श्रीराम

ILA SINHA Jan 8, 2022

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Seemma Valluvar Jan 4, 2022

जनक ने कहा – ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होती है ? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है ? प्रभु ! यह मुझसे कहिये ।1। अष्टावक्र ने कहा – मुक्ति चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमा, दया, सरलता, सन्तोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर ।2। तू न पृथ्वी है, न जल है, न अग्नि है, न वायु है, न आकाश है । मुक्ति के लिए अपने को इन सबका साक्षी चैतन्यरूप जान ।3। यदि देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम कर स्थित है तो अभी ही सुखी, शान्त और बन्ध-मुक्त हो जाएगा ।4। तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं है और न तू किसी आश्रम वाला है, न आँख आदि इन्द्रियों का विषय है । तू असंग, निराकार और विश्व का साक्षी है, ऐसा जानकर सुखी हो ।5। हे विभो ! धर्म और अधर्म, सुख और दुःख मन के हैं । तेरे लिए नहीं । तू न कर्ता है, न भोक्ता है । तू तो सर्वदा मुक्त ही है ।6। तू एक सबका द्रष्टा है और सदा ही मुक्त है । तेरा बन्धन यही है कि तू अपने को छोड़कर दूसरे को द्रष्टा देखता है ।7। ‘मैं कर्ता हूँ’, ऐसा अहंकाररूपी विशाल काले सर्प से दंशित हुआ तू, ‘ मैं कर्ता नहीं हूँ’, ऐसे विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो ।8। ‘मैं एक विशुद्ध बोध हूँ’ ऐसी निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान को जलाकर तू शोक रहित हुआ सुखी हो ।9। यहाँ यह विश्व रस्सी में सर्प के समान भासता है । यही आनन्द-परमानन्द रूपी बोध है । अतः तू सुखपूर्वक विचर ।10। मुक्ति का अभिमानी मुक्त है, और बद्ध का अभिमानी बद्ध है । यहाँ यह किवदन्ती सत्य ही है कि जैसी मति वैसी ही गति होती है ।11। आत्मा साक्षी है, व्यापक है, पूर्ण है, एक है, मुक्त है, चैतन्यस्वरूप है, क्रियारहित है, असंग है, निस्पृह है, शान्त है । यह भ्रम से संसारी जैसा भासता है ।12। ‘मैं अभासरूप हूँ’ ऐसे भ्रम को एवं बाहर-भीतर के भाव को छोड़कर तू कूटस्थ बोधरूप एवं अद्वैत, आत्मा का विचार कर ।13। हे पुत्र ! तू बहुत काल से देहाभिमान के पाश से बँधा हुआ है । उसी पाश को ‘मैं बोध हूँ’ इस ज्ञान की तलवार से काटकर तू सुखी हो ।14। तू असंग है, क्रिया रहित है, स्वयंप्रकाश है और निरञ्जन है । तेरा बन्धन यही है कि तू समाधि के लिए अनुष्ठान करता है ।15। यह संसार तुझमें व्याप्त है, तुझी में पिरोया है । यथार्थतः तू चैतन्यस्वरूप है । अतः क्षुद्रचित्त को मत प्राप्त हो ।16। तू निरपेक्ष, निर्विकार, स्वनिर्भर है । शान्ति और मुक्ति का स्थान है, अगाध बुद्धिरूप है, क्षोभ-शून्य है । अतः चैतन्यमात्र में निष्ठा वाला हो ।17। साकार को मिथ्या जान, निराकार को निश्चल जान । इस तत्व के उपदेश से संसार में पुनः उत्पत्ति नहीं होती ।18। जिस तरह दर्पण अपने में प्रतिबिम्बित रूप के भीतर और बाहर स्थित है । उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर और बाहर स्थित है ।19। जिस प्रकार सर्वव्यापी एक आकाश घट के भीतर और बाहर स्थित है, उसी तरह नित्य और निरन्तर ब्रह्म सब भूतों में स्थित है ।20। ध्यान और एकांत यानी, “एक” का भी अंत...🧘‍♂️मैंने भगवान से पूछा इन मानवता के दुश्मन जेहादियों का अंत क्यों नहीं होता।भगवान ने कहा तुम्हारी प्रार्थना व संकल्प में दम ही नहीं है।ध्यान व ओंकार का साथ तुम लोगों ने छोड़ जो दिया है। जय श्री राम 🙏🌺🌺🌺🌺🚩

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