
प्रशांत कुमार मिश्रा
4 days ago
रामचरित: उत्तरकाण्ड ;दोहा २८. कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउॅं कर जोरि | बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि || अर्थात् तुलसीदासजी कहते हैं कि चलते समय सुग्रीव ने हनुमानजी से कहा कि हे पवनकुमार ! तुम पुण्य की राशि हो , जो भगवान् ने तुम्हें अपनी सेवा के लिए रख लिया ; अंगद ने भी कहा कि हे हनुमान ! सुनो , मैं तुमसे हाथ जोड़कर कहता हूँ , प्रभु से मेरा दण्डवत कहना और श्री रघुनाथजी को बार- बार मेरी याद कराते रहना | तात्पर्य यह है कि पुण्य की राशि हनुमानजी को प्रभु श्रीरामजी ने अपनी सेवा के लिए अयोध्या में रख लिया , इसलिए हमें भी अपना दण्डवत प्रभु से कहने के लिए और उन्हें अपनी याद कराने के लिए हनुमानजी से विनती करते रहना चाहिए | जय जय सीताराम | | जयजय सीताराम | जयजय सीताराम |
Comments (1)

Rama Devi Sahu
Aug 21, 2026
🙏 श्रीरामचरितमानस से आज का दिव्य संदेश 🙏 “मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी॥” 🌺 अर्थ: हे प्रभु श्रीराम! मेरे लिए आप ही सब कुछ हैं। आप दीन-दुखियों के सहायक हैं और मेरे हृदय की हर बात को जानने वाले अंतर्यामी हैं। ❤️ ✨ सच्ची भक्ति वही है, जहाँ मनुष्य अपना सब कुछ प्रभु के चरणों में समर्पित कर देता है। 🌹🌹🌹🙏🙏🌹🌹🌹