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श्रीमद्देवीभागवत (आठवां स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 5 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ भूमण्डल के विस्तार का और आम्र, जाम्बू, कदम्ब एवं वटवृक्ष के फलों के रस से प्रकट हुई नदियों का वर्णन तथा गंगाजी के अवतरण का वृत्तान्त... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान् नारायण आगे कहते हैं- देवर्षि नारद! मन्दर, मेरुमन्दर, सुपार्श्व और कुमुद ये चार पर्वत सुमेरु गिरि के पाये के रूप में हैं। दस हजार योजन इनका विस्तार है। सुमेरु गिरि की चारों दिशाओं में उसे रोककर ये विराजमान हैं। ये चार पर्वत सुमेरु गिरि के लिये मानो खम्भे हैं। इन चारों पर्वतों पर चार वृक्ष हैं— आम, जामुन, कदम्ब और बड़। ये चारों वृक्ष, जो ग्यारह सौ योजन ऊँचे हैं, ध्वजा का काम देते हैं। चारों वृक्ष और चारों पर्वत समान विस्तार में फैले हुए हैं। वह स्थान चार अत्यन्त गहरे तालाबों से सुशोभित है। वे तालाब दूध, मधु, ईख के रस और स्वादिष्ट जल से भरे हैं। उस जल से स्नान, आचमन आदि करने वाले देवताओं को यौगिक सम्पत्ति प्राप्त होती है। वहीं स्त्रियों को परम सुखी बनाने वाले चार दिव्य उपवन हैं, उन उपवनों के नाम हैं नन्दन, चैत्ररथ, वैभ्राज और सर्वभद्र। उनमें अंगनाओं सहित देवताओं का निवास होता है। ऐसे महाभाग देवता परम स्वतन्त्र होकर सुखपूर्वक वहाँ यथेच्छ विहार करते हैं। मन्दराचल के वक्षःस्थल पर एक दिव्य आम का वृक्ष है। उस वृक्ष की ऊँचाई ग्यारह सौ योजन है। उसके अमृतमय फल त्रिकूट पर्वत के समान विशाल, अत्यन्त स्वादिष्ट और बड़े कोमल हैं। वे फल वृक्ष के ऊँचे सिरे से गिरते ही बिखर जाते हैं। उनका रस बह चलता है। वह रस ऐसा लाल है, मानो अरुण समुद्र का जल हो। उसी रस से अरुणोदा नाम की एक नदी बह रही है। उसका जल बड़ा ही सुरम्य है। महाराज! उसी पर्वत पर भगवती श्रीअरुणा विराजमान हैं। प्रधान-प्रधान देवता और दैत्य उनकी उपासना करते हैं। सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण करने वाली वे देवी सदा पापों के संहार में लगी रहती हैं। अनेक प्रकार के उपहार एवं बलि से प्रसन्न होकर वे सारा कल्मष दूर करके भक्तों को निर्भय बना देती हैं। उनकी कृपा दृष्टि से साधक कुशलसम्पन्न एवं नीरोग बन जाते हैं। आद्या, माया, अतुला, अनन्ता, पुष्टि, ईश्वरमालिनी, दुष्टनाशकरी और कान्तिदायिनी – इन नामों से वे देवी भूमण्डल पर विख्यात हैं। उन्हीं देवी की पूजा के प्रभाव से जगत्‌ में सुवर्ण उत्पन्न हुआ है। माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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जब ठगे गए गणेश जी एक भक्ति से ओतप्रोत कथा। गणेश जी विघ्न विनाशक व शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता हैं। अगर कोई सच्चे मन से गणोश जी की वंदना करता है, तो गौरी नंदन तुरंत प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं। वैसे भी गणेश जी जिस स्थान पर निवास करते हैं, उनकी दोनों पत्नियां ऋद्धि तथा सिद्धि भी उनके साथ रहती हैं उनके दोनों पुत्र शुभ व लाभ का आगमन भी गणेश जी के साथ ही होता है। कभी-कभी तो भक्त भगवान को असमंजस में डाल देते हैं। पूजा-पाठ व भक्ति का जो वरदान मांगते हैं, वह निराला होता है। काफ़ी समय पहले की बात है एक गांव में एक अंधी बुढ़िया रहती थी। वह गणेश जी की परम भक्त थी। आंखों से भले ही दिखाई नहीं देता था, परंतु वह सुबह शाम गणेश जी की बंदगी में मग्न रहती। नित्य गणेश जी की प्रतिमा के आगे बैठकर उनकी स्तुति करती। भजन गाती व समाधि में लीन रहती। गणेश जी बुढ़िया की भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सोचा यह बुढ़िया नित्य हमारा स्मरण करती है, परंतु बदले में कभी कुछ नहीं मांगती। भक्ति का फल तो उसे मिलना ही चाहिए। ऐसा सोचकर गणेश जी एक दिन बुढ़िया के सम्मुख प्रकट हुए तथा बोले- ‘माई, तुम हमारी सच्ची भक्त हो। जिस श्रद्धा व विश्वास से हमारा स्मरण करती हो, हम उससे प्रसन्न हैं। अत: तुम जो वरदान चाहो, हमसे मांग सकती हो।’ बुढ़िया बोली- ‘प्रभो! मैं तो आपकी भक्ति प्रेम भाव से करती हूं। मांगने का तो मैंने कभी सोचा ही नहीं। अत: मुझे कुछ नहीं चाहिए।’ गणेश जी पुन: बोले- ‘हम वरदान देने केलिए आए हैं।’ बुढ़िया बोली- ‘हे सर्वेश्वर, मुझे मांगना तो नहीं आता। अगर आप कहें, तो मैं कल मांग लूंगी। तब तक मैं अपने बेटे व बहू से भी सलाह मश्विरा कर लूंगी। गणेश जी कल आने का वादा करके वापस लौट गए।’ बुढ़िया का एक पुत्र व बहू थे। बुढ़िया ने सारी बात उन्हें बताकर सलाह मांगी। बेटा बोला- ‘मां, तुम गणेश जी से ढेर सारा पैसा मांग लो। हमारी ग़रीबी दूर हो जाएगी। सब सुख चैन से रहेंगे।’ बुढ़िया की बहू बोली- ‘नहीं आप एक सुंदर पोते का वरदान मांगें। वंश को आगे बढ़ाने वाला भी, तो चाहिए।’ बुढ़िया बेटे और बहू की बातें सुनकर असमंजस में पड़ गई। उसने सोचा- यह दोनों तो अपने-अपने मतलब की बातें कर रहे हैं। बुढ़िया ने पड़ोसियों से सलाह लेने का मन बनाया। पड़ोसन भी नेक दिल थी। उसने बुढ़िया को समझाया कि तुम्हारी सारी ज़िंदगी दुखों में कटी है। अब जो थोड़ा जीवन बचा है, वह तो सुख से व्यतीत हो जाए। धन अथवा पोते का तुम क्या करोंगी! अगर तुम्हारी आंखें ही नहीं हैं, तो यह संसारिक वस्तुएं तुम्हारे लिए व्यर्थ हैं। अत: तुम अपने लिए दोनों आंखें मांग लो।’ बुढ़िया घर लौट आई। बुढ़िया और भी सोच में पड़ गई। उसने सोचा- कुछ ऐसा मांग लूं, जिससे मेरा, बहू व बेटे- सबका भला हो। लेकिन ऐसा क्या हो सकता है? इसी उधेड़तुन में सारा दिन व्यतीत हो गया। बुढ़िया कभी कुछ मांगने का मन बनाती, तो कभी कुछ। परंतु कुछ भी निर्धारित न कर सकी। दूसरे दिन गणेश जी पुन: प्रकट हुए तथा बोले- ‘आप जो भी मांगेंगे, वह हमारी कृपा से हो जाएगा। यह हमारा वचन है।’ गणेश जी के पावन वचन सुनकर बुढ़िया बोली- ‘हे गणराज, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो कृप्या मुझे मन इच्छित वरदान दीजिए। मैं अपने पोते को सोने के गिलास में दूध पीते देखना चाहती हूं।’ बुढ़िया की बातें सुनकर गणेश जी उसकी सादगी व सरलता पर मुस्कुरा दिए। बोले- ‘तुमने तो मुझे ठग ही लिया है। मैंने तुम्हें एक वरदान मांगने के लिए बोला था, परंतु तुमने तो एक वरदान में ही सबकुछ मांग लिया। तुमने अपने लिए लंबी उम्र तथा दोनों आंखे मांग ली हैं। बेटे के लिए धन व बहू के लिए पोता भी मांग लिया। पोता होगा, ढेर सारा पैसा होगा, तभी तो वह सोने के गिलास में दूध पीएगा। पोते को देखने के लिए तुम जिंदा रहोगी, तभी तो देख पाओगी। अब देखने के लिए दो आंखें भी देनी ही पड़ेंगी।’ फिर भी वह बोले- ‘जो तुमने मांगा, वे सब सत्य होगा।’ यूं कहकर गणेश जी अंर्तध्यान हो गए। कुछ समय पाकर गणेश जी की कृपा से बुढ़िया के घर पोता हुआ। बेटे का कारोबार चल निकला तथा बुढ़िया की आंखों की रौशनी वापस लौट आई। बुढ़िया अपने परिवार सहित सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। बोलो गजानन महाराज की जय।

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (तीन सौ बयासी वाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनम: श्रीरामजी के विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजी के द्वारा उनके उत्तर...(भाग 5) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीराम जी ने पूछा- ब्रह्मण ! चित्त के रहते हुए चेतन का अचेत्य परमात्मा की ओर उन्मुख होना कितनी देर के लिये सम्भव हो सकेगा? (क्योंकि चित्तवृत्तियों का निरोध होने पर ही परमात्मा अटल स्थिति हो पाती है ) अतः यह बताइये कि निर्वाण-पद प्रदान करने वाली जो चित्त की अचित्तता है, उसका उदय कैसे हो सकता है ? ( दूसरे शब्दों में चित्त के नाश का ही उपाय बताने की कृपा करें । ) श्रीवसिष्ठ जी ने कहा - रघुनन्दन जब चेत्य जगत् की उत्पत्ति सम्भव ही नहीं है, तत्र चितिशक्ति जीवात्मा कैसे और कहाँ से उसका चिन्तन या अनुभव करेगा ! चेत्य की सत्ता न होने से चित्त की सत्ता भी चिरकाल से ही नहीं है। फिर किसके नाश का उपाय बताया जाय ? श्रीरामजी ने पूछा--जिस चेतय का सब को अनुभव होता है, उसका होना कैसे सम्भव नहीं है ! जिसका अनुभव हो रहा है, उसका इस तरह अपलाप, उसकी सत्ता को अस्वीकार कैसे किया जा रहा है ? श्रीवसिष्ठजी ने कहा – अज्ञानी की दृष्टि में जो जगत् का स्वरूप है, वह सत्य नहीं है और ज्ञानी की दृष्टि में उसका जैसा स्व रूप है, वह अद्वितीय ब्रह्ममय होने के कारण वाणी का विषय नहीं है। (अत: यहाँ अज्ञानियों के ही जगत् की सत्ता का निराकरण किया गया है। ) श्रीरामजी ने पूछा–मुने ! अज्ञानियों का त्रैलोक्य कैसा है और वह सत्य कैसे नहीं है तथा तत्वज्ञानियों का जगत् जैसा है, वह वाणी का विषय कैसे नहीं हो सकता ! श्रीवसिष्ठजी ने कहा – अज्ञानियों का जो जगत् है, वह आदि-अन्त से युक्त तथा द्वैतरूप है। परंतु तत्व ज्ञानियों की दृष्टि में वह नहीं है। उनकी दृष्टि में जगत् की सत्ता सम्भव ही नहीं है; क्योंकि आदिकाल से ही कभी उसकी उत्पत्ति नहीं हुई। श्रीरामजी ने पूछा–मुने आदिकाल से ही उत्पन्न नहीं हुआ, उसकी सत्ता कभी सम्भव नहीं है। वह असद्रूप और आभासशून्य है। यदि जगत् का भी यही स्वरूप है तो उसका अनुभव कैसे हो रहा है ! श्रीवसिष्ठजीने कहा – रघुनन्दन ! जाग्रत्-जगत् स्वप्न जगत् के समान असत् होता हुआ ही सत् के तुल्य प्रतीत हो रहा है। इसकी कभी उत्पत्ति नहीं हुई; क्योंकि उत्पत्ति का कोई कारण नहीं है। यह स्वप्न के तुल्य प्रकट होकर अर्थ-क्रियाकारी भी प्रतीत होता है। श्रीरामजी ने पूछा- भगवन् ! स्वप्न आदि में और संकल्प एवं मनोरथ आदि में जो दृश्य का अनुभव होता है, वह जाग्रत् व्यवहार के अनुभव से उत्पन्न जाप्रत् रूप संस्कार से होता है। किंतु यह जाग्रत् किससे अनुभव में आता है ? श्रीवसिष्ठ जी ने कहा – श्रीराम ! यदि जाग्रत् के संस्कार से ही स्वप्न का भान होता है तो सपने में गिरा हुआ अपना घर कैसे प्रातः काल जागने पर सुरक्षित रूप से उपलब्ध होता है। श्रीरामजी बोले – भगवन् ! जाग्रत्-पदार्थ का स्वप्न में भान नहीं होता; किंतु अन्य पदार्थ ही स्वप्न में भासित होता है । वह अन्य पदार्थ ब्रह्म ही है, यह बात मेरी समझ में आ गयी । अत: इतना ही पूछना शेष है कि वह अन्य पदार्थरूप ब्रह्म अपूर्व जगत् के रूप में कैसे भासित होता है? श्रीवसिष्ठजी ने कहा —रघुनन्दन ! सब कुछ अपूर्व सा हो भासित होता हो, ऐसा नियम नहीं है। कोई पदार्थ जिसका पहले अनुभव नहीं हुआ है, चित्त में अपूर्व प्रतीत होता है और कोई जिसका पहले अनुभव हो चुका है, अपूर्व नहीं प्रतीत होता । वह अनुभव सृष्टि के आदि, अन्त और मध्य में किये हुए अभ्यास के अनुसार ही भासित होता है। क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नवम स्कन्ध, अथाष्टमोऽध्यायः सगर-चरित्र...(भाग 3) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ एवंवृत्तः परित्यक्तः पित्रा स्नेहमपोह्य वै। योगेश्वर्येण बालांस्तान् दर्शयित्वा ततो ययौ ।।१८ अयोध्यावासिनः सर्वे बालकान् पुनरागतान् । दृष्ट्वा विसिस्मिरे राजन् राजा चाप्यन्वतप्यत ।।१९ अंशुमांश्चोदितो राज्ञा तुरंगान्वेषणे ययौ । पितृव्यखातानुपथं भस्मान्ति ददृशे हयम् ||२० तत्रासीनं मुनिं वीक्ष्य कपिलाख्यमधोक्षजम् । अस्तौत् समाहितमनाः प्रांजलिः प्रणतो महान् ॥ २१ अंशुमानुवाच न पश्यति त्वां परमात्मनोऽजनो न बुध्यतेऽद्यापि समाधियुक्तिभिः । कुतोऽपरे तस्य मनःशरीरधी विसर्गसृष्टा` वयमप्रकाशाः ।। २२ ये देहभाजस्त्रिगुणप्रधाना गुणान् विपश्यन्त्युत' वा तमश्च । यन्मायया मोहितचेतसस्ते विदुः स्वसंस्थं न बहिः प्रकाशाः ।। २३ तं त्वामहं ज्ञानघनं स्वभाव प्रध्वस्तमायागुणभेदमोहैः । सनन्दनाद्यैर्मुनिभिर्विभाव्यं कथं हि मूढः परिभावयामि ॥२४ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ अन्त में उनकी ऐसी करतूत देखकर पिता ने पुत्र स्नेह को तिलांजलि दे दी और उन्हें त्याग दिया। तदनन्तर असमंजस ने अपने योगबल से उन सब बालकों को जीवित कर दिया और अपने पिता को दिखाकर वे वन में चले गये ॥१८॥ अयोध्या के नागरिकों ने जब देखा कि हमारे बालक तो फिर लौट आये तब उन्हें असीम आश्चर्य हुआ और राजा सगर को भी बड़ा पश्चात्ताप हुआ ।।१९।। इसके बाद राजा सगर की आज्ञा से अंशुमान् घोड़े को ढूँढ़ने के लिये निकले। उन्होंने अपने चाचाओं के द्वारा खोदे हुए समुद्र के किनारे-किनारे चलकर उनके शरीर के भस्म के पास ही घोड़े को देखा ||२०|| वहीं भगवान्‌ के अवतार कपिलमुनि बैठे हुए थे। उनको देखकर उदारहृदय अंशुमान ने उनके चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर एकाग्र मन से उनकी स्तुति की ॥२१॥ अंशुमान ने कहा- भगवन्! आप अजन्मा ब्रह्माजी से भी परे हैं। इसीलिये वे आपको प्रत्यक्ष नहीं देख पाते। देखने की बात तो अलग रही- वे समाधि करते-करते एवं युक्ति लड़ाते-लड़ाते हार गये, किन्तु आज तक आपको समझ भी नहीं पाये। हमलोग तो उनके मन, शरीर और बुद्धि से होने वाली सृष्टि के द्वारा बने हुए अज्ञानी जीव हैं। तब भला, हम आपको कैसे समझ सकते हैं ।।२२|| संसार के शरीरधारी सत्त्वगुण, रजोगुण या तमोगुण प्रधान हैं। वे जाग्रत् और स्वप्न अवस्थाओं में केवल गुणमय पदार्थों, विषयों को और सुषुप्ति अवस्था में केवल अज्ञान-ही- अज्ञान देखते हैं। इसका कारण यह है कि वे आपकी माया से मोहित हो रहे हैं। वे बहिर्मुख होने के कारण बाहर की वस्तुओं को तो देखते हैं, पर अपने ही हृदय में स्थित आपको नहीं देख पाते ||२३|| आप एकरस, ज्ञानघन हैं। सनन्दन आदि मुनि, जो आत्मस्वरूप के अनुभव से माया के गुणों के द्वारा होने वाले भेदभाव को और उसके कारण अज्ञान को नष्ट कर चुके हैं, आपका निरन्तर चिन्तन करते रहते हैं। माया के गुणों में ही भूला हुआ मैं मूढ़ किस प्रकार आपका चिन्तन करूँ? ||२४|| क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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(((((((((( माखन चोर )))))))))) . एक दिन ठाकुर जी ने ग्वालबालो से कहा की आज तो हम प्रभा काकी के यहाँ माखन चोरी करने चलेंगे, . एक ग्वालियाँ ने कहा की लाला फिरतो आज हम एकादशी करेंगे, ठाकुर जी बोले क्यों ? . बोले लाला तुजे पता नही है प्रभा गोपी कैसी है .एक हाथ की कमर पे पड़ जावे तो पाच दिन तक गर्म नमक का सेक करना पड़ता है, . ठाकुर जी बोले तुजे कैसे पता ? बोले में उसका पति हु, भुगत भोगी हुँ.. . ठाकुर जी बोले तू उसका पति है तो हमारी मण्डली में क्या कर रहा है ? . बोले मुझे भी खाने को कुछ देती नही तो मुझे भी तुम्हारी मण्डली में आना पड़ा, . ठाकुर जी कहते मेने तो आज जय कर लिया , में तो प्रबावती गोपिके यहाँ, जाऊंगा, सो जाऊंगा, . गोपियाँ मैया से शिकायत बहुत करती थी, तो मैयाने ठाकुर जी के पग में नुपुर पहना दिए, और गोपियाँ से कहा की जब मेरा लाला तुम्हारे यहाँ माखन चोरी करने आवे तो घुघरू की छम छम की आवाज आये तब तुम मेरे लाला को पकड लेना, . ठाकुर जी देखा की गोपिके घर के बाहर गोबर पड़ा है, ठाकूर जी उस गोबर में दोनों पैर डाल कर जोर जोर से कुदे तो घुंघुरु में गोबर भर गया, और आवाज आना बंद हो गयी, . अब ठाकुर जी धीरे-धीरे पाव धरते हुवे, दोनों हाथ मटकी में ड़ाल कर माखन खाने लगे, तो गोपी पीछे ही खड़ी थी, और पीछे से आकर ठाकुर जी को पकड़ा, . ऐ धम, ठाकुर जी बोले रे ये कौन आ गयी, पीछे मुड़के देखे तो गोपी ! ठाकुर जी बोले ओ गोपी तुम, . गोपी बोलि रे चोर कहिके चोरी करने आया, ठाकुर जी बोले मेने चोरी कहा की, नहीं में चोरी करने नही आया, मेतो मेरे घर आया, . गोपी बोली ये तेरा घर जरा देख ? ठाकुर जी ने ऐषी भोली सी सकल बनाई, और इधर उधर देख के बोले . अरे सखी क्या करू मुझे तो कुछ खबर ही नही पड़ति, क्या बताऊँ दिन भर गैया चाराता हु और श्याम को बाबा के साथ हथाई पे जाता हु, इतना थक जाता हु की मुझे तो खबर ही नही पड़ती, की मेरा घर कौनसा, तेरा घर कौनसा .... . कोई बात नही गोपी तू भी तो मेरी काकी है, तेरा घर सो मेरा घर, तेरा घर सो मेरा घर . . गोपी बोली रे कब से तेरा घर सो मेरा घर बोले जा रहा है, एक बार भी ये नही कहें की मेराघर सो तेराघर, बड़ा चतुर है, चोरी करता है ? . बोले सखी मेने चोरी नही की, गोपी बोली लाला अगर तेने चोरी नही की तो तेरे हाथो पे माखन कैसे लग गयो, . ठाकुर जी बोले सखी वोतो में भीतर आयो तो देखा की मटकी पे चीटिया चिपक रही है, तो मेने सोचा की मेरी मैया को सूजे ना है ! . संध्या के समय मैया माखन के संग संग चीटिया न परोस देगी ! बाकि मेने खाया तो नही, . सखी बोली लाला तेने खाया नही तो तेरे मुख पे कैसे लग गयो ? . बोले सखी मेतो ठहरो सीधो पर एक चेटी तेरे जैसी चंचल थी, वो मेरे जंघा पे छड़ी, मेने कछुना कियो मेरे पेटपे छड़ी मेने कछुना कियो पर मेरे मुख ते छड़ी तो खुजली होने लगी तक खुजली करते हुए माखन मुह पे लग गयो, बाकि मेने खाया तो नहीं, . गोपी बोली.. आज में तोहे छोड़ ने वाली नही हु, . ठाकुर जी बोले सखी मोहे जाने दे, सखी मोहे छोड़ दे, सखी अब कभी चोरी नही करूँगा, . सखी तेरी कसम , सखी तेरे बाबा की कसम, सखी तेरे भैया की कसम, सखी तेरे फूफा की कसम सखी तेरे भुआ की कसम, सखी तेरे मामा की कसम, सखी तेरे खसम की कसम, अब कभी चोरी नही करूँगा .. . गोपी बोली रे मेरे रिश्तेदरो को ही मार रहा है, एक, दो, तो तेरे भी नाम ले, . ठाकुर जी की कोमल वाणी से गोपी को दया आ गई की छोटो सो लालो है सायद घर भूल गया होगा, और ठाकुर जी बच निकले, ऐसे है ये माखन चोर ... ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ (((((((((( जय जय श्री राधे ))))))))))

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (तीन सौ ईक्यासी वाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनम: श्रीरामजी के विविध प्रश्न और श्रीवसिष्ठजी के द्वारा उनके उत्तर...(भाग 4) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी ने कहा – रघुनन्दन ! बोधस्वरूप जीवन्मुक्त की स्वरूपभूता जो बोधता है, वही उसमें विशुद्ध अहंता कहलाती है। तत्वज्ञानी का मैं और तुम भी उसके स्वरूपभूत ज्ञान से भिन्न नहीं है। उसमें जो द्वैतरूप व्यवहार देखा जाता है, वह वायु और उसके स्पन्दन की भाँति अद्वैतरूप ही है। श्रीरामजी ने पूछा-भगवन् ! संसार को स्वप्न की भाँति मिथ्या समझ लेनेमात्र से कौन-सा अभीष्ट फल सिद्ध होता है ? स्वप्न आदि में पदार्थों की साकारता कैसे शान्त होती है ? श्रीवसिष्ठजी ने कहा – रघुनन्दन ! अध्यात्मशास्त्र के पूर्वापर के विवेक पूर्वक विचार से ज्ञानोदय होने पर पदार्थों में साकारता या स्थूलता की भावना शान्त हो जाती है। वे सब-के-सब चिन्मय ब्रह्मरूप ही है, ऐसा अटल निश्चय हो जाता है। इसी तरह स्वप्न के पदार्थों में भी (जागने पर) स्थूलता की भावना निवृत्त हो जाती है। श्रीरामजी ने पूछा–जिसकी भावना स्थूलता को छोड़कर अत्यन्त सूक्ष्मता को प्राप्त हो गयी है, वह जगत् को कैसा देखता है ? उसका यह संसारभ्रम कैसे शान्त होता है ? श्रीवसिष्ठजी ने कहा- वासना के क्षीण हो जाने पर पुरुष जगत् को उजड़ा हुआ, असत् के सदृश, आकाश में दीखने वाले गन्धर्वनगर के समान और वर्षा द्वारा मिटाये गये चित्र के तुल्य देखता है । श्रीरामजी ने पूछा-मुने! बासना के क्षीण हो जाने पर जिसके लिये जगत् की स्थिति स्वप्न के तुल्य हो जाती है, उस पुरुष की जागतिक पदार्थों के विषय में जब स्थूलता की भावना मिट जाती है, तब फिर क्या होता है ! श्रीवसिष्ठजी ने कहा-घुनन्दन ! जिसकी दृष्टि में जगत् केवल संकल्परूप है, उस पुरुष की वह अति सूक्ष्म वासना भी उत्तरोत्तर क्रम से विलीन हो जाती है। इस तरह सर्वथा वासनाशून्य होकर वह शीघ्र ही निर्वाण मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है। श्रीरामजी ने पूछा- ब्रह्मन् ! जो अनेक जन्मों से बद्धमूल अनेक शाखा-प्रशाखाओं से सुशोभित तथा जन्म-मरणरूपी बन्धन में डालने वाली है, वह घोर वासना किस उपाय से पूर्णतः शान्त हो जाती है ? श्रीवसिष्ठजी ने कहा- रघुनन्दन यथार्थ तत्वज्ञान से जब यह भ्रममात्र दृश्यचक्र स्थूल रूपता से रहित अनुभूत हो जाता है, तब क्रमशः उसकी वासना का क्षय होने लगता है। श्रीरामजी ने पूछा – मुने जब दृश्यचक्र स्थूलाकारता से रहित अनुभूत हो जाता है, तब और क्या होता है ! पूर्ण शान्ति कैसे होती है ? श्रीवसिष्ठजी ने कहा – श्रीराम ! स्थूलाकारता का भ्रम मिट जाने पर जब जगत् की केवल चित्तमात्ररूपता अगवत हो जाती है और चित्तवृत्तियों के निरोध से जगत् में गौरवबुद्धि नहीं रहती है, तब जगत् के प्रति होने वाली आस्था शान्त हो जाती है श्रीरामजी ने पूछा – भगवन् ! चित्त कैसा है! उसका विचार कैसे किया जाता है और उसके स्वरूप का मीति विचार कर लेने पर क्या होता है ? यह बताइये । श्रीवसिष्ठजी ने कहा – रघुनन्दन चेतन का चेतनीय विषयों की ओर उन्मुख होना ही चित्त कहलाता है। इस समय जो चर्चा चल रही है। यही इसका विचार है। इससे इसकी वासना शान्त हो जाती है। क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ नवम स्कन्ध, अथाष्टमोऽध्यायः सगर-चरित्र...(भाग 2) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सुमत्यास्तनया दृप्ताः पितुरादेशकारिणः । हयमन्वेषमाणास्ते समन्तान्न्यखनन् महीम् ।।९ प्रागुदीच्यां दिशि हयं ददृशुः कपिलान्तिके। एष वाजिहरश्चौर आस्ते मीलितलोचनः ।। १० हन्यतां हन्यतां पाप इति षष्टिसहस्रिणः । उदायुधा अभिययुरुन्मिमेष तदा मुनिः ||११ स्वशरीराग्निना तावन्महेन्द्रहृतचेतसः । महद्व्यतिक्रमहता भस्मसादभवन् क्षणात् ।।१२ न साधुवादो मुनिकोपभर्जिता नृपेन्द्रपुत्रा इति सत्त्वधामनि कथं तमो रोषमयं विभाव्यते जगत्पवित्रात्मनि खे रजो भुवः ||१३ यस्येरिता सांख्यमयी दृढेह नौ र्यया मुमुक्षुस्तरते दुरत्ययम् । भवार्णवं मृत्युपथं विपश्चितः परात्मभूतस्य कथं पृथङ्मतिः ।।१४ योऽसमंजस इत्युक्तः स केशिन्या नृपात्मजः । तस्य पुत्रोंऽशुमान् नाम पितामहहिते रतः ।।१५ असमंजस आत्मानं दर्शयन्नसमंजसम् । जातिस्मरः पुरा संगाद् योगी योगाद् विचालितः ।।१६ आचरन् गर्हितं लोके ज्ञातीनां कर्म विप्रियम् । सरय्वां क्रीडतो बालान् प्रास्यदुद्वेजयञ्जनम् ।।१७ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ उस समय महारानी सुमति के गर्भ से उत्पन्न सगर के पुत्रों ने अपने पिता के आज्ञानुसार घोड़े के लिये सारी पृथ्वी छान डाली। जब उन्हें कहीं घोड़ा न मिला, तब उन्होंने बड़े घमण्ड से सब ओर से पृथ्वी को खोद डाला ॥९॥ खोदते खोदते उन्हें पूर्व और उत्तर के कोने पर कपिलमुनि के पास अपना घोड़ा दिखायी दिया। घोड़े को देखकर वे साठ हजार राजकुमार शस्त्र उठाकर यह कहते हुए उनकी ओर दौड़ पड़े कि 'यही हमारे घोड़े को चुराने वाला चोर है। देखो तो सही, इसने इस समय कैसे आँखें मूँद रखी हैं। यह पापी है। इसको मार डालो, मार डालो!' उसी समय कपिलमुनि ने अपनी पलकें खोलीं ।।१०-११।। इन्द्र ने राजकुमारों की बुद्धि हर ली थी, इसीसे उन्होंने कपिलमुनि-जैसे महापुरुष का तिरस्कार किया। इस तिरस्कार के फलस्वरूप उनके शरीर में ही आग जल उठी जिससे क्षणभर में ही वे सब-के-सब जलकर खाक हो गये ॥१२॥ परीक्षित् ! सगर के लड़के कपिलमुनि के क्रोध से जल गये, ऐसा कहना उचित नहीं है। वे तो शुद्ध सत्त्वगुण के परम आश्रय हैं। उनका शरीर तो जगत्‌ को पवित्र करता रहता है। उनमें भला क्रोधरूप तमोगुण की सम्भावना कैसे की सकती है। भला, कहीं पृथ्वी की धूल का भी आकाश से सम्बन्ध होता है? ||१३|| यह संसार सागर एक मृत्युमय पथ है। इसके पार जाना अत्यन्त कठिन है। परन्तु कपिलमुनि ने इस जगत्‌ में सांख्यशास्त्र की एक ऐसी दृढ़ नाव बना दी है जिससे मुक्ति की इच्छा रखने वाला कोई भी व्यक्ति उस समुद्र के पार जा सकता है। वे केवल परम ज्ञानी ही नहीं, स्वयं परमात्मा हैं। उनमें भला, यह शत्रु है और यह मित्र- इस प्रकार की भेदबुद्धि कैसे हो सकती है? ।।१४।। सगर की दूसरी पत्नी का नाम था केशिनी। उसके गर्भ से उन्हें असमंजस नाम का पुत्र हुआ था। असमंजस के पुत्र का नाम था अंशुमान्। वह अपने दादा सगर की आज्ञाओं के पालन तथा उन्हीं की सेवा में लगा रहता ||१५|| असमंजस पहले जन्म में योगी थे। संग के कारण वे योग से विचलित हो गये थे, परन्तु अब भी उन्हें अपने पूर्वजन्म का स्मरण बना हुआ था। इसलिये वे ऐसे काम किया करते थे, जिनसे भाई-बन्धु उन्हें प्रिय न समझें। वे कभी-कभी तो अत्यन्त निन्दित कर्म कर बैठते और अपने को पागल सा दिखलाते- यहाँ तक कि खेलते हुए बच्चों को सरयू में डाल देते! इस प्रकार उन्होंने लोगों को उद्विग्न कर दिया था ।।१६-१७।। क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (आठवां स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 5 (भाग 1) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ भूमण्डल के विस्तार का और आम्र, जाम्बू, कदम्ब एवं वटवृक्ष के फलों के रस से प्रकट हुई नदियों का वर्णन तथा गंगाजी के अवतरण का वृत्तान्त... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ भगवान् नारायण कहते हैं- देवर्षि नारद! अब द्वीपों के वर्ष-विभाजन का प्रसंग विस्तार पूर्वक सुनो। पहले लाख योजन के परिमाण में जम्बूद्वीप का निर्माण हुआ है। इस विशाल द्वीप की आकृति इस प्रकार गोल है, जैसे कमल-बीज का कोश हो। इस द्वीप में हजार हजार योजन तक फैले हुए नौ वर्ष हैं। चारों ओर से पर्वतों ने इन्हें घेर रखा है। आठ बड़े-बड़े पर्वतों से ये वर्ष विभाजित हैं। दो वर्षों को धनुषाकार समझना चाहिये, जो दक्षिण से उत्तर तक फैले हैं। वहीं चार और विशाल वर्ष हैं। एक इलावृत नाम का वर्ष है, जिसके चारों कोने बराबर-बराबर हैं। इस इलावृत को मध्यवर्ष कहते हैं। यह जम्बूद्वीप की नाभि के स्थान पर प्रतिष्ठित है। वहीं लाख योजन ऊँचा यह सुमेरु पर्वत है। यह पर्वत ही गोलाकार पृथ्वीरूपी कमल का बीजकोश है। इसकी चोटी बत्तीस योजन के विस्तार में है। इस पर्वत की जड़ सोलह हजार योजन की दूरी में फैली है और इतने ही योजन तक नीचे जमीन में धँसी है। इलावृत वर्ष के उत्तर सीमा के रूप में तीन पर्वत कहे गये हैं। उन पर्वतों के नाम हैं— नील, श्वेत और शृंगवान् । दूसरा सुवर्णमय वर्ष रम्यक वर्ष के नाम से प्रसिद्ध है। तीसरा कुरुवर्ष है। उक्त पर्वत इन सभी वर्षों की सीमा व्यक्त करते हैं। ये वर्ष आगे की ओर फैले हुए हैं। दोनों ओर की सीमा क्षार समुद्र है। उसकी चौड़ाई दो हजार योजन से अधिक है। क्रमशः एक-से-एक पूर्व की ओर बढ़ते गये हैं। उत्तर में एक-एक दशांश का अन्तर होता गया है और चौड़ाई में क्रमशः कमी होती गयी है। ये वर्ष बहुत-सी नदियों और समुद्रों से सम्पन्न हैं । इलावृतवर्ष के दक्षिण ओर निषध, हेमकूट और हिमालय नामक बहुत लम्बे-चौड़े तीन विशाल पर्वत शोभा पाते हैं। कहा जाता है कि ये पर्वत दस हजार योजन ऊँचे हैं। हरिवर्ष, किम्पुरुष और भारतवर्ष इन तीन वर्षों का विभागानुसार यथार्थ वर्णन मिलता है। निषध, हेमकूट और हिमालय- ये तीन पर्वत इनकी सीमा हैं। इलावृत के पश्चिमभाग में माल्यवान् नाम का पर्वत है। पूर्व की ओर श्रीमान् गन्धमादन पर्वत सुशोभित है। ये दोनों विशाल पर्वत नीलगिरि से लेकर निषध पर्वत तक दो हजार योजन की दूरी में फैले हुए हैं। इनकी चौड़ाई भी पर्याप्त है। ये दोनों पर्वत वर्ष की सीमा निश्चित करते हैं। केतुमाल और भद्राश्ववर्ष की सीमा इन माल्यवान् एवं गन्धमादन पर्वत पर निर्भर है। माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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Jitendra Singh May 24, 2022

रामावतार की यज्ञ-सीताओं और गोपियों का क्या है सम्बन्ध ? गोपियों का एक यूथ ‘रामावतार में यज्ञ में स्थापित सीताजी की प्रतिमाओं’ का था । कैसे यज्ञ-सीताएं गोपी रूप में अवतरित हुईं—वहीं प्रसंग इस प्रस्तुति में दिया जा रहा है। श्रीमद्भागवत में ‘गोपी’ शब्द का अर्थ परमात्मा को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा बताया गया है । कल्पों तक कठोर तपस्या करके जो पूर्ण त्याग और अपने मधुर प्रेम के द्वारा प्रियतम श्रीकृष्ण को सुख पहुंचाने के लिए वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे, वे श्रुतियां, ब्रह्मविद्या, बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, देवकन्याएं गोपी बनकर व्रज में आए । इसके अतिरिक्त रामावतार में श्रीराम को देखकर मुग्ध होने वाले दण्डकवन के ऋषि-मुनि, जनकपुर की निवासिनी स्त्रियां, कोसलपुर की स्त्रियां, अयोध्या की स्त्रियां, भीलकन्याएं आदि जो भगवान का आलिंगन करना चाहते थे–उन्हें भगवान के वरदान स्वरूप व्रज में गोपीरूप में अवतीर्ण होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था । इस प्रकार गोपियों के अनेक यूथ थे । भगवान श्रीकृष्ण ब्रह्माजी से कहते हैं—‘जिनको मैं पूर्व के युगों में वर दे चुका हूँ, वे सब मेरे पुण्यमय व्रज में गोपीरूप में पधारेंगी ।’ कृष्णावतार में गोपियों का एक यूथ ‘रामावतार में यज्ञ में स्थापित सीताजी की प्रतिमाओं’ का था । कैसे यज्ञ-सीताएं गोपी रूप में अवतरित हुईं—वहीं प्रसंग इस ब्लॉग में दिया जा रहा है । रामावतार की यज्ञ में स्थापित की हुई सीताएं और गोपियाँ!!!!!! लंका विजय के बाद जब प्रभु श्रीराम का राज्याभिषेक हो गया तो एक दिन वे अपनी प्रजा का हाल-चाल जानने के लिए गुप्त रूप से विचरण कर रहे थे । वहां उन्होंने एक धोबी को अपनी पत्नी की भर्त्सना करते हुए सुना । श्रीराम ने लोकापवाद के कारण अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर दिया । निर्वासन के समय सीताजी महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहीं । इस अवधि में प्रभु श्रीराम ने एक आदर्श राजा के रूप में वैदिक धर्म की रक्षा के लिए यज्ञ का अनुष्ठान किया; किन्तु अश्वमेध-यज्ञ में यजमान का सपत्नीक होना अनिवार्य है । अत: मुनि वशिष्ठ की आज्ञानुसार सीताजी की स्वर्णमयी प्रतिमा का निर्माण कराकर यज्ञ-कार्य आरम्भ किया गया । जब-जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम यज्ञ करते, तब-तब विधिपूर्वक सीताजी की एक स्वर्ण की प्रतिमा बनवायी जाती । इस तरह यज्ञ मंदिर में सीताजी की अनेकों सुवर्णमयी प्रतिमाएं एकत्रित हो गईं । एक दिन वे सभी यज्ञ में स्थापित सीता की स्वर्णमयी प्रतिमाएं चैतन्य होकर कान्ताभाव से श्रीराम की सेवा में उपस्थित हुईं । श्रीराम ने सीताजी के प्रति अपने अनन्य अनुराग का परिचय देते हुए कहा— ‘देवियो ! ‘एक-पत्नी व्रत धरोऽहं’ । मैंने एक-पत्नी-व्रत धारण किया है; अत: मैं आपको स्वीकार नहीं कर सकता ।’ श्रीराम के प्रति प्रेमपरायणा हुईं उन यज्ञ-सीताओं ने कहा—‘प्रभु ! हम भी तो मिथिलेशकुमारी स्वरूपा हैं । हम तो आपकी सेवा करने वाली हैं और उत्तम व्रत का पालन करने वाली सतियां हैं । यज्ञ-कार्य के संचालन के लिए आपने हमको अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया था । आप धर्म पर अडिग रहने वाले हैं, वेदों के ज्ञाता हैं; फिर आप ये अधर्मपूर्ण बात कैसे कह सकते हैं ? यदि आप हमारा हाथ पकड़ करके अब परित्याग करते हैं तो आपको पाप का भागी होना पड़ेगा ।’ तब प्रभु श्रीराम ने कहा—‘देवियो ! आप सबने सत्य कहा है; परन्तु अभी तो मैं एक-पत्नी व्रती हूँ । सभी लोग मुझे ‘राजर्षि’ कहते हैं । अत: नियम को छोड़ भी नहीं सकता । द्वापर युग के अंत में आप सभी गोपी स्वरूप को प्राप्त कर वृन्दावन में पधारना; तब आपके मनोरथ पूर्ण होंगे ।’ भगवान श्रीराम के वर से यज्ञ-सीताएं वृन्दावन में गोपों के घर में गोपांगनाएं होकर जन्मीं । उनके शरीर दिव्य थे । एक दिन वे सभी गोपियां श्रीकृष्ण का दर्शन कर मोहित हो गईं और श्रीराधा के पास जाकर बोलीं— ‘वृषभानुनंदिनी ! आप हमें श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए कोई व्रत बताएं, नंदनन्दन तो तुम्हारे वश में रहते हैं ।’ श्रीराधा ने कहा—‘श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिए तुम सब एकादशी-व्रत का अनुष्ठान करो । उससे श्रीहरि तुम्हारे वश में हो जाएंगे ।’ एकादशी-व्रत की महिमा सुनकर यज्ञ-सीता स्वरूपा गोपिकाओं ने श्रीकृष्ण-दर्शन की लालसा से विधिपूर्वक एकादशी का व्रत-अनुष्ठान किया । इस व्रत से प्रसन्न होकर भगवान श्रीकृष्ण ने मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा की रात्रि में उन सबके साथ महारास किया और उनके कल्प-कल्पांतर के मनोरथ पूर्ण किए ।

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Jitendra Singh May 24, 2022

🍂🌹राधा कुन्ड की कथा🌹🍂 🌞श्री कृष्ण ने जिस दिन अरिष्टासुर का वध किया, उसी दिन रात्रिकाल में इसी स्थल पर श्रीकृष्ण के साथ श्री राधिका आदि प्रियाओं का मिलन हुआ। श्रीकृष्ण ने बड़े आतुर होकर राधिका का आलिंगन करने के लिए अपने कर पल्लवों को बढ़ाया, उस समय राधिका परिहास करती हुई पीछे हट गयी और बोलीं– आज तुमने एक वृष (गोवंश) की हत्या की है। इसलिए तुम्हें गो हत्या का पाप लगा है, अत: मरे पवित्र अंगों का स्पर्श मत करो। किन्तु कृष्ण ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। –प्रियतमे! मैंने एक असुर का वध किया है। उसने छलकर साँड का वेश बना लिया था। अत: मुझे पाप कैसे स्पर्श कर सकता है? राधिका ने कहा- जैसा भी हो तुमने साँड के रूप में ही उसे मारा हैं। अत: गो हत्या का पाप अवश्य ही तुम्हें स्पर्श कर रहा है। सखियों ने भी इसका अनुमोदन किया। प्रायश्चित्त का उपाय पूछने पर राधिकाजी ने मुस्कराते हुए भूमण्डल के समस्त तीर्थों में स्नान को ही प्रायश्चित्त बतलाया। ऐसा सुनकर श्रीकृष्ण ने अपनी एड़ी की चोट से एक विशाल कुण्ड का निर्माण कर उसमें भूमण्डल के सारे तीर्थों को आह्वान किया। साथ ही साथ असंख्य तीर्थ रूप धारण कर वहाँ उपस्थित हुए। कृष्ण ने उन्हें जलरूप से उस कुण्ड में प्रवेश करने को कहा। कुण्ड तत्क्षणात परम पवित्र एवं निर्मल जल से परिपूर्ण हो गया। श्रीकृष्ण उस कुण्ड में स्नान कर राधिकाजी को पुन: स्पर्श करने के लिए अग्रसर हुए: किन्तु राधिका स्वयं उससे भी सुन्दर जलपूर्ण वृहद कुण्ड को प्रकाश कर प्रियतम के आस्फालन का उत्तर देना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने तुनक-कर पास में ही सखियों के साथ अपने कंकण के द्वारा एक परम मनोहर कुण्ड का निर्माण किया। किन्तु उसमें एक बूँद भी जल नहीं निकला। कृष्ण ने परिहास करते हुए गोपी|गोपियों को अपने कुण्ड से जल लेने के लिए कहा, किन्तु राधिकाजी अपनी अगणित सखियों के साथ घड़े लेकर मानसी गंगा से पानी भर लाने के लिए प्रस्तुत हुई, किन्तु श्रीकृष्ण ने तीर्थों को मार्ग में सत्याग्रह करने के लिए इंगित किया। तीर्थों ने रूप धारणकर सखियों सहित राधिकाजी की बहुत सी स्तुतियाँ कीं, राधिकाजी ने प्रसन्न होकर अपने कुण्ड में उन्हें प्रवेश करने की अनुमति दी। साथ ही साथ तीर्थों के जल प्रवाह ने कृष्णकुण्ड से राधाकुण्ड को भी परिपूर्ण कर दिया। श्रीकृष्ण ने राधिका एवं सखियों के साथ इस प्रिय कुण्ड में उल्लासपूर्वक स्नान एवं जल विहार किया। अर्धरात्रि के समय दोनों कुण्डों का प्रकाश हुआ था। उस दिन कार्तिक माह की कृष्णाष्टमी थी, अत: उस बहुलाष्टमी की अर्द्धरात्रि में लाखों लोग यहाँ स्नान करते हैं। 🌹🙏जय श्री राधे कृष्णा जी 🙏🌹

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