santosh yadav
santosh yadav Nov 23, 2021

जय जय श्री राम🚩🚩🚩

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Ankit Kumar . Nov 25, 2021
जय श्री राम जी । जय श्री बजरंगबली हनुमान जी ।

ritu saini Nov 23, 2021

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Davinder Rana Nov 25, 2021

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Amit Kumar Nov 23, 2021

सुप्रभात वंदनम् जय बिहारी जी की श्री भरत जी का दल आगे चला। निषादराज, श्रंगबेरपुर के राजा, को पता लगा। भरत आ रहे हैं? सेवकों ने कहा -- चतुरंगिनी सेना भी साथ है। रथ, घोड़े, हाथी, पूरा दल बल है। बस, निषादराज भड़क गए। आज राम सेवक -- निषादराज कहते हैं -- सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जियत न सुरसरि उतरन देऊँ।। आज मैं भरत से युद्ध करूंगा। जीते जी गंगा जी के उस पार नहीं होने दूँगा। राम जी को असहाय जानकर, बनवासी जानकर, उनसे युद्ध करने जा रहे हैं, उन पर चढ़ाई करने जा रहे हैं। समर मरनि पुनि सुरसरि तीरा। मरूँगा तो युद्ध में वीरगति को प्राप्त होऊँगा, और वह भी गंगा जी के किनारे। राम काजु छन भंगु सरीरा। भरत भाई नृपु मैं जन नीचू। भरत उनके भाई हैं। मैं तो राम जी का छोटा सा सेवक हूँ। बड़े भाग असि पाइअ मीचू।। भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। कार्य है मुझे। धोखा मत देना, तैयार हो जाओ युद्ध के लिए। अच्छा देखो, इस प्रसंग से एक शिक्षा और मिलती है। हृदय मिले हों, तो तन दूर रहने के बाद भी मन दूर नहीं होता, और मन ही न मिले हों, तो आप इकट्ठे तो रह सकते हैं, एक कभी नहीं रह सकते। इकट्ठे होने में और एक होने में अंतर है। जहांँ हृदय मिलते हैं वहाँ व्यक्ति एक होते हैं और जहाँ नहीं मिलते वहाँ इकट्ठे होते हैं। हाथ के साथ यही कठिनाई है। कब कौन किससे हाथ मिला ले, आपको पता ही नहीं लगेगा, कब कौन किससे हाथ मिलाने वाला है? और दूसरी भी बात है, कब कौन हाथ खींच ले, पता ही नहीं लगेगा। एक से पूछा कि हाथ खींच क्यों लिया, जो मिलाया था? बोला -- हमने तो हाथ बनाने के लिए ही हाथ मिलाया था। बन गया तो खींच लिया। हाथ मिलते हैं वहाँ लोग इकट्ठे होते हैं, पर इकट्ठे हुए लोगों को एक मत समझना। पर जहाँ हृदय मिलते हैं वहाँ व्यक्ति एक होते हैं। इसीलिए हमारे यहाँ पुरानी परम्परा है ‌। जब कोई मिलते हैं तो हृदय लगकर। उसका भाव यह है कि मिलो तो ऐसे मिलो कि हृदय से मिलो। भले ही तन के मिलने के ढंग से हृदय से न मिलो, पर भाव से, हृदय से मिलो, संकेत यही है। चलो, अब हृदय से मिलना बंद हो गया। चलो हाथ ही सही, मिलते तो हैं, पर अब वह भी मिलने बंद हो गये। अब हाथ मिलते नहीं, अब हाथ हिलते हैं, और इसका अर्थ, वे साफ-साफ कहते हैं कि हम तुम्हारे नहीं हैं, हमारे भरोसे मत रहना। तो सामने वाले भी कहते हैं कि क्या तुम हमें अपना समझते हो? हम भी तुम्हारे नहीं हैं। अब देखो, लक्ष्मण जी चित्रकूट में हैं। निषादराज श्रंगबेरपुर में हैं और दोनों गुरु-शिष्य हैं। निषादराज को लक्ष्मण जी ने उपदेश दिया रात्रि में, गीता का। लक्ष्मण गीता कहलाती है, और सही बात है रात्रि में ही तो उपदेश की आवश्यकता है। मोह निसा सब सोवनिहारा। अच्छा, यह भी अद्भुत संकेत है कि उपदेश दिया किसने? कहा -- लक्ष्मण जी ने। ••••क्यों? जागनि लगे बैठि वीरासन। लक्ष्मण जी कभी सोते नहीं। इसका अर्थ क्या है? जो सदा जागृत रहता हो, जो मोह की नींद में जागा हुआ हो, वही दूसरे को जगा सकता है। तो लक्ष्मण जी हैं गुरु, और निषादराज हैं शिष्य। देखो सम्बन्धों की हार्दिकता और आत्मीयता की विशेषता क्या है? शिष्य को देखकर गुरु जी की याद आ जाय, शिष्य को देखने से ही गुरु का स्मरण हो। यह शिष्य हैं। अच्छा तो गुरु जी ऐसे ही हैं। इसलिए कई बार लोग शिष्य को देखकर ही कहते हैं-- अच्छा, उनके शिष्य हैं क्या? ••••••तो कैसे पहचाना?•••••उनके रहन--सहन ढँग से पहचाना, उठने-बैठने से पहचाना। इतनी आत्मीयता, देखो पुत्र से पिता का परिचय मिलता है। वह बिंदु परम्परा से उद्भूत है और शिष्य से गुरु का परिचय मिलता है, वह नाद परम्परा से उद्भूत है। निषादराज शिष्य हैं, लक्ष्मण जी गुरुदेव हैं। गुरुदेव चित्रकूट में हैं, शिष्य श्रृंगवेरपुर में हैं, लेकिन कितनी एकता है कि भरत जी को देखकर जो बातें निषादराज ने कही हैं, बिल्कुल वही शैली, उसी ढंग में लक्ष्मण जी ने भी कही हैं। आप पंक्तियां मिला लो गुरु और चेले की। शिष्य निषादराज क्या बोले? सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जियत न सुरसरि उतरन दैऊँ।।

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राकेश Nov 25, 2021

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Sudha Mishra Nov 25, 2021

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Saritachoudhary Nov 25, 2021

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