💐🌲🌹शुभ शनिवार🌹🌲💐 🌀🌹🎇शुभसंध्या 🎇🌹🌀 🎎((गोपी गीत इतना श्रेष्ठ क्यों है))🎎 ******************************* 🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇🍇 🌷श्रीमद्भागवत में दशम स्कंध में गोपी गीत आता है। ये गोपी गीत भगवान कृष्ण को साक्षात् पाने का मन्त्र है। भगवान कृष्ण को पाने के जितने भी तरीके हैं या होंगे उनमे से एक गोपी गीत है। इस गोपी गीत(gopi geet) में उन्नीस श्लोक हैं। जब भगवान शरद पूर्णिमा की रात में रास लीला का प्रारम्भ करते है तो कुछ समय बाद गोपियों को मान हो जाता है कि इस जगत में हमारा भाग्य ही सबसे श्रेष्ठ है भगवान उनके मन की बात समझकर बीच रास से अंतर्ध्यान हो जाते है, 🌹व्यक्ति केवल दो ही जगह जा सकता है, एक है संसार और दूसरा है आध्यात्म या भगवान. जैसे ही भगवान से हटकर गोपियों का मन अपने ही भाग्य पर चला गया यहाँ भगवान बता रहे है कि जैसे ही भक्त मुझसे मन हटाता है वैसे ही मै चला जाता हूँ। 🎎भगवान सहसा अंतर्धान हो गये:-% 💐उन्हें न देखकर व्रजयुवतियो के हदय में विरह की ज्वाला जलने लगी – भगवान की मदोन्मत्त चाल, प्रेमभरी मुस्कान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्न-भिन्न प्रकार की लीलाओ और श्रृंगाररस की भाव-भंगियो ने उनके चित्त को चुरा लिया था. वे प्रेम की मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयी और फिर श्रीकृष्ण की विभिन्न चेष्टाओं और लीलाओ का अनुकरण करने लगी. अपने प्रियतम की चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन- बोलन आदि मे श्रीकृष्ण की प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयी. 🌹सर्वथा भूलकर ‘श्रीकृष्ण स्वरुप’ हो गयी:- 🌋उनके शरीर में भी वही गति-मति वही भाव-भंगिमा उतर आयी, वे अपने को सर्वथा भूलकर ‘श्रीकृष्ण स्वरुप’ हो गयी. ‘मै श्रीकृष्ण ही हूँ’ इस प्रकार कहने लगी वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वर से उन्ही के गुणों का गान करने लगी. मतवाली होकर एक वन से दूसरे वन में एक झाड़ी से दूसरी झाड़ी में जा-जाकर श्रीकृष्ण को ढूँढने लगी. वे पेड-पौधों से उनका पता पूछने लगी – हे पीपल, बरगद! नंदनंदन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुस्कान और चितवन से हमारा मन चुराकर चले गये है क्या तुमने उन्हें देखा है ? 🎸एक ही स्वर में, ‘गोपी-गीत’ गाया :- 🎎जब भगवान उन्हें कही नहीं मिले तो श्रीकृष्ण के ध्यान में डूबी गोपियाँ यमुना जी के पावन पुलिन पर रमणरेती में लौट आयी और एक साथ मिलकर श्रीकृष्ण के गुणों का गान करने लगी.सबने एक साथ, एक ही स्वर में, ‘गोपी-गीत‘ गाया. जब सब गोपियों के मन की दशा एक जैसी ही थी, सबके भाव की एक ही दशा थी, तब उन करोड़ो गोपियों के मुँह से एक ही गीत, एक साथ निकला,इसमें आश्चर्य कैसा ? गोपी गीत में उन्नीस श्लोक है. गोपी गीत `कनक मंजरी’ छंद में है. ये गोपी गीत बड़ा ही विलक्षण ,आलौकिक है जो नित्य इस गोपी गीत पाठ करता है भगवान श्री कृष्ण जी में उसका प्रेम होता है और उसे उनकी अनुभूति होती है. 🎎भगवान के अन्तर्धान होने का एक कारण और था भगवान गोपियों के प्रेम को जगत को दिखाना चाहते थे कि गोपियाँ मुझसे कितना प्रेम करती है. नीचे पूरा गोपी गीत दिया गया है। आप उस गोपी गीत का एक एक श्लोक पढ़िए और उसका मर्म जानिए। यदि आप ह्रदय से , भगवान के प्रेम में डूबकर, सब कुछ भुलाकर गोपी गीत नहीं पढ़ेंगे तो आपको कुछ भी समझ नहीं आने वाला है। इसलिए मन को भगवान के चरणों में सौंपकर गोपी गीत का पाठ कीजिये। 🦚🌹जय श्री राधे कृष्ण🌹🦚 🦚 🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚🦚 🩸🩸🩸🩸🩸🩸🩸🩸🩸🩸🩸🩸🩸

💐🌲🌹शुभ शनिवार🌹🌲💐
🌀🌹🎇शुभसंध्या 🎇🌹🌀
🎎((गोपी गीत इतना श्रेष्ठ क्यों है))🎎
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🌷श्रीमद्भागवत में दशम स्कंध में गोपी गीत आता है। ये गोपी गीत भगवान कृष्ण को साक्षात् पाने का मन्त्र है। भगवान कृष्ण को पाने के जितने भी तरीके हैं या होंगे उनमे से एक गोपी गीत है। इस गोपी गीत(gopi geet) में उन्नीस श्लोक हैं। जब भगवान शरद पूर्णिमा की रात में रास लीला का प्रारम्भ करते है तो कुछ समय बाद गोपियों को मान हो जाता है कि  इस जगत में हमारा भाग्य ही सबसे श्रेष्ठ है भगवान उनके मन की बात समझकर बीच रास से अंतर्ध्यान हो जाते है,

🌹व्यक्ति केवल दो ही जगह  जा सकता है, एक है संसार और दूसरा है आध्यात्म या भगवान. जैसे ही भगवान से हटकर गोपियों का मन अपने ही भाग्य पर चला गया यहाँ भगवान बता रहे है कि जैसे ही भक्त मुझसे मन हटाता है वैसे ही मै चला जाता हूँ।

🎎भगवान सहसा अंतर्धान हो गये:-%

💐उन्हें न देखकर व्रजयुवतियो के हदय में विरह की ज्वाला जलने लगी – भगवान की मदोन्मत्त चाल, प्रेमभरी मुस्कान, विलासभरी चितवन, मनोरम प्रेमालाप, भिन्न-भिन्न प्रकार की लीलाओ और श्रृंगाररस की भाव-भंगियो ने उनके चित्त को चुरा लिया था. वे प्रेम की मतवाली गोपियाँ श्रीकृष्णमय हो गयी और फिर श्रीकृष्ण की विभिन्न चेष्टाओं और लीलाओ का अनुकरण करने लगी. अपने प्रियतम की चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन- बोलन आदि मे श्रीकृष्ण की प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयी.

🌹सर्वथा भूलकर ‘श्रीकृष्ण स्वरुप’ हो गयी:-

🌋उनके शरीर में भी वही गति-मति वही भाव-भंगिमा उतर आयी, वे अपने को सर्वथा भूलकर ‘श्रीकृष्ण स्वरुप’ हो गयी. ‘मै श्रीकृष्ण ही हूँ’ इस प्रकार कहने लगी वे सब परस्पर मिलकर ऊँचे स्वर से उन्ही के गुणों का गान करने लगी. मतवाली होकर एक वन से दूसरे वन में एक झाड़ी से दूसरी झाड़ी में जा-जाकर श्रीकृष्ण को ढूँढने लगी. वे पेड-पौधों से उनका पता पूछने लगी – हे पीपल, बरगद! नंदनंदन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुस्कान और चितवन से हमारा मन चुराकर चले गये है क्या तुमने उन्हें देखा है ?

🎸एक ही स्वर में, ‘गोपी-गीत’ गाया :-

🎎जब भगवान उन्हें कही नहीं मिले तो श्रीकृष्ण के ध्यान में डूबी गोपियाँ यमुना जी के पावन पुलिन पर रमणरेती में लौट आयी और एक साथ मिलकर श्रीकृष्ण के गुणों का गान करने लगी.सबने एक साथ, एक ही स्वर में, ‘गोपी-गीत‘ गाया.

जब सब गोपियों के मन की दशा एक जैसी ही थी, सबके भाव की एक ही दशा थी, तब उन करोड़ो गोपियों के मुँह से एक ही गीत, एक साथ निकला,इसमें आश्चर्य कैसा ? गोपी गीत में उन्नीस श्लोक है. गोपी गीत `कनक मंजरी’ छंद में है.

ये गोपी गीत बड़ा ही विलक्षण ,आलौकिक है जो नित्य इस गोपी गीत  पाठ करता है भगवान श्री कृष्ण जी में उसका प्रेम होता है और उसे उनकी अनुभूति होती है.

🎎भगवान के अन्तर्धान होने का एक कारण और था भगवान गोपियों के प्रेम को जगत को दिखाना चाहते थे कि गोपियाँ मुझसे कितना  प्रेम करती है.
नीचे पूरा गोपी गीत दिया गया है। आप उस गोपी गीत का एक एक श्लोक पढ़िए और उसका मर्म जानिए। यदि आप ह्रदय से , भगवान के प्रेम में डूबकर, सब कुछ भुलाकर गोपी गीत नहीं पढ़ेंगे तो आपको कुछ भी समझ नहीं आने वाला है। इसलिए मन को भगवान के चरणों में सौंपकर गोपी गीत का पाठ कीजिये।
       🦚🌹जय श्री राधे कृष्ण🌹🦚
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कामेंट्स

Anup Kumar Sinha Aug 29, 2021
जय श्री कृष्ण🙏🙏 ऊँ सूर्य देवाय नमः 🙏🙏 शुभ दोपहर वंंदन, भाई जी ।सारे जगत को प्रकाशित करने वाले भगवान भास्कर आपके जीवन को भी खुशियाँ रूपी प्रकाश से प्रकाशित कर दें 🙏🌹

Gd Bansal Aug 29, 2021
जय श्री कृष्ण

Bindu Singh Aug 29, 2021
Jai shree krishna ji Radhe Radhe ji bhai sahab ji pranam ji 🙏🏼🌷

RAKESH SHARMA Aug 29, 2021
JAGATPRAKASHIT KARNE WALE AROGYA SURYE DEV AASHIRWAD KRP AP AUR PARIWAR PAR HUMESHA BANI RAHE AP SABHI KO YASH VAIBHV KIRTI DHAN SUKH SHANTI SMIRIDDHI DIRGHAYU PRADAN HO 🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹

RAKESH SHARMA Aug 29, 2021
GOD BLESS UR DAY WITH SMILE LAUGHTER KINDNESS MERCY And PEACE HAVE A GREAT WONDERFUL AMAZING DAY GOOD AFTERNOON JI🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹

Seema Sharma (Himachal) Aug 29, 2021
अगर आपने दर्द में भी मुस्कुराना सीख लिया तो समझिए आपने जिन्दगी जीना सीख लिया आपका हर पल सुंदर और मंगलमय आनंदमय हो 🌷🌺🌹🌷🌹😊🌹🌷😊 शुभ दोपहर जी 😊🙏🌹 thanks ji 🙏😊

shree Shukla Aug 29, 2021
Jay Shri Radha Krishna 🙏🏻 shubh dopahar vandan ji 🙏🏻 Radhe Radhe Ji 🙏🏻

manish...Soni... Aug 29, 2021
जय राधे कृष्णा जी . हर हर महादेव. ... गुड आफ्टरनून जी.... ... 🙏🌹🙏.....

Ashwinrchauhan Aug 29, 2021
ॐ सूर्य देवाय नमः शुभ रविवार भगवान सूर्य नारायण देव की कृपा आप पर आप के पुरे परिवार पर सदेव बनी रहे आप का हर पल मंगल एवं शुभ रहे आरोग्य के देवता सूर्य नारायण देव आप की हर मनोकामना पूरी करे आप का आने वाला दिन शुभ रहे शुभ दोपहर वंदन भाईजी

🇮🇳🇮🇳GEETA DEVI 🇮🇳🇮🇳 Aug 29, 2021
RADHEY RADHEY...🙏🌹🌹 BEAUTIFUL GOOD EVENING MY SWEET BHAIYA JEE... 🍀🍀🎉 🌷🌷🙏GOD BLESS U AND UR ALL FAMILY ALWAYS BE HAPPY AND HEALTHY LONG LIFE 🙏🌷🌷 HAVE A GOOD DAY ALWAYS KEEP SMILING MY SWEET BHAIYA JEE... 🍹🍹🍰🍰🤗🤗👌👌🎈🎈🎉🙏🙏🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀🌹🌹🍀🍀

🔹🌼🇮🇳हरि प्रिय पाठक🇮🇳🌼🔹 Aug 29, 2021
🎉🎈🎉🎈🎉🎈🎉🎈🎉🎈 🌻🌹🌻।।जय श्री कृष्ण।।🌻🌹🌻 "कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः " 🍁🌼🍁🌼🍁🌼🍁🌼🍁🌼 राधे राधे जी,आप एवं आपके परिवार को श्री कृष्ण जन्माष्टमी की अग्रिम बधाई जी,शुभ रात्रि विश्राम ,आप की रात्रि सकूँन भरा कृष्णमय होजी। 🌺🌹🌺‼️🙏‼️🌺🌹🌺

🙋ⒶⓃⒿⒶⓁⒾ😊 ⓂⒾⓈⒽⓇⒶ🙏 Aug 29, 2021
☀️ॐ सूर्याय नमः🌤️राम राम जी आदरणीय भइया जी शुभ रात्रि वंदन 🌹🙏भगवान सूर्यनारायण आपको सदैव स्वस्थ और निरोग रखें 👌आप और आपका समस्त परिवार सदा स्वस्थ रहें सुखी रहें हंसते मुस्कुराते रहें 😊जय श्री राधे कृष्णा जी 🙏☘️हर हर महादेव ☘️🚩🙏

Brajesh Sharma Aug 29, 2021
शुभ रात्रि वंदन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय... जय श्री राधे कृष्णा जी... ॐ नमः शिवाय.. हर हर महादेव आप हर पल खुश रहें मस्त रहें स्वस्थ रहें

नरेश श्रीहरि 🙏 Aug 30, 2021
जय श्री कृष्णा जय जय श्री राधे 🙏🌺🕉️🌺🙏 श्री कृष्ण जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनाएं शुभ प्रभात वंदन

🛕काशी विश्वनाथ धाम🛕Drs Aug 30, 2021
@devkivarindani 🦚🌹सुप्रभात वंदन दीदी🌹🦚 🙏आपको सपरिवार 🎂भगवान श्री कृष्ण जन्मोत्सव और अगस्त माह के अंतिम 🔱शिवमय सोमवार की हार्दिक शुभकामनाएं🌹 👏आप और आपके पूरे परिवार पर भगवान श्री कृष्ण जी और बाबा भोलेनाथ की कृपा सदा बनी रहे जी🙏 🌸आपका दिन शुभ और मंगलमय हो🌹

श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सप्तम: स्कन्ध: अथैकादशोऽध्यायः मानवधर्म, वर्णधर्म और स्त्रीधर्म का निरूपण...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीशुक उवाच श्रुत्वेहितं साधुसभासभाजितं महत्तमाप्रण्य उरुक्रमात्मनः । युधिष्ठिरो दैत्यपतेर्मुदा युतः पप्रच्छ भूयस्तनयं स्वयम्भुवः ॥ १ युधिष्ठिर उवाच भगवज्छ्रोतुमिच्छामि नृणां धर्मं सनातनम्। वर्णाश्रमाचारयुतं यत् पुमान्विन्दते परम् ॥ २ भवान्प्रजापतेः साक्षादात्मजः परमेष्ठिनः । सुतानां सम्मतो ब्रह्मंस्तपोयोगसमाधिभिः ॥ ३ नारायणपरा विप्रा धर्मं गुह्यं परं विदुः । करुणा: साधवः शान्तास्त्वद्विधा न तथापरे ॥ ४ नारद उवाच नत्वा भगवतेऽजाय लोकानां धर्महेतवे । वक्ष्ये सनातनं धर्मं नारायणमुखाच्छ्रुतम् ॥ ५ योऽवतीर्यात्मनोंऽशेन दाक्षायण्यां तु धर्मतः । लोकानां स्वस्तयेऽध्यास्ते तपो बदरिकाश्रमे ॥६ धर्ममूलं हि भगवान्सर्ववेदमयो हरिः । स्मृतं च तद्विदां राजन्येन चात्मा प्रसीदति ॥७ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ श्रीशुकदेवजी कहते हैं- भगवन्मय प्रह्लादजी के साधुसमाज में सम्मानित पवित्र चरित्र सुनकर संतशिरोमणि युधिष्ठिर को बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने नारदजी से और भी पूछा।।१।। युधिष्ठिरजी ने कहा – भगवन् ! अब मैं वर्ण और आश्रमों के सदाचार के साथ मनुष्यों के सनातनधर्म का श्रवण करना चाहता हूँ, क्योंकि धर्म से ही मनुष्य को ज्ञान, भगवत् प्रेम और साक्षात् परम पुरुष भगवान्‌ की प्राप्ति होती है ॥ २ ॥ आप स्वयं प्रजापति ब्रह्माजी के पुत्र हैं और नारदजी ! आपकी तपस्या, योग एवं समाधि के कारण वे अपने दूसरे पुत्रों की अपेक्षा आपका अधिक सम्मान भी करते हैं ॥ ३ ॥ आपके समान नारायण-परायण, दयालु, सदाचारी और शान्त ब्राह्मण धर्म के गुप्त-से- गुप्त रहस्य को जैसा यथार्थरूप से जानते हैं, दूसरे लोग वैसा नहीं जानते ॥ ४ ॥ नारदजी ने कहा- युधिष्ठिर! अजन्मा भगवान् ही समस्त धर्मोकि मूल कारण हैं। वही प्रभु चराचर जगत् के कल्याण के लिये धर्म और दक्षपुत्री मूर्ति के द्वारा अपने अंश से अवतीर्ण होकर बदरिकाश्रम में तपस्या कर रहे हैं। उन नारायण भगवान्‌ को नमस्कार करके उन्हीं के मुख से सुने हुए सनातन धर्म का मैं वर्णन करता हूँ ॥ ५-६ ।। युधिष्ठिर ! सर्ववेदस्वरूप भगवान् श्रीहरि, उनका तत्त्व जानने वाले महर्षियों की स्मृतियाँ और जिससे आत्मग्लानि न होकर आत्मप्रसाद की उपलब्धि हो, वह कर्म धर्म के हैं मूल है ॥ ७ ॥ क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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श्रीमद्देवीभागवत (छठा स्कन्ध) 〰️〰️🌼〰️🌼🌼〰️🌼〰️〰️ अध्याय 8 (भाग 2) ॥श्रीभगवत्यै नमः ॥ देवताओं का बृहस्पतिजी से परामर्श, बृहस्पतिजी की सम्पति के अनुसार कार्य-सम्पादन, इन्द्राणी पर देवी की कृपा, नहुष का मुनियों की पालकी पर सवार होना और मुनि के शाप से नहुष का पतन तथा उसे सर्प-योनि की प्राप्ति... 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ व्यासजी कहते हैं - देवताओं की बात सुनकर बृहस्पतिजी ने उन्हें उत्तर दिया- "परम साध्वी शची मेरे यहाँ शरणार्थी बनकर आयी हैं। मैं इनका त्याग नहीं करूँगा। एक उपाय है- एक बार शची राजा नहुष के सामने जायँ और उससे कहें कि 'मैं तुम्हारी सेवा अवश्य करूँगी; परंतु पहले यह पता लगा लूँ कि मेरे पति जीवित तो नहीं हैं। सम्भव है, मेरे पतिदेव इन्द्र जीवित हों; ऐसी स्थिति में मैं दूसरे को कैसे स्वामी बना सकती हूँ। अतः उन महाभाग को खोजने के लिये एक बार मेरे लिये वापस लौटना आवश्यक है।' इन्द्राणी को चाहिये कि इस प्रकार कहकर नहुष को धोखे में डाल दे, फिर जैसा मैं बताऊँ, उसके अनुसार पतिदेव को ले आने का प्रयत्न करना चाहिये।" इस प्रकार आपस में परामर्श करके जितने भी देवता थे, वे सब-के-सब शची को साथ लेकर नहुष के पास पहुँचे। जब उस बनावटी इन्द्र नहुष ने देखा कि देवता आ गये और साथ में शची भी है, तब उसके हर्ष की सीमा न रही। वह ठहाका मारकर हँसा और शची से कहने लगा – 'प्रिये! चारुलोचने! इस समय मैं इन्द्र के पदपर प्रतिष्ठित हूँ। देवताओं ने मुझे यह गौरव प्रदान किया है। अखिल भूमण्डल का शासन-सूत्र मेरे हाथ में है। अतः अब तुम मेरी सेवा में आ जाओ।' नहुष के यों कहने पर इन्द्राणी के शरीर में कँपकँपी छूट गयी। उसका हृदय आतंकित हो गया। फिर सँभलकर वे उससे कहने लगीं- 'देवेश्वर के पद पर शोभा पाने वाले नरेश! आपसे मैं एक अभिलषित वर की याचना करती हूँ। उस समय तक आप प्रतीक्षा करें – जबतक कि मैं यह निर्णय न कर लूँ कि मेरे पति इन्द्र जीवित हैं या नहीं; क्योंकि इस बात का संदेह मेरे मन में बना हुआ है। अभीतक मुझे ठीक-ठीक पता ही नहीं कि उनका मरण हो गया अथवा वे कहीं चले गये।' शची ने जब इस प्रकार नहुष से कहा, तब उसके मुख पर प्रसन्नता छा गयी। 'बहुत ठीक है, ऐसा ही हो' कहकर बड़े उत्साह के साथ नहुष ने शची देवी को वहाँ से जाने की आज्ञा दे दी। उससे छुटकारा पाने पर इन्द्राणी तुरंत देवताओं के पास गयीं और उनसे कहा ‘आपलोग बड़े उद्यमशील पुरुष हैं। अब मेरे पतिदेव को यहाँ लौटा लाने का प्रयत्न कीजिये ।' शची देवी के इस पवित्र एवं मधुर वचन को सुनकर देवता बड़ी सावधानी के साथ इन्द्र के विषय में विचार करने लगे। जय माता जी की क्रमश... शेष अगले अंक में जय माता जी की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

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संक्षिप्त भविष्य पुराण 〰️〰️🌸🌸🌸〰️〰️ ★उत्तरपर्व (चतुर्थ खण्ड)★ (दोसौ उनसठवाँ दिन) ॐ श्री परमात्मने नमः श्री गणेशाय नमः ॐ नमो भगवते वासुदेवाय हेमहस्त्तिरथ दान की विधि...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं – महाराज! अब इसके बाद मैं मङ्गलमय सुवर्णनिर्मित हस्तिरथदान का वर्णन कर रहा हूँ, जिससे मनुष्य विष्णुलोक में जाता है। किसी पुण्यतिथि के आने पर संक्रान्ति या ग्रहणकाल में बुद्धिमान् यजमान को मणियों से सुशोभित देवताओं के रथ के आकार का सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियों से युक्त हो, बनवाना चाहिये। उसमें स्वर्णनिर्मित चार श्रेष्ठ हाथी भी रहने चाहिये। उस रथ को कृष्णमृगचर्म के ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिव की प्रतिमाओं से युक्त हो । उसके मध्यभाग में लक्ष्मी सहित विष्णुभगवान्‌ की भी मूर्ति होनी चाहिये। उसके ध्वज पर गरुड तथा जुआ के अग्रभाग पर विनायक को स्थापित करना चाहिये। वह नाना प्रकार के फलों से युक्त हो और उसके ऊपर चँदोवा तना हो। वह पँचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पों से सुशोभित हो । नरोत्तम! अपनी शक्ति के अनुसार उस रथ को पाँच पल से ऊपर सौ पल सोने तक का बनवाना चाहिये । इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणों द्वारा माङ्गलिक शब्दों के उच्चारण के साथ स्नान कराया गया यजमान देवताओं और पितरों की अभ्यर्चना करे। अञ्जलि में फूल लेकर तीन बार रथ की प्रदक्षिणा करे तथा सम्पूर्ण सुखों को प्रदान करने वाले इन मन्त्रों का उच्चारण करे नमो नमः शङ्करपद्मजार्क लोकेशविद्याधरवासुदेवैः त्वं सेव्यसे वेदपुराणयज्ञै स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात् ॥ यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारे रानन्दहेतुगुणरूपविमुक्तवन्तम् योगैकमानसदृशो मुनयः समाधौ पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ ॥ यस्मात् त्वमेव भवसागरसम्प्लुताण्ड • मानन्दभारमृतमध्वरपानपात्रम् तस्मादघौघशमनेन कुरु प्रसादं चामीकरेभरथ माधव सम्प्रदानात् ॥ (उत्तरपर्व १८९ । ९-११) ‘तेजोमय स्यन्दन! शंकर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। रथाधिरूढ स्वामिन् ! जो पद परम गुह्यतम, सनातन, आनन्द का हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टि वाले मुनिगण जिसका समाधिकाल में दर्शन करते हैं, वह आप ही हैं। माधव! चूँकि आप ही भवसागर में डूबने वालों के लिये आनन्द के पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञों में पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथ के दान से मेरे पापपुञ्जों को नष्टकर मुझ पर कृपा कीजिये ।' जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथ-दान करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और विद्याधर, देवगण एवं मुनीन्द्रगणों द्वारा सेवित इन्द्रियातीत भगवान् शिव के लोक को प्राप्त करता है तथा अपने बन्धुओं, पितरों, पुत्रों एवं सम्पूर्ण बान्धवों को विष्णुभगवान्‌ के शाश्वत लोक में ले जाता है। जय श्रीराम क्रमश... शेष अगले अंक में 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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संक्षिप्त योगवशिष्ठ (निर्वाण-प्रकरण-उत्तरार्ध) (दो सौ उन्नीसवाँ दिन) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्री गणेशाय नमः ॐ श्रीपरमात्मनेनमः आत्मा या ब्रह्म को समता, सर्वरूपता तथा द्वैतशून्यता का प्रतिपादन; जीवात्मा की ब्रह्मभावना से संसार- निवृत्ति का वर्णन...(भाग 1) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ श्रीवसिष्ठजी कहते हैं— रघुनन्दन ! सर्वत्र व्यापक परमात्मा एक होता हुआ ही सभी रूपों में विराजमान है। उसमें अज्ञानवश ही अनेकता की कल्पना हुई है । ज्ञान हो जाने पर तो न वह एक है और न अनेक या सर्वरूप ही; फिर उसमें नानात्व की कल्पना कैसे हो सकती है । आदि-अन्त से रहित सारा आकाश चित्तत्व – सच्चिदानन्द परब्रह्म परमात्मा से परिपूर्ण है । फिर शरीर की उत्पत्ति और विनाश होने पर भी उस चेतन तत्त्व का खण्डन कैसे हो सकता है । अमावास्या के बाद जब प्रतिपदा को चन्द्रमा की एक कला उदित होती है, तब समुद्र आनन्द के मारे उछलने लगता है और जब प्रलयकाल की प्रचण्ड वायु चलती है, तब वह सूख जाता है। परंतु आत्मतत्त्व कभी किसी अवस्था में न तो क्षुब्ध होता है और न क्षीण ही होता है । वह सदा समभाव से सौम्य बना रहता है। जैसे नाव पर यात्रा करने वाले पुरुष को स्थावर वृक्ष और पर्वत आदि चलते-से प्रतीत होते हैं तथा जैसे सीपी में लोगों को चाँदी का भ्रम होता है, उसी प्रकार चित्त को चिन्मय परमात्मा में देहादिरूप जगत् की प्रतीति होती है। यह शरीर आदि चित्त की कल्पना है और शरीर आदि की दृष्टि से चित्त की कल्पना हुई है। इसी प्रकार देह और चित्त दोनों की दृष्टि से जीवभाव की कल्पना हुई है । वास्तव में ये सब-के-सब परमपदस्वरूप परब्रह्म परमात्मा में बिना हुए हो प्रतीत होते हैं अथवा ये सब-के-सब चिन्मय परम तत्त्व से भिन्न नहीं हैं; ऐसी दशा में द्वैत कहाँ रहा: परब्रह्म परमात्मा का यथार्थ ज्ञान होने पर यह सब कुछ एकमात्र शान्त स्वरूप ब्रह्म ही सिद्ध होता है । अतः ब्रह्म के सिवा जगत् आदि दूसरा कोई पदार्थ नहीं है और न दूसरी कोई भ्रान्ति ही है । रघुनन्दन वासनायुक्त जीवात्मा की भावना से जगत् सम्पत्ति का प्रादुर्भाव होता है और वासनाशून्य जीवात्मा की ब्रह्मभावना से संसार को निवृत्ति होती है । जीवात्मा का जो वासनारहित विशुद्ध स्पन्दन (भावना ) है, उसे स्पन्दन माना ही नहीं गया है, जैसे समुद्र में भँवर आदि के द्वारा भीतर घुसती हुई तरङ्ग स्पन्दनशील होने पर भी स्पन्दनशून्य ही मानी जाती है। किंतु जन्म की कारणभूता जो जीवात्मा की दृश्यभावना है, उसके भीतर जो वासनारस विद्यमान है, वही अङ्कर प्रकट करता है; अतः उसी को असङ्गरूप अग्नि से जलाकर भस्म कर देना चाहिये। मनुष्य कर्म करता हो या न करता हो; परंतु शुभाशुभ कार्यों में वह जो मन से डूब नहीं जाता, उसकी इस अनासक्ति को ही विद्वान् पुरुष असङ्ग मानते हैं अथवा वासना को उखाड़ फेंकना ही असङ्ग कहा गया है । अहंभाव का त्याग करना ही संसार-सागर से पार होना है और उसी का नाम वासनाक्षय है । इसके लिये अपने पुरुषार्थ के सिवा दूसरी कोई गति नहीं है। श्रीराम ! तुम तो आत्माराम और पूर्णकाम हो ही । सारी इच्छाओं से रहित निश्शङ्क हो समस्त कार्य करते हुए भी केवल अपने चिन्मय स्वरूप में ही स्थित हो । भय तुमसे सदा दूर ही रहता है । अतः अपनी सहज शान्ति के द्वारा सबके मनोऽभिराम बने रहो। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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Rameshannd Guruji Nov 26, 2021

भैरव की उत्पत्ति । 🌹🙏जय श्री काल भैरवनाथ संकलित : ----रमेशानंद गुरुजी ब्रह्मा और विष्णु में एक समय विवाद छिड़ा कि परम तत्व कौन है ?उस समय वेदों से दोनों ने पूछा : - क्योंकि वेद ही प्रमाण माने जाते हैं ।वेदों ने कहा कि सबसे श्रेष्ठ शंकर हैं ।ब्रह्मा जी के पहले पाँच मस्तक थे ।उनके पाँचवें मस्तक ने शिव का उपहास करते हुए , क्रोधित होते हुए कहा कि रुद्र तो मेरे भाल स्थल से प्रकट हुए थे , इसलिए मैंने उनका नाम " रुद्र ' रखा है । अपने सामने शंकर को प्रकट हुए देख उस मस्तक ने कहा कि हे बेटा !तुम मेरी शरण में आओ , मैं तुम्हारी रक्षा करूँगा । ( स्कंद पुराण , काशी खण्ड अध्याय ३० ) भैरव का नामकरण इस प्रकार गर्व युक्त ब्रह्मा जी की बातें सुनकर भगवान शिव अत्यंत क्रोधित हो उठे और अपने अंश से भैरवाकृति को प्रकट किया ।शिव ने उससे कहा कि " काल भैरव ' ! तुम इस पर शासन करो । साथ ही उन्होंने कहा कि तुम साक्षात " काल ' के भी कालराज हो ।तुम विश्व का भरण करने में समर्थ होंगे , अतः तुम्हारा नाम " भैरव ' भी होगा । तुमसे काल भी डरेगा , इसलिए तुम्हें “ काल भैरव ' भी कहा जाएगा । दुष्टात्माओं का तुम नाश करोगे , अतः तुम्हें “ आमर्दक ' नाम से भी लोग जानेंगे ।हमारे और अपने भक्तों के पापों का तुम तत्क्षण भक्षण करोगे , फलतः तुम्हारा एक नाम " पापभक्षण ' भी होगा । श्री तत्वनिधि नाम तंत्र - मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुस्पष्ट परिचय मिलता है , क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं ' भ ' अक्षरवाली जो भैरव मूर्ति है वह श्यामला है , भद्रासन पर विराजमान है तथा उदय कालिकसूर्य के समान सिंदूरवर्णी उसकी कांति है ।वह एक मुखी विग्रह अपने चारों हाथों में धनुष , बाण वर तथा अभय धारण किए हुए हैं ।' र ' अक्षरवाली भैरव मूर्ति श्याम वर्ण हैं ।उनके वस्त्र लाल हैं ।सिंह पर आरूढ़ वह पंचमुखी देवी अपने आठ हाथों में खड्ग , खेट ।( मूसल ) , अंकुश , गदा , पाश , शूल , वर तथा अभय धारण किए हुए ' व ' अक्षरवाली भैरवी शक्ति के आभूषण और नरवरफाटक सामान श्वेत हैं ।वह देवी समस्त लोकों का एकमात्र आश्रय है ।विकसित कमल पुष्प उनका आसन है ।वे चारों हाथों में क्रमशः दो कमल , वर एवं अभय धारण करती हैं । स्कंदपुराण के काशी - खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है ।गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए , तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी ' काशी ' में आकर दोष मुक्त हुए ।ब्रह्मवैवत पुराण के प्रकृति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं - महाभैरव , संहार भैरव , असितांग भैरव , रूरू भैरव , काल भैरव , क्रोध भैरव , ताम्रचूड भैरव , चंद्रचूड भैरव ।लेकिन इसी पुराण के गणपति - खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है ।तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग , रूरू , चंड , क्रोध , उन्मत्त , कपाली , भीषण संहार नाम वाले हैं ।भैरव कलियुग के जागृत देवता हैं ।शिव पुराण में भैरव को महादेव शंकर का पूर्ण रूप बताया गया है ।इनकी आराधना में कठोर नियमों का विधान भी नहीं है ।ऐसे परम कृपालु एवं शीघ्र फल देने वाले भैरवनाथ की शरण में जाने पर जीव का निश्चय ही उद्धार हो जाता है । 🌹🙏जय श्री काल भैरवनाथ🌹🙏 🌹🙏रमेशानन्द गुरूजी

