गंगाजी के किनारे ही उनकी हड्डियाँ उसमें बह गयीं। गंगाजी के प्रताप से कसाई को राजकुमार और गौ को राजकन्या का जन्म मिला एवं पूर्वजन्म के किये हुए उस कर्म ने एक रात्रि के लिए उन दोनों को इकट्ठा किया। क्योंकि कसाई ने गौ को हंसिये से मारा था, इसी कारण राजकन्या के हाथों अनायास ही तलवार गिरने से राजकुमार का सिर कट गया और वह मर गया। इस तरह अपना फल देकर कर्म निवृत्त हो गया। तुमने जो हाथ का इशारा रूप कर्म किया था, उस पापकर्म ने तुम्हारा हाथ कटवा दिया है। इसमें तुम्हारा ही दोष है किसी अन्य का नहीं, ऐसा निश्चय कर सुखपूर्वक रहो।" कितना सहज है ज्ञानसंयुक्त जीवन ! यदि हम इस कर्मसिद्धान्त को मान लें और जान लें तो पूर्वकृत घोर से घोर कर्म का फल भोगते हुए भी हम दुःखी नहीं होंगे बल्कि अपने चित्त की समता बनाये रखने में सफल होंगे। भगवान श्रीकृष्ण इस समत्व के अभ्यास को ही 'समत्व योग' संबोधित करते हैं, जिसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त होने पर मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त हो जाता है। ----------:::×:::--------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

+7 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 8 शेयर

. "कर्मो का फल" एक बार की कथा है, देवऋषि नारद और ऋषि अन्गरा कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी नजर एक मिठाई की दुकान पर पड़ी। दुकान के नजदीक ही झूठी पतलों का ढेर लगा हुआ था। उस झूठन को खाने के लिए जैसे ही एक कुत्ता आता है, बैसे ही उस दुकान का मालिक उसको जोर से डन्डा मारता है। डन्डे की मार खा कर कुत्ता चीखता हुआ वहाँ से चला जाता है। ये दृश्य देख कर, देवऋषि को हंसी आ गयी। ऋषि अन्गरा ने उन से हंसी का कारण पूछा, नारद बोले: हे ऋषिवर ! यह दुकान पहले एक कन्जूस व्यक्ति की थी। अपनी जिंदगी में उसने बहुत सारा पैसा इकट्ठा किया। और इस जन्म में वो कुत्ता बन कर पैदा हुआ और यह दुकान मालिक उसी का पुत्र है, देखें ! जिस के लिए उस ने बेशुमार धन इकट्ठा किया। आज उसी के हाथों से, उसे जूठा भोजन भी नहीं मिल सका। कर्मफल के इस खेल को देखकर मुझे हंसी आ गई। मनुष्य को अपने शुभ और अशुभ करमों का फल जरूर मिलता है। बेशक इस लिए उसे जन्मों-जन्मों की यात्रा क्यों न करनी पड़े। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

. "श्रेष्ठतम का आश्रय ही श्रेयस्कर" बहुत-सी भेड़-बकरियाँ जंगल में चरने गयीं। उनमें से एक बकरी चरते-चरते एक लता में उलझ गयी। उसको उस लता में से निकलने में बहुत देर लगी, तब तक अन्य सब भेड़-बकरियाँ अपने घर पहुँच गयीं| अँधेरा भी हो रहा था। वह बकरी घूमते-घूमते एक सरोवर के किनारे पहुँची। वहाँ किनारे की गीली जमीन पर सिंह का एक चरण-चिह्न अंकित था। वह उस चरण-चिह्न के शरण होकर उसके पास बैठ गयी। रात में जंगली सियार, भेड़िया, बाघ आदि प्राणी बकरी को खाने के लिये पास में आये तो उस बकरी ने बता दिया कि ' पहले देख लेना कि मैं किसके शरण में हूँ, तब मुझे खाना!' वे चिह्न को देखकर कहने लगे-'अरे, यह तो सिंह के चरण चिह्न के शरण है, जल्दी भागो यहाँ से! सिंह आ जायगा तो हमको मार डालेगा। इस प्रकार सभी प्राणी भयभीत होकर भाग गये अन्त में जिसका चरण-चिह्न था, वह सिंह स्वयं आया और बकरी से बोला-'तू जंगल में अकेली कैसे बैठी है?' बकरी ने कहा-' यह चरण-चिह्न देख लेना, फिर बात करना। जिसका यह चरण-चिह्न हैं, उसी के मैं शरण हुए बैठी हूँ।' सिंह ने देखा कि 'ओह! यह तो मेरा ही चरण चिह्न है, यह बकरी तो मेरे ही शरण हुई।' सिंह ने बकरी को आश्वासन दिया कि अब तुम डरो मत, निर्भय होकर रहो। रात में जब जल पीने के लिये हाथी आया तो सिंह ने हाथी से कहा-'तू इस बकरी को अपनी पीठ पर चढ़ा ले। इसको जंगल में चराकर लाया कर और हरदम अपनी पीठ पर ही रखा कर, नहीं तो तू जानता नहीं कि मैं कौन हूँ? मार डालूँगा!' सिंह की बात सुनकर हाथी थर-थर काँपने लगा। उसने अपनी सूँड़ से झट बकरी को पीठ पर चढ़ा लिया। अब वह बकरी निर्भय होकर हाथी की पीठ पर बैठे-बैठे ही वृक्षों की ऊपर की कोंपले खाया करती और मस्त रहती। खोज पकड़ सैंठे रहो, धणी मिलेंगे आय। अजया गज मस्तक चढ़े, निर्भय कोंपल खाय॥ ऐसे ही जब मनुष्य भगवान् के शरण हो जाता है, उनके चरणों का सहारा ले लेता है, तब वह सम्पूर्ण प्राणियों से, विघ्न-बाधाओं से निर्भय हो जाता है। उसको कोई भी भयभीत नहीं कर सकता, उसका कोई भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जो जाको शरणो गहै, ताकहैँ ताकी लाज। उलटे जल मछली चले, बह्यो जात गजराज॥ ----------:::×:::---------- -कल्याण (९४|२) "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

+5 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB