Rajput Indra
Rajput Indra Nov 25, 2021

🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸 अनमोल वचन: मंदिर में नारियल तोड़ना ::-- 1_ सबसे पहले हम नारियल की जटा हटाते है.. .ये हैं हमारी इच्छाएंँ, जिन्हें सबसे पहले हटाना है। 2_ उसका कठोर हिस्सा तोड़ते है..... ये है हमारा अहंकार,जिसे हटाना बहुत जरुरी है। 3__फिर निकलता है पानी,,, ये हमारे अंदर के गलत विचार हैं ! 4__ फिर आती है प्योर सफ़ेद गिरी.. जो आत्मा का प्रतीक है...। ### आत्मा इच्छा, अहंकार और गलत सोच को हटाये बिना परमात्मा से नहीं मिल सकती । 🙏ओम् शांति 🙏 🍁आपका दिन शुभ हो 🍁 🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸🌿🌸

+7 प्रतिक्रिया 1 कॉमेंट्स • 9 शेयर

कामेंट्स

+8 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 22 शेयर

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷 🕉🇮🇳 *卐 सत्यराम सा 卐* 🇮🇳🕉 🌹🙏 *ॐ नमो नारायण* 🙏🌹 🌿🌷🌻 *शुभ~दिवस* 🌻🌷🌿 🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳.🇮🇳🦚🇮🇳 *स्वर, संगीत ~ @श्री दास जी* *सौजन्य : अखिल भारतीय श्रीदादू सेवक समाज* 🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉🌻🕉 . *दादू जब दिल मिली दयालु सौं, तब अंतर नांही रेख ।* *नाना विधि बहु भूषणां, कनक कसौटी एक ॥३०८॥* टीका - हे जिज्ञासुओं ! जैसे स्वर्ण के नाना आभूषणों को अग्नि कसौटी देवे, तो केवल स्वर्ण शेष रहता है, उसी प्रकार संसार में जीवों के जो नानात्वरूप हैं, सो भी स्वर्ण के आभूषणों की भाँति संसार - दृष्टि से भिन्न - भिन्न प्रतीत होते हैं, किन्तु सत्य कसौटी ब्रह्मज्ञान होने पर उनमें किंचित् भी द्वैतभाव नहीं रहता है ॥३०८॥ *(#श्रीदादूवाणी ~ परिचय का अंग)* https://youtu.be/EN00yTrfvwc https://youtu.be/EN00yTrfvwc