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sn vyas Nov 26, 2021

*‼️महाभारत की अनसुनी कथाएं‼️* ---------------------- *🏹कौरवोंके विनाशके कारण शकुनी🏹* ---------------------- *एक साधु के कहे अनुसार गांधारी का विवाह पहले एक बकरे के साथ किया गया था। बाद मैं उस बकरे की बलि दे दी गयी थी।* *यह बात गांधारी के विवाह के समय छुपाई गयी थी। जब ध्रतराष्ट्र को इस बात का पता चला तो उसने गांधार नरेश सुबाला और उसके 100 पुत्रों को कारावास मैं डाल दिया और काफी यातनाएं दी।* *एक एक करके सुबाला के सभी पुत्र मरने लगे। उन्हैं खाने के लिये सिर्फ मुट्ठी भर चावल दिये जाते थे।* *सुबाला ने अपने सबसे छोटे बेटे शकुनि को प्रतिशोध के लिये तैयार किया।* *सब लोग अपने हिस्से के चावल शकुनि को देते थे ताकि वह जीवित रह कर कौरवों का नाश कर सके।* *मृत्यु से पहले सुबाला ने ध्रतराष्ट्र से शकुनि को छोड़ने की बिनती की जो ध्रतराष्ट्र ने मान ली।* *सुबाला ने शकुनि को अपनी रीढ़ की हड्डी के पासे बनाने के लिये कहा, वही पासे कौरव वंश के नाश का कारण बने।* *शकुनि ने हस्तिनापुर में सबका विश्वास जीता और 100 कौरवों का अभिवावक बना।* *उसने ना केवल दुर्योधन को युधिष्ठिर के खिलाफ भडकाया बल्कि महाभारत के युद्ध का आधार भी बनाया।* *🙏 जय श्री कृष्ण🙏*

