B.G.Agrawal
B.G.Agrawal Nov 25, 2021

+12 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 5 शेयर

कामेंट्स

+5 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 14 शेयर

. माघ माहात्म्य अध्याय - 07 चित्रगुप्त ने उन दोनों के कर्मों की आलोचना करके दूतों से कहा कि बड़े भाई कुंडल को घोर नरक में डालो और दूसरे भाई विकुण्डल को स्वर्ग में ले जाओ जहाँ उत्तम भोग हैं तब एक दूत तो कुंडल को नरक में फेंकने के लिए ले गया और दूसरा दूत बड़ी नम्रता से कहने लगा कि हे विकुण्डल! चलो तुम अच्छे कर्मों से स्वर्ग को प्राप्त होकर अनेक प्रकार के भोगों को भोगों तब विकुण्डल बड़े विस्मय के साथ मन में संशय धारकर दूत से कहने लगा कि हे यमदूत! मेरे मन में बड़ी भारी शंका उत्पन्न हो गई है अतएव मैं तुमसे कुछ पूछता हूँ कृपा कर के मेरे प्रश्नों का उत्तर दो। हम दोनों भाई एक ही कुल में उत्पन्न हुए, एक जैसे ही कर्म करते रहे, दोनों भाइयों ने कभी कोई शुभ कार्य नहीं किया फिर एक को नरक क्यों और दूसरे को स्वर्ग किस कारण प्राप्त हुआ? मैं अपने स्वर्ग में आने का कोई कारण नहीं देखता तब यमदूत कहने लगा कि हे विकुण्डल! माता-पिता, पुत्र, पत्नी, भाई, बहन से सब संबंध जन्म के कारण होते हैं और जन्म, कर्म को भोगने के लिए ही प्राप्त होता है। जिस प्रकार एक वृक्ष पर अनेक पक्षियों का आगमन होता है उसी तरह इस संसार में पुत्र, भाई, माता, पिता का भी संगम होता है। इनमें से जो जैसे-जैसे कर्म करता है वैसे ही फल भोगता है। तुम्हारा भाई अपने पाप कर्मों से नरक में गया तुम अपने पुण्य कर्म के कारण स्वर्ग में जा रहे हो तब विकुण्डल ने आश्चर्य से पूछा कि मैंने तो आजन्म कोई धर्म का कार्य नहीं किया सदैव पापों में ही लगा रहा। मैं अपने पुण्य के कर्म को नहीं जानता, यदि तुम मेरे पुण्य के कर्म को जानते हो तो कृपा कर के बताइए तब देवदूत कहने लगा कि मैं सब प्राणियों को भली-भाँति जानता हूँ, तुम नहीं जानते। सुनो, हरिमित्र का पुत्र सुमित्र नाम का ब्राह्मण था जिसका आश्रम यमुना नदी के दक्षिणोत्तर दिशा में था। उसके साथ जंगल में ही तुम्हारी मित्रता हो गई और उसके साथ तुमने दो बार माघ मास में श्री यमुना जी में स्नान किया था। पहली बार स्नान करने से तुम्हारे सब पाप नष्ट हो गए और दूसरी बार स्नान करने से तुमको स्वर्ग प्राप्त हुआ। सो हे वैश्यवर! तुमने दो बार माघ मास में स्नान किया इसी के पुण्य के फल से तुमको स्वर्ग प्राप्त हुआ और तुम्हारा भाई नरक को प्राप्त हुआ। दत्तात्रेय जी कहने लगे कि इस प्रकार वह भाई के दुखों से अति दुखित होकर नम्रतापूर्वक मीठे वचनों से दूतों से कहने लगा कि हे दूतों! सज्जन पुरुषों के साथ सात पग चलने से मित्रता हो जाती है और यह कल्याणकारी होती है। मित्र प्रेम की चिन्ता न करते हुए तुम मुझको इतना बताने की कृपा करो कि कौन-से कर्म से मनुष्य यमलोक को प्राप्त नहीं होता क्योंकि तुम सर्वज्ञ हो ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 24 शेयर
Ramesh soni Jan 23, 2022

+41 प्रतिक्रिया 29 कॉमेंट्स • 8 शेयर
D,RAM Jan 21, 2022

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 0 शेयर

. माघ माहात्म्य अध्याय - 06 पूर्व समय में सतयुग के उत्तम निषेध नामक नगर में हेमकुण्डल नाम वाला कुबेर के सदृश धनी वैश्य रहता था। जो कुलीन, अच्छे काम करने वाला, देवता, अग्नि और ब्राह्मण की पूजा करने वाला, खेती का काम करता था। वह गौ, घोड़े, भैंस आदि का पालन करता था। दूध, दही, छाछ, गोबर, घास, गुड़, चीनी आदि अनेक वस्तु बेचा करता था जिससे उसने बहुत सा धन इकठ्ठा कर लिया था। जब वह बूढ़ा हो गया तो मृत्यु को निकट समझकर उसने धर्म के कार्य करने प्रारंभ कर दिए। भगवान विष्णु का मंदिर बनवाया। कुंआ, तालाब, बावड़ी, आम, पीपल आदि वृक्ष के तथा सुन्दर बाग-बगीचे लगवाए। सूर्योदय से सूर्यास्त तक वह दान करता, गाँव के चारों तरफ जल की प्याऊ लगवाई। उसने सारे जन्म भर जितने भी पाप किए थे उनका प्रायश्चित करता था। इस प्रकार उसके दो पुत्र उत्पन्न हुए जिनका नाम उसने कुंडल और विकुण्डल रखा। जब दोनों लड़के युवावस्था के हुए तो हेमकुण्डल वैश्य गृहस्थी का सब कार्य सौंपकर तपस्या के निमित्त वन में चला गया और वहाँ विष्णु की आराधना में शरीर को सुखाकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त हुआ। उसके दोनों पुत्र लक्ष्मी के मद को प्राप्त होकर बुरे कर्मों में लग गए। वेश्यागामी वीणा और बाजे लेकर वेश्याओं के साथ गाते-फिरते थे। अच्छे सुन्दर वस्त्र पहनकर सुगंधित तेल आदि लगाकर, भांड और खुशामदियों से घिरे हुए हाथी की सवारी और सुन्दर घरों में रहते थे। इस प्रकार ऊपर बोए बीज के सदृश वह अपने धन को बुरे कामों में नष्ट करते थे। कभी किसी सत पात्र को दान आदि नहीं करते थे न ही कभी हवन, देवता या ब्रह्माजी की सेवा तथा विष्णु का पूजन ही करते थे। थोड़े दिनों में उनका सब धन नष्ट हो गया और वह दरिद्रता को प्राप्त होकर अत्यन्त दुखी हो गए। भाई, जन, सेवक, उपजीवी सब इनको छोड़कर चले गए तब इन्होंने चोरी आदि करना आरंभ कर दिया और राजा के भय से नगर को छोड़कर डाकुओं के साथ वन में रहने लगे और वहाँ अपने तीक्ष्ण बाणों से वन के पक्षी, हिरण आदि पशु तथा हिंसक जीवों को मारकर खाने लगे। एक समय इनमें से एक पर्वत पर गाय जिसको सिंह मारकर खा गया और दूसरा वन को गया जो काले सर्प के डसने से मर गया तब यमराज के दूत उन दोनों को बाँधकर यम के पास लाए और कहने लगे कि महाराज इन दोनों पापियों के लिए क्या आज्ञा है? ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे" " कुमार रौनक कश्यप " ********************************************

+3 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 1 शेयर

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 4 शेयर

+12 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 23 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB