Seemma Valluvar
Seemma Valluvar Oct 22, 2021

कहानी राजा भरथरी (भर्तृहरि) की ========================= उज्जैन में भरथरी की गुफा स्थित है। इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है। गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है। यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था। यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा। यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है। गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है। पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :- उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से। पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे। कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ। गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी। यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए। राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12 वर्षों तक तपस्या की थी। राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी। भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है। उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे थे। एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’ शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए। गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है। शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’ भरथरी अपने निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए। सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो। ‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया? छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’ गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’ गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की। भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’। अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी। एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए। भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’ गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’

कहानी राजा भरथरी (भर्तृहरि) की  
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उज्जैन में  भरथरी  की गुफा स्थित है।  इसके संबंध में यह माना जाता है कि यहां भरथरी ने तपस्या की थी। यह गुफा शहर से बाहर एक सुनसान इलाके में है।  गुफा के पास ही शिप्रा नदी बह रही है। 

गुफा के अंदर जाने का रास्ता काफी छोटा है। जब हम इस गुफा के अंदर जाते हैं तो सांस लेने में भी कठिनाई महसूस होती है। गुफा की ऊंचाई भी काफी कम है, अत: अंदर जाते समय काफी सावधानी रखनी होती है।  यहाँ पर एक गुफा और है जो कि पहली गुफा से छोटी है। यह  गोपीचन्द कि गुफा है जो कि भरथरी का भतीजा था।

यहां प्रकाश भी काफी कम है, अंदर रोशनी के लिए बल्ब लगे हुए हैं। इसके बावजूद गुफा में अंधेरा दिखाई देता है। यदि किसी व्यक्ति को डर लगता है तो उसे गुफा के अंदर अकेले जाने में भी डर लगेगा।

 यहां की छत बड़े-बड़े पत्थरों के सहारे टिकी हुई है। गुफा के अंत में राजा भर्तृहरि की प्रतिमा है और उस प्रतिमा के पास ही एक और गुफा का रास्ता है। इस दूसरी गुफा के विषय में ऐसा माना जाता है कि यहां से चारों धामों का रास्ता है। गुफा में भर्तृहरि की प्रतिमा के सामने एक धुनी भी है, जिसकी राख हमेशा गर्म ही रहती है।

गौर से देखने पर आपको गुफा के अंत में एक गुप्त रास्ता दिखाई देगा जिसके बारे में कहा जाता है कि यहाँ से चारो धामों को रास्ता जाता है।

पत्नी के धोखे से आहत राजा भरथरी के साधू बनने कि कहानी :-

उज्जैन को उज्जयिनी के नाम से भी जाना जाता था। उज्जयिनी शहर के परम प्रतापी राजा हुए थे विक्रमादित्य। विक्रमादित्य के पिता महाराज गंधर्वसेन थे और उनकी दो पत्नियां थीं। एक पत्नी के पुत्र विक्रमादित्य और दूसरी पत्नी के पुत्र थे भर्तृहरि। 

गंधर्वसेन के बाद उज्जैन का राजपाठ भर्तृहरि को प्राप्त हुआ, क्योंकि भरथरी विक्रमादित्य से बड़े थे। राजा भर्तृहरि धर्म और नीतिशास्त्र के ज्ञाता थे। प्रचलित कथाओं के अनुसार भरथरी की दो पत्नियां थीं, लेकिन फिर भी उन्होंने तीसरा विवाह किया पिंगला से।  पिंगला बहुत सुंदर थीं और इसी वजह से भरथरी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित हो गए थे।

कथाओं के अनुसार भरथरी अपनी तीसरी पत्नी पिंगला पर काफी मोहित थे और वे उस पर अंधा विश्वास करते थे। राजा पत्नी मोह में अपने कर्तव्यों को भी भूल गए थे। उस समय उज्जैन में एक तपस्वी गुरु गोरखनाथ का आगमन हुआ।

 गोरखनाथ राजा के दरबार में पहुंचे। भरथरी ने गोरखनाथ का उचित आदर-सत्कार किया। इससे तपस्वी गुरु अति प्रसन्न हुए। प्रसन्न होकर गोरखनाथ ने राजा एक फल दिया और कहा कि यह खाने से वह सदैव जवान बने रहेंगे, कभी बुढ़ापा नहीं आएगा, सदैव सुंदरता बनी रहेगी।

