श्रीराम

Ram Niwas Soni Dec 27, 2021

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Vishwajeet Gaur Jan 10, 2022

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Babbu Bhai Jan 4, 2022

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🌱🌱जय श्री सीताराम जी 🌱🌱 🦚🦚❤️❤️🍁🍁❤️❤️🦚🦚 🎪 श्री सीताराम विवाह 🎪 सिय रघुवीर विवाह जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहं सदा उछाह मंगलायतन राम जसु।। भगवान श्री सीताराम जी के विवाह का गायन करते हुए श्री तुलसीदास जी महाराज यह पंक्तियां प्रस्तुत करते हैं, जिनका आशय है कि भगवान श्री सीताराम जी के विवाह की मंगलमयी कथा का प्रीति पूर्वक जो भी गायन और श्रवण करेंगे, उनके मन में सदा उत्साह बना रहेगा। क्योंकि श्री राघवेन्द्र का सुयश भक्त के जीवन में मंगल की सृष्टि करने वाला है - मंगलायतन राम जसु। श्री सीताराम जी के जयमाल के दृश्य को देखकर सभी आनंदित हो रहे हैं। अब इसमें कई अद्भुत बातें हैं। भगवान श्री राघवेन्द्र ने सिर झुकाया। श्री सीता जी जयमाल पहनाने में विलम्ब कर रही हैं। श्री राम जी ने कहा -- अब सिर झुका लिया, अब तो जयमाल पहना दीजिए। श्री सीता जी ने कहा कि आपने भी तो धनुष तोड़ने में विलम्ब किया था। अब मुझे अवसर मिला है तो मैं जयमाल पहनाने में देर करूंगी। राम जी ने कहा कि मेरी ओर से विलम्ब हो जाय तो आश्चर्य की बात नहीं है। ••• क्यों? श्री राम जी ने कहा -- मैं ज्ञान स्वरूप हूँ। ज्ञान अखंड एक सीतावर। और श्री किशोरी जी आप भक्ति स्वरूपा हैं। तो ज्ञान के मार्ग में विलम्ब हो, यह स्वाभाविक है लेकिन भक्ति की ओर से भी अगर विलम्ब होगा, तो भक्ति पर भरोसा कौन करेगा? इसलिए आप तो जयमाल पहना ही दीजिए। श्री जानकी जी ने मुस्कुरा कर कहा कि प्रभु! आप सिर झुकाए बड़े अच्छे लग रहे हो। अगर जयमाल पहना दूंगी, तो यह दृश्य देखने को नहीं मिलेगा। यह नयनाभिराम दृश्य देखो ना, आप सिर झुकाए बड़े अच्छे लग रहे हो। श्री राम जी ने कहा कि हम भरी सभा में सिर झुकाए बैठे रहें, यह क्या अच्छा लगता है आपको? यह क्या शोभा की बात है? श्री सीता जी ने कहा -- इसलिए कि जिनके लाख प्रयास करने के बाद भी धनुष हिला तक नहीं, वह ऐसे अभिमान में सिर उठाये बैठे हैं जैसे बहुत बड़ा काम किया हो, और जिसके छूते ही धनुष टूट गया हो, वह अगर सिर झुका कर बैठे तो यह शील का भाव प्रकट होता है। यह आपका शील स्वभाव देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। और इसमें कितना सुन्दर संकेत है? राम जी ज्ञान के रूप हैं तो मानो इशारा यह है कि ज्ञान की शोभा झुकने में ही है। विद्या ददाति विनयं। अगर हमें ज्ञान मिला है तो विनम्रता आनी ही चाहिए। देखो, जब वृक्षों में फल लग जाते हैं, तभी डालियाँ झुकती हैं। विना फल लगे वृक्षों की डालियाँ नहीं झुकतीं। इसी तरह बादलों में जब जल भर जाता है, तब वे नीचे की ओर आते हैं और मुझे लगता है इसी तरह जिनके जीवन में ज्ञान भर जाता है, वे ही विनम्र हो जाते हैं। तो ज्ञान की शोभा झुकने में है, और श्री सीता जी ने जयमाल पहनाई, इसका भाव यह है कि जिस ज्ञान में विनम्रता होती है, भक्ति तो उसी को जयमाल पहनाती है, उसी का स्वागत करती है। अब जयमाल गिरी, खूब आनन्द हुआ। पर सखियों ने श्री सीता जी से कहा कि अब राम जी के चरणों का स्पर्श करो। सखी कहहिं प्रभु पद गहु सीता। करति न परस चरन अति भीता।। सखियां कहती हैं -- श्री किशोरी जी! आप राम जी के चरणों में प्रणाम कीजिए। अब श्री सीता जी चरण स्पर्श नहीं कर रही हैं।••• क्यों? बड़ी भोली भावना है। श्री सीता जी को लगा कि ये तो वे ही चरण हैं, जिनके स्पर्श से शिला नारी बन गई। गौतम तिय गति सुरति कर नहिं परसत पद पान। जिनके स्पर्श से शिला नारी बन गई, तो कहीं ऐसा तो नहीं है कि नारी स्पर्श करने पर शिला बन जाती हो। तो श्री राम जी का सानिध्य मिला है तो यह योग कहीं वियोग में न बदल जाय। क्योंकि वे राम जी को पाकर उनसे बिलग नहीं होना चाहतीं। राम जी इस प्रेम को समझ गये, तो -- हिय विहंसे रघुवंशमणि प्रीति अलौकिक जानि। यह प्रीति अलौकिक है, लौकिक नहीं। इसका अर्थ एक और है। ••• क्या? ••• लौकिक प्रेम में वाह्य शिष्टाचार अनौपचारिकता की आवश्यकता होती है और यहाँ जयमाल गिरने के बाद दो रह ही नहीं गये। तो प्रणाम तो दो में होता है और जब दो हैं ही नहीं, तो -- रफ्ता-रफ्ता इश्क़ में वे आबरू हुए। पहले आप, आप से तुम, तुम से तू हुए।। अब दो रहे ही नहीं। उठ गया पर्दा दुई का दरम्यां से देख ले। अब तेरी तसबीर मैं हूँ तू मेरी तसबीर है।।

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