+6 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

चंद्रमा की सुन्दरता व राजा दक्ष प्रजापति का चंद्रमा को श्राप 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️ चंद्रमा की सुंदरता पर राजा दक्ष की सत्ताइस पुत्रियां मोहित हो गईं. वे सभी चंद्रमा से विवाह करना चाहती थी दक्ष ने समझाया सगी बहनों का एक ही पति होने से दांपत्य जीवन में बाधा आएगी लेकिन चंद्रमा के प्रेम में पागल दक्ष पुत्रियां जिद पर अड़ी रहीं. अश्विनी सबसे बड़ी थी. उसने कहा कि पिताजी हम आपस में मेलजोल से मित्रवत रहेंगे. आपको शिकायत नहीं मिलेगी. दक्ष ने सत्ताईस कन्याओं का विवाह चंद्रमा से कर दिया. विवाह से चंद्रमा और उनकी पत्नियां दोनों बहुत प्रसन्न थे लेकिन ये खुशी ज्यादा दिनों तक नहीं रही. जल्द ही चंद्रमा सत्ताइस बहनों में से एक रोहिणी पर ज्यादा मोहित हो गए और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करने लगे. यह बात दक्ष को पता चली और उन्होंने चंद्रमा को समझाया. कुछ दिनों तक तो चंद्रमा ठीक रहे लेकिन जल्द ही वापस रोहिणी पर उनकी आसक्ति पहले से भी ज्यादा तेज हो गई. अन्य पुत्रियों के विलाप से दुखी दक्ष ने फिर चंद्रमा से बात की लेकिन उन्होंने इसे अपना निजी मामला बताकर दक्ष का अपमान कर दिया. दक्ष प्रजापति थे. कोई देवता भी उनका अनादर नहीं करता था. क्रोधित होकर उन्होंने चंद्रमा को शाप दिया कि तुम क्षय रोग के मरीज हो जाओ. दक्ष के शाप से चंद्रमा क्षय रोग से ग्रस्त होकर धूमिल हो गए. उनकी चमक समाप्त हो गई. पृथ्वी की गति बिगड़ने लगी. परेशान ऋषि-मुनि और देवता भगवान ब्रह्मा की शरण में गए. ब्रह्मा, दक्ष के पिता थे लेकिन दक्ष के शाप को समाप्त कर पाना उनके वश में नहीं था. उन्होंने देवताओं को शिवजी की शरण में जाने का सुझाव दिया. ब्रह्मा ने कहा- चंद्रदेव भगवान शिव को तप से प्रसन्न करें. दक्ष पर उनके अलावा किसी का वश नहीं चल सकता. ब्रह्मा की सलाह पर चंद्रमा ने शिवलिंग बनाकर घोर तप आरंभ किया. महादेव प्रसन्न हुए और चंद्रमा से वरदान मांगने को कहा. चंद्रमा ने शिवजी से अपने सभी पापों के लिए क्षमा मांगते हुए क्षय रोग से मुक्ति का वरदान मांगा. भगवान शिव ने कहा कि तुम्हें जिसने शाप दिया है वह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है. उसके शाप को समाप्त करना संभव नहीं फिर भी मैं तुम्हारे लिए कुछ न कुछ करूंगा जरूर. शिवजी बोले- एक माह में जो दो पक्ष होते हैं, उसमें से एक पक्ष में तुम मेरे वरदान से निखरते जाओगे, लेकिन दक्ष के शाप के प्रभाव से दूसरे पक्ष में क्षीण होते जाओगे. शिव के वरदान से चंद्रमा शुक्लपक्ष में तेजस्वी रहते हैं और कृष्ण पक्ष में धूमिल हो जाते हैं. चंद्रमा की स्तुति से महादेव जिस स्थान पर निराकार से साकार हो गए थे उस स्थान की देवों ने पूजा की और वह स्थान सोमनाथ के नाम से विख्यात हुआ. चंद्रमा की वे सताइस पत्नियां ही सताइस विभिन्न नक्षत्र हैं. (शिवपुराण की कथा ) 〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️🔸〰️〰️

+37 प्रतिक्रिया 8 कॉमेंट्स • 37 शेयर

+2 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर
sn vyas Jan 24, 2022

आचार्य डॉ0 विजय शंकर मिश्र (प्रशासनिक सेवा) *************************************** -------------------:सांग्रीला घाटी:-------------------- ***************************** भाग--02 ********* परम श्रद्धेय ब्रह्मलीन गुरुदेव पण्डित अरुण कुमार शर्मा काशी की अद्भुत अध्यात्म-ज्ञानगंगा में पावन अवगाहन पूज्यपाद गुरुदेव के श्रीचरणों में कोटि-कोटि वन्दन सांग्रीला घाटी के तीन साधनाकेंद्र प्रसिद्ध हैं--पहला है 'ज्ञानगंज मठ', दूसरा है 'सिद्धविज्ञान आश्रम' और तीसरा है 'योग सिद्धाश्रम'। ये तीनों आश्रम अत्यन्त विशाल हैं और उनमें अनेक विभाग हैं और हर विभाग के अलग-अलग आचार्य और निदेशक हैं। सभी आचार्य और सभी निदेशक ब्राह्मीभाव प्राप्त उच्चकोटि के ज्ञानयोगी हैं। वे दीर्घजीवी हैं और हैं कालंजयी। प्रायः वे आत्मशरीर में रहते हैं। उनका भौतिक और सूक्ष्म शरीर अलग-अलग रहता है। कहने का मतलब है कि वे लोग साधना तो आत्मशरीर में रहकर करते हैं, लेकिन सूक्ष्मशरीर से संचरण-विचरण करते हैं। कभी-कदा आवश्यकता पड़ने पर भौतिक शरीर का भी उपयोग कर लेते हैं।वर्ना वह शरीर निष्क्रिय ही पड़ा रहता है। उन लोगों का सूक्ष्मशरीर अत्यन्त प्रखर एवम् शक्तिशाली होता है जिसके फलस्वरूप वे लोग सूक्ष्मशरीर के द्वारा तत्क्षण हज़ारों मील की यात्रा कर सकते हैं और आवश्यकतानुसार भौतिक शरीर में प्रकट हो सकते हैं। स्वामी विशुद्धानंद परमहंसदेव जो महामहोपाध्याय डा.गोपीनाथ कविराज के गुरु थे और 'गंधबाबा' के नाम से प्रसिद्ध थे, 'ज्ञानगंज' मठ से सम्बंधित थे। उसी मठ के आचार्य ने उन्हें योगदीक्षा दी थी और 'सूर्यविज्ञान' में पारंगत किया था। ज्ञानगंज मठ के आचार्य सदैव आकाश-मार्ग से योगानुकूल और दिव्य संस्कार-सम्पन्न शिष्यों की खोज में रहा करते हैं, मिल जाने पर उन्हें अपने मठ में ले जाते हैं और शिक्षा-दीक्षा के बाद योग के प्रचार-प्रसार के लिए संसार में भेज देते हैं। स्वामी विशुद्धानंद परमहंसदेव ऐसे ही शिष्य थे। उन्हें इसी प्रकार ले जाया गया था और सूर्यविज्ञान में पारंगत हो जाने के बाद उन्हें वापस कर दिया गया था। ज्ञानगंज मठ के दो प्रमुख विभाग हैं। पहला विभाग विशुद्ध 'ज्ञानयोग' से सम्बंधित है और दूसरा विभाग 'योगविज्ञान' का है। योगविज्ञान से सम्बंधित 16 विज्ञान हैं जिनमें सौरविज्ञान, नक्षत्र विज्ञान, कालविज्ञान, क्षणविज्ञान, सूर्यविज्ञान, चंद्रविज्ञान और वासुविज्ञान प्रमुख हैं। इन सभी विज्ञानों की शिक्षा-दीक्षा अलग-अलग दी जाती है । संसार में जो जिस विज्ञान के पात्र हैं, उन्हें खोज-खोज कर आचार्य ले जाते हैं और सम्बंधित विज्ञान की शिक्षा देने के बाद पुनः संसार में वापस भेज देते हैं। स्वामी विशुद्धानंद परमहंसदेव सूर्यविज्ञान के योग्य थे। इसीलिये उन्हें उपयुक्त समझकर महापुरुष स्वामी नीमानंद परमहंसदेव अपने साथ ज्ञानगंज मठ ले गए थे। स्वामी नीमानन्द दीर्घ अवस्था प्राप्त कालंजयी योगी हैं। आकाशचारी तो हैं ही, उनके गुरु जो हज़ारों वर्ष की आयु के हैं, उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अपने पांचों शरीरों में अलग-अलग निवास करते हैं। उनका भौतिक शरीर तो हमेशा 25 वर्ष के युवक के समान रहता है। उन्होंने ही स्वामी विशुद्धानंद जी को योगविज्ञान की दीक्षा दी थी और अपने निकट के योगियों जिनके नाम थे--श्यामनन्द परमहंस, भृगुराम परमहंस और दिव्यानन्द परमहंस, के पास सूर्यविज्ञान की शिक्षा के लिए भेज दिया। स्वामी विशुद्धानंद परमहंसदेव को उनके महागुरु ने एक दिव्य शक्ति-सम्पन्न अलौकिक शिवलिंग दिया था जिसकी स्थापना स्वामीजी ने 'वंडुलेश्वर' के नाम से अपने गांव 'वंडूल' में की थी। वह शिवलिंग आज भी विद्यमान है। तीनों आश्रमों के बाद दो-तीन तान्त्रिक मठ भी हैं जो काफी लम्बे-चौड़े हैं और जिनमें उच्चकोटि के कापालिक और शाक्त साधक निवास करते हैं। अपनी अलौकिक साधनाओं की सिद्धि व सफलता के लिए नर-बलि देना और शव-साधना करना उनका प्रमुख कार्य है। वे साधक लोग भी अलौकिक शक्ति-सम्पन्न, कालंजयी और आकाशचारी हैं। वे भी योग्य पात्र की खोज में भ्रमण करते रहते हैं। इसी प्रकार सिद्ध तांत्रिक लामाओं के भी कई योग-तांत्रिक मठ और आश्रम हैं और उनका बाहरी दुनियां के कई मठों तथा आश्रमों से सम्बन्ध है। मगर वे भौतिक जगत् के सामने अपने परिचय को गुप्त रखते हैं। (श्रद्धेय गुरुदेव श्रीअरुण कुमार शर्मा बताते हैं कि ) ऐसे ही एक तांत्रिक लामा से मेरी भेंट हुई थी। वह किसी काम से तवांग मठ में आया था। उसे कई प्रकार की तांत्रिक सिद्धियां प्राप्त थीं। अपनी किसी सिद्धि के लिए वह योग्य शव की खोज में था और उसी सिलसिले में उससे मेरी भेंट हुई थी। पहली ही भेंट में मैं उससे प्रभावित हो गया। 'सियांग मठ' में रहता था वह। सैकड़ों वर्ष से कापालिक संप्रदाय के अघोरियों की भयंकर तामसिक साधनाओं का केंद्र है--सियांग मठ। सैकड़ों वर्ष की आयु के अनेक कालंजयी कापालिक न जाने कब से उस मठ में रहते चले आ रहे हैं। वे सभी मानवेतर शक्ति-सम्पन्न हैं। अपनी भयानक तमोगुणी तांत्रिक शक्तियों के बल पर प्रकृति में विकृति पैदा कर असंभव से असंभव कार्य का सकने में समर्थ हैं वे। अगर उस लामा से मेरी( गुरुदेव की ) भेंट न हुई होती तो न सांग्रीला घाटी के बारे में कुछ जानता और न तो गया ही होता उस रहस्यमयी घाटी में। उसी ने मुझे प्रेरणा दी और उसी प्रेरणा के वश में होकर तैयार हो गया मैं उसके साथ जाने के लिए। मगर कब और कैसे तीन आयाम वाले इस जगत् की सीमा लांघकर चौथे आयाम में चला गया--पता ही नहीं चला मुझे। एक बात अवश्य है कि प्रवेश करते ही इस जगत् का अस्तित्व वायवीय हो गया और इसकी जगह एक सर्वथा नवीन आलोकमय संसार उदभासित जो उठा मेरे सामने और उसी के साथ पिछली सारी स्मृतियां भी विलुप्त हो गईं मेरी। आश्चर्य की बात तो यह है कि वहां न सूर्य का प्रकाश था और न थी चाँद की चाँदनी। वातावरण में एक दूधिया प्रकाश फैला हुआ था और उसीके साथ चारों तरफ विचित्र-सी ख़ामोशी फैली हुई थी। उसी दूधिया प्रकाश में मैंने देखा कि एक ओर मठों, आश्रमों की आकृतियों के मन्दिर थे और दूसरी ओर थी सुदूर तक फैली हुई सांग्रीला की सुनसान घाटी। घाटी काफी रमणीक और आकर्षक लगी मुझे। एक अनिर्वचनीय शान्ति का साम्राज्य था वहां। न जाने कब और कैसे मैं लामा के साथ एक ऐसे स्थान पर पहुंचा जहाँ की जमीन स्फटिक की तरह पारदर्शी और चमकीली थी। लामा ने कान में फुसफुसाकर कहा--जानते हो ?--यह ज़मीन जहाँ तुम खड़े हो, एक महान् योगी की प्रबल इच्छाशक्ति के वशीभूत है। इतना ही नहीं, इस ज़मीन का अगोचर सम्बन्ध अनेक लोक-लोकान्तरों से भी है। शेष आगे की पोस्ट में--

+3 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 2 शेयर

इन 5 कामों में देर करना अच्छी बात है 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️ कबीरदास का एक बहुत ही प्रसिद्ध दोहा है- काल करे सो आज कर, आज करै सो अब। यानी जो काम कल करना है, उसे आज ही कर लेना चाहिए और जो काम आज करना है, उसे अभी कर लेना चाहिए। इसका सीधा सा अर्थ ये है कि किसी भी काम को करने में देर नहीं करना चाहिए। ये बात सभी कामों के लिए सही नहीं है। स्त्री और पुरुष, दोनों के लिए कुछ काम ऐसे भी हैं, जिनमें देर करना अच्छी बात है। महाभारत के एक श्लोक में बताया है कि हमें किन कामों को टालने की कोशिश करनी चाहिए… रागे दर्पे च माने च द्रोहे पापे च कर्मणि। अप्रिये चैव कर्तव्ये चिरकारी प्रशस्यते।। ये श्लोक महाभारत के शांति पर्व में दिया गया है। इसमें 5 काम ऐसे बताए गए हैं, जिनमें देर करने पर हम कई परेशानियों से बच सकते हैं। 1 पहला काम है राग👉 इन पांच कामों में पहला काम है राग यानी अत्यधिक मोह, अत्यधिक जोश, अत्यधिक वासना। राग एक बुराई है। इससे बचना चाहिए। जब भी मन में राग भाव जागे तो कुछ समय के लिए शांत हो जाना चाहिए। अधिक जोश में किया गया काम बिगड़ भी सकता है। वासना को काबू न किया जाए तो इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं। किसी के प्रति मोह बढ़ाने में भी कुछ समय रुक जाना चाहिए। राग भाव जागने पर कुछ देर रुकेंगे तो ये विचार शांत हो सकते हैं और हम बुराई से बच जाएंगे। 2 दूसरा काम है घमंड👉 दर्प यानी घमंड ऐसी बुराई है जो व्यक्ति को बर्बाद कर सकती है। घमंड के कारण ही रावण और दुर्योधन का अंत हुआ था। घमंड का भाव मन में आते ही एकदम प्रदर्शित नहीं करना चाहिए। कुछ देर रुक जाएं। ऐसा करने पर हो सकता है कि आपके मन से घमंड का भाव ही खत्म हो जाए और आप इस बुराई से बच जाएं। 3 तीसरा काम है लड़ाई👉 करना यदि कोई ताकतवर इंसान किसी कमजोर से भी लड़ाई करेगा तो कुछ नुकसान तो ताकतवर को भी होता है। लड़ाई करने से पहले थोड़ी देर रुक जाना चाहिए। ऐसा करने पर भविष्य में होने वाली कई परेशानियों से हम बच सकते हैं। आपसी रिश्तों में वाद-विवाद होते रहते हैं, लेकिन झगड़े की स्थिति आ जाए तो कुछ देर शांत हो जाना चाहिए। झगड़ा भी शांत हो जाएगा। 4 चौथा काम है पाप👉 करना यदि मन में कोई गलत काम यानी पाप करने के लिए विचार बन रहे हैं तो ये परेशानी की बात है। गलत काम जैसे चोरी करना, स्त्रियों का अपमान करना, धर्म के विरुद्ध काम करना आदि। ये काम करने से पहले थोड़ी देर रुक जाएंगे तो मन से गलत काम करने के विचार खत्म हो सकते हैं। पाप कर्म से व्यक्ति का सुख और पुण्य नष्ट हो जाता है। 5 पांचवां काम है👉 दूसरों को नुकसान पहुंचाना यदि हम किसी का नुकसान करने की योजना बना रहे हैं तो इस योजना पर काम करने से पहले कुछ देर रुक जाना चाहिए। इस काम में जितनी देर करेंगे, उतना अच्छा रहेगा। किसी को नुकसान पहुंचाना अधर्म है और इससे बचना चाहिए। पुरानी कहावत है जो लोग दूसरों के लिए गड्ढा खोदते हैं, एक दिन वे ही उस गड्ढे में गिरते हैं। इसीलिए दूसरों का अहित करने से पहले कुछ देर रुक जाना चाहिए। 〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️🌸〰️〰️