यह चमत्कारी फल देकर गोरखनाथ वहां से चले गए। राजा ने फल लेकर सोचा कि उन्हें जवानी और सुंदरता की क्या आवश्यकता है। चूंकि राजा अपनी तीसरी पत्नी पर अत्यधिक मोहित थे, अत: उन्होंने सोचा कि यदि यह फल पिंगला खा लेगी तो वह सदैव सुंदर और जवान बनी रहेगी। 

यह सोचकर राजा ने पिंगला को वह फल दे दिया। रानी पिंगला भर्तृहरि पर नहीं बल्कि उसके राज्य के कोतवाल पर मोहित थी। यह बात राजा नहीं जानते थे। जब राजा ने वह चमत्कारी फल रानी को दिया तो रानी ने सोचा कि यह फल यदि कोतवाल खाएगा तो वह लंबे समय तक उसकी इच्छाओं की पूर्ति कर सकेगा। 

रानी ने यह सोचकर चमत्कारी फल कोतवाल को दे दिया। वह कोतवाल एक वैश्या से प्रेम करता था और उसने चमत्कारी फल उसे दे दिया। ताकि वैश्या सदैव जवान और सुंदर बनी रहे। 

वैश्या ने फल पाकर सोचा कि यदि वह जवान और सुंदर बनी रहेगी तो उसे यह गंदा काम हमेशा करना पड़ेगा। नर्क समान जीवन से मुक्ति नहीं मिलेगी। इस फल की सबसे ज्यादा जरूरत हमारे राजा को है। राजा हमेशा जवान रहेगा तो लंबे समय तक प्रजा को सभी सुख-सुविधाएं देता रहेगा। यह सोचकर उसने चमत्कारी फल राजा को दे दिया। राजा वह फल देखकर हतप्रभ रह गए।

राजा ने वैश्या से पूछा कि यह फल उसे कहा से प्राप्त हुआ। वैश्या ने बताया कि यह फल उसे कोतवाल ने दिया है। भरथरी ने तुरंत कोतवाल को बुलवा लिया। सख्ती से पूछने पर कोतवाल ने बताया कि यह फल उसे रानी पिंगला ने दिया है। 

जब भरथरी को पूरी सच्चाई मालूम हुई तो वह समझ गया कि पिंगला उसे धोखा दे रही है। पत्नी के धोखे से भरथरी के मन में वैराग्य जाग गया और वे अपना संपूर्ण राज्य विक्रमादित्य को सौंपकर उज्जैन की एक गुफा में आ गए। इसी गुफा में भरथरी ने 12  वर्षों तक तपस्या की थी।

राजा भरथरी की कठोर तपस्या से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। इंद्र ने सोचा की भरथरी वरदान पाकर स्वर्ग पर आक्रमण करेंगे। यह सोचकर इंद्र ने भरथरी पर एक विशाल पत्थर गिरा दिया। तपस्या में बैठे भरथरी ने उस पत्थर को एक हाथ से रोक लिया और तपस्या में बैठे रहे। 

इसी प्रकार कई वर्षों तक तपस्या करने से उस पत्थर पर भरथरी के पंजे का निशान बन गया। यह निशान आज भी भरथरी की गुफा में राजा की प्रतिमा के ऊपर वाले पत्थर पर दिखाई देता है। यह पंजे का निशान काफी बड़ा है, जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि राजा भरथरी की कद-काठी कितनी विशालकाय रही होगी।

भरथरी ने वैराग्य पर वैराग्य शतक की रचना की, जो कि काफी प्रसिद्ध है। इसके साथ ही भरथरी ने श्रृंगार शतक और नीति शतक की भी रचना की। यह तीनों ही शतक आज भी उपलब्ध हैं और पढ़ने योग्य है।

उज्जैन के राजा भरथरी के पास 365 पाकशास्त्री यानि रसोइए थे, जो राजा और उसके परिवार और अतिथियों के लिए भोजन बनाने के लिए। एक रसोइए को वर्ष में केवल एक ही बार भोजन बनाने का मोका मिलता था। लेकिन इस दौरान भरथरी जब गुरु गोरखनाथ जी के चरणों में चले गये तो भिक्षा मांगकर खाने लगे  थे।

एक बार गुरु गोरखनाथजी ने अपने शिष्यों से कहा, ‘देखो, राजा होकर भी इसने काम, क्रोध, लोभ तथा अहंकार को जीत लिया है और दृढ़निश्चयी है।‘ शिष्यों ने कहा, ‘गुरुजी ! ये तो राजाधिराज हैं, इनके यहां 365 तो बावर्ची रहते थे। 

ऐसे भोग विलास के वातावरण में से आए हुए राजा और कैसे काम, क्रोध, लोभ रहित हो गए?’ 

गुरु गोरखनाथ जी ने राजा भरथरी से कहा, ‘भरथरी! जाओ, भंडारे के लिए जंगल से लकड़ियां ले आओ।’ राजा भरथरी नंगे पैर गए, जंगल से लकड़ियां एकत्रित करके सिर पर बोझ उठाकर ला रहे थे। 

गोरखनाथ जी ने दूसरे शिष्यों से कहा, ‘जाओ, उसको ऐसा धक्का मारो कि बोझ गिर जाए।‘ चेले गए और ऐसा धक्का मारा कि बोझ गिर गया और भरथरी गिर गए। भरथरी ने बोझ उठाया, लेकिन न चेहरे पर शिकन, न आंखों में आग के गोले, न होंठ फड़के। गुरु जी ने चेलों से क, ‘देखा! भरथरी ने क्रोध को जीत लिया है।’

शिष्य बोले, ‘गुरुजी! अभी तो और भी परीक्षा लेनी चाहिए।’ थोड़ा सा आगे जाते ही गुरुजी ने योगशक्ति से एक महल रच दिया। गोरखनाथ जी भरथरी को महल दिखा रहे थे। युवतियां नाना प्रकार के व्यंजन आदि से सेवक उनका आदर सत्कार करने लगे। भरथरी युवतियों को देखकर कामी भी नहीं हुए और उनके नखरों पर क्रोधित भी नहीं हुए, चलते ही गए।

गोरखनाथजी ने शिष्यों को कहा, अब तो तुम लोगों को विश्वास हो ही गया है कि भरथरी े काम, क्रोध, लोभ आदि को जीत लिया है।

 शिष्यों ने कहा, गुरुदेव एक परीक्षा और लीजिए। गोरखनाथजी ने कहा, अच्छा भरथरी  हमारा शिष्य बनने के लिए परीक्षा से गुजरना पड़ता है। जाओ, तुमको एक महीना मरुभूमि में नंगे पैर पैदल यात्रा करनी होगी।’

 भरथरी अपने  निर्दिष्ट मार्ग पर चल पड़े। पहाड़ी इलाका लांघते-लांघते राजस्थान  की मरुभूमि में पहुंचे। धधकती बालू, कड़ाके की धूप मरुभूमि में पैर रखो तो बस जल जाए। एक दिन, दो दिन यात्रा करते-करते छः दिन बीत गए।

 सातवें दिन गुरु गोरखनाथजी अदृश्य शक्ति से अपने प्रिय चेलों को भी साथ लेकर वहां पहुंचे। गोरखनाथ जी बोले, ‘देखो, यह भरथरी जा रहा है। मैं अभी योगबल से वृक्ष खड़ा कर देता हूं। वृक्ष की छाया में भी नहीं बैठेगा।’ अचानक वृक्ष खड़ा कर दिया। चलते-चलते भरथरी का पैर वृक्ष की छाया पर आ गया तो ऐसे उछल पड़े, मानो अंगारों पर पैर पड़ गया हो।

‘मरुभूमि में वृक्ष कैसे आ गया?  छायावाले वृक्ष के नीचे पैर कैसे आ गया? गुरु जी की आज्ञा थी मरुभूमि में यात्रा करने की।’ कूदकर दूर हट गए। गुरु जी प्रसन्न हो गए कि देखो! कैसे गुरु की आज्ञा मानता है। जिसने कभी पैर गलीचे से नीचे नहीं रखा, वह मरुभूमि में चलते-चलते पेड़ की छाया का स्पर्श होने से अंगारे जैसा एहसास करता है।’

 गोरखनाथ जी दिल में चेले की दृढ़ता पर बड़े खुश हुए, लेकिन और शिष्यों के मन में ईर्ष्या थी। शिष्य बोले, ‘गुरुजी! यह तो ठीक है लेकिन अभी तो परीक्षा पूरी नहीं हुई।’ गोरखनाथ जी (रूप बदल कर) भर्तृहरि से मिले और बोले, ‘जरा छाया का उपयोग कर लो।’ भरथरी बोले, ‘नहीं, मेरे गुरुजी की आज्ञा है कि नंगे पैर मरुभूमि में चलूं।’