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श्रीमद्भागवत महापुराणम् 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ सप्तम: स्कन्ध: अथ दशमोऽध्यायः प्रह्लाद जी के राज्याभिषेक और त्रिपुर दहन की कथा...(भाग 9) 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ तेऽसुरा ह्यपि पश्यन्तो न न्यषेधन्विमोहिताः । तद् विज्ञाय महायोगी रसपालानिदं जगौ ॥ ६३ स्वयं विशोकः शोकार्तान्स्मरन्दैवगतिं च ताम् । देवोऽसुरो नरोऽन्यो वा नेश्वरोऽस्तीह कश्चन ॥ ६४ आत्मनोऽन्यस्य वा दिष्टं दैवेनापोहितुं द्वयोः । अथासौ शक्तिभिः स्वाभिः शम्भोः प्राधनिकं व्यधात् ॥ ६५ धर्मज्ञानविरक्त्यृद्धितपोविद्याक्रियादिभिः । रथं सूतं ध्वजं वाहान्धनुर्वर्म शरादि यत् ॥ ६६ सन्नद्धो रथमास्थाय शरं धनुरुपाददे । शरं धनुषि सन्धाय मुहूर्तेऽभिजितीश्वरः ॥ ६७ ददाह' तेन दुर्भेद्या हरोऽथ त्रिपुरो नृप । दिवि दुन्दुभयो नेदुर्विमानशतसङ्कुलाः ॥ ६८ देवर्षिपितृसिद्धेशा जयेति कुसुमोत्करैः । अवाकिरञ्जगुर्हष्टा ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥ ६९ एवं दग्ध्वा पुरस्तिस्रो भगवान्पुरहा नृप । ब्रह्मादिभिः स्तूयमानः स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥ ७० एवंविधान्यस्य हरेः स्वमायया विडम्बमानस्य नृलोकमात्मनः । वीर्याणि गीतान्यृषिभिर्जगद्गुरो र्लोकान् पुनानान्यपरं वदामि किम् ॥ ७१ श्लोकार्थ 〰️〰️〰️ यद्यपि उसके रक्षक दैत्य इन दोनों को देख रहे थे, फिर भी भगवान् की माया से वे इतने मोहित हो गये कि इन्हें रोक न सके । जब उपाय जानने वालों में श्रेष्ठ मयासुर को यह बात मालूम हुई, तब भगवान्‌ की इस लीला का स्मरण करके उसे कोई शोक न हुआ। शोक करने वाले अमृत रक्षकों से उसने कहा – 'भाई ! देवता, असुर, मनुष्य अथवा और कोई भी प्राणी अपने, पराये अथवा दोनों के लिये जो प्रारब्ध का विधान है, उसे मिटा नहीं सकता। जो होना था, हो गया। शोक करके क्या करना है ?" इसके बाद भगवान् श्रीकृष्ण ने अपनी शक्तियों के द्वारा भगवान् शङ्कर के युद्ध की सामग्री तैयार की ॥ ६३-६५ ॥ उन्होंने धर्म से रथ, ज्ञान से सारथि, वैराग्य से ध्वजा, ऐश्वर्य से घोड़े, तपस्या से धनुष, विद्या से कवच, क्रिया से बाण और अपनी अन्यान्य शक्तियों से अन्यान्य वस्तुओं का निर्माण किया ॥ ६६ ॥ इन सामग्रियों से सज-धजकर भगवान् शङ्कर रथपर सवार हुए एवं धनुष-बाण धारण किया। भगवान् शङ्कर ने अभिजित् मुहूर्त में धनुष पर बाण चढ़ाया और उन तीनों दुर्भेद्य विमानों को भस्म कर दिया। युधिष्ठिर ! उसी समय स्वर्ग में दुन्दुभियाँ बजने लगीं। सैकड़ों विमानों की भीड़ लग गयी ॥ ६७-६८ ॥ देवता, ऋषि, पितर और सिद्धेश्वर आनन्द से जय-जयकार करते हुए पुष्पों की वर्षा करने लगे। अप्सराएँ नाचने और गाने लगीं ॥ ६९ ॥ युधिष्ठिर ! इस प्रकार उन तीनों पुरों को जलाकर भगवान् शङ्कर ने ‘पुरारि' की पदवी प्राप्त की और ब्रह्मादिकों की स्तुति सुनते हुए अपने धाम को चले गये ॥ ७० ॥ आत्मस्वरूप जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण इस प्रकार अपनी माया से जो मनुष्यों की-सी लीलाएँ करते हैं, ऋषिलोग उन्हीं अनेकों लोकपावन लीलाओं का गान किया करते हैं। बताओ, अब मैं तुम्हें और क्या सुनाऊँ ? ।। ७१ ॥ क्रमशः... शेष अलगे लेख में... 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

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