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Ramesh agrawal Dec 7, 2021

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#मन को वश में #करना* मन को वश करके प्रभु चरणों में लगाना बड़ा ही कठिन है। शुरुआत में तो यह इसके लिये तैयार ही नहीं होता है । लेकिन इसे मनाएं कैसे? एक शिष्य थे । किन्तु उनका मन किसी भी भगवान की साधना में नही लगता था। साधना करने की इच्छा भी मन मे थी । वे गुरु के पास गये और कहा कि गुरुदेव मन लगता नहीं और साधना करने का मन होता है । कोई ऐसी साधना बताएं जो मन भी लगे और साधना भी हो जाये । गुरु ने कहा तुम कल आना । दुसरे दिन वह गुरु के पास पहुँचा तो गुरु ने कहा । सामने रास्ते में कुत्ते के छोटे बच्चे हैं उनमे से दो बच्चे उठा ले आओ और उनकी हफ्ताभर देखभाल करो । गुरु के इस अजीब आदेश को सुनकर वह भक्त चकरा गया लेकिन क्या करे, गुरु का आदेश जो था। वह 2 पिल्लों को पकड़ कर लाया लेकिन जैसे ही छोड़ा वे भाग गये।वह फिरसे पकड़ लाया लेकिन वे फिर भागे । अब उसने उन्हें पकड़ लिया और दूध रोटी खिलायी ।अब वे पिल्ले उसके पास रमने लगे। हप्ताभर उन की ऐसी सेवा यत्न पूर्वक की कि अब वे उसका साथ छोड़ नही रहे थे ।वह जहाँ भी जाता पिल्ले उसके पीछे-पीछे भागते। यह देख गुरु ने दूसरा आदेश दिया कि इन पिल्लों को भगा दो।भक्त के लाख प्रयास के बाद भी वह पिल्ले नहीं भागे । तब गुरु ने कहा देखो बेटा !शुरुआत मे ये बच्चे तुम्हारे पास रुकते नहीं थे । लेकिन जैसेही तुमने उनके पास ज़्यादा समय बिताया ये तुम्हारे बिना रहनें को तैयार नहीं हैं। ठीक इसी प्रकार खुद जितना ज़्यादा वक्त भगवान के पास बैठोगे, मन धीरे-धीरे भगवान की सुगन्ध,आनन्द से उनमें रमता जायेगा। हम अक्सर चलती-फिरती पूजा करते है,तो भगवान में मन कैसे लगेगा? जितनी ज्यादा देर ईश्वर के पास बैठोगे उतना ही मन ईश्वर रस का मधुपान करेगा और एक दिन ऐसा आएगा कि उनके बिना आप रह नही पाओगे । शिष्य को अपने मन को वश में करने का मर्म समझ में आ गया और वह गुरु आज्ञा से भजन सुमिरन करने चल दिया। *बिन गुरु ज्ञान कहां से पाऊं* ।। *।।जय जय श्री राम।।*

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Meena Sharma Dec 6, 2021

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Meena Sharma Dec 6, 2021

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sn vyas Dec 6, 2021

*श्रीराम ने क्यों ली जल समाधि???* अयोध्या आगमन के बाद राम ने कई वर्षों तक अयोध्या का राजपाट संभाला और इसके बाद गुरु वशिष्ठ व ब्रह्मा ने उनको संसार से मुक्त हो जाने का आदेश दिया। एक घटना के बाद उन्होंने सरयू नदी में जल समाधि ले ली थी। अश्विन पूर्णिमा के दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने अयोध्या से सटे फैजाबाद शहर के सरयू किनारे जल समाधि लेकर महाप्रयाण किया। श्रीराम ने सभी की उपस्थिति में ब्रह्म मुहूर्त में सरयू नदी की ओर प्रयाण किया उनके पीछे थे उनके परिवार के सदस्य भरत,शत्रुघ्न,उर्मिला, मांडवी और श्रुतकीर्ति। ॐ का उच्चारण करते हुए वे सरयू के जल में एक एक पग आगे बढ़ते गए और जल उनके हृदय और अधरों को छूता हुआ सिर के उपर चढ़ गया। क्यों ली जल समाधि : यमराज यह जानते थे कि भगवान की इच्छा के बिना भगवान न तो स्वयं शरीर का त्याग करेंगे और न शेषनाग के अंशावतार लक्ष्मण जी। ऐसे में यमराज ने एक चाल चली। एक दिन यमराज किसी विषय पर बात करने भगवान राम के पास आ पहुंचे। भगवान राम ने जब यमराज से आने का कारण पूछा तो यमराज ने कहा कि आपसे कुछ जरूरी बातें करनी है। भगवान राम यमराज को अपने कक्ष में ले गए। यमराज ने कहा कि मैं चाहता हूं कि जब तक मेरी और आपकी बात हो उस बीच कोई इस कक्ष में नहीं आए। यमराज ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए क‌हा कि अगर कोई बीच में आ जाता है तो आप उसे मृत्युदंड देंगे। भगवान राम ने यमराज की बात मान ली और यह सोचकर कि लक्ष्मण उनके सबसे आज्ञाकारी हैं इस लिए उन्होंने लक्ष्मण जी को पहरे पर बैठा दिया। यमराज और राम जी की बात जब चल रही थी उसी समय दुर्वासा ऋषि अयोध्या पहुंच गए और राम जी से तुरंत मिलने की इच्छा जताई। लक्ष्मण जी ने कहा कि भगवान राम अभी यमराज के साथ विशेष चर्चा कर रहे हैं। भगवान की आज्ञा है कि जब तक उनकी बात समाप्त नहीं हो जाए कोई उनके कक्ष में नहीं आए। इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप कुछ समय प्रतीक्षा करें। ऋषि दुर्वासा लक्ष्मण जी की बातों से क्रोधित हो गए और कहा कि अभी जाकर राम से कहो कि मैं उनसे मिलना चाहता हूं अन्यथा मैं पूरी अयोध्या को नष्ट होने का शाप दे दूंगा। लक्ष्मण जी ने सोचा कि उनके प्राणों से अधिक महत्व उनके राज्य और उसकी जनता का है इसलिए अपने प्राणों का मोह छोड़कर लक्ष्मण जी भगवान राम के कक्ष में चले गए। भगवान राम लक्ष्मण को सामने देखकर हैरान और परेशान हो गए। भगवान राम ने लक्ष्मण से पूछा कि यह जानते हुए भी कि इस समय कक्ष में प्रवेश करने वाले को मृत्युदंड दिया जाएगा,तुम मेरे कक्ष में क्यों आए हो ?। लक्ष्मण जी ने कहा कि दुर्वासा ऋषि आपसे अभी मिलना चाहते हैं। उनके हठ के कारण मुझे अभी कक्ष में आना पड़ा है। राम जी यमराज से अपनी बात पूरी करके जल्दी से ऋषि दुर्वासा से मिलने पहुंचे। यमराज अपनी चाल में सफल हो चुके थे। राम जी से यमराज ने कहा कि आप अपने वचन के अनुसार लक्ष्मण को मृत्युदंड दीजिये। भगवान राम अपने वचन से विवश थे। रामजी सोच में थे कि अपने प्राणों से प्रिय भाई को कैसे मृत्युदंड दिया जाए। राम जी ने अपने गुरू ववशिष्ठ जी से इस विषय में बात की तो गुरु ने बताया कि अपनों का त्‍याग मृत्युदंड के समान ही होता है। इसलिए आप लक्ष्मण को अपने से दूर कर दीजिये, यह उनके लिए मृत्युदंड के बराबर ही सजा होगी। जब राम जी ने लक्ष्मण को अपने से दूर जाने के लिए कहा तो लक्ष्मण जी ने कहा कि आपसे दूर जाकर तो मैं यूं भी मर जाऊंगा। इसलिए अब मेरे लिए उचित है कि मैं आपके वचन की लाज रखूं। लक्ष्मण जी भगवान राम को प्रणाम करके राजमहल से चल पड़े और सरयू नदी में जाकर जल समाधि ले ली। इस तरह राम और लक्ष्मण दोनों ने अपने-अपने वचनों और कर्तव्य का पालन किया। इसल‌िए कहते— *‘रघुकुल रीति सदा चली आई।* *प्राण जाय पर वचन न जाई।* 💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐 श्रीरामचन्द्र रघुपङ्गव राजवर्य राजेन्द्र राम रघुनायक राघवेश। राजाधिराज रघुनन्दन रामचंद्र दासोsहमद्य भवत: शरणागतोsस्मि।। मंगलार्थ महीपाल नीराजनमिदं हरे। संगृहाण जगन्नाथ रामचंद्र नमोस्तु ते।। ऊँ परिकरसहिताय श्रीसीतारामचंद्राय कर्पूरारार्तिक्यं समर्पयामि। नमो देवाधिदेवाय रघुनाथाय शार्गिणे। चिन्मयानन्तरूपाय सीताया: पतये नम:।। 💐 *ॐ—परिकरसहिताय—श्रीरामचंद्राय* 💐 *पुष्पांजलि—समर्पयामि।* 💐💐💐💐 💐 💐 💐 💐 💐 💐💐 जयति पुण्य सनातन संस्कृति💐 जयति पुण्य भूमि भारत💐 जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रं💐 सदा सर्वदासुमङ्गल💐 ॐ हर हर हर महादेव💐 आदिअनादि अनन्तशिवहर💐 सर्वज्ञ शङ्कर💐 जयभवानी💐 जयश्रीराम💐

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एक और जहा भगवान् विष्णु जी का कृष्णा अवतार जग विख्यात हैं वही दूसरी और श्री राम का अवतार भी विश्व प्रसिद्ध हैं। रघुकुल में जन्मे मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम जी, अयोध्या के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बड़े पुत्र थे। इनके तीन भाई लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न थे तथा इनकी पत्नी का नाम सीता था। बजरंगबली या हनुमान जी इनके प्रिये भक्त हैं, इनका परिवार आदर्श भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करता हैं। वे स्वाभाव से भी बहुत विनम्र थे और उनके शौर्य, शालीनता व मर्यादा की दुहाई हर कोई देता था। वही दूसरी तरफ वे एक कुशल शासक और महान शक्तिशाली यौद्धा के साथ जन प्रिय राजा भी थे। उनकी प्रजा को उनसे बहुत स्नेह था और श्री राम भी अपनी प्रजा से बहुत प्यार करते थे, इसलिए जब लंकापति रावण का वध कर लंका से भगवान् राम, माता सीता और लक्ष्मण चौदह वर्ष के वनवास से अयोद्धया लोटे तो नगरवासियों ने चारो तरफ घी के दिए जलाकर उनका स्वागत किया, और इस दिन को आज भी हम सभी दिवाली के रूप में मनाते हैं। श्री राम ने सदैव सत्य और धर्म के मार्ग पर अग्रसर रहते हुए जन कल्याण किया और अपनी प्रजा के प्रिय रहे। आज भी करोड़ो हिन्दू भक्तों के लिए पुरुषोतम भगवान जय श्री राम आस्था और विश्वास का केंद्र हैं।

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