 गोरखनाथ जी ने सोचा, ‘अच्छा! कितना चलते हो देखते हैं।’ थोड़ा आगे गए तो गोरखनाथ जी ने योगबल से कांटे पैदा कर दिए। ऐसी कंटीली झाड़ी कि कंथा (फटे-पुराने कपड़ों को जोड़कर बनाया हुआ वस्त्र) फट गया। पैरों में शूल चुभने लगे, फिर भी भरथरी ने ‘आह’ तक नहीं की।

 भरथरी तो और अंतर्मुख हो गए, ’यह सब सपना है, गुरु जी ने जो आदेश दिया है, वही तपस्या है। यह भी गुरुजी की कृपा है’।

अंतिम परीक्षा के लिए गुरु गोरखनाथ जी ने अपने योगबल से प्रबल ताप पैदा किया। प्यास के मारे भरथरी के प्राण कंठ तक आ गये। तभी गोरखनाथ जी ने उनके अत्यन्त समीप एक हरा-भरा वृक्ष खड़ा कर दिया, जिसके नीचे पानी से भरी सुराही और सोने की प्याली रखी थी।

 एक बार तो भर्तृहरि ने उसकी ओर देखा पर तुरंत ख्याल आया कि कहीं गुरु आज्ञा भंग तो नहीं हो रही है। उनका इतना सोचना ही हुआ कि सामने से गोरखनाथ आते दिखाई दिए।

 भरथरी ने दंडवत प्रणाम किया। गुरुजी बोले, ”शाबाश भरथरी, वर मांग लो। अष्टसिद्धि दे दूं, नवनिधि दे दूं। तुमने सुंदर-सुंदर व्यंजन ठुकरा दिए, युवतियां तुम्हारे चरण पखारने के लिए तैयार थीं, लेकिन तुम उनके चक्कर में नहीं आए। तुम्हें जो मांगना है, वो मांग लो। 

भर्तृहरि बोले, ‘गुरुजी! बस आप प्रसन्न हैं, मुझे सब कुछ मिल गया। शिष्य के लिए गुरु की प्रसन्नता सब कुछ है। आप मुझसे संतुष्ट हुए, मेरे करोड़ों पुण्यकर्म और यज्ञ, तप सब सफल हो गए।’ गोरखनाथ बोले, ‘नहीं भरथरी! अनादर मत करो। तुम्हें कुछ-न-कुछ तो लेना ही पड़ेगा, कुछ-न-कुछ मांगना ही पड़ेगा।’ इतने में रेती में एक चमचमाती हुई सूई दिखाई दी। उसे उठाकर भरथरी बोले, ‘गुरुजी! कंठा फट गया है, सूई में यह धागा पिरो दीजिए ताकि मैं अपना कंठा सी लूं।’

गोरखनाथ जी और खुश हुए कि ’हद हो गई! कितना निरपेक्ष है, अष्टसिद्धि-नवनिधियां कुछ नहीं चाहिए। मैंने कहा कुछ मांगो, तो बोलता है कि सूई में जरा धागा डाल दो। गुरु का वचन रख लिया। कोई अपेक्षा नहीं? भर्तृहरि तुम धन्य हो गए! कहां उज्जयिनी का सम्राट नंगे पैर मरुभूमि में। एक महीना भी नहीं होने दिया, सात-आठ दिन में ही परीक्षा से उत्तीर्ण हो गए।’

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कामेंट्स

.... Oct 23, 2021
जय शनिदेव जी जय वीर हनुमान जी शुभ प्रभात वंदन जी शनिदेव की कृपा हनुमान जी का आशीर्वाद आप सभी भाई बहनों पर बना रहे ईश्वर आप के परिवार को सदा खुश रखे आपका दिन मंगलमय हो🥀🍀🙏🍀

Babbu Bhai Oct 23, 2021
Ram Ram Ji. Good Morning My Dear Sweet Sister. God Bless You And Your Family

Deepa Binu Oct 23, 2021
HARE KRISHNA 🙏 Good Morning JI 🌷 Have a beautiful day 🌷

Ravi Kumar Taneja Oct 23, 2021
🌈शुभ दोपहर वंदन जी🌴🌈🌴 🔔जय रवि पुत्र शनि महाराज🙏🚩🙏 💥🚩श्री राम जय राम जय जय राम🙏🚩💥 ‼️जय जय जय बजरंग बली‼️ 🕉आप हमेशा खुश रहें,मस्त रहें, मुस्कुराते रहें, स्वस्थ रहें🙏💥🙏 🕉शं शनिश्चराय नमः🙏⚘🙏शनि देव की दया- दृष्टि आप पर और आपके परिवार पर सदैव बनी रहे,आपका दिन खुशियों से परिपूर्ण हो🙏🌷🙏 🕉🦚🦢🙏🌸🙏🌸🦢🦚🕉

Ansouya Mundram 🍁 Oct 23, 2021
जय सिया राम 🌹🙏🌹 सप्रेम शुभ दोपहर प्यारी बहना जी 🙏 आप का दिन शुभ और मंगलमय हो 🙏 प्रभु श्री राम जी और हनुमान जी की कृपा आप और आपके परिवार पर हमेशा बना रहे बहना जी 🙏 जय बजरंगबली हनुमान 🙏 जय श्री शनिदेव जी महाराज 🙏🙏 🌹🙏🏻🌹🙏🏻🌹

Runa Sinha Oct 23, 2021
Jai Shanidev 🌹🙏🏻🌹 Good afternoon. Panchmukhi Maharaj evam Shanidev Maharaj aapki samast kamnaon ki purti karen. Aapka sada kalyan karen, bahan🙏🏻

Kailash Chandra Vyas Oct 23, 2021
सत् घटनाओ से भारत अटा पडा़ है। आपने.सुंदर चयन किया।##भिक्षा देदे मैया पींगला, जोगी खडा़ है व्दार राजा भृतहरि।##पत्तनी से भिक्षा मंग कर लाना राजा कि अंतिम परीक्षा थी। उसे भी उन्होने किया।शुभ संध्या जी।राधे राधे।

brindaban 9178010443 Oct 23, 2021
राधे राधे जी श्री आदरणीय योगेश्वरी सीमा रानी राज राजेश्वरी देवी श्री जी सुभसंध्या की हार्दिक शुभकामनाएं जी🌹🤝🌹

Anil Oct 23, 2021
good night 🙏🙏🙏

Saumya sharma Oct 23, 2021
जय श्री राम प्यारी बहना जी 🙏अति सुंदर पोस्ट के लिए धन्यवाद 🙏🌹इस संसार में सबसे सुंदर संगीत दिल की धड़कन है क्योंकि ईश्वर ने स्वयं इसे बनाया है ☺आपके जीवन में यह संगीत दीर्घ काल तक बजता रहे इसी कामना के साथ शुभ रात्रि विश्राम 🙏आप सपरिवार स्वस्थ व प्रसन्न रहें ☺🌹🙏

GOVIND CHOUHAN Oct 23, 2021
Jai Shree Ram 🌷 Jai Siyaram 🌷 Jai Jai Jai Bajarang Bali 🌷🙏🙏 Shubh Raatri Vandan Jiii 🙏🙏

Rani Oct 23, 2021
jai shree radhe radhe 🙏🌹subh ratri vandan bahana ji🙏🌹

🌷JK🌷 Oct 23, 2021
🌹Jai Sri Radhe krishna🌹 subh ratri vandan ji 🌹🙏🌹

RAKESH SHARMA Oct 23, 2021
JAI SHREE RAM JAI HANUMAN JAI SHANI DEV AP AUR PARIWAR KI SABHI MANOVANCHHIT MANOKAMANA PARIPURN KARE HAR SANKAT NIRASHA SE DUR RAKHE JAI HANUMAN 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

RAKESH SHARMA Oct 23, 2021
SUKH SMIRIDDHI K SATH MANGALMAY SHUBHRATRI VANDAN AVM SHAT SHAT SNEHIL SADAR NAMAN SADEV SAPARIWAR AANANDMAY BHAKTIMAY GYAN MARG PAR AGRA'SAR SWASTH PRAGATISHEEL RAHE 🌹🙏🌹🙏🌹🙏🌹🙏

Bhagat ram Oct 23, 2021
🌹🌹 जय श्री कृष्णा राधे राधे जी 🙏🙏💐🌺🌿🌹🌹 शुभ रात्रि वंदन जी 🙏🙏💐🌺🌿🌹🌹

Ravi Kumar Taneja Oct 23, 2021
*🌙करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाये*💙 💚सौभाग्य और आरोग्य के लिए माँ दुर्गा के निम्न अमोघ मंत्र का अनुष्ठान करें *देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌।* *रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥* 💟माँ दुर्गा से प्रार्थना है कि सभी सुहागिन बहनों , स्त्रियों को स्वास्थ्य, आरोग्य, सौभाग्य प्रदान करे औऱ अनके पति को लम्बी आयु प्रदान करके उन्हे सौभाग्यशाली बनाए रखें !!!💟 🕉💛🙏🌹🙏💛🕉

🙋ⒶⓃⒿⒶⓁⒾ😊 ⓂⒾⓈⒽⓇⒶ🙏 Oct 25, 2021
☘️ॐ नमः शिवाय ☘️ राधे राधे जी शुभ रात्रि वंदन 🌹🙏आप का हर पल आनंदमय हो👌भगवान भोले नाथ अप को सदा सुखी रखे ✋जय श्री राधे कृष्णा 🌷हर हर महादेव🍀🌷🙏

Ram Niwas Soni Nov 27, 2021

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SaarthakR Prajapat Nov 27, 2021

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ILA SINHA Nov 27, 2021

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Kailash Prasad Nov 27, 2021

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Kailash Prasad Nov 27, 2021

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Ramesh agrawal Nov 27, 2021

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Bindu Singh Nov 27, 2021

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prakash patel Nov 27, 2021

🏹 રામાયણ🏹 અયોધ્યા કાંડ ✍️ ૧૮ લક્ષ્મણજી આગળ કહે છે કે-મનુષ્ય-જન્મ ની અંદર જે કંઇ ધર્મ,અર્થ અને કામ પ્રાપ્ત થાય છે તે,પણ પૂર્વજન્મ માં કરેલાં ધર્મ-કર્મ નું જ ફળ છે.તે જ પ્રારબ્ધ (દૈવ) છે.અને તે ભોગવ્યા વિના કોઈ પણ ઉપાયે તેનો નાશ થઇ શકતો નથી.ભોગવાઈ જાય એટલે આપોઆપ આ પ્રારબ્ધ (દૈવ) પુરુ થાય છે. એકવાર રામજી આગળ હું પુરુષાર્થ ની બડાઈ કરતો હતો ત્યારે તેમણે જ મને કહ્યું હતું કે- જેને પુરુષાર્થ કહે છે તે –કાગ-તાડીય ન્યાય જેવું છે. જેમ,કાગડા નું બેસવું અને તાડ ના ઝાડ ના ફળ નું પડવું,-એ બે ક્રિયાઓ કોઈ વાર એક સાથે થઇ જાય છે, તેમ,પુરુષાર્થ થી ફળ મળી જાય છે,પરંતુ તેમ છતાં પ્રારબ્ધ જ સર્વ વાતે બળવાન છે.અને પ્રાણી માત્ર ને સુખ,દુઃખ,ભય,લાભ,હાનિ,ક્રોધ,લોભ,બંધન અને મોક્ષ –એ બધામાંથી જે કંઈ પ્રાપ્ત થાય છે, એ પ્રારબ્ધ (દૈવ) નું જ કાર્ય છે. ઘણીવાર મોટા આરંભેલા કાર્ય નો પણ એકાએક વિઘ્ન આવતા નાશ થઇ જાય છે. હે ભાઈ,આ સંસાર માં કોઈ કોઈ ને સુખી કે દુઃખી કરી શકતું નથી, પરંતુ,સૌ પોતપોતાનાં કરેલાં કર્મોનું ફળ ભોગવે છે. કાહુ ન કોઉં સુખ કર દુઃખ દાતા,નિજ કૃત કરમ ભોગ સબુ ભ્રાતા. સુખ-દુઃખ નું કારણ અંદર શોધે તે સંત, અને બહાર શોધે તે પામર. પામર એટલા માટે કે-એને બહાર કશું જડવાનું નથી,કેવળ ભ્રમ પ્રાપ્ત થવાનો છે. કોઈ બીજો સુખ-દુઃખ આપે છે એવી કલ્પના માત્ર થી તે વ્યક્તિ પ્રત્યે વેરભાવ પેદા થાય છે. માટે સર્વદા મન ને સમજાવવું કે –સુખ-દુઃખ તેં જ પેદા કરેલું છે. મનમાં જ્યાં સુધી સુખ-દુઃખ છે ત્યાં સુધી તે સુખ-દુઃખ છે,બાકી તે (સુખ-દુઃખ) ખરેખર તો છે જ નહિ. સંયોગ-વિયોગ,શત્રુ-મિત્ર,જન્મ-મૃત્યુ,સંપત્તિ –વિપત્તિ—એ સર્વ નું મૂળ મોહ છે, અજ્ઞાન છે. જમીન,ઘર, ધન,નગર,પરિવાર,સ્વર્ગ,નરક—એ બધું યે અજ્ઞાન નું જ ફળ છે.ખરી રીતે તે બધાં છે જ નહિ. જેમ સ્વપ્ન માં રાજા ભિખારી થઇ જાય કે ભિખારી રાજા થઇ જાય,પણ જાગ્યા પછી જુએ તો નથી કોઈ ભિખારી થયો કે નથી કોઈ રાજા થયો,તેમ આ બધી સ્વપ્ન ની દુનિયા છે. આપણે બધાં મોહ ની રાત્રિ માં સૂતાં છીએ અને સૂતાં સૂતાં સ્વપ્નાં જોઈએ છીએ. અહીં જે જાગે છે તે જોગી છે,અને જે નથી જાગતો તે ભોગી છે. જ્યાં સુધી ભોગ છે,વિષય-વિલાસ છે,ત્યાં સુધી આ સ્વપ્ન ના જેવી દુનિયા સાચી છે એવું લાગે છે, પણ જેવો ભોગ છૂટ્યો,અને વૈરાગ્ય આવ્યો,ત્યારે સ્વપ્નમાંથી જાગૃતિ માં પ્રવેશ થયો સમજવો. એટલા માટે ગીતામાં કહ્યું છે કે-ભોગીઓ જયારે ઊંઘે છે ત્યારે જોગીઓ જાગે છે અને જોગીઓ જયારે ઊંઘતા હોય છે ત્યારે ભોગીઓ ની આંખ ઉઘાડી હોય છે. શ્રીરામ પરમાનંદ-બ્રહ્મ-સ્વ-રૂપ છે.મનથી ન જણાય તેવા,સૂક્ષ્મ દ્રષ્ટિથી યે ન દેખાય એવા,એ, અનાદિ,અનુપમ,અવિકારી અને ભેદ-રહિત છે. એમને કર્મ નું કોઈ બંધન નથી,તેઓ તો કર્માંતીત છે,અને તેઓ પોતાની ઇચ્છાથી પ્રગટ થાય છે. “શ્રીરામ સત્ય-પર-બ્રહ્મ છે,અને રામ (બ્રહ્મ) વિના આ જગતમાં બીજું કંઈ છે જ નહિ” અરે,રામજી (રામ-નામ) નું જે સ્મરણ કરે,તેણે કદી દુઃખ થતું નથી તો રામજી ને શું દુઃખ થવાનું? રામજી ને તો તળાઈ (રૂ ની પથારી) કે પરાળ (ઘાસ ની પથારી) સરખાં છે, મેવા-મીઠાઈ ને કંદમૂળ સરખાં છે, રાજપાટ અને વનવાસ પણ સરખાં છે. કૈકેયી એ એમને વનવાસ દીધો પણ એમના મનમાં ક્ષણ માટે પણ રોષ પ્રગટ્યો નથી. એમના મન માં દ્વિધા ને સ્થાન નથી,સંશય ને સ્થાન નથી,રાગ-દ્વેષ ને સ્થાન નથી. જીવને પોતાનાં કર્મ પ્રમાણે જન્મ મળે છે,તે કર્મ થી બંધાયેલ છે,પણ ઈશ્વર (બ્રહ્મ) તો સ્વેચ્છા એ પ્રગટ થાય છે. તેઓ તો કર્મ થી પર છે.તેમ છતાં પરમાત્મા જયારે લીલા કરવા પૃથ્વી પર પધારે છે ત્યારે, તેઓ કર્મ ની મર્યાદા રહે છે, અને જગતને એવો આદર્શ બતાવે છે કે- “હું ઈશ્વર છું,છતાં પણ કર્મ ની મર્યાદા પાળું છું,કર્મ ના બંધન માં છું” આ ભગવાન ની લીલા છે. પૃથ્વી પરના જીવો ને આશ્વાસન આપવા માટે પ્રભુ આમ કરે છે. https://m.facebook.com/groups/367351564605027/permalink/609166967090151/ 🏹 ॐ શ્રી રામ જય રામ જય જય રામ 🙏🏼

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