+24 प्रतिक्रिया 2 कॉमेंट्स • 39 शेयर

भारत के अत्यन्त प्रसिद्ध तीन प्राचीन सूर्य-मन्दिर 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ भारत में सूर्यपूजा, मन्दिर निर्माण, प्रतिमाआराधना आदि वैदिक कर्म अत्यन्त प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध है। नारदादि ऋषि सूर्यवंशी सूर्याराधक थे। द्वापर में भगवान कृष्ण एवं साम्ब के विशेष चन्द्रवंशी क्षत्रिय भी सूर्याराधक थे। इनमें साम्ब का विस्तृत चरित्र साम्बविजय, साम्ब-उपपुराण तथा वराह, भविष्य, ब्रह्म एवं स्कन्दादि महापुराणों में प्राप्त होता है। उन्होंने कुष्ठ रोग से मुक्ति के लिये मूल स्थान मुल्तान में सूर्य मन्दिर का निर्माण कराया एवं सूर्य की आराधना द्वारा उनकी कृपा प्राप्त कर रोग मुक्त हुए। सूर्य देव ने उन्हें अपनी प्रतिमा-लाभ एवं स्थापना की भी बात बतलायी। शीघ्र ही उन्हें चन्द्रभागा नदी में एक बहती हुई विश्वकर्मानिर्मित प्रतिमा भी मिली, जिसे उन्होंने मित्रवन में स्थापित किया। भगवान सूर्य ने साम्ब को फिर प्रातःकाल में सुतीर (मुण्डीर). मध्यान्ह में कालप्रिय (कालपी) तथा सायंकाल में मूलस्थान में अपने दर्शन करने की बात बतलायी सांनिध्यं मम पूर्वान्हे सुतीरे द्रक्ष्यते जनः । कालप्रिये च मध्यान्हे परान्हे चात्र नित्यशः ।। तदनुसार साम्ब ने उदयाचल के पास सुतीर में यमुना तट पर कालपी में तथा मूल स्थान (मूल्तान) में सूर्यप्रतिमाएँ स्थापित की। सुतीर की जगह स्कन्दपुराण में मुण्डीर पाठ प्राप्त होता है तथा साम्ब पुराण में इसे रविक्षेत्र या सूर्यकानन कहा गया है। ब्रह्मपुराण में इसे कोणादित्य या उत्कलका कोणार्क कहा गया है, जो वस्तुतः पुरी से 30 मील दूरी पर स्थित आज का कोणार्क नगर ही हैं। इतिहास के अनुसार वर्तमान सूर्यमन्दिर को गांगनृसिंह देव ने प्रथम शती विक्रमी में निर्माण कराया था। वराहपुराण के अनुसार साम्ब ने कुष्ठमुक्ति के लिये श्रीकृष्ण से आज्ञा प्राप्त कर भुक्ति मुक्ति फल देने वाली मथुरा में आकर देवर्षि नारद की बतायी विधि के अनुसार प्रातः मध्यान्ह और सायंकाल में उन षट्सूर्यो की पूजा एवं दिव्य स्तोत्र उपासना आरम्भ की। भगवान् सूर्य ने भी योगबल की सहायता से एक सुन्दर रूप धारण कर साम्ब के सामने आकर कहा- 'साम्ब! तुम्हारा कल्याण हो। तुम मुझसे कोई वर माँग लो और मेरे कल्याणकारी व्रत एवं उपासना पद्धति का प्रचार करो। मुनिवर नारद ने तुम्हे जो साम्बपंचशिका' स्तुति बतलायी है, उसमें वैदिक अक्षरों एवं पदों से सम्बद्ध पचास श्लोक हैं। वीर! नारद जी द्वारा निर्दिष्ट इन श्लोकों द्वारा तुमने जो मेरी स्तुति की है, इससे मैं तुम पर पूर्ण संतुष्ट हो गया हूँ।" ऐसा कहकर भगवान सूर्य ने साम्ब के सम्पूर्ण शरीर का स्पर्श किया। उनके छूते ही साम्ब के सारे अंग सहसा रोग मुक्त होकर दीप्त हो उठे और दूसरे सूर्य के समान ही विद्योतित होने लगे। उसी समय याज्ञवल्क्यमुनि माध्यंदिन यज्ञ करना चाहते थे। भगवान् सूर्य साम्ब को लेकर उनके यज्ञ में पधारे और वहाँ उन्होंने साम्ब को माध्यंदिन-संहिता का अध्ययन कराया। तब से साम्ब का भी एक नाम 'माध्यंदिन पड़ गया। वैकुण्ठक्षेत्र के पश्चिम भाग में यह स्वाध्याय सम्पन्न हुआ था। अतएव इस स्थान को माध्यंदिनीय तीर्थ कहते हैं। वहाँ स्नान एवं दर्शन करने से मानव समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। साम्ब के प्रश्न करने पर सूर्य ने जो प्रवचन किया, वही से प्रसंग भविष्यपुराण के नाम से प्रख्यात पुराण बन गया। यहाँ साम्ब ने कृष्णगंगा के दक्षिण तट पर मध्यान्ह के सूर्य की प्रतिमा प्रतिष्ठापित की। जो मनुष्य प्रातः मध्यान्ह और अस्त होते समय इन सूर्यदेव का यहाँ दर्शन करता है, वह परम पवित्र होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त सूर्य की एक दूसरी उत्तम प्रातःकालीन विख्यात प्रतिमा भगवान् 'कालप्रिय' नाम से प्रतिष्ठित हुई। तदनन्तर पश्चिम भाग में मूलस्थान' में अस्ताचल के पास मूलस्थान नाम प्रतिमा की प्रतिष्ठा हुई। इस प्रकार साम्ब ने सूर्य की तीन प्रतिमाएँ स्थापित कर उनकी प्रातः, मध्यान्ह एवं संध्या- इन तीनो कालों में उपासना की भी व्यवस्था की साम्ब ने भविष्यपुराण में निर्दिष्ट विधि के अनुसार भी अपने नाम से प्रसिद्ध एक मूर्ति की यहाँ स्थापना करायी। मथुरा का वह श्रेष्ठ स्थान साम्बपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। कालपी के सूर्य का विवरण भवभूति के सभी नाटकों में तो है ही, राष्ट्रकूट राजा इन्द्र तृतीय के यात्राविवरण के साथ गोविन्ददेव तृतीय के कैम्बे प्लेट में भी इस प्रकार प्राप्त होता है। येनेदं हि महोदयारिनगर निर्मूलमुन्मूलितं । यन्माद्यद् द्विपदन्तघातविषय कालप्रियप्रांगणं । तीर्णा यत्तुगैरगाधयमुना सिन्धुप्रतिस्पर्द्धिनी।। नाम्नाद्यापि जनैः कुशस्थलमिति ख्यातिं परां नीयते।। मोहेड़ा सूर्य-मन्दिर भी प्राचीन है, पर इतिहास के विद्वान उसे 10 वी शती विक्रमी में निर्मित मानते है। 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️

+19 प्रतिक्रिया 3 कॉमेंट्स • 13 शेयर
prinshu Jan 23, 2022

+4 प्रतिक्रिया 0 कॉमेंट्स • 13 शेयर

भारत का एकमात्र धार्मिक सोशल नेटवर्क

Rate mymandir on the Play Store
5000 से भी ज़्यादा 5 स्टार रेटिंग
डेली-दर्शन, भजन, धार्मिक फ़ोटो और वीडियो * अपने त्योहारों और मंदिरों की फ़ोटो शेयर करें * पसंद के पोस्ट ऑफ़्लाइन सेव करें
सिर्फ़ 4.5MB