((🦚श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा🦚)) 🌹********************************🌹 🦚🌹🌻सुप्रभात🌻🌹🦚 🦚🎂🌹जय श्री कृष्ण🌹🎂🦚 🔱🌿🛕ॐ नमः शिवाय🛕🌿🔱 🦚🎂🏵️शुभ कृष्ण जन्माष्टमी🏵️🎂🦚 🦚🌺🥗 शुभ सोमवार🥗🎂🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका दिन शुभ और मंगलमय हो🌹 🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂 ((🦚श्रीकृष्ण के जन्म की पौराणिक कथा🦚) 🌹********************************🌹 🎎भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था। यह तिथि उसी शुभ घड़ी की याद दिलाती है और सारे देश में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। एक समय कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था। रास्ते में आकाशवाणी हुई- 'हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।' यह सुनकर कंस वसुदेव को मारने के लिए उद्यत हुआ। तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- 'मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। बहनोई को मारने से क्या लाभ है?' कंस ने देवकी की बात मान ली और मथुरा वापस चला आया। उसने वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। अब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। उन्होंने वसुदेव-देवकी के दुखी जीवन को देख आठवें बच्चे की रक्षा का उपाय रचा। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ 'माया' थी। जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- 'अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं। तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।' उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए। अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।' यह है कृष्ण जन्म की कथा। 🦚🌹जय श्री कृष्ण 🌹🦚

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🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@ranveersoni 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@shreeshukla 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@kantakamra 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@pinudhiman 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@pinudhiman 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@amishraji 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@seemavalluvar1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@anupkumar38 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@sanjayparashar7 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@kamalamaheshwar 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@madhubenpatel1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@manojm 🦚शुभरात्रि वंदन भाई🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@muneshtyagi1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@sanju229 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

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@sanjay.aggarwal.11 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@sanjayawasthi7 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@brajeshsharma1 🦚शुभरात्रि वंदन जी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@radhekrishna14 🦚शुभरात्रि वंदन दीदी🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका रात्रि शुभ और मंगलमय हो🌹

sachin jain Nov 25, 2021

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सप्तम: स्कन्ध: अथैकादशोऽध्यायः मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच श्रुत्वेहितं साधुसभासभाजितं महत्तमाप्रण्य उरुक्रमात्मनः । युधिष्ठिरो दैत्यपतेर्मुदा युतः पप्रच्छ भूयस्तनयं स्वयम्भुवः ॥ १ युधिष्ठिर उवाच भगवज्छ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं सनातनम्। वर्णाश्रमाचारयुतं यत् पुमान्विन्दते परम् ॥ २ भवान्प्रजापतेः साक्षादात्मजः परमेष्ठिनः । सुतानां सम्मतो ब्रह्मंस्तपोयोगसमाधिभिः ॥ ३ नारायणपरा विप्रा धर्मं गुह्यं परं विदुः । करुणा: साधवः शान्तास्त्वद्विधा न तथापरे ॥ ४ नारद उवाच नत्वा भगवतेऽजाय लोकानां धर्महेतवे । वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ५ योऽवतीर्यात्मनोंऽशेन दाक्षायण्यां तु धर्मतः । लोकानां स्वस्तयेऽध्यास्ते तपो बदरिकाश्रमे ॥६ धर्ममूलं हि भगवान्सर्ववेदमयो हरिः । स्मृतं च तद्विदां राजन्येन चात्मा प्रसीदति ॥७ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं- भगवन्मय प्रह्लादजी के साधुसमाज में सम्मानित पवित्र चरित्र सुनकर संतशिरोमणि युधिष्ठिर को बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने नारदजी से और भी पूछा।।१।। युधिष्ठिरजी ने कहा – भगवन् ! अब मैं वर्ण और आश्रमों के सदाचार के साथ मनुष्यों के सनातनधर्म का श्रवण करना चाहता हूँ, क्योंकि धर्म से ही मनुष्य को ज्ञान, भगवत् प्रेम और साक्षात् परम पुरुष भगवान्‌ की प्राप्ति होती है ॥ २ ॥ आप स्वयं प्रजापति ब्रह्माजी के पुत्र हैं और नारदजी ! आपकी तपस्या, योग एवं समाधि के कारण वे अपने दूसरे पुत्रों की अपेक्षा आपका अधिक सम्मान भी करते हैं ॥ ३ ॥ आपके समान नारायण-परायण, दयालु, सदाचारी और शान्त ब्राह्मण धर्म के गुप्त-से- गुप्त रहस्य को जैसा यथार्थरूप से जानते हैं, दूसरे लोग वैसा नहीं जानते ॥ ४ ॥ नारदजी ने कहा- युधिष्ठिर! अजन्मा भगवान् ही समस्त धर्मोकि मूल कारण हैं। वही प्रभु चराचर जगत् के कल्याण के लिये धर्म और दक्षपुत्री मूर्ति के द्वारा अपने अंश से अवतीर्ण होकर बदरिकाश्रम में तपस्या कर रहे हैं। उन नारायण भगवान्‌ को नमस्कार करके उन्हीं के मुख से सुने हुए सनातन धर्म का मैं वर्णन करता हूँ ॥ ५-६ ।। युधिष्ठिर ! सर्ववेदस्वरूप भगवान् श्रीहरि, उनका तत्त्व जानने वाले महर्षियों की स्मृतियाँ और जिससे आत्मग्लानि न होकर आत्मप्रसाद की उपलब्धि हो, वह कर्म धर्म के हैं मूल है ॥ ७ ॥ क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (छठा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 8 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ देवताओं का बृहस्पतिजी से परामर्श, बृहस्पतिजी की सम्पति के अनुसार कार्य-सम्पादन, इन्द्राणी पर देवी की कृपा, नहुष का मुनियों की पालकी पर सवार होना और मुनि के शाप से नहुष का पतन तथा उसे सर्प-योनि की प्राप्ति... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं - देवताओं की बात सुनकर बृहस्पतिजी ने उन्हें उत्तर दिया- "परम साध्वी शची मेरे यहाँ शरणार्थी बनकर आयी हैं। मैं इनका त्याग नहीं करूँगा। एक उपाय है- एक बार शची राजा नहुष के सामने जायँ और उससे कहें कि 'मैं तुम्हारी सेवा अवश्य करूँगी; परंतु पहले यह पता लगा लूँ कि मेरे पति जीवित तो नहीं हैं। सम्भव है, मेरे पतिदेव इन्द्र जीवित हों; ऐसी स्थिति में मैं दूसरे को कैसे स्वामी बना सकती हूँ। अतः उन महाभाग को खोजने के लिये एक बार मेरे लिये वापस लौटना आवश्यक है।' इन्द्राणी को चाहिये कि इस प्रकार कहकर नहुष को धोखे में डाल दे, फिर जैसा मैं बताऊँ, उसके अनुसार पतिदेव को ले आने का प्रयत्न करना चाहिये।" इस प्रकार आपस में परामर्श करके जितने भी देवता थे, वे सब-के-सब शची को साथ लेकर नहुष के पास पहुँचे। जब उस बनावटी इन्द्र नहुष ने देखा कि देवता आ गये और साथ में शची भी है, तब उसके हर्ष की सीमा न रही। वह ठहाका मारकर हँसा और शची से कहने लगा – 'प्रिये! चारुलोचने! इस समय मैं इन्द्र के पदपर प्रतिष्ठित हूँ। देवताओं ने मुझे यह गौरव प्रदान किया है। अखिल भूमण्डल का शासन-सूत्र मेरे हाथ में है। अतः अब तुम मेरी सेवा में आ जाओ।' नहुष के यों कहने पर इन्द्राणी के शरीर में कँपकँपी छूट गयी। उसका हृदय आतंकित हो गया। फिर सँभलकर वे उससे कहने लगीं- 'देवेश्वर के पद पर शोभा पाने वाले नरेश! आपसे मैं एक अभिलषित वर की याचना करती हूँ। उस समय तक आप प्रतीक्षा करें – जबतक कि मैं यह निर्णय न कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं; क्योंकि इस बात का संदेह मेरे मन में बना हुआ है। अभीतक मुझे ठीक-ठीक पता ही नहीं कि उनका मरण हो गया अथवा वे कहीं चले गये।' शची ने जब इस प्रकार नहुष से कहा, तब उसके मुख पर प्रसन्नता छा गयी। 'बहुत ठीक है, ऐसा ही हो' कहकर बड़े उत्साह के साथ नहुष ने शची देवी को वहाँ से जाने की आज्ञा दे दी। उससे छुटकारा पाने पर इन्द्राणी तुरंत देवताओं के पास गयीं और उनसे कहा ‘आपलोग बड़े उद्यमशील पुरुष हैं। अब मेरे पतिदेव को यहाँ लौटा लाने का प्रयत्न कीजिये ।' शची देवी के इस पवित्र एवं मधुर वचन को सुनकर देवता बड़ी सावधानी के साथ इन्द्र के विषय में विचार करने लगे। जय माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (दोसौ उनसठवाँ दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय हेमहस्त्तिरथ दान की विधि...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं – महाराज! अब इसके बाद मैं मङ्गलमय सुवर्णनिर्मित हस्तिरथदान का वर्णन कर रहा हूँ, जिससे मनुष्य विष्णुलोक में जाता है। किसी पुण्यतिथि के आने पर संक्रान्ति या ग्रहणकाल में बुद्धिमान् यजमान को मणियों से सुशोभित देवताओं के रथ के आकार का सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियों से युक्त हो, बनवाना चाहिये। उसमें स्वर्णनिर्मित चार श्रेष्ठ हाथी भी रहने चाहिये। उस रथ को कृष्णमृगचर्म के ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिव की प्रतिमाओं से युक्त हो । उसके मध्यभाग में लक्ष्मी सहित विष्णुभगवान्‌ की भी मूर्ति होनी चाहिये। उसके ध्वज पर गरुड तथा जुआ के अग्रभाग पर विनायक को स्थापित करना चाहिये। वह नाना प्रकार के फलों से युक्त हो और उसके ऊपर चँदोवा तना हो। वह पँचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पों से सुशोभित हो । नरोत्तम! अपनी शक्ति के अनुसार उस रथ को पाँच पल से ऊपर सौ पल सोने तक का बनवाना चाहिये । इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा माङ्गलिक शब्दों के उच्चारण के साथ स्नान कराया गया यजमान देवताओं और पितरों की अभ्यर्चना करे। अञ्जलि में फूल लेकर तीन बार रथ की प्रदक्षिणा करे तथा सम्पूर्ण सुखों को प्रदान करने वाले इन मन्त्रों का उच्चारण करे नमो नमः शङ्करपद्मजार्क लोकेशविद्याधरवासुदेवैः त्वं सेव्यसे वेदपुराणयज्ञै स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात् ॥ यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारे रानन्दहेतुगुणरूपविमुक्तवन्तम् योगैकमानसदृशो मुनयः समाधौ पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ ॥ यस्मात् त्वमेव भवसागरसम्प्लुताण्ड • मानन्दभारमृतमध्वरपानपात्रम् तस्मादघौघशमनेन कुरु प्रसादं चामीकरेभरथ माधव सम्प्रदानात् ॥ (उत्तरपर्व १८९ । ९-११) ‘तेजोमय स्यन्दन! शंकर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। रथाधिरूढ स्वामिन् ! जो पद परम गुह्यतम, सनातन, आनन्द का हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टि वाले मुनिगण जिसका समाधिकाल में दर्शन करते हैं, वह आप ही हैं। माधव! चूँकि आप ही भवसागर में डूबने वालों के लिये आनन्द के पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञों में पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथ के दान से मेरे पापपुञ्जों को नष्टकर मुझ पर कृपा कीजिये ।' जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथ-दान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और विद्याधर, देवगण एवं मुनीन्द्रगणों द्वारा सेवित इन्द्रियातीत भगवान् शिव के लोक को प्राप्त करता है तथा अपने बन्धुओं, पितरों, पुत्रों एवं सम्पूर्ण बान्धवों को विष्णुभगवान्‌ के शाश्वत लोक में ले जाता है। जय श्रीराम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (दो सौ उन्नीसवाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः आत्मा या ब्रह्म को समता, सर्वरूपता तथा द्वैतशून्यता का प्रतिपादन; जीवात्मा की ब्रह्मभावना से संसार- निवृत्ति का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— रघुनन्दन ! सर्वत्र व्यापक परमात्मा एक होता हुआ ही सभी रूपों में विराजमान है। उसमें अज्ञानवश ही अनेकता की कल्पना हुई है । ज्ञान हो जाने पर तो न वह एक है और न अनेक या सर्वरूप ही; फिर उसमें नानात्व की कल्पना कैसे हो सकती है । आदि-अन्त से रहित सारा आकाश चित्तत्व – सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा से परिपूर्ण है । फिर शरीर की उत्पत्ति और विनाश होने पर भी उस चेतन तत्त्व का खण्डन कैसे हो सकता है । अमावास्या के बाद जब प्रतिपदा को चन्द्रमा की एक कला उदित होती है, तब समुद्र आनन्द के मारे उछलने लगता है और जब प्रलयकाल की प्रचण्ड वायु चलती है, तब वह सूख जाता है। परंतु आत्मतत्त्व कभी किसी अवस्था में न तो क्षुब्ध होता है और न क्षीण ही होता है । वह सदा समभाव से सौम्य बना रहता है। जैसे नाव पर यात्रा करने वाले पुरुष को स्थावर वृक्ष और पर्वत आदि चलते-से प्रतीत होते हैं तथा जैसे सीपी में लोगों को चाँदी का भ्रम होता है, उसी प्रकार चित्त को चिन्मय परमात्मा में देहादिरूप जगत् की प्रतीति होती है। यह शरीर आदि चित्त की कल्पना है और शरीर आदि की दृष्टि से चित्त की कल्पना हुई है। इसी प्रकार देह और चित्त दोनों की दृष्टि से जीवभाव की कल्पना हुई है । वास्तव में ये सब-के-सब परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मा में बिना हुए हो प्रतीत होते हैं अथवा ये सब-के-सब चिन्मय परम तत्त्व से भिन्न नहीं हैं; ऐसी दशा में द्वैत कहाँ रहा: परब्रह्म परमात्मा का यथार्थ ज्ञान होने पर यह सब कुछ एकमात्र शान्त स्वरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है । अतः ब्रह्म के सिवा जगत् आदि दूसरा कोई पदार्थ नहीं है और न दूसरी कोई भ्रान्ति ही है । रघुनन्दन वासनायुक्त जीवात्मा की भावना से जगत् सम्पत्ति का प्रादुर्भाव होता है और वासनाशून्य जीवात्मा की ब्रह्मभावना से संसार को निवृत्ति होती है । जीवात्मा का जो वासनारहित विशुद्ध स्पन्दन (भावना ) है, उसे स्पन्दन माना ही नहीं गया है, जैसे समुद्र में भँवर आदि के द्वारा भीतर घुसती हुई तरङ्ग स्पन्दनशील होने पर भी स्पन्दनशून्य ही मानी जाती है। किंतु जन्म की कारणभूता जो जीवात्मा की दृश्यभावना है, उसके भीतर जो वासनारस विद्यमान है, वही अङ्कर प्रकट करता है; अतः उसी को असङ्गरूप अग्नि से जलाकर भस्म कर देना चाहिये। मनुष्य कर्म करता हो या न करता हो; परंतु शुभाशुभ कार्यों में वह जो मन से डूब नहीं जाता, उसकी इस अनासक्ति को ही विद्वान् पुरुष असङ्ग मानते हैं अथवा वासना को उखाड़ फेंकना ही असङ्ग कहा गया है । अहंभाव का त्याग करना ही संसार-सागर से पार होना है और उसी का नाम वासनाक्षय है । इसके लिये अपने पुरुषार्थ के सिवा दूसरी कोई गति नहीं है। श्रीराम ! तुम तो आत्माराम और पूर्णकाम हो ही । सारी इच्छाओं से रहित निश्शङ्क हो समस्त कार्य करते हुए भी केवल अपने चिन्मय स्वरूप में ही स्थित हो । भय तुमसे सदा दूर ही रहता है । अतः अपनी सहज शान्ति के द्वारा सबके मनोऽभिराम बने रहो। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Rameshannd Guruji Nov 26, 2021

भैरव की उत्पत्ति । 🌹🙏जय श्री काल भैरवनाथ संकलित : ----रमेशानंद गुरुजी ब्रह्मा और विष्णु में एक समय विवाद छिड़ा कि परम तत्व कौन है ?उस समय वेदों से दोनों ने पूछा : - क्योंकि वेद ही प्रमाण माने जाते हैं ।वेदों ने कहा कि सबसे श्रेष्ठ शंकर हैं ।ब्रह्मा जी के पहले पाँच मस्तक थे ।उनके पाँचवें मस्तक ने शिव का उपहास करते हुए , क्रोधित होते हुए कहा कि रुद्र तो मेरे भाल स्थल से प्रकट हुए थे , इसलिए मैंने उनका नाम " रुद्र ' रखा है । अपने सामने शंकर को प्रकट हुए देख उस मस्तक ने कहा कि हे बेटा !तुम मेरी शरण में आओ , मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा । ( स्कंद पुराण , काशी खण्ड अध्याय ३० ) भैरव का नामकरण इस प्रकार गर्व युक्त ब्रह्मा जी की बातें सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे और अपने अंश से भैरवाकृति को प्रकट किया ।शिव ने उससे कहा कि " काल भैरव ' ! तुम इस पर शासन करो । साथ ही उन्होंने कहा कि तुम साक्षात " काल ' के भी कालराज हो ।तुम विश्व का भरण करने में समर्थ होंगे , अतः तुम्हारा नाम " भैरव ' भी होगा । तुमसे काल भी डरेगा , इसलिए तुम्हें “ काल भैरव ' भी कहा जाएगा । दुष्टात्माओं का तुम नाश करोगे , अतः तुम्हें “ आमर्दक ' नाम से भी लोग जानेंगे ।हमारे और अपने भक्तों के पापों का तुम तत्क्षण भक्षण करोगे , फलतः तुम्हारा एक नाम " पापभक्षण ' भी होगा । श्री तत्वनिधि नाम तंत्र - मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है , क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं ' भ ' अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है , भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिकसूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है ।वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष , बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं ।' र ' अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं ।उनके वस्त्र लाल हैं ।सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग , खेट ।( मूसल ) , अंकुश , गदा , पाश , शूल , वर तथा अभय धारण किए हुए ' व ' अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक सामान श्वेत हैं ।वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है ।विकसित कमल पुष्प उनका आसन है ।वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल , वर एवं अभय धारण करती हैं । स्कंदपुराण के काशी - खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है ।गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए , तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी ' काशी ' में आकर दोष मुक्त हुए ।ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं - महाभैरव , संहार भैरव , असितांग भैरव , रूरू भैरव , काल भैरव , क्रोध भैरव , ताम्रचूड भैरव , चंद्रचूड भैरव ।लेकिन इसी पुराण के गणपति - खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है ।तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग , रूरू , चंड , क्रोध , उन्मत्त , कपाली , भीषण संहार नाम वाले हैं ।भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं ।शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है ।इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है ।ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है । 🌹🙏जय श्री काल भैरवनाथ🌹🙏 🌹🙏रमेशानन्द गुरूजी

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sn vyas Nov 26, 2021

*‼️महाभारत की अनसुनी कथाएं‼️* ---------------------- *🏹कौरवोंके विनाशके कारण शकुनी🏹* ---------------------- *एक साधु के कहे अनुसार गांधारी का विवाह पहले एक बकरे के साथ किया गया था। बाद मैं उस बकरे की बलि दे दी गयी थी।* *यह बात गांधारी के विवाह के समय छुपाई गयी थी। जब ध्रतराष्ट्र को इस बात का पता चला तो उसने गांधार नरेश सुबाला और उसके 100 पुत्रों को कारावास मैं डाल दिया और काफी यातनाएं दी।* *एक एक करके सुबाला के सभी पुत्र मरने लगे। उन्हैं खाने के लिये सिर्फ मुट्ठी भर चावल दिये जाते थे।* *सुबाला ने अपने सबसे छोटे बेटे शकुनि को प्रतिशोध के लिये तैयार किया।* *सब लोग अपने हिस्से के चावल शकुनि को देते थे ताकि वह जीवित रह कर कौरवों का नाश कर सके।* *मृत्यु से पहले सुबाला ने ध्रतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की बिनती की जो ध्रतराष्ट्र ने मान ली।* *सुबाला ने शकुनि को अपनी रीढ़ की हड्डी के पासे बनाने के लिये कहा, वही पासे कौरव वंश के नाश का कारण बने।* *शकुनि ने हस्तिनापुर में सबका विश्वास जीता और 100 कौरवों का अभिवावक बना।* *उसने ना केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भडकाया बल्कि महाभारत के युद्ध का आधार भी बनाया।* *🙏 जय श्री कृष्ण🙏*

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Dharampal Singh35678 Nov 27, 2021

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