Sudha Mishra
Sudha Mishra Nov 27, 2021

Jai Shri Ram Jai hanuman ji🙏🙏🌹🌹🌹🌹🌹

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कामेंट्स

GOVIND CHOUHAN Nov 27, 2021
Jai Shree Ram 🌷 Jai Siyaram 🌷 Jai Jai Jai Bajarang Bali 🌷🙏🙏 Shubh Raatri Vandan Jiii 🙏🙏

U. S. Pandey Nov 27, 2021
‼️🙏‼️🚩🕉हं हनुमते नमः। ‼️🙏‼️🚩🕉🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣🤣हा हा हा हा हा हा,, बडी़ मुश्किल मे पड़ गया रावण।। ‼️🙏‼️🚩🕉जय बजरंग बली। ‼️🙏‼️🚩🕉शुभ रात्रि स्नेहानुराग बंन्दन मेरी प्यारी छोटी, बहन ‼️🙏‼️🚩🕉

Shivsanker Shukla Nov 27, 2021
शुभ रात्रि आदरणीय बहन जय श्री राम

U. S. Pandey Nov 27, 2021
‼️🙏‼️🚩🕉Very nice Post. all the best ‼️🙏‼️🚩🕉G. n. sister.

R.K.SONI (Ganesh Mandir) Nov 27, 2021
Jai Shree Ram Ji🙏 Shubh ratri vandan Ji🌹🌹🌹v. nice post ji👌👌👌🌹🌹🌹🌹🌈🌈🌈🙏🙏

sunita Nov 27, 2021
Jay shree ram Jay Jay hanuman ji suhbratri vandan sister ji 🌹🌹🙏🏻🌹🌹

Kailash Prasad Nov 27, 2021
💮🌼🌸🍀🌺🌼☘️🌼🌺🌸🌼🌺 श्रद्धा ज्ञान देती है, नम्रता मान देती है, और योग्यता स्थान देती है, और ये तीनों मिल जाएं तो व्यक्ति को हर जगह सम्मान देती है!! गुड नाईट 💮🌼🌸🍀🌺🌼☘️🌼🌺🌸🌼🌺

Sudha Mishra Nov 27, 2021
@sunita532 Jai shri radhe krishna ji Shubh Ratri Pyari Bahna ji kanha ji ki kripa sda aap pr aapke pure privar pr bani rahe jai shri krishna ji🙏🏻 🌹

patel Navin Nov 27, 2021
🙏shubh ratri vandan ji 🙏🌹🌹jai bajarangbali 🌹 🌹bajarangbali ki krapa app ke pariwar pe bana rahe 🌹👌👌👌👌👌

इष्ट के प्रति एकाग्रता 🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶 किसी जंगल मे एक गर्भवती हिरणी थी, जिसका प्रसव होने ही वाला था । उसने एक तेज धार वाली नदी के किनारे घनी झाड़ियों और घास के पास एक जगह देखी, जो उसे प्रसव हेतु सुरक्षित स्थान लगा । अचानक उसे प्रसव पीड़ा शुरु होने लगी । लगभग उसी समय आसमान में काले-काले बादल छा गए और घनघोर बिजली कड़कने लगी । जिससे जंगल मे आग भड़क उठी । हिरणी घबरा गयी । उसने अपनी दायीं ओर देखा, लेकिन यह क्या ? वहाँ एक बहेलिया उसकी तरफ तीर का निशाना लगाए हुए था । उसकी बायीं ओर भी एक शेर उस पर घात लगाये हुए उसकी ओर बढ़ रहा था । अब वो हिरणी करे तो क्या करे ? क्योंकि वह तो प्रसव पीड़ा से गुजर रही है । अब क्या होगा ? क्या वह सुरक्षित रह पाएगी ? क्या वह अपने बच्चे को जन्म दे पाएगी ? क्या वह नवजात शिशु सुरक्षित रह पाएगा ? या फिर सब कुछ जंगल की आग में जलकर राख हो जाएगा ? और यदि इनसे बच भी गयी तो क्या वह बहेलिये के तीर से बच पाएगी ? या कहीं फिर वह उस खूंखार शेर के पंजों की मार से दर्दनाक मौत मारी जाएगी ? जो उसकी ओर धीरे-धीरे बढ़ रहा है । उसके एक ओर जंगल की आग, दूसरी ओर तेजधार वाली बहती नदी और सामने उत्पन्न सभी संकट, अब वो क्या करे ? लेकिन फिर उसने आँखें बन्द करके अपना ध्यान परमात्मा पर एकाग्र करते हुए अपने नव आगंतुक बच्चे को जन्म देने की ओर केन्द्रित कर दिया । फिर जो हुआ, वह आश्चर्यजनक ही था ! कड़कड़ाती बिजली की चमक से शिकारी की आँखों के सामने अँधेरा छा गया, शिकारी अंधा हो गया, उसके हाथों से तीर चल गया और सीधे भूखे शेर को जाकर लगा, शेर मर गया । बादलों से बहुत जोर से वर्षा होने लगी और जंगल की आग धीरे-धीरे बुझ गयी । इसी बीच हिरणी ने एक स्वस्थ शावक को जन्म दिया । ऐसा ही हमारी भी जिन्दगी में होता है, जब हम चारों ओर से अनन्त समस्याओं से घिर जाते हैं, नकारात्मक विचार हमारे दिलो दिमाग को जकड़ लेते हैं, कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती, उस समय कुछ विचार बहुत ही नकारात्मक होते हैं, जो हमें चिंताग्रस्त कर हमें कुछ सोचने समझने लायक नहीं छोड़ते, बस उस समय हमें चारों तरफ से अपने मन को हटाकर, सिर्फ मन को एकाग्र करके अपने आराध्य इष्ट का स्मरण करते हुए उस हिरण की भांति अपने मुख्य लक्ष्य की तरफ ध्यान देना चाहिये । जिस प्रकार हिरणी ने सभी नकारात्मक परिस्तिथियाँ उत्पन्न होने पर भी अपना ध्यान परमात्मा में एकाग्र करके अपने मुख्य लक्ष्य *प्रसव* पर ध्यान केन्द्रित किया, जो उसकी प्रमुख प्राथमिकता थी, बाकी तो मौत या जिन्दगी कुछ भी उसके हाथ में नहीं था और उसकी कोई भी क्रिया या प्रतिक्रिया उसकी व उसके गर्भस्थ शिशु की जान ले सकती थी । उसी प्रकार हमें भी अपने मुख्य लक्ष्य की ओर ही ध्यान देना चाहिये । एकान्त में बैठकर हम अपने आपसे सवाल करें कि हमारा उद्देश्य क्या है ? मुख्य लक्ष्य क्या है, हमारा ? हमारा विश्वास, हमारी आशा क्या है ? ऐसे ही अनेक संकटों से हम घिर जायें तो हमें अपने आराध्य इष्ट को याद करना चाहिए । उस पर दृढ विश्वास करना चाहिए, जो कहीं नहीं, बल्कि हमारे हृदय में ही बसा हुआ है, जो हमारा सच्चा साथी भी है। 🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶🔹🔶

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radha Jan 26, 2022

*मां-बाप के निरादर के लिए बहु नहीं, बेटा होता है जिम्मेदार* *एक वृद्ध माँ रात को 11:30 बजे रसोई में बर्तन साफ कर रही है, घर में दो बहुएँ हैं, जो बर्तनों की आवाज से परेशान होकर अपने पतियों को सास को उल्हाना देने को कहती हैं |* *वो कहती हैं आप माँ को मना करो इतनी रात को बर्तन धोने के लिये हमारी नींद खराब होती है | साथ ही सुबह 4 बजे उठ कर फिर खट्टर पट्टर शुरू कर देती हैं सुबह 5 बजे पूजा |* *आरती करके हमें सोने नहीं देती ना रात को ना ही सुबह | जाओ सोच क्या रहे हो, जाकर माँ को मना करो |* *बड़ा बेटा खड़ा होता है और रसोई की तरफ जाता है | रास्ते में छोटे भाई के कमरे में से भी वो ही बातें सुनाई पड़ती हैं जो उसके कमरे में हो रही थी | वो छोटे भाई के कमरे को खटखटा देता है | छोटा भाई बाहर आता है |* *दोनों भाई रसोई में जाते हैं, और माँ को बर्तन साफ करने में मदद करने लगते हैं, माँ मना करती है पर वो नहीं मानते, बर्तन साफ हो जाने के बाद दोनों भाई माँ को बड़े प्यार से उसके कमरे में ले जाते हैं, तो देखते हैं पिताजी भी जागे हुए हैं |* *दोनो भाई माँ को बिस्तर पर बैठा कर कहते हैं, माँ सुबह जल्दी उठा देना, हमें भी पूजा करनी है, और सुबह पिताजी के साथ योगा भी करेंगे |* *माँ बोली ठीक है बच्चो, दोनों बेटे सुबह जल्दी उठने लगे, रात को 9:30 पर ही बर्तन मांजने लगे, तो पत्नियां बोलीं माता जी करती तो हैं आप क्यों कर रहे हो बर्तन साफ ? तो बेटे बोले हम लोगों की शादी करने के पीछे एक कारण यह भी था कि माँ की सहायता हो जायेगी। पर तुम लोग ये कार्य नहीं कर रही हो कोई बात नहीं हम अपनी माँ की सहायता कर देते हैं।* *हमारी तो माँ है इसमें क्या बुराई है, अगले तीन दिनों में घर में पूरा बदलाव आ गया | बहुएँ जल्दी बर्तन इसलिये साफ करने लगीं कि नहीं तो उनके पति बर्तन साफ करने लगेंगे | साथ ही सुबह वो भी पतियों के साथ ही उठने लगीं और पूजा आरती में शामिल होने लगीं |* *कुछ दिनों में पूरे घर के वातावरण में पूरा बदलाव आ गया | बहुएँ सास ससुर को पूरा सम्मान देने लगीं |* *माँ का सम्मान तब कम नहीं होता जब बहुऐं उनका सम्मान नहीं करतीं | माँ का सम्मान तब कम होता है जब बेटे माँ का सम्मान नहीं करते या माँ के कार्य में सहयोग ना करें ।* *जन्म का रिश्ता है। माता पिता पहले आपके हैं।*

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एक सन्यासी एक घर के सामने से निकल रहा था। एक छोटा सा बच्चा घुटने टेक कर चलता था। सुबह थी और धूप निकली थी और उस बच्चे की छायाआगे पड़ रही थी।वह बच्चा छाया में अपने सिर को पकड़ने के लिए हाथ ले जाता है, लेकिन जब तक उसका हाथ पहुँचता है छाया आगे बढ़ जाती है। बच्चा थक गया और रोने लगा। उसकी माँ उसे समझाने लगी कि पागल यह छाया है, छाया पकड़ी नहीं जाती। लेकिन बच्चे कब समझ सकते हैं कि क्या छाया है और क्या सत्य है? जो समझ लेता है कि क्या छाया है और क्या सत्य,वह बच्चा नहीं रह जाता। वह प्रौढ़ होता है। बच्चे कभी नहीं समझते कि छाया क्या है, सपने क्या हैं झूठ क्या है।वह बच्चा रोने लगा।कहा कि मुझे तो पकड़ना है इस छाया को।वह सन्यासी भीख माँगनेआया था।उसने उसकी माँ को कहा,मैं पकड़ा देता हूँ। वह बच्चे के पास गया। उस रोते हुए बच्चे की आँखों में आँसू टपक रहे थे। सभी बच्चों की आँखों से आँसू टपकते हैंज़िन्दगी भर दौड़ते हैं और पकड़ नहीं पाते। पकड़ने की योजना ही झूठी है। बूढ़े भी रोते हैं और बच्चे भी रोते हैं। वह बच्चा भी रो रहा था तो कोई नासमझी तो नहीं कर रहा था। उस सन्यासी ने उसके पास जाकर कहा,बेटे रो मत।क्या करना है तुझे? छाया पकड़नी है न?उस सन्यासी ने कहा, जीवन भर भी कोशिश करके थक जायेगा, परेशान हो जायेगा। छाया को पकड़ने का यह रास्ता नहीं है। उस सन्यासी ने उस बच्चे का हाथ पकड़ा और उसके सिर पर हाथ रख दिया।इधर हाथ सिर पर गया, उधर छाया के ऊपर भी सिर पर हाथ गया। सन्यासी ने कहा,देख, पकड़ ली तूने छाया। छाया कोई सीधा पकड़ेगा तो नहीं पकड़ सकेगा। लेकिन अपने को पकड़ लेगा तो छाया पकड़ में आ जाती है। जो अहंकार को पकड़ने को लिए दौड़ता है वह अहंकार को कभी नहीं पकड़ पाता। अहंकार मात्र छाया है। लेकिन जो आत्मा को पकड़ लेता है, अहंकार उसकी पकड़ में आ जाता है।वह तो छाया है। उसका कोई मुल्य नहीं। केवल वे ही लोग तृप्ति को, केवल वे ही लोग आप्त कामना को उपलब्ध होते हैं जो आत्मा को उपलब्ध होते हैं।

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*⚜️ आज का प्रेरक प्रसंग ⚜️* *!! अपनी क्षमता पहचानो !!* ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ एक गाँव में एक आलसी आदमी रहता था, वह कुछ काम-धाम नहीं करता था। बस दिन भर निठल्ला बैठकर सोचता रहता था कि किसी तरह कुछ खाने को मिल जाये। एक दिन वह यूं ही घूमते-घूमते आम के एक बाग़ में पहुँच गया। वहाँ रसीले आमों से लदे कई पेड़ थे। रसीले आम देख उसके मुँह में पानी आ गया और आम तोड़ने वह एक पेड़ पर चढ़ गया, लेकिन जैसे ही वह पेड़ पर चढ़ा, बाग़ का मालिक वहाँ आ पहुँचा। बाग़ के मालिक को देख आलसी आदमी डर गया और जैसे-तैसे पेड़ से उतरकर वहाँ से भाग खड़ा हुआ। भागते-भागते वह गाँव के बाहर स्थित जंगल में जा पहुँचा, वह बुरी तरह से थक गया था। इसलिए एक पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताने लगा। तभी उसकी नज़र एक लोमड़ी पर पड़ी, उस लोमड़ी की एक टांग टूटी हुई थी और वह लंगड़ाकर चल रही थी। लोमड़ी को देख आलसी आदमी सोचने लगा कि ऐसी हालत में भी जंगली जानवरों से भरे जंगल में ये लोमड़ी बच कैसे गई? इसका अब तक शिकार कैसे नहीं हुआ? जिज्ञासा में वह एक पेड़ पर चढ़ गया और वहाँ बैठकर देखने लगा कि अब इस लोमड़ी के साथ आगे क्या होगा? कुछ ही पल बीते थे कि पूरा जंगल शेर की भयंकर दहाड़ से गूंज उठा, जिसे सुनकर सारे जानवर डरकर भागने लगे, लेकिन लोमड़ी अपनी टूटी टांग के साथ भाग नहीं सकती थी, वह वहीं खड़ी रही। शेर लोमड़ी के पास आने लगा, आलसी आदमी ने सोचा कि अब शेर लोमड़ी को मारकर खा जायेगा, लेकिन आगे जो हुआ, वह कुछ अजीब था। शेर लोमड़ी के पास पहुँचकर खड़ा हो गया, उसके मुँह में मांस का एक टुकड़ा था, जिसे उसने लोमड़ी के सामने गिरा दिया। लोमड़ी इत्मिनान से मांस के उस टुकड़े को खाने लगी, थोड़ी देर बाद शेर वहाँ से चला गया। यह घटना देख आलसी आदमी सोचने लगा कि भगवान सच में सर्वेसर्वा हैं, उसने धरती के समस्त प्राणियों के लिए, चाहे वह जानवर हो या इंसान, खाने-पीने का प्रबंध कर रखा है, वह अपने घर लौट आया। घर आकर वह 2-3 दिन तक बिस्तर पर लेटकर प्रतीक्षा करने लगा कि जैसे भगवान ने शेर के द्वारा लोमड़ी के लिए भोजन भिजवाया था, वैसे ही उसके लिए भी कोई न कोई खाने-पीने का सामान ले आएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, भूख से उसकी हालात ख़राब होने लगी। आख़िरकार उसे घर से बाहर निकलना ही पड़ा। घर के बाहर उसे एक पेड़ के नीचे बैठे हुए बाबा दिखाए पड़े। वह उनके पास गया और जंगल का सारा वृतांत सुनाते हुए वह बोला, “बाबा जी! भगवान मेरे साथ ऐसा क्यों कर रहे हैं? उनके पास जानवरों के लिए भोजन का प्रबंध है, लेकिन इंसानों के लिए नहीं। बाबा जी ने उत्तर दिया, “बेटा! ऐसी बात नहीं है, भगवान के पास सारे प्रबंध है। दूसरों की तरह तुम्हारे लिए भी, लेकिन बात यह है कि वे तुम्हें लोमड़ी नहीं शेर बनाना चाहते हैं। *शिक्षा:-* हम सबके भीतर क्षमताओं का असीम भंडार है, बस अपनी अज्ञानतावश हम उन्हें पहचान नहीं पाते और स्वयं को कमतर समझकर दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा करते रहते हैं। स्वयं की क्षमता पहचानिए। दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा मत करिए। इतने सक्षम बनिए कि आप दूसरों की सहायता कर सकें। *सदैव प्रसन्न रहिये।* *जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।* ✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

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सुपरहीरो 〰️🌸〰️ "सर कुछ काम नहीं है तो आज मैं थोड़ा जल्दी निकल जाऊं ।" एक घंटे से कुर्सी पर बैठे घड़ी की सुइयां देख रहे रघु ने प्रकाश के कैबिन में घुसते हुए कहा । "यार रघु, बस ये फाइल गुप्ता जी के ऑफिस में दे देना फिर तुम उधर से ही निकल जाना ।" प्रकाश ने भी एक नज़र घड़ी पर मारी और जवाब दिया । "ठीक है सर ।" "और सुनो, जाने से पहले एक कप चाय पिला दो यार, सिर फटा जा रहा है ।" रघु निकल ही रहा था कि प्रकाश ने एक और काम बता दिया उसे । "ठीक सर, अभी लाया ।" थोड़ी देर में रघु चाय बना कर ले आया । उसने चाय प्रकाश को दी और फाइल लेकर निकल पड़ा । हालांकि फाइल गुप्ता जी के ऑफिस तक पहुंचाना कोई आसान काम नहीं था । रघु को वहां जाने में आधा घंटा लगता और फिर वापस आ कर घर जाने में आधा घंटा और । वो लगातार अपनी घड़ी देखे जा रहा था । जैसे तैसे वो अपनी साइकिल खींचता हुआ गुप्ता जी के ऑफिस पहुंचा, फाइल रखी और वहां से चलने लगा । "अरे रघु, यार रहीम आज छुट्टी पर है और कुछ क्लाइंट्स आने वाले हैं । ज़रा यार ये समान ला दो मार्किट से ।" गुप्ता जी ने एक और काम फ़र्मा दिया था रघु को । उसने घड़ी की तरफ देखा 5.45 हो चुके थे । देर हो रही थी मगर वो गुप्ता जी को ना भी नहीं कह सकता था । मजबूरी में उसे जाना पड़ा । आधा घंटा लग गया उसे समान लेकर लौटने में । उसने जल्दी से समान रखा और वहां से निकलने लगा तभी गुप्ता जी बोले "रघु यार थोड़ी देर रुक जाओ । क्लाइंट्स के रहते कुछ ज़रूरत पड़ सकती है । यकीन रखो तुम्हें निराशा नहीं होगी दोस्त ।" रघु ने एक बार फिर से घड़ी की तरफ देखा । हालांकि वो जानता था गुप्ता जी दिलेर आदमी हैं । काम के बदले में वो कुछ ना कुछ तो ज़रूर देंगे । लेकिन अभी उसके लिए पैसे से भी ज़रूरी कुछ था । "वो बात नहीं है सर । आज ज़रा जल्दी घर जाना था ।" "समझ सकता हूं भाई लेकिन अभी मैं किसी और को बुला भी नहीं सकता और ये क्लाइंट बहुत ज़रूरी हैं । इनके स्वागत में कमी नहीं करना चाहता मैं । देख लो अगर रुक सको तो अहसान होगा तुम्हारा । मैं सच में निराश नहीं करूंगा तुम्हें ।" गुप्ता जी को काम करवाना अच्छे से आता है और रघु तो वैसे भी दो मीठे शब्दों का भूखा रहा है हमेशा से । उसने कुछ सोचा और फिर उसे बात माननी ही पड़ी गुप्ता जी की । कुछ ही देर में उनके क्लाइंट्स आ गये और उनकी पार्टी शुरू हो गई । देखते देखते 2 घंटे बीत गए । इस बीच रघु को कई बार बाज़ार दौड़ना पड़ा था । 8.30 हो चुके थे । गुप्ता जी ने रघु की तरफ देखा और फिर उसे बाहर ले गए । "मुझे लगता है अब कुछ चाहिए नहीं होगा । तो तुम जा सकते हो । वैसे भी बहुत समय ले लिया तुम्हारा यार । शुक्रिया तुम्हारा ।" इतना कहते हुए गुप्ता जी ने रघु के हाथ में 500 का नोट थमा दिया । रघु ने मुस्कुराते हुए उनका धन्यवाद किया और एक बार घड़ी की तरफ फिर से देखते हुए वहां निकल गया । वो मार्किट में कुछ देर रुका और फिर 10 बजे तक घर पहुंचा । दरवाजा खटखटाया तो रोशनी ने दरवाजा खोला । उसके चेहरे पर नाराजगी झलक रही थी । "अरे ऐसे मत देखो, बुरा फंस गया था । गुप्ता जी के यहां रुकना पड़ गया ।" रघु ने घर में घुसते हुए हाथ में पकड़े लिफाफे एक तरफ रखे और जूते उतारते हुए अपनी सफाई देने लगा । "जल्दी आ जाते तो सब साथ में खाना खा लेते ?" "क्या हुआ ? सो गया क्या ?" "हां काफ़ी देर पूछता रहा पापा कब आएंगे, फिर टीवी देखते देखते सो गया । ये सब क्या है ?" रोशनी ने लिफाफों को देखते हुए पूछा । "सब तुम्हें ही बता दें ?" रोशनी ने तब तक लिफाफे में देख लिया था । "अरे वाह, मगर आप तो कह रहे थे फिज़ूलखर्ची है ?" "है तो लेकिन अब साल में उसकी एक मांग भी पूरी ना कर सकें तो कमाने पर लानत है ।" "अच्छा अब डयलॉग ना मारिए । चल के उसे उठाने की कोशिश करते हैं । वैसे उम्मीद कम ही है क्योंकि वो ढीठ है आपकी तरह ही । एक बार सो गया तो फिर उठता नहीं ।" "चलो तो देखते हैं ज़्यादा ढीठ कौन है उसे जगाने वाला बाप या वो खुद ।" दोनों मुस्कुराए और कमरे की तरफ बढ़ गए । "सोमू, ए सोमू । उठ तो, पापा आ गए ।" "मां, सोने दो ना ।" "ए बेटा देख तो सही पापा क्या लाए हैं ।" "नहीं देखना ना अभी । सुबह देख लूंगा ।" "ठीक है तो मत देख । जा रहा हूं मैं ये लेकर ।" रघु कमरे से जाने लगा । "क्या है पापा ?" रघु के जाने ए पहले सोमू आंख मलता हुआ उठकर बैठ गया था । रघु ने एक बड़ा सा लिफ़ाफ़ा खोला और उसमें से एक केक निकालते हुए बोला "हैप्पी बड्डे बेटा ।" इसके बाद रोशनी और रघु दोनों उसे बड्डे विश करने लगे । सोमू केक देख कर ऐसे खुश हुआ कि ना जाने क्या मिल गया हो उसे । काफ़ी महीने पहले से ही वो अपनी क्लास के दोस्तों के किस्से सुनाता रहता था कि किसने अपने जन्म दिन पर कैसे केक काटा । रोशनी भी महीने भर पहले से रघु को कह रही थी कि इस बार सोमू के जन्मदिन पर केक काटेंगे लेकिन रघु ये कह कर मना कर देता कि 300-400 का केक आता है, बेकार में इतने पैसे क्यों बर्बाद करने । वो भले ही ऐसा कहता था लेकिन उसने मन ही मन सोच लिया था कि इस बार वो बेटे की ये इच्छा ज़रूर पूरी करेगा । हालांकि बेटे को हैसीयत से ज़्यादा महंगे स्कूल में पढ़ाने और घर का खर्च निकालने के बाद उसके हाथ में कुछ बचता नहीं था लेकिन इस बार उसने इतने पैसे अलग से निकाल लिए थे । इसके बाद आज गुप्ता जी के दिए पैसों से और आसानी हो गई थी । रघु ने दूसरे लिफाफे भी खोले । उनमें खाने पीने का सामान और एक सोमू के पसंद की ड्रेस थी । सोमू की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं था । वो बार बार अपने पिता को गौर से देख रहा था । ज़माने के लिए एक नौकर जो दूसरों का आदेश मानता है, चाय बनाता है जूठे बर्तन धोता है वो रघु अपने बेटे की नज़रों में हीरो है । शायद यही हीरो बनने के लिए वो ये काम करता है । बच्चे सुपरहीरोज़ के बारे में बाद में जानते हैं लेकिन उनका पहला हीरो उनके पिता ही होते हैं फिर भले वे किसी दफ्तर के चपरासी हों या फिर अधिकारी । और इधर एक पिता की ज़िंदगी खुद को अपने बच्चों की नज़र में हीरो बनाए रखने में ही निकल जाती है । 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Anju Mishra Jan 24, 2022

🙏🌹हर हर महादेव 🙏🌹 स्वयं को पहचानें - 👉 एक बार अकबर एक ब्राह्मण को दयनीय हालत में जब भिक्षाटन करते देखा तो बीरबल की ओर व्यंग्य कसकर बोला - 'बीरबल! ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण! जिन्हें ब्रह्म देवता के रुप में जाना जाता है। ये तो भिखारी है'। बीरबल ने उस समय तो कुछ नहीं कहा। लेकिन जब अकबर महल में चला गया तो बीरबल वापिस आये और ब्राह्मण से पूछा कि वह भिक्षाटन क्यों करता है' ? ब्राह्मण ने कहा - 'मेरे पास धन, आभूषण, भूमि कुछ नहीं है और मैं ज्यादा शिक्षित भी नहीं हूँ। इसलिए परिवार के पोषण हेतू भिक्षाटन मेरी मजबूरी है'। बीरबल ने पूछा - 'भिक्षाटन से दिन में कितना प्राप्त हो जाता है'? ब्राह्मण ने जवाब दिया - 'छह से आठ अशर्फियाँ।' बीरबल ने कहा - 'आपको यदि कुछ काम मिले तो क्या आप भिक्षा मांगना छोड़ देंगे ?' ब्राह्मण ने पूछा - 'मुझे क्या करना होगा ?' बीरबल ने कहा - 'आपको ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके प्रतिदिन 101 माला गायत्री मन्त्र का जाप करना होगा और इसके लिए आपको प्रतिदिन भेंटस्वरुप 10 अशर्फियाँ प्राप्त होंगी।' बीरबल का प्रस्ताव ब्राह्मण ने स्वीकार कर लिया। अगले दिन से ब्राह्मण ने भिक्षाटन करना बन्द कर दिया और बड़ी श्रद्धा भाव से गायत्री मन्त्र जाप करना प्रारम्भ कर दिया और शाम को 10 अशर्फियाँ भेंटस्वरुप लेकर अपने घर लौट आता। ब्राह्मण की सच्ची श्रद्धा व लग्न देखकर कुछ दिनों बाद बीरबल ने गायत्री मन्त्र जाप की संख्या और अशर्फियों की संख्या दोनों ही बढ़ा दी। गायत्री मन्त्र की शक्ति के प्रभाव से ब्राह्मण को भूख, प्यास व शारीरिक व्याधि की तनिक भी चिन्ता नहीं रही। गायत्री मन्त्र जाप के कारण उसके चेहरे पर तेज झलकने लगा। लोगों का ध्यान ब्राह्मण की ओर आकर्षित होने लगा। दर्शनाभिलाषी उनके दर्शन कर मिठाई, फल, पैसे, कपड़े चढाने लगे। अब उसे बीरबल से प्राप्त होने वाली अशर्फियों की भी आवश्यकता नहीं रही। यहाँ तक कि अब तो ब्राह्मण को श्रद्धा पूर्वक चढ़ाई गई वस्तुओं का भी कोई आकर्षण नहीं रहा। बस वह सदैव मन से गायत्री जाप में लीन रहने लगा। ब्राह्मण सन्त के नित्य गायत्री जप की खबर चारों ओर फैलने लगी। दूरदराज से श्रद्धालु दर्शन करने आने लगे। भक्तों ने ब्राह्मण की तपस्थली में मन्दिर व आश्रम का निर्माण करा दिया। ब्राह्मण के तप की प्रसिद्धि की खबर अकबर को भी मिली। बादशाह ने भी दर्शन हेतू जाने का फैंसला लिया और वह शाही तोहफे लेकर राजसी ठाठबाट में बीरबल के साथ सन्त से मिलने चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर शाही भेंटे अर्पण कर ब्राह्मण को प्रणाम किया। ऐसे तेजोमय सन्त के दर्शनों से हर्षित हृदय सहित बादशाह बीरबल के साथ बाहर आ गए। तब बीरबल ने पूछा - 'क्या आप इस सन्त को जानतें हैं ?' अकबर ने कहा - 'नहीं, बीरबल मैं तो इससे आज पहली बार मिला हूँ।' फिर बीरबल ने कहा - 'महाराज ! आप इसे अच्छी तरह से जानते हो। यह वही भिखारी ब्राह्मण है,जिस पर आपने व्यंग्य कसकर एक दिन कहा था - 'ये हैं तुम्हारे ब्राह्मण ! जिन्हें ब्रह्म देवता कहा जाता है ?' आज आप स्वयं उसी ब्राह्मण के पैरों में शीश नवा कर आए हैं। अकबर के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। बीरबल से पूछा - 'लेकिन यह इतना बड़ा बदलाव कैसे हुआ ?' बीरबल ने कहा - 'महाराज ! वह मूल रुप में ब्राह्मण ही है। परिस्थितिवश वह अपने धर्म की सच्चाई व शक्तियों से दूर था। धर्म के एक गायत्री मन्त्र ने ब्राह्मण को साक्षात् 'ब्रह्म' बना दिया और वह कैसे बादशाह को चरणों में गिरने के लिए विवश कर दिया। यही ब्राह्मण आधीन मन्त्रों का प्रभाव है। यह नियम सभी ब्राह्मणों पर सामान रुप से लागू होता है।

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devilakshmi Jan 24, 2022

. ❣️"द्रौपदी का दान"❣️ इन्सान जैसा कर्म करता है, कुदरत या परमात्मा उसे वैसा ही उसे लौटा देता है। एक बार द्रौपदी सुबह तड़के स्नान करने यमुना घाट पर गयी भोर का समय था। तभी उसका ध्यान सहज ही एक साधु की ओर गया जिसके शरीर पर मात्र एक लँगोटी थी। साधु स्नान के पश्चात अपनी दूसरी लँगोटी लेने गया तो वो लँगोटी अचानक हवा के झोंके से उड़ पानी में चली गयी ओर बह गयी। संयोगवश साधु ने जो लंगोटी पहनी वो भी फटी हुई थी। साधु सोच मे पड़ गया कि अब वह अपनी लाज कैसे बचाए। थोड़ी देर में सूर्योदय हो जाएगा और घाट पर भीड़ बढ़ जाएगी। साधु तेजी से पानी के बाहर आया और झाड़ी में छिप गया। द्रौपदी यह सारा दृश्य देख अपनी साड़ी जो पहन रखी थी, उसमे आधी फाड़ कर उस साधु के पास गयी ओर उसे आधी साड़ी देते हुए बोली- "तात! मैं आपकी परेशानी समझ गयी। इस वस्त्र से अपनी लाज ढ़क लीजिए। साधु ने सकुचाते हुए साड़ी का टुकड़ा ले लिया और आशीष दिया। जिस तरह आज तुमने मेरी लाज बचायी उसी तरह एक दिन भगवान तुम्हारी लाज बचाएंगे। जब भरी सभा मे चीरहरण के समय द्रौपदी की करुण पुकार नारद ने भगवान तक पहुँचायी तो भगवान ने कहा- "कर्मों के बदले मेरी कृपा बरसती है, क्या कोई पुण्य है। द्रौपदीके खाते में?" जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान हिसाब में मिला, जिसका ब्याज भी कई गुणा बढ़ गया था। जिसको चुकता करने भगवान पहुँच गये द्रौपदी की मदद करने, दुस्सासन चीर खींचता गया और हजारों गज कपड़ा बढ़ता गया। इंसान यदि सुकर्म करे तो उसका फल सूद सहित मिलता है, और दुष्कर्म करे तो सूद सहित भोगना पड़ता है। ----------:::×:::---------- "जय जय श्री राधे